19 March 2023
WISDOM -----
18 March 2023
WISDOM
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'आज के इस विज्ञान के युग में मनुष्य , ह्रदय की संवेदना एवं भक्तिभाव को भूलकर बुद्धिवादी और तर्कवादी बन गया है , स्वयं को विधाता समझ बैठा है l आज सबसे बड़ी आवश्यकता सद्बुद्धि की है l " दुर्बुद्धि के कारण ही मनुष्य अपने धन और ज्ञान का दुरूपयोग करता है l संसार में जितनी भी उथल -पुथल है , युद्ध , दंगे , हत्या , जाति और धर्म के नाम पर झगड़े l यह सब दुर्बुद्धि के कारण ही है l पुराण की एक कथा है ---- महर्षि व्यास जी एक बार अपने आश्रम में बहुत उदास और चिंतित बैठे थे l तभी नारद ही वहां आए और कहने लगे --- " महर्षि व्यास जी ! आपने अठारह पुराण , महाभारत जैसे ग्रन्थ लिखे , आप वेदज्ञ हैं फिर आपकी चिंता का कारण क्या है ? " यह सुनकर व्यास जी ने कहा ---- "हे देवर्षि ! मेरी चिंता का कारण यही है कि मैंने इतना सब कुछ लिखकर मानव को मानवता का सन्देश दिया , तो भी मनुष्य को ऐसी सद्बुद्धि नहीं मिली कि वह सुखमय जीवन जी सके l वह आज भी उसी तरह भटक रहा है और परोपकार करने के बजाय एक दूसरे को परेशान करने में लगा है l समझ में नहीं आता मैं क्या करूँ ? " तब नारद जी ने कहा --- " हे ऋषि श्रेष्ठ ! आपने पुराणों में ज्ञान -विज्ञान की बातें तो लिखी हैं , परन्तु भक्तिरस से परिपूर्ण साहित्य नहीं लिखा , अत : भक्तिरस की रचना कीजिए , जिससे जनता का कल्याण होगा और आपको भी शांति मिलेगी l " तब उन्होंने भगवान के समस्त अवतारों की लीला का वर्णन करते हुए ' भागवत पुराण ' की रचना की , जिससे जनता और व्यास जी दोनों को ही आनंद की अनुभूति हुई l
16 March 2023
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महाभारत में कर्ण का चरित्र हमें यह सिखाता है कि अनीति और अधर्म पर चलने वाले व्यक्ति का कभी कोई एहसान न ले l एहसान को वो एक अच्छा नाम देता है और बदले में पूरी ऊर्जा सोख लेता है l ऐसे एहसान चुकता करने की कोई सीमा भी नहीं है , चाहे प्राण ही क्यों न चले जाएँ l दुर्योधन अति का महत्वकांक्षी था , वह पांडवों को सुई की नोक बराबर भूमि भी नहीं देना चाहता l दुर्योधन को विश्वास था कि वह चार पांडवों को तो पराजित कर सकता है , लेकिन अर्जुन को पराजित करना असंभव है l उसे एक ऐसे वीर की तलाश थी जो अर्जुन को पराजित कर सके l कर्ण में उसे वह संभावना नजर आई इसलिए उसने कर्ण को अंग देश का राजा बनाकर उससे मित्रता की l भीष्म और द्रोणाचार्य से भी ज्यादा वह कर्ण पर विश्वास करता था l कर्ण को भी सूत पुत्र होने के कारण सब तरफ उपेक्षा व अपमान मिला था इसलिए उसने दुर्योधन द्वारा दिए गए सम्मान को तुरंत स्वीकार कर लिया और सारा जीवन दुर्योधन की हाँ में हाँ मिलकर इस एहसान का बदला चुकाता रहा l कर्ण को अपनी आंतरिक शक्ति का ज्ञान ही नहीं था कि वह सूर्य पुत्र है , कुंती का बेटा और पांडवों का बड़ा भाई है l जब युद्ध होना निश्चित हो गया तब महारानी कुंती और भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को यह सत्य बताया कि वह सूर्य पुत्र है , अनीति और अधर्म का साथ न दे l लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी l कर्ण ने मित्र धर्म को निभाने के लिए अपने प्राण दे दिए l महर्षि व्यास दूरद्रष्टा थे , वे जानते थे कि कलियुग में अनीति , अधर्म अपने चरम पर होगा , चारों ओर छल , कपट और षड्यंत्र का बोलबाला होगा इसलिए कर्ण के चरित्र के माध्यम से उन्होंने संसार को शिक्षा दी कि कोई व्यक्ति हो या कोई देश हो उसे बहुत सोच -समझ कर ही किसी से मित्रता का हाथ बढ़ाना चाहिए l यह मित्रता चाहे पद का लालच हो , ऋण के रूप में हो या किसी भी सहायता के रूप में हो , यदि इसे देने वाला अत्याचारी है , षड्यंत्रकारी है तो वह गुलाम बनाने में कोई कोर -कसर नहीं छोड़ेगा l कलियुग में नैतिकता की बहुत कमी है , मनुष्य संवेदनहीन है इसलिए ये महाकाव्य हमें जागरूक करते हैं , जीवन जीना सिखाते हैं l
13 March 2023
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लघु -कथा ---- दो मित्र थे l साथ -साथ व्यापार करते थे l दोनों ने ही बहुत धन कमाया और दोनों में ही समाज सेवा की भावना प्रबल थी लेकिन दोनों का तरीका भिन्न था l पहला मित्र अन्न दान करता था , वस्त्र दान भी करता था और सोचता कि उसने बहुत पुण्य कर लिया लेकिन दूसरा मित्र केवल अपंग , वृद्ध , अपाहिजों और बहुत ही गरीब , असमर्थ लोगों को ही भोजन देता था l जो शरीर से काम करने योग्य उसके पास मदद को आते उन्हें वह अपने खर्च से कोई न कोई हुनर सिखवा देता या कोई भी ऐसी व्यवस्था करा देता जिससे वह धन कमा कर अपने और अपने परिवार की भोजन की व्यवस्था स्वयं कर सकें l अपने जीवन में उसने हजारों लोगों को स्वाभिमान से जीवन जीने का अवसर दिया l वह जिस रास्ते से निकलता लोग उसकी जय जयकार करते l यह देखकर पहले मित्र को बड़ी ईर्ष्या होती थी l एक पहुंचे हुए संत से उसने परामर्श किया तो उन्होंने कहा ----तुम्हारा वह मित्र लोगों का ह्रदय जीतने की कला जानता है , लोगों को जीवन जीना सिखाता है और तुम शरीर से काम करने योग्य लोगों को भी अपने दान से आलसी बना रहे हो l भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कर्मयोग को श्रेष्ठ बताया है l आलसी को भगवान भी पसंद नहीं करते , लोगों को कर्मयोगी बनाओ l
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अहंकार सारी अच्छाइयों के द्वार बंद कर देता है l अहंकार से ही काम , क्रोध , लोभ जैसे विकार उत्पन्न होते हैं l अहंकारी व्यक्ति संवेदनहीन और निष्ठुर होता है l संसार में जितने भी युद्ध हुए , बड़े पैमाने पर हत्याएं , मारकाट हुईं , अत्याचार , अन्याय किसी न किसी के अहंकार का ही परिणाम है l अहंकारी स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझता है , किसी दूसरे की तरक्की उसे बर्दाश्त नहीं होती l ------ एक राजा था l उसे यह अहंकार हो गया कि वह ही जगत का पालक है l शास्त्रकारों ने व्यर्थ ही भगवान विष्णु को जगत का पालन करने वाला कहा है l उस राजा को इस बात का अभिमान था कि वही सब का पेट भर रहा है , यदि वो सब पर कृपा न करे तो लोग भूखे मर जाएँ l l एक संन्यासी को इस बात का पता चला तो वे उस राज्य में गए l राजा उनको भी अपने वैभव के बारे में बताने लगा और बोला --मैं ही सब का पालक हूँ l संत ने पूछा --- तेरे राज्य में कितने कुत्ते , कौए , कीड़े -मकोड़े हैं ? राजा चुप हो गया l संत ने कहा ---- जब तू यह नहीं जानता तो उनको भोजन कैसे भेजता होगा ? राजा ने लज्जित होकर कहा --- तो क्या भगवान कीड़े -मकोड़ों को भी भोजन देते हैं ? यदि ऐसा है तो मैं एक कीड़े को डिबिया में बंद कर के देखता हूँ l कल देखूंगा कि भगवान इसे कैसे भोजन देते हैं l दूसरे दिन राजा ने संत के सामने डिबिया खोली , तो वह कीड़ा चावल का एक दाना बड़े प्रेम से खा रहा था l यह चावल डिबिया बंद करते समय राजा के मस्तक से गिर पड़ा था l अब उस अहंकारी ने माना कि भगवान ही सबका पालक है , हम तो सिर्फ माध्यम हैं l
12 March 2023
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' इस बाहरी संसार में विधाता ने मक्खी , मच्छर , सर्प , बिच्छू , खटमल आदि ऐसे जीवों को बनाया है , जो मनुष्यों को हमेशा हानि पहुंचाते हैं , इसलिए उनसे बचने के लिए प्रबंध करना पड़ता है l सर्प , बिच्छू की तरह डंक मारने वाले प्राणियों की इस संसार में कोई कमी नहीं है , पर उनसे सचेत रहकर जम कर मोर्चा लेना ही उचित है l नहीं तो हानि उठानी पड़ सकती है l" --- एक सेठ जी थे , उनके पास बहुत धन -संपदा थी l उनके कोई संतान नहीं थी l समस्या थी कि धन का क्या करें , और समाज में सम्मान पाने की भी बहुत चाहत थी l कुछ चापलूसों ने उन्हें सलाह दी कि ऐसे तो सम्मान पाना बहुत कठिन है , आप अपने आसपास सर्प , बिच्छू जैसे स्वाभाव के , लोगों को भयभीत करने वाले लोग रख लो , तो उनके भय से लोग आपको झुककर सलाम करेंगे , चरण स्पर्श करेंगे l सेठ ने सलाह मानकर वैसा ही किया , अब लोग उन्हें सलाम करते तो उनके अहं को बड़ी संतुष्टि मिलती l सेठजी तो बहुत प्रसन्न हो गए लेकिन समाज में अपराध बढ़ गए , लोगों का जीवन , सुख -शांति खतरे में पड़ गई l कारण सेठ द्वारा पाले गए गुंडे अपने स्वाभाव के अनुरूप लोगों को सताने लगे l कुछ हितैषियों ने सेठ को सलाह दी कि सेठ जी धन का सदुपयोग करो l बहुत गरीब बच्चे हैं देश में , उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य का अच्छा प्रबंध करो , युवा लोगों को रोजगार दो तब आपका सम्मान बढ़ेगा और आपके जाने के बाद भी कायम रहेगा l अब सेठजी को समझ में आया कि दुष्टों को पालकर सम्मान नहीं मिल सकता l सद्गुणों से और सत्कर्म से ही सच्चा सम्मान मिलता है l
11 March 2023
WISDOM ------
कहते हैं जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर है l महाभारत का कोई भी प्रसंग देख लें , वैसा ही सब कुछ इस धरती पर , इस युग में , और अधिक विस्तृत रूप में देखने को मिल जायेगा l इस महाकाव्य में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि सत्ता का सुख भोगने वालों में अन्याय और दुष्कृत्य के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस नहीं होता l ऐसे लोग न्याय का पक्ष नहीं ले पाते और न ही अपने आचरण से नई पीढ़ी को कोई दिशा दे पाते हैं l ------- द्रोणाचार्य ने पांडवों और कौरवों को धर्नुविद्या , शस्त्र विद्या का ज्ञान कराया l द्रोणाचार्य ने अपने जीवन में गरीबी के दिन देखे थे , उनका पुत्र अश्वत्थामा जब दूध के लिए रोता था तो उसकी माँ उसे आटा पानी में घोलकर पिलाती थीं l वे उस समय दुर्योधन की कृपा से राजसत्ता का सुख भोग रहे थे , और जानते थे कि दुर्योधन के विरोध से उन्हें महात्मा विदुर की भांति शाक -पात पर आना पड़ेगा l ये सुख उनसे छीन जायेंगे , पांडव बेचारे खुद दर -बदर भटक रहे थे , वे उन्हें क्या देते l दुर्योधन के एहसान तले रहने के कारण ही वे उसके द्वारा पांडवों के विरुद्ध रचे जाने वाले षड्यंत्रों का विरोध नहीं करते थे l यहाँ तक कि द्रोपदी के चीर -हरण के समय भी उनके मुँह पर ताला लगा हुआ था l यही स्थिति कुलगुरु कृपाचार्य की थी l वे भी अपनी स्वार्थ सिद्धि , धन के लोभ और सत्ता सुख भोगने में लगे थे l भीष्म पितामह अपनी प्रतिज्ञा से बंधे थे और दुर्योधन का ही अन्न खाते थे इसलिए दुर्योधन की गलतियों पर मौन रहे l महारथी कर्ण , न्याय -अन्याय को समझता था लेकिन जब सूत -पुत्र होने के कारण संसार ने उसे अपमानित किया तब दुर्योधन ने उसे गले लगाकर , उसका तिलक कर उसे अंग देश का राजा बनाया था , अत: कर्ण मित्र धर्म निभा रहा था l कारण चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन यह सत्य है कि जिसने भी अत्याचारी , अन्यायी का समर्थन किया उन सबका अंत हुआ l दुर्योधन ने जीवन भर षड्यंत्र रचे , वह अधर्म और अन्याय पर था इसलिए पूरे कौरव वंश को ले डूबा l एक से बढ़कर एक वीर राजा महाराजा जो भी दुर्योधन के पक्ष में थे , सभी का युद्ध में अंत हुआ l ईश्वर ने हमें चयन की स्वतंत्रता दी है l स्वार्थ और लोभ से ऊपर उठकर सत्य और न्याय की राह पर चलें l