पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " दु:संग भले ही कितना मधुर एवं सम्मोहक लगे , किन्तु उसका यथार्थ महाविष की भाँति संघातक होता है l " आचार्य श्री लिखते हैं ----- " यदि किसी दुराचारी को सत्संग और सत्पुरुषों का साथ मिल जाए तो उसका भी कल्याण हो जाता है l " लेकिन सत्संग चाहे वह सत्पुरुषों का हो या सद्विचारों का , ईश्वर की कृपा से ही मिलता है l ---------------------- एक डाकू फकीरों के ---दरवेशों के वेश में डाके डालता था l अपना हिस्सा वह गरीबों में बाँट देता था l हाथ में माला लिए जपता रहता l एक बार उसके दल ने काफिला लूटा l एक व्यापारी के हाथ में ढेर सारा पैसा था l लूट चल रही थी l उसने फकीर को देखा l उसके पास सारा धन लाकर रख दिया l काफिला लुट जाने के बाद जब वह धन लेने पहुंचा तो देखा कि वहां तो लूट का माल बांटा जा रहा है l सरदार वही था जो फकीर ---दरवेश बना हुआ था , उसी के पास व्यापारी का धन था l व्यापारी बोला ---- " हमने तो आपको दरवेश समझा था l आप तो कुछ और ही निकले l हमने डाकुओं के सरदार पर नहीं , फकीर पर , खुदा के बन्दे पर विश्वास किया था l आदमी का भरोसा साधु , फकीर पर से उठना नहीं चाहिए l यह धन आप रखिए , पर आपसे एक निवेदन है कि आप दरवेश के वेश में मत लूटिए l नहीं तो लोगों का विश्वास ही इस वेश पर से उठ जायेगा l वह डाकू तत्काल ही वास्तव में फ़क़ीर बन गया l उसके बाद उसने कभी डाका नहीं डाला l दुराचारी भी सन्मार्ग मिलने पर कल्याण पा जाता है l
16 January 2021
15 January 2021
WISDOM ------
विश्व विजय का स्वप्न देखने वाले सिकंदर को मृत्यु के समय जीवन की एक - एक स्मृति मस्तकपटल पर आने लगी l उसे उन दो लड़कियों की स्मृति आ गई , जिनने उसे नैतिक दृष्टि से पराजित कर दिया था l भारत के उत्तर - पश्चिम प्रान्त के एक गाँव के पास उसकी सेनाओं ने डेरा डाला था l गाँव में उत्सव था l ग्रामीण युवक - युवतियों के मोहक नृत्य को देखकर सिकंदर अपनी सुध -बुध खो बैठा l उसने वहीँ भोजन मँगा लिया l दो सुन्दर ग्रामीण युवतियां एक थाली को कीमती चादर से ढक कर लाईं l चादर हटाते ही सिकंदर क्रुद्ध हो उठा l उस थाली में सोने - चांदी के आभूषण थे l युवतियों ने कहा --- " नाराज न हों सम्राट ! हमने सुना है आप इसी के लिए भूखें हैं l इसी के लिए आप हजारों - लाखों को मारकर इतनी दूर से हमारे बीच आए हैं l हमें हमारी जान की चिंता नहीं है l आप यह भोजन स्वीकार करें एवं हमारा सिर काट लें l " कहते हैं इसके बाद सिकंदर विक्षिप्त हो उठा और वापस लौट गया l
WISDOM ----
संकल्पवान व्यक्ति एक दीपक की तरह छोटा ही क्यों न हो , देर - सवेर भगवान किसी न किसी रूप में उसे सहारा देने पहुँच ही जाते हैं l ------- यज्ञ होना था l उसके लिए समिधाओं का ढेर लगा था l ऋषि ने डीप प्रज्वलन का क्रम किया l दीपक को टिमटिमाता देख समिधाओं का ढेर हँसा और बोला ---- " ये छोटा सा दीपक भला हमारा क्या बिगाड़ेगा ? " अग्नि स्थापना का क्रम आया तो दीपक से निकली छोटी सी लौ ने यज्ञ-अग्नि की स्थापना कर दी l आहुतियों के साथ एक - एक कर सभी समिधाएं होम हो गईं l सारी घटना को अंतर्दृष्टि से देखते हुए ऋषि अपने शिष्यों से बोले ---- " प्रखरता चाहे एक लौ के बराबर ही क्यों न हो , वो अकेले तमस के साम्राज्य से टकराने में सक्षम है l हमें भी अपनी तपस्या का प्रकाश इतना प्रबल और उज्ज्वल करना चाहिए कि हम गहन अंधकार के बीच भी अपना मार्ग बना सकें l
14 January 2021
WISDOM -----
सबसे समर्थ कालपुरुष है l समर्थ होते हुए भी भगवान राम ने वनवास का कष्ट सहा l श्रीकृष्ण के यादव कुल का नाश हुआ , नल को राज्य से हटना पड़ा , काल ने किसी को नहीं छोड़ा , भगवान कृष्ण स्वयं दुर्योधन को समझाने गए , वो कुछ समझने को तैयार ही नहीं था , आखिर महाभारत हुआ l ' काल बड़ा बलवान है ' ---- यदि कोई इस सत्य को समझ जाये तो उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाता है l --------- बेताल अवंतिका ( उज्जैन ) के महामात्य थे , बहुत बड़े तांत्रिक थे l उनका जीवन कभी तांत्रिक साधनाओं में बीता , कभी रणभूमि में l सम्राट विक्रमादित्य उनके बिना स्वयं को असहाय महसूस करते थे l लेकिन आज वे स्वयं में लीन थे , अपने आप को विवश महसूस करते हुए सोच रहे थे कि इतने षड्यंत्र - कुचक्र आखिर किसके लिए ? दूसरों को पराजित करने वाला आज महसूस कर रहा था कि सबसे सशक्त कालपुरुष है l मृत्यु से आज तक कोई नहीं बच पाया है l उनके विवेक - चक्षु खुल गए l सांसारिक मोह टूट गया , दंभ मर गया , जीवन भर के पाप आँखों के समक्ष आ रहे थे , मस्तिष्क में मानों हथौड़ों की चोट लग रही थी l उन्होंने राजसी परिधान उतारे , साधारण वेशभूषा पहनी l हाथ में लाठी और उत्तरीय कंधे पर डालकर निकल गए l क्षिप्रा नदी के तट पर खड़े होकर उन्होंने अवंतिका नगरी , भगवान महाकाल को प्रणाम किया और चल पड़े l अभी बीस कदम ही चले थे कि एक ओर से महाकवि कालिदास आ रहे थे l वे पूछ बैठे ---- " बेताल भट्ट ! आज किस कूटनीति के तहत वेश बदलकर जा रहे हैं ? " बेताल बोले ---- " अब मैं अंतिम और निर्णायक युद्ध अपने आप से करने जा रहा हूँ l " कालिदास ने फिर प्रश्न किया --- " किन्तु इस अवंतिका का क्या होगा ? " बेताल बोले ----- " सब व्यर्थ का मोह है l मनुष्य अहंकारवश सोचता है और भावी पीढ़ी के मार्ग में बाधक बनता है l " बेताल आगे बढ़ गए और देश में खबर फ़ैल गई कि महातांत्रिक , राज्य के महामात्य ने वानप्रस्थ लेकर स्वयं को समाजसेवा हेतु समर्पित कर दिया है l
13 January 2021
WISDOM -----
विवेक शक्ति मूर्च्छित हो जाने के कारण ही लोग धर्म के नाम पर आपस में झगड़ते हैं l सच्चे भक्त हों तो भगवान स्वयं उन्हें समझाने आते हैं l एक कथा है ----- एक बार हनुमान जी की भेंट अर्जुन से हुई l हनुमान जी भगवान राम के भक्त थे और अर्जुन श्रीकृष्ण के l हनुमान जी कहने लगे -- मेरे भगवान राम बली हैं , अर्जुन कहते श्रीकृष्ण बली है l दोनों भक्तों में बहस छिड़ गई , बहस का अंत न होते देख परीक्षा करने का निश्चय हुआ और शर्त तय हुई कि जो हारे , वह आत्महत्या कर ले l अर्जुन ने श्रीकृष्ण का ध्यान किया और तुरंत समुद्र में एक विशाल पुल बाँध दिया और हनुमान जी से बोले --- " अब यदि तुम्हारे राम बली हैं तो इस पुल को तोड़ दो l यदि न तोड़ सके तो श्रीकृष्ण की तुलना में श्रीराम का पराक्रम कमजोर माना जायेगा l हनुमान जी जोश में भर गए l उन्होंने शरीर का शतयोजन विस्तार किया और पुल पर कूद पड़े l भक्तों के इस झगड़े का पता भगवान को हुआ तो वे बहुत चिंतित हुए l यदि हनुमान जी की रक्षा करते हैं तो अर्जुन का अंत होता है l यदि अर्जुन जीतते हैं तो हनुमान जी का अंत निश्चित है l सोच -विचारकर भगवान ने स्वयं ही अपना शरीर पुल के नीचे लगा दिया l हनुमान जी जैसे ही पुल पर कूदे , उनके भार से भगवान का शरीर फट गया और खून बहने लगा l हनुमान जी ने भगवान राम को पहचाना और कूद कर उनके पास पहुंचे और दुःख करने लगे l अर्जुन ने कृष्ण रूपी भगवान को पहचाना , वे भी विलाप करने लगे l भगवान ने समझाया ---- " अच्छा होता , आप लोग विवेक से काम लेते l मैं एक हूँ , मेरे ही अनेक रूप संसार में फैले हैं l इसलिए किसी से झगड़ा नहीं करना चाहिए l कोई विवाद आए तो उसे विवेक से हल कर लेना चाहिए l " हम सच्चे भक्त बने l यदि हृदय में सच्चाई है , विवेक है तो कभी झगड़ा होगा ही नहीं l
12 January 2021
WISDOM ----- विद्वानों की ईर्ष्या अन्यों की अपेक्षा अधिक घातक और व्यापक परिणाम उत्पन्न करती है
पुराणों में एक कथा है ---- एक बार वैशाली क्षेत्र में दुष्ट - दुराचारियों का उत्पात - आतंक इतना बढ़ा कि उस प्रदेश में भले आदमियों का रहना कठिन हो गया l लोग घर छोड़कर अन्यत्र सुरक्षित स्थानों के लिए पलायन करने लगे l इन भागने वालों में ब्राह्मण समुदाय का भी बड़ा वर्ग था l वैशाली के ब्राह्मणों ने महर्षि गौतम के आश्रम में चलकर रहना उचित समझा l महर्षि गौतम के तप का प्रभाव था कि वहां गाय और सिंह एक ही घाट पर पानी पीते थे l ब्राह्मणों को वहां आश्रय मिल गया , वे सुखपूर्वक रहने लगे l एक दिन देवर्षि नारद वहां से निकले , कुछ समय महर्षि गौतम के आश्रम में रुके l इस समुदाय के संरक्षण की नई व्यवस्था देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उदारता की भूरि -भूरि प्रशंसा करने लगे l ब्राह्मण समुदाय से महर्षि गौतम की यह प्रशंसा बर्दाश्त नहीं हुई , ईर्ष्या उन्हें बेतरह सताने लगी l वे सोचने लगे कि हमने ही उन्हें यश दिलाया , हमारे ही आगमन से उन्होंने इतना श्रेय कमाया l अब हम अपना पुरुषार्थ दिखाकर उन्हें नीचा भी दिखाएंगे l षड्यंत्र रचा गया l रातों - रात मृत गाय आश्रम के आंगन में डाली गई l कुहराम मच गया l यह गौतम ने मारी है , हत्यारा है , पापी है , इसक्का भंडाफोड़ सर्वत्र करेंगे l महर्षि गौतम योग साधना से उठे और यह कुतूहल देखकर अवाक रह गए l आगंतुकों को विदा करने का निश्चय हुआ l ऋषि बोले ---- ' मूर्द्धन्य जनों की ईर्ष्या अन्यों की अपेक्षा अधिक घातक और व्यापक परिणाम उत्पन्न करती है l आप लोग जहाँ रहते थे , वहां चले जाएँ l अपनी ईर्ष्या से जिस क्षेत्र को कलुषित किया था , उसे स्नेह - सौजन्य के सहारे सुधारने का नए सिरे से प्रयत्न करें l
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- ' मनोबल ही जीवन है l वही सफलता और प्रसन्नता का उद्गम है l मन की दुर्बलता ही रोग , दुःख और मौत बनकर आगे आती है l ' एक समय था जब संसार के अधिकांश देश पराधीन थे l अपनी आजादी के लिए दृढ़ संकल्प लिया और संगठित प्रयास किया , अपने मनोबल को जगाया तो सब को पराधीनता से मुक्ति मिली , गुलामी की जंजीरें टूटी और आजादी मिली l आत्मबल से गुलामी से मुक्ति तो संभव है लेकिन यदि मन: स्थिति कमजोर है , आत्मबल नहीं है , परावलंबी हैं तो शक्तिशाली तत्व और असुरता उन्हें ' कठपुतली ' बना देती है l ऐसे में स्वयं निर्णय लेने की शक्ति नहीं होती l यदि आत्मबल नहीं है , अपनी कोई सोच ही नहीं है तो डोरी जिसके हाथ में होगी , वैसा ही दृश्य दिखाई देगा l