मदनमोहन नाम का एक नवयुवक आगरा के प्रसिद्ध कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने पहुंचा l उसने खाड़ी का धोती - कुरता पहना हुआ था व माथे पर तिलक लगा रखा था l वो दिन भारत की गुलामी के दिन थे l अत: शिक्षक ने उसकी इस वेशभूषा को देखकर उससे अंग्रेजी में पूछा ---- " तुम्हे ब्रिटिश वेशभूषा में कक्षा में आना चाहिए था l : यह सुनकर मदनमोहन ने शिक्षक से अंग्रेजी में ही प्रश्न किया ---- " मैं इस देश का वासी हूँ , फिर मैं अपने ही देश में भारतीय वेशभूषा में क्यों नहीं आ सकता ? " उसके इस प्रश्न का उत्तर शिक्षक` के पास नहीं था l उन्हें चुप होना पड़ा कालांतर में यही मदनमोहन स्वामी कृष्णबोधानंद के नाम से विख्यात हुए l इन्होने 1942 में सम्पूर्ण भारत में स्वदेशी चलाने की प्रेरणा दी l
7 August 2021
6 August 2021
WISDOM -----
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में सफल होना चाहता है , जो लक्ष्य उसने निर्धारित किया है , उसे पा लेना चाहता है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने सफलता के दो मूल मन्त्र बताएं हैं ----- अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग एवं ईश्वर विश्वास l ये दोनों ही सफलता की कुंजी हैं l आचार्य श्री लिखते हैं ---- हमें अपने कार्य को करने के लिए बड़ी मेहनत करनी चाहिए l जब तक हम पूरा प्रयास न कर लें तब तक हमें मेहनत करनी चाहिए l यदि प्रयास करते - करते हम थक भी जाएँ तो हमें अपनी ऊर्जा फिर से बटोरकर पुन : उस काम में जी जान से जुट जाना चाहिए l जब किसी भी कार्य को मन से , शरीर से एवं भाव से करने लगते हैं तो हम अपनी क्षमता का पूर्ण सदुपयोग करने लगते हैं l अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग करने के साथ हमें ईश्वर पर भरोसा करना ही चाहिए l इसका अर्थ है कि हम यह भावना रखते हुए भगवान से प्रार्थना करें कि हे प्रभु ! हम अपनी सम्पूर्ण क्षमता लगाकर जो कर सकते थे कर चुके l हमारी क्षमता सीमित है परन्तु आप पूर्ण व अनंत हैं , आपकी क्षमता व ऊर्जा कभी खत्म होने वाली नहीं है l अब हमारा सफल होना या न होना केवल आपके वश में है , हमें आप पर पूर्ण विश्वास है , आप हमारी मदद करें l यही है ईश्वर विश्वास l "
WISDOM ------
महाराष्ट्र के प्रख्यात विद्वान् पंडित परचुरे शास्त्री को कोढ़ की बीमारी हो गई l परिवार व समाज ने उन्हें उपेक्षित कर दिया l गहन निराशा में उन्होंने निश्चय किया कि वे अपना अंतिम समय बापू के आश्रम में बिताएंगे और वे सेवाग्राम के पास एक निर्जन मार्ग पर लेट गए l उन्हें बहुत लोगों ने देखा , परन्तु सेवा के लिए कोई आगे नहीं आया l बापू को जैसे ही यह पता चला तो वे तुरंत उनको आश्रम ले आये और उनकी महीनों तक सेवा की l परचुरे शास्त्री बापू के सदव्यवहार से स्वस्थ हो गए l बापू ने कोरे उपदेश नहीं दिए , वे जो कहते थे उसको अपने आचरण से सिद्ध करते थे l
5 August 2021
WISDOM-------
श्रीमद्भगवद्गीता के महान व्याख्याकार लोकमान्य तिलक ने गीता के एक श्लोक की अनुभूति की , श्लोक में भगवान कहते हैं ---- जिस प्रकार एक ही सूर्य , सम्पूर्ण लोकों को प्रकाशित करता है , उसी प्रकार एक ही आत्मा , सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करती है l तिलक इस श्लोक पर विचार कर रहे थे , उन्होंने अपनी मन: स्थिति बताते हुए एक स्थान पर लिखा है ------- वर्षा के दिन थे , एक सुबह रास्ते से निकलते समय उन्होंने देखा रास्ते के किनारे जगह - जगह गड्ढे बन गए हैं , इन गड्ढों में पानी भर गया था , कुछ गड्ढे बड़े थे , कुछ छोटे थे , सब में पानी भरा था , कुछ में जानवर नहा रहे थे कुछ खाली थे l सुबह का समय था , उस समय जो दृश्य था उसने मुझे नई अनुभूति प्रदान की l तिलक लिखते हैं --- मैंने देखा सूरज एक है , गंदे गड्ढे में भी उसी का प्रतिबिम्ब है और स्वच्छ जल में भी , दोनों में कोई अंतर नहीं है l गंदगी जल में है लेकिन प्रतिबिम्ब वैसा ही निर्दोष और पवित्र है , फिर यह एक सूर्य समूची धरती पर कितने ही सरोवरों आदि में प्रकाशित होगा l एक ही सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है l " सूर्य एक है , एक ही गगन है , प्रकाश एक है , मनुष्य ने अपने स्वार्थ और अहंकार के कारण ही ऊंच - नीच , बड़े - छोटे तथा जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव किए हैं l
WISDOM ------
सोमनाथ लूटकर महमूद गजनवी लौट रहा था तो मार्ग में राजपूतों की एक टुकड़ी से मुकाबला करना पड़ा l उसकी विशाल सेना के सामने मात्र सौ -सवा सौ रणबाँकुरे खड़े थे l गजनवी हँस पड़ा , बोला ---- " इन बेवकूफों को समझाओ l क्यों जान देते हो l " घुड़सवारों का नेतृत्व एक अस्सी साल के वृद्ध कर रहे थे l वे बोले --- " बादशाह ! हम राजपूत मृत्यु से कभी नहीं डरते l हमारी निगाह में तुम एक लुटेरे हो l भारत विजेता कहकर हमारा अपमान न करो l जब तक इस धरती पर एक भी राजपूत जीवित है , तब तक भारत विजय का स्वप्न भी मत देखना l " युद्ध छिड़ गया l उस छोटे से समूह ने वह कौशल दिखाया कि एक - एक ने दस - दस को मार गिराया l गजनवी की सेना को पसीना आ गया l पर वे कब तक टिकते l सभी वीरगति को प्राप्त हुए l महमूद गजनवी अपने सेनापति से बोलै ---- " तुम ठीक कहते हो l इस देश में बल से कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता l इसे मात्र छल से ही हराया जा सकता है l गजब के हैं ये लोग l " हमारी आपसी फूट और जागरूकता की कमी ने ही देश को युगों की गुलामी दी ------
4 August 2021
WISDOM------
धर्म का अर्थ है ---- सत्य और न्याय के पथ पर चलना , अत्याचार , अन्याय का विरोध करना l जो लोग अनैतिक और अमर्यादित कार्य कर रहे हैं , उनका विरोध करना , उन्हें ऐसा करने से रोकना धर्माचरण है l युगों से यही देखा गया है कि धर्म की बात करने वाले ही धर्म के विरुद्ध कार्य करते है , अत्याचारी और अन्यायी का समर्थन करते हैं l महाभारत में कुलगुरु कृपाचार्य धर्म की सूक्षम्ता को गहराई से जानते थे l कुलगुरु का कर्तव्य होता है कि कुल में धर्म की प्रतिष्ठा हो l लेकिन उन्होंने दुर्योधन की अनीति का कभी विरोध नहीं किया , जब द्रोपदी का चीरहरण हुआ तब भी वे खामोश रहे l प्रभावशाली लोग जब अत्याचार और अन्याय को होते देख चुप रहते हैं , तो इससे अत्याचारियों को और बढ़ावा मिलता है और उसका परिणाम महाभारत के रूप में सामने आता है l
3 August 2021
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " मनुष्य शरीर होने के नाते जीवन में गलतियों का होना स्वाभाविक है , पर उन गलतियों से सीख प्राप्त करना महत्वपूर्ण घटना है l सामान्य मनुष्य एक गलती करता है , उससे कुछ सीखता नहीं है , और आदतन वही गलतियाँ बार - बार करते चला जाता है l आचार्य श्री लिखते हैं ----- " यदि लोग अपने दोषों का चिंतन किया करें , उन्हें स्वीकार कर लिया करें और उनका दंड भी उसी साहस के साथ भुगत लिया करें तो व्यक्ति की आत्मा में इतना बल आ जाता है कि कोई और साधन - सम्पन्नता न होने पर भी वह संतुष्ट जीवन जी सकता है l " आज के समय में बढ़ते हुए तनाव , सिरदर्द का एक बड़ा कारण यह भी है कि लोग अपने दोषों को छिपाते हैं l अच्छाई में गजब का आकर्षण होता है , इस कारण बुरे से बुरा व्यक्ति भी स्वयं को समाज में अच्छा व सदाचारी दिखाना चाहता है , अपने दोषों को , अपने द्वारा किए गए गलत कार्यों को समाज से छुपाना चाहता है l कुत्सित मानसिकता के व्यक्ति लोगों की ऐसी कमजोरियों का पता लगाकर उनसे अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं , उनको ब्लैकमेल करते हैं l यदि मनुष्य के जीवन में अध्यात्म विकसित हो जाए तो वह अपने जीवन को खुली किताब रखे , अपने दोषों को साहस के साथ स्वीकार करे और दूर करने का निरंतर प्रयास करें l आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' जो दोषों को छिपाते हैं वे गिरते चले जाते हैं पर जो बुराइयों को स्वीकार करता है , उसकी आत्महीनता तिरोहित हो जाती है l भूल को स्वीकार करने से और उसका प्रायश्चित करने से आत्मा की जटिल ग्रंथियां मुक्त होती जाती हैं , ऐसे साहसी व्यक्ति ही सांसारिक सुख - वैभवों का भी लाभ पाते हैं l "