तनाव कहीं बाहर से नहीं आता , यह हमारी अपनी ही कमजोरियों से उपजता है l नाम , पद , यश , सम्मान पाने की इच्छा ही हमें तनाव देती है l यदि हम अपने मन में इस सत्य को बैठा लें कि ' देने वाला ईश्वर है , वह जो दे वह अच्छा है , और जो न दे उसमें कहीं न कहीं हमारी ही कोई भलाई छुपी है हमने अपना कर्तव्य किया , आगे ईश्वर की मर्जी ' तो हमें कभी कोई तनाव नहीं होगा l सुख -चैन की नींद आना ईश्वर की बहुत बड़ी देन है l ----एक बार गाँधी जी का एक परिचित धनाढ्य व्यक्ति गांधी जी से मिलने पहुंचा l उसने कहा --- " गांधी जी ! आप तो जानते हैं कि मैंने लाखों रूपये खरच कर के धर्मशाला का निर्माण कराया था l अब गुटबाजों ने मुझे ही प्रबंध समिति से हटा दिया l ऐसे लोग समिति में आ गए हैं , जिनका धन की द्रष्टि से योगदान नगण्य ही है l इस संबंध में क्या न्यायालय में मामला दर्ज कराना उचित नहीं होगा ? " गांधी जी ने कहा --- " तुमने धर्मशाला धर्मार्थ बनाई थी या उसे व्यक्तिगत संपत्ति बनाए रखने के लोभ में ? असली धर्म तो वह होता है , जो बिना लाभ की इच्छा के किया गया हो l तुम अभी तक नाम व प्रसिद्धि का लालच नहीं त्याग पाए हो , इसलिए तुम धर्मशाला में प्रबंध समिति के पद से हटाए जाने से दुःखी हो l मेरी बात मानो तो तुम धर्मशाला की प्रबंध समिति में पद और नाम की प्रसिद्धि के मोह को त्याग दो l इससे तुम्हारे मन को शांति प्राप्त होगी l " यह सुनकर उस व्यक्ति ने संकल्प किया कि अब वह पद अथवा नाम के लोभ में कभी नहीं पड़ेगा l
17 August 2023
15 August 2023
WISDOM ------
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----" यदि हम समस्या को सुलझाना चाहते हैं , उस पर विजय पाना चाहते हैं तो हमें अपनी प्रतिक्रिया को नियंत्रित करना होगा l समस्या के कारणों को जाने -समझे बिना तुरंत रिऐक्ट करने से समस्या और भी जटिल हो जाती है l यदि हमें समस्या को सुलझाना है , उससे बाहर निकलना है तो हमें अपना ध्यान उसके समाधान पर केन्द्रित करना होगा l "------- एक बार महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ यात्रा कर रहे थे l एक झील देखकर उन्होंने अपने दोनों शिष्यों से कहा ----" मुझे प्यास लग रही है , झील से पानी ले आओ l " तभी एक बैलगाड़ी झील में उतरकर उस पार जाने लगी l इससे पानी मटमैला हो गया l एक शिष्य तुरंत लौट आया और बुद्ध से बोला --- " पानी गन्दा है , आपके पीने लायक नहीं है l " जबकि दूसरा शिष्य चुपचाप वहीँ झील के किनारे ही बैठ गया l कुछ समय बाद वह साफ़ पानी लेकर बुद्ध के पास पहुंचा , तो वे बोले ---- "तुमने पानी को साफ़ करने के लिए क्या किया ? " दूसरे शिष्य ने कहा --- " कुछ नहीं , सिर्फ समय दिया , मिटटी अपने आप जम गई और मुझे साफ़ पानी मिल गया l " आचार्य श्री लिखते हैं --- इस घटना क्रम में दोनों शिष्यों के पास समान समस्या थी किन्तु पहले शिष्य का ध्यान सिर्फ समस्या पर था इसलिए वह पानी लाने में असफल रहा l जबकि दूसरे शिष्य का ध्यान समस्या के कारण और उसके समाधान पर थ , इसलिए वह सफल रहा l आचार्य श्री लिखते हैं --- इस सूत्र को अपनाकर जीवन में आने वाली किसी भी मुश्किल समस्या को हम सहजता से हल कर सकते हैं l जीवन की हलचल को शांत होने के लिए कुछ वक्त देना जरुरी है l जिस तरह गंदे पानी को स्वच्छ बनाने के लिए उसमे मिली मिटटी के नीचे बैठने का इंतजार करना होता है , उसी प्रकार जीवन की हलचलों को शांत करने के लिए कुछ वक्त देना भी जरुरी होता है l "
13 August 2023
WISDOM ----
पं .श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- "भौतिक प्रगति के नाम पर मनुष्य ने सुविधाओं के अंबार खड़े कर लिए किन्तु फिर भी वह अपने जीवन में सुखी व संतुष्ट दिखाई नहीं पड़ता l मनुष्य अब पहले की अपेक्षा और दुःखी , परेशान , निराश , अशांत व असंतुष्ट नजर आता है l मनुष्य के शारीरिक और मानसिक रोग भी उसी अनुपात में बढ़े हैं l इसका एक कारण मनुष्य के अंतर्मन की भाव शून्यता और संवेदनहीनता है , जो समय के साथ निरंतर बढ़ रही है l भौतिकता की चकाचौंध में पड़कर मनुष्य ने जीवन मूल्यों को नकारा है l स्वार्थ , अहंकार , ईर्ष्या , द्वेष आदि में पड़कर व्यक्तिगत हित को ही सब कुछ मान लिया l " आचार्य श्री आगे लिखते हैं ---- " मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है l वह उसी अनुपात में सुखी हो सकता है , जिस अनुपात में उसका समाज सुखी है l वह समाज की उपेक्षा कर अपने लिए सुख के साधन तो इकट्ठे कर सकता है , किन्तु जीवन में सुखी नहीं बन सकता l आज समाज में जो भी आतंकवाद , दंगे , खून -खराबे बढ़ रहे हैं , वे सब संवेदनहीनता के कारण ही उपजे हैं l यह सब तभी समाप्त हो सकता है जब व्यक्ति के अंदर संवेदना जगे और वह प्राणिमात्र के कल्याण की बात सोचे l " एक प्रसंग है जो यह बताता है कि ह्रदय में संवेदना जागने से हिंसा कैसे समाप्त हो जाती है ------- कौशाम्बी के राजगृह में कारू कसूरी नामक कसाई रहता था l वह पशुओं का मांस बेचकर अपनी जीविका चलाता था l राजगृह में बौद्ध संत आते रहते थे l अपने पुत्र सुलस के साथ वह कभी -कभी उनके दर्शन के लिए चला जाता था l संत किसी भी प्रकार की हिंसा न करने की प्रेरणा दिया करते थे l कारू कसूरी कहता --- मैं अपने पुरखों के धंधे को कैसे छोड़ दूँ ? यदि मैं हिंसा न करूँ तो खाऊंगा क्या ? जब कारू कसाई वृद्ध हो गया , तो उसने तलवार अपने बेटे सुलस को सौंप दी l कसाइयों की पंचायत में सुलस से कहा गया कि वह कुलदेवी की प्रतिमा के समक्ष भैंसे की बलि दो l सुलास का ह्रदय पशुओं के वध के समय उनकी छटपटाहट देखकर द्रवित हो उठता था l अत: उससे तलवार नहीं उठी l मुखिया ने दोबारा उससे कहा --- " बेटे ! यह हमारे कुल की परंपरा है l देवी को प्रसन्न करने के लिए रक्त निकालना पड़ता है l सुलस ने भैंसे की जगह अपने पैर पर तलवार से वार कर दिया l पैर से खून बहने लगा l ऐसा करने का कारण पूछने पर सुलस बोला --- " यदि कुलदेवी को रक्त की ही चाहत है तो किसी निर्दोष का खून बहाने से बेहतर है कि वे मेरा ही रक्त स्वीकार कर लें l " उसका उत्तर सुनकर कारू कसाई का ह्रदय द्रवित हो उठा और उस दिन के बाद से उसके परिवार में पशु वध बंद कर दिया गया l
12 August 2023
WISDOM
लघु कथा ----एक बार की बात है घनघोर पानी बरस रहा था l दूर -दूर तक जल ही नजर आता था l ऊपर उड़ती हुई दो बतखों की द्रष्टि एक कछुए पर पड़ी , जो एक पेड़ की टहनी मुँह से पकड़े किसी तरह स्वयं को प्रकृति के प्रहार से बचाने में लगा था l बतखों को कछुए पर दया आ गई , वे उसके पास जाकर बोलीं ---" आओ कछुए भाई ! तुम टहनी पकड़े रहो और हम तुम्हे उड़ाकर सूखी जमीन तक पहुंचा देते हैं l बस , किसी भी स्थिति में अपना मुँह न खोलना l ' कछुए ने सीख को समझे बिना हाँ कर दी l दोनों बतखों ने टहनी के सिरे पकड़े , कछुआ टहनी को बीच से पकड़े था , बतखें उड़ चलीं और पलक झपकते ही दूर आसमान में जा पहुँची l नीचे जमीन पर खड़े बच्चों ने यह अचरज भरा द्रश्य तो जोर -जोर से हँसने लगे l बच्चों को हँसते देख कछुआ क्रोध से भर गया और पलटकर चिल्लाने लगा l मुँह खोलते ही टहनी से उसकी पकड़ छूट गई और वह धड़ाम से जमीन पर आ गिरा l इस कथा से शिक्षा है कि हमें मौन रहने का अभ्यास करना चाहिए l अविवेक के कारण व्यक्ति असमय मुंह खोलता है , ऐसी मूढ़ता का परिणाम विनाशकारी होता है l
WISDOM ----
सच्चा अध्यात्मवादी कौन ? --- एक व्यक्ति बहुत गरीब था l उसने कड़ी मेहनत और पुरुषार्थ के बल पर धीरे -धीरे काफी संपत्ति अर्जित कर ली और अपने गाँव का सबसे अमीर व्यक्ति बन गया लेकिन उसे अपनी अमीरी का बिलकुल भी घमंड नहीं था l उसका पुत्र जब बड़ा हो गया तो उसने अपने घर की सारी जिम्मेदारी उसे सौंप दी और स्वयं अपने घर से कुछ दूर जंगल में कुटिया बनाकर रहने लगा , वहीँ ध्यान व भजन करता और जब -तब घर जाकर अपने पुत्र का मार्गदर्शन भी करता l एक दिन देवर्षि नारद उस जंगल से गुजरे l उस व्यक्ति को वहां देख रुक गए l उस व्यक्ति ने नारद जी को अपने परिवार और धन -वैभव के साथ अपनी आध्यात्मिक रूचि और तपस्या के बारे में विस्तार से बताया l नारद जी ने उसकी परीक्षा लेने की सोची , कुछ दिन बाद वह पुन: जंगल में आए तो देखा वह व्यक्ति ध्यान कर रहा है l कुछ देर बाद जब वह ध्यान से बाहर आया तो नारदजी ने उससे कहा -- आपके मकान में भयंकर आग लग गई है , कुछ ही क्षणों में आपका धन -वैभव जल कर राख हो जायेगा l यह सुनकर वह व्यक्ति जरा भी परेशान नहीं हुआ और बोला --- 'वह धन -वैभव प्रभु का दिया हुआ है , जैसी प्रभु की इच्छा l वैसे भी घर में बहुत लोग हैं जो विपत्ति का सामना कर सकते हैं l ' नारदजी प्रसन्न होकर चले गए l कुछ दिनों बाद वे पुन: उस व्यक्ति को देखने आए , तो देखा कुटिया खाली है , वह व्यक्ति वहां नहीं है l नारदजी को उस व्यक्ति पर शक हुआ और वे उसे खोजते हुए उसके गाँव पहुंचे तो देखा , उन दिनों उस क्षेत्र में भयंकर अकाल पड़ा था और वह व्यक्ति अपनी तपस्या , ध्यान छोड़कर लोगों को अपने हाथ से राशन -पानी , धन , भोजन सामग्री बांटने में लगा है l कोई भी खाली हाथ नहीं जा रहा , सब प्रसन्न होकर जा रहे हैं l नारद जी उसके सेवा भाव से बहुत प्रसन्न हुए और बोले --- " तुम्हारी तपस्या हर द्रष्टि से उत्तम है , तुमने अध्यात्म को सही अर्थों में अपनाया है l तुम्हारे भीतर मानव कल्याण की भावना है l तुम में न तो धन -वैभव का अभिमान है और न ही अपनी तपस्या का अभिमान है l तुम्हारे लिए वन और राजमहल दोनों एक समान हैं , तुम सच्चे अध्यात्मवादी हो l " नारदजी ने उसे आशीर्वाद दिया और उससे विदा ली l
9 August 2023
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एक दरिद्र मनुष्य सुन्दर राजकन्या पर मुग्ध हो गया और उसे पाने के लिए पुरुषार्थ करने लगा l असंभव लक्ष्य , किन्तु संकाल्प दृढ l अंत में सोचा साधु होकर तपस्या करूँगा , उससे जो आत्मबल अर्जित होगा , उससे राजकन्य प्राप्त हो जाएगी l इस प्रकार संसार त्यागकर उग्र तपस्या करने लगा l सारे राज्य में उसकी ख्याति बढी l धनी , दरिद्र सभी उसके दर्शनों के लिए आने लगे l एक दिन वह राजकन्य स्वयं उस तपस्वी के दर्शन के लिए आई l उसे अपने सामने देखकर तपस्वी के ह्रदय के चक्षु खुल गए l उसने सोचा , जिस प्रभु के प्रति श्रद्धावश यह मेरे दर्शनार्थ आई है , उस प्रभु को मैं छोड़ दूँ , तो मेरी क्या गति होगी ? तपस्वी ने वास्तविकता को समझा और अपनी शक्ति को शाश्वत सौन्दर्य परमात्मशक्ति को पाने हेतु नियोजित कर दिया l
7 August 2023
WISDOM -----
कलियुग के अनेक लक्षण हैं , उनमें से एक यह भी है कि इस समय में दुर्बुद्धि का प्रकोप बढ़ जाने से मनुष्य भगवान को पूजता नहीं है , भगवान के नाम पर लड़ता है , विवाद और दंगा करता है l अधिकांश इसी को अपनी रोजी -रोटी कमाने का साधन बना लेते हैं l यदि धर्म और जाति के नाम पर होने वाले झगड़े क्या वास्तव में इसी आधार पर हैं ? तो घरेलू हिंसा , परिवार में धन , संपत्ति के विवाद , परिवार में ही वर्चस्व के लिए लड़ाई , सदस्यों का शोषण , उत्पीड़न , कार्य स्थल पर उत्पीड़न --- यह तो समान धर्म के लोग ही आपस में एक दूसरे को सताते हैं l इसलिए इस लड़ाई में ईश्वर को बीच में लाकर प्रकृति को नाराज नहीं करना चाहिए l पुराणों में अनेक कथाएं हैं जिनमें बताया गया है कि ईश्वर का निवास हम सब के ह्रदय में है , गीता में भी यही कहा गया है l लड़ाई -झगडे में अपनी इतनी ऊर्जा और जीवन का बहुमूल्य समय गंवाना मूर्खता है l ---- पुराण में एक कथा है -- दो महा पराक्रमी और अजेय राक्षस थे --- हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु l देवासुर संग्राम में हिरण्याक्ष की मृत्यु हो गई तो भाई की मृत्यु का बदला लेने के लिए हिरण्यकशिपु गदा लेकर भगवान से लड़ने के लिए निकल पड़ा l जैसे ही युद्ध आरम्भ हुआ भगवान अंतर्धान हो गए l उनको ढूंढते हुए उसकी भेंट नारद जी से हुई l नारद जी ने उससे पूछा कि युद्ध में किसकी विजय हुई ? हिरण्यकशिपु बोला --- ' लड़ते -लड़ते वह न जाने कहाँ छुप गया , मैं उसे देख नहीं सका l " नारद जी ने जाकर भगवान से पूछा --- " आप कहाँ छिप गए , जिससे हिरण्यकशिपु आपको देख नहीं सका l l " भगवान ने कहा --- " मैं सब भूतों में अपने रहने के स्थान उसकी ह्रदय गुहा में जा बैठा था , जहाँ बैठकर अपनी माया द्वारा प्राणियों को उनके कर्मानुसार संसार चक्र में घुमाता हूँ l "