4 August 2022

WISDOM ------

   पं   श्रीराम  शर्मा   आचार्य जी   लिखते  हैं   --------  अन्याय   चाहे  कितना  ही  बड़ा  क्यों   न  हो  ,  उसका  प्रतिकार  करने  का   साहस  न  करना   अपने  मानवीय  कर्तव्यों  की   उपेक्षा  करना  है  l   अन्याय  का  अंधकार   चाहे  कितना  ही  सघन  क्यों  न  हो   ,    एक   आदर्शवादी    व्यक्ति  उसे  मिटाने   के  लिए   दीपक  की  तरह  जले   तो  प्रकाश  हो  कर  ही  रहेगा   l  '   ---------  पंख  कटे  जटायु  को   गोद  में  लेकर   भगवान  राम  ने  उसका  अभिषेक  आँसुओं  से  किया  ,  स्नेह  से  उसके  सिर  पर  हाथ   फेरते  हुए   भगवान  राम  ने  कहा  ----  " तात  !  तुम  जानते  थे   रावण  महाबलवान   है  ,  फिर  उससे  तुमने  युद्ध  क्यों  किया  ? "     जटायु  ने  गर्वोन्नत  वाणी  में  कहा  ----- " प्रभो  !  मुझे  मृत्यु  का  भय  नहीं  ,  भय  तो  तब  था    जब  अन्याय  के  प्रतिकार  की  शक्ति  नहीं  जागती   l  "  भगवान  राम  ने  कहा  ----- " तात  !  तुम  धन्य  हो  !  तुम्हारी  जैसी  संस्कारवान   आत्माओं  से    संसार  को   कल्याण  का  मार्गदर्शन  मिलेगा   l  "

3 August 2022

WISDOM -----

   , जो  ईश्वर  से  भय  खाता  है  उसे  दूसरा  भय  नहीं  सताता  l '   अध्यात्मवेत्ताओं     के  अनुसार  --- संकीर्ण  स्वार्थ , वासना  और  अहं  से   युक्त  अनैतिक  जीवन   भय  का  प्रमुख  कारण  है   l  भय  का  सबसे  घ्रणित  पहलू   अपने  स्वार्थ  के  लिए  ,  दूसरों  पर  छाये  रहने  की   भावना  से   अधीनस्थ  लोगों  का  शोषण  करना  है  l                          ईश्वर  विश्वास  में  बहुत  शक्ति  होती  है    लेकिन  कलियुग  में  यह  मनुष्य  की  दुर्बुद्धि  है  कि  विज्ञानं  में  इतनी  तरक्की  कर  के  मनुष्य  स्वयं  को  भगवान  समझने  लगा  है  l   लेकिन  सत्य  यह  है  कि  आज  मनुष्य  आंतरिक  रूप  से  बहुत  कमजोर  और  भयभीत  है   l  मनुष्य  की  मानसिक  कमजोरियां  ही  उसके  भय  का  कारण  हैं  l  वैराग्य शतक  में  भतृहरि   ने  भय  की  सूक्ष्म  स्थिति  का   विशलेषण  किया  है   कि  ----- भोग  में  रोग  का  भय ,  सत्ता  में  शत्रुओं  का  भय ,  धन  में  चोरी  होने  का  भय  ,  सौन्दर्य  में  बुढ़ापे  का  भय  ,  शरीर  में  मृत्यु  का  भय   l  इस  तरह  संसार  में  सब  कुछ  भय  से  युक्त  है   l  उनके  अनुसार  त्याग  का  मार्ग  निर्भयता  की  अवस्था  की  ओर  ले  जाता  है   l    

WISDOM ------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- ध्वंस  सरल  है  l  उसे  छोटी  चिनगारी   एवं  सड़ी  कील  भी  कर  सकती  है  l  गौरव  सृजनात्मक  कार्यों  में  है  l  मनुष्य  का  चिंतन  और  प्रयास  सृजनात्मक  प्रयोजनों  में  ही  निरत  रहना  चाहिए  l  '    आचार्य श्री  लिखते  हैं   कि  अहंकार  और  अति  महत्वाकांक्षा      व्यक्ति   के    विवेक  का  हरण  कर  लेते  हैं  ,  उसकी  बुद्धि ,   दुर्बुद्धि  में  बदल  जाती  है    और  वह   गलत  राह  पर  चल  देता  है   l                     इतिहास  में  ऐसे  अनेक  उदाहरण  हैं    जैसे ----- सिकन्दर  शक्तिमंत  था  ,  सारे  विश्व  को  अपने  पैरों   तले लाने  की  महत्वाकांक्षा   उस  पर  प्रेत  की  तरह  सवार   हो  गई  ,  जिसने  उसे  आततायी  बना  दिया  l   स्वयं  को  विश्व विजेता  सिद्ध  करने  के  लिए   उसने   असंख्यों  का  रक्त  बहाया  ,  कितनी  ही  माताओं  की  गोद  सूनी  कर  दी ,  कितने  ही  बच्चों  को  अनाथ  कर  दिया   l  न  स्वयं  चैन  से  बैठा ,   न  अपने  सैनिकों  को  चैन  से  बैठने  दिया   और  न  ही    दूसरे  राजाओं  को    l   आचार्य श्री  लिखते  हैं ----- ' केवल  स्वार्थ  और  मिथ्याभिमान  से   प्रेरित  होकर   किया  गया  काम   कितना  ही  बड़ा  क्यों  न  हो    न  तो  उस  व्यक्ति  को  ही  सुखी  और  संतुष्ट  कर  सकता  है   और  न  मानव  समाज  को  ही  कुछ  दे  सकता  है   l  '  जब  उसके  जीवन  का  अंतिम  समय  आया  तो  वह  विक्षिप्त  सा  हो  गया  l  विचारों  से  मुक्त  होने  के  लिए  उसने  शराब  का  सहारा  लिया  l  कोई   कितना  ही  बड़ा  अजेय  योद्धा  हो  ,  क्या  मृत्यु  से  कोई  बचा  है  ?  

2 August 2022

WISDOM -----

     पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- अहंकार  विवेक  का  हरण  कर  लेता  है  l   इसके  चलते  सही  सोच -समझ   और  सम्यक  जीवन  द्रष्टि  समाप्त  हो  जाती  है   l  अहंकार  के  रोग  की  खास  बात   यह  है  कि   यदि  व्यक्ति  सफल   होता  जाता  है   तो  उसका  अहंकार  भी  उसी  अनुपात  में  बढ़ता  जाता  है   और  वह  एक  विशाल  चट्टान  की  भांति   जीवन  के    सत्पथ   या  आध्यात्मिक  पथ  को  रोक  लेता  है    इसके  विपरीत  यदि  व्यक्ति   असफल  हुआ  तो   उसका  अहंकार  एक  घाव  की  भांति  रिसने   व  दुःखने   लगता  है   l  '                         आचार्य श्री  लिखते  हैं  ------ सामर्थ्य  बढ़ने  के  साथ  मनुष्य  के  दायित्व  भी  बढ़ते  हैं   l  ज्ञानी  पुरुष   बढ़ती   सामर्थ्य  का  उपयोग  पीड़ितों  का  कष्ट  हरने   एवं  भटकी  मानवता  को   दिशा  दिखाने  में  करते  हैं    जबकि  अज्ञानी  उसी  सामर्थ्य  का   उपयोग   अहंकार  के  पोषण  और  दूसरों  का  अपमान   करने  के  लिए  करते  हैं   l '  दुर्योधन ,शिशुपाल ,  रावण ,  हिटलर  ऐसे  ही  उदाहरण  हैं   जिन्होंने  अपनी  सामर्थ्य  को  अत्याचार  और   लोगों  को  उत्पीड़ित  करने  में  लगा  दिया   l  

WISDOM -------

   पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं --- " आचरणविहीन   धर्म  आडंबर  के  सिवा   और  कुछ  भी  नहीं   l  पत्थरों  के  पुराने  मंदिरों  में  सिर  झुकाने   की  रीति  निभाने  वालों  की  दशा   भी  पत्थरों  जैसी   हो  चली  है   l  धर्म  का  प्रचार  तो  बहुत  हो  रहा  है  ,  लेकिन  इसका  आचरण  नहीं  के  बराबर  हो  रहा  है   l  बातें  देवत्व  की  हो  रही  हैं  ,  जबकि  जीवन  निरंतर  पशुता  की  ओर   झुकता  जा  रहा  है   l  विचार  और  आचरण  के  बीच  गहरी  खाई  ने    धर्म  को  प्रभावहीन  बना  दिया  है   l   "  इस  सन्दर्भ   में   वे  एक  बूढ़े  फकीर  की  कहानी  लिखते  हैं  ------  '  एक  पहाड़ी  गाँव  में  एक  पालतू  तोता  था  ,  जो  स्वतंत्रता , स्वतंत्रता , स्वतंत्रता  '  चिल्लाया  करता  था  l  एक  बार  फकीर  उस  गाँव  में  ठहरे   l    उन्होंने  तोते  की  वेदना वेदना  भरी  वाणी  सुनी   l  वह  फकीर  अपनी  युवावस्था  में   देश  के  स्वाधीनता  आन्दोलन  में  कई  बार  कैद  रह  चुके  थे  l  इसलिए  तोते  द्वारा  कहे  गए  शब्दों  ' स्वतंत्रता ,  स्वतंत्रता ,---- '    को  सुनकर  व्याकुल  हो  गए   l  उन्होंने  बड़ी  मुश्किल  से  तोते  के  मालिक  को   उस  तोते  को  स्वतंत्र  करने  के  लिए  राजी  किया   l   बहुत  मुश्किल  के  बाद   वह  फकीर  उस  तोते  को   खुले  आकाश  में   उड़ाने  में  सफल  हुए   l  लेकिन  अगले  दिन  उन्होंने  देखा   कि  वही  तोता   अपने  पिंजरे  में  बैठकर   ' स्वतंत्रता  '  की  टेर   लगा  रहा  है   l  यह  देखकर  वे  मुस्करा  उठे   l  अब  उन्हें  आचरण विहीन  धर्म  का  अनुभव  हुआ   l  '

1 August 2022

WISDOM ----

   अनमोल  वचन ------ पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- ' उच्च  मन  वाले  मनस्वी  मनुष्य   मर  भले  ही  जाएँ,  परन्तु  वे  कभी  भी  कृपणता   तथा  कायरता  नहीं  करते   l  '    

 आचार्य श्री  लिखते  हैं ----- 'ओछे  मनुष्य    वे  नहीं  जो  वजन , लम्बाई   या  आयु  की   द्रष्टि  से  छोटे  हैं   l  जिनकी  विचारणा   तथा  आकांक्षा   उथली  और  बचकानी  है  ,  जो  गए -गुजरे  लोगों   की  तरह  सोचते   और  घटिया  आकांक्षाएं   पूरी  करने  के  लिए  ओछे  हथकंडे  अपनाते  हैं  ,  उन्हें  कोई  चतुर  भले  ही  कह  ले  ,  पर  वस्तुत:  वे   व्यक्तित्व  की  द्रष्टि  से   बौने  और  अविकसित  लोगों  की  श्रेणी  में  ही   माने  जा  सकेंगे   l  "

  आचार्य श्री  लिखते  हैं ----- "  मानव  जीवन  एक  सौभाग्य  है  ,  जो  बार -बार  नहीं  मिलता  l  विडंबना  यही  है  कि   इसका  सदुपयोग  करने  वाले   कम  ही  होते  हैं   l  जो  जीवन  का  समुचित  उपयोग  करना  जानते  हैं  ,  वे  क्रमिक    गति  से    ऊँचे  उठते  हुए    चरम     ध्येय   को  अंतत: प्राप्त  कर  के  ही  रहते  हैं   l  "

WISDOM-------

  लघु  कथाएं  हमें  शिक्षा  तो  देती  हैं  लेकिन   लोभ , लालच ,  कामना  , तृष्णा , महत्वाकांक्षा  मनुष्य  के  मन  पर  इस  तरह  हावी  हैं   कि  वह  परिणाम  सोचता  ही  नहीं  है   l    फूट  चाहे  परिवार  में  हो , समाज  या  संस्था  कहीं  भी  हो  ,  यह  हमेशा  दुःखदायी   होती  है   l  इस  फूट  का  फायदा   'तीसरा  ' कब  और  कैसे  उठा  लेता  है   ,  जब  तक  यह  समझ  आता  है ,  बहुत  देर   हो   चुकी  होती  है   l   इसी  सत्य  को  समझाने  वाली  कथा  है ------        1 .  दो  बिल्लियाँ   मिलकर  किसी  घर  से  एक  रोटी    चुरा  लाई  l  बँटवारे  का  फैसला  नहीं  हो  रहा  था   l  वो  फैसला  कराने  बन्दर  के  पास  पहुंची   l  बन्दर  ने  रोटी  के  दो  टुकड़े  किए   l  दोनों  को  तराजू  के  दो  पलड़ों  में  रखा  l  जो  भारी  था   उसमें  से  एक  बड़ा  टुकड़ा  तोड़कर  मुँह  में  रख  लिया  ,  अब  दूसरा  भारी  हो  गया   तो  उसमें  से  भी  एक  टुकड़ा  तोड़कर   मुँह  में  रख  लिया   l  इसी  प्रकार  दो -तीन  बार  में    सारी  रोटी  खा  डाली   l  रोटियों  का  चूरा  तराजू  में  पड़ा  था   l  बिल्लियों  ने  कहा  --- इसी  को  हमें  दे  दो   l  बन्दर  ने  कहा  ---  मेरी  इतनी  मेहनत  का    कुछ  तो  मेहनताना  मिलना  चाहिए   l  यह  कहकर  उसने  बचे  हुए    चूरे   को  भी  खा  लिया   l   बिल्लियाँ  इतना  गंवाने  के  बाद    समझीं  कि    अपना  झगड़ा  आपस  में  ही  निपटा  लेना  चाहिए   l  

2 .    वर्षा  की  फुहारों  से  धरती  में  से   अनेक  पौधे  उग  आए  l  दुर्भाग्य  से   सब  पौधे   आपस आपस  में  ही  लड़  पड़े   और  उनमें  से  हर एक  अपने  को    ज्यादा  महत्वपूर्ण  और  उपयोगी  बताने  लगा   l  विवाद  बढ़ता  गया  l  छह  माह  ऐसे  ही   लड़ते -झगड़ते  व्यतीत  हो  गए   l  ग्रीष्म   ऋतु  का  आगमन  हुआ   तो  उसके  ताप  से  सारे  पौधे  सूख  गए   और  जब  बिछड़ने  की   घड़ी  आई   तो  उन्हें  अनुभव  हुआ   कि   उन्होंने  पूरी  उम्र   यों  ही  लड़ने -झगड़ने   में  व्यतीत  कर  दी   l  दुःखी   पौधों  ने  संकल्प  लिया   कि  यदि  पुन:  अवसर  मिला   तो  प्रेम पूर्वक   रहेंगे   l  तब  से  पौधे   हँसते - खेलते   सहयोग -सहकार  से  रहते  हैं  ,  मात्र  इनसान  ही  इस  छोटी  सी  बात  को  समझ  नहीं  पाता   l