छोटे - छोटे जीव - जंतु भी अपने जीवन को सहज - सरल व सुखद बनाने के लिए अनेकों विधियाँ ढूंढते हैं l चींटी , दीमक , मधुमक्खी जैसे छोटे जीवों ने न जाने कितने युगों पहले से समूह में , सहयोग - सहकार से रहना सीख लिया लेकिन मनुष्य क्योंकि बुद्धिमान है , ज्ञानी है इस काम को अभी तक नहीं सीख पाया l मनुष्य में स्वार्थ , अहंकार , लालच इतना है कि वह स्वयं अपनी सामूहिकता का विनाश कर लेता है l सामूहिक भावना के विनाश के लिए उसके पास अनेकों तर्क है जैसे ---- भाषा , जाति , धर्म , क्षेत्रीयता , ऊंच - नीच , काले - गोरे ---- ऐसे विभिन्न तर्कों के आधार पर मनुष्यों ने ही अपनी बुद्धि का दुरूपयोग कर समूह भावना का विनाश कर लिया अब स्वार्थी तत्व इसी फूट का लाभ उठाते हैं l
24 September 2020
23 September 2020
WISDOM------
गुरु नानक यात्रा पर थे तो उनसे किसी ने आकर पूछा --- " हिंदू और मुसलमान में कौन बड़ा ? " गुरु नानक जी ने उत्तर दिया ---- " धर्म का मर्म अच्छे कर्म करने में है l बड़ा वह कहलाता है जो अच्छे कर्म करता है l कोई धर्म के आधार पर बड़ा नहीं होता l कहने को खजूर का पेड़ भी बड़ा होता है , पर उससे किसी की भलाई नहीं होती है लेकिन तुलसी का पौधा बहुत छोटा होते हुए भी बहुत उपयोगी है , अनेक रोगों का नाश कर देता है l यदि बड़प्पन और महानता का आकलन करना हो तो व्यक्ति के कर्मों को देखो , वह किस संप्रदाय या मजहब को मानता है --- इससे उसके बड़प्पन का मूल्यांकन मत करो l " उस व्यक्ति ने फिर पूछा ---- " क्या अच्छे कर्म करने के लिए किसी धर्म को मानना जरुरी नहीं है ? " गुरु नानक जी बोले ---- " अच्छा कर्म करना ही धर्म है l अच्छे कर्म करने वालों को किसी धर्म को मानने की आवश्यकता नहीं है l "
WISDOM -----
दो आचार्य परस्पर वार्तालाप कर रहे थे l एक ने दूसरे से पूछा --- " उन्हें मूर्ख , परन्तु विनम्र शिष्य पसंद हैं अथवा बुद्धिमान , किन्तु अहंकारी l " आचार्य ने उत्तर दिया --- " जो मूर्ख है उसे समझाया जा सकता है , किन्तु जो विशेषज्ञ , परन्तु अहंकारी है , उसे ब्रह्मा भी रास्ते पर नहीं ला सकते l " विश्व का इतिहास ऐसे ही अहंकारियों की गाथा से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने अहंकार के कारण सामान्य जन को बेकसूर मरने पर मजबूर कर दिया l यह सत्य है कि प्रत्येक प्राणी इस संसार में जीना चाहता है , कोई नहीं चाहता कि उसके बच्चे अनाथ हो जाएँ , उसका परिवार बेसहारा हो जाये , यह धरती अनाथों , विधवाओं , अपाहिजों और बीमारों के करुण क्रंदन से भर जाये l केवल कुछ लोगों के अहंकार , महत्वाकांक्षा और स्वार्थ का दुष्परिणाम संसार को भुगतना पड़ता है l यह जानते हुए भी कि मृत्यु निश्चित है , इस धरती से एक तिनका भी साथ नहीं ले जा सकते , फिर भी निर्दोष जनता को कष्ट व मुसीबत में डालकर लोग स्वयं अपने जीवन को कलंकित करते हैं
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लिखा है ---- ' स्वार्थी व अहंकारी व्यक्ति कभी सुखी व संतुष्ट नहीं हो सकता क्योंकि उसके मन में सदैव कुछ पाने की इच्छा बनी ही रहती है l स्वार्थ के साथ अहंकार , ईर्ष्या , द्वेष आदि अवगुण स्वत: ही जुड़ जाते हैं l अहंकार कभी भी थोड़े से संतुष्ट नहीं होता , बल्कि वह तो और अधिक , सबसे अधिक , सर्वश्रेष्ठ की अपेक्षा रखता है l इसी कारण व्यक्ति में ईर्ष्या , द्वेष का उदय होता है , जो दूसरों के शोषण का कारण बनता है और इसी से उत्पन्न होती है भाव शून्यता l आज मनुष्य इसी भावशून्यता की स्थिति में जी रहा है l ' प्रेम , दया , त्याग का स्थान स्वार्थ , अहंकार व ईर्ष्या , द्वेष ने ले लिया है l " आचार्य श्री लिखते हैं --- ' अहंकारी व्यक्ति समाज की उपेक्षा कर अपने लिए सुख के साधन तो जुटा सकता है किन्तु जीवन को सुखी नहीं बना सकता l जीवन में सब कुछ होते हुए भी सुख , शांति व संतुष्टि नहीं होती l '
22 September 2020
WISDOM -----
इस संसार में व्यक्ति को सर्वाधिक आकर्षित करती है ---- सुख की चाह l इस सुख को पाने के लिए वह तरह - तरह के प्रलोभनों में फँसता है , वह सुख की चाह में केवल भ्रमित होता रहता है , लेकिन उसे वास्तविक सुख नहीं मिल पाता l महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति को जो सुख मिला है , वह उसमें खुश नहीं होता , वह चाहता है कि दूसरों के हिस्से का सुख भी उसे ही मिल जाये l दूसरों का सुख उससे सहन नहीं होता और अपने सुखों के खो जाने का भय उसे दिन - रात सताता है l संसार में आज ऐसे ही लोगों की अधिकता है , जिनमे त्याग का भाव नहीं है l पुराणों में कथा है --- महाराज ययाति की l उनकी इच्छाएं कभी पूरी नहीं हुईं l उन्होंने अपने पुत्र - पौत्रों से यौवन की भीख मांगी , हजारों वर्षों तक सुख - भोग भोगने के बाद भी उन्हें तृप्ति नहीं हुई अंत में उन्हें गिरगिट की योनि प्राप्त हुई l हमारे ऋषियों ने सुख - भोग को मर्यादित करने के लिए ही आश्रम - व्यवस्था की , मनुष्यों को त्याग करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थान रिक्त करने की सलाह दी l लेकिन संसार में दुर्बुद्धि का ऐसा प्रकोप है कि ज्यों - ज्यों जीवन हाथ से छूटने का समय करीब आता है , व्यक्ति उसे और तेजी से पकड़ना चाहता है और चाहता है कि कितना सुख भोग लें , इस सुख के लिए चाहे संसार को युद्ध के दावानल में ही क्यों न झोंखना पड़े l
21 September 2020
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एक समय की बात है इंदौर में किसी रास्ते के एक किनारे पर एक गाय अपने बछड़े के साथ खड़ी थी l तभी देवी अहिल्याबाई के पुत्र मालोजी राव की सवारी निकली l गाय का बछड़ा अकस्मात उछलकर रथ के सामने आ गया l गाय भी उसके पीछे दौड़ी , पर तब तक मालोजी का रथ बछड़े को कुचलता हुआ आगे निकल गया , किसी ने परवाह नहीं की l गाय स्तब्ध आहत - सी वहीँ बैठ गई l थोड़ी देर बाद अहिल्याबाई वहां से गुजरीं , उन्होंने गाय को और उसके पास मृत पड़े बछड़े को देखकर घटनाक्रम का पता लगाया l सारा घटनाक्रम जानने पर अहिल्याबाई ने दरबार में मालोजी की पत्नी मेनाबाई को बुलाया l उन्होंने मेनाबाई से पूछा ---- " यदि कोई व्यक्ति किसी माँ के सामने उसके बेटे की हत्या कर दे , तो उसे क्या दंड मिलना चाहिए ? " मालोजी की पत्नी ने जवाब दिया --- " उसे प्राणदंड मिलना चाहिए l " देवी अहिल्या ने मालोजी को हाथ - पैर बांधकर मार्ग पर डालने को कहा और फिर उन्होंने यह आदेश दिया कि मालोजी को यह मृत्युदंड रथ से टकरा कर दिया जाये l परन्तु यह कार्य करने को कोई भी सारथी तैयार न हुआ l देवी अहिल्याबाई न्यायप्रिय थीं l अत: वे स्वयं माँ होते हुए भी इस कार्य को करने के लिए रथ पर सवार हो गईं l वे रथ को लेकर आगे बढ़ी ही थीं कि तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी l वही गाय रथ के सामने आकर खड़ी हो गई और उसे जितनी बार हटाया जाता , वह उतनी ही बार अहिल्याबाई के सामने आ जाती l यह दृश्य देखकर मंत्री परिषद ने देवी अहिल्या से मालोजी को क्षमा करने की प्रार्थना की l इस तरह गाय ने स्वयं पीड़ित होते हुए भी मालोजी को क्षमा करके उनके जीवन की रक्षा की | इंदौर में जिस जगह यह घटना घटी , वह स्थान आज भी आड़ा बाजार के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस स्थान पर गाय ने अड़कर दूसरे की रक्षा की l
WISDOM ----
चाहे कोई भगवान का कितना भी बड़ा भक्त हो , कर्म फल से कोई नहीं बचा है l जब धरती पर पाप बहुत बढ़ जाता है तब भगवान स्वयं जन्म लेते हैं पापियों का नाश करने के लिए l जब दसों दिशाओं में रावण का आतंक था , तब भगवान राम का जन्म हुआ l उस समय ऋषियों के चिंतन में यह बात थी की रावण तो सपरिवार परम शिव भक्त है , तो क्या प्रभु स्वयं अवतार लेकर अपने ही भक्त का विनाश करेंगे ? तब भगवान भोलेनाथ ने ऋषियों से कहा --- ' हे ऋषिगण ! पूजा के कर्मकांड को भक्ति नहीं कहा जा सकता l भक्ति तो पवित्र भावनाओं में वास करती है l जो भक्त है , उसकी संवेदना का विस्तार तो सृष्टिव्यापी होता है , भला वह कैसे किसी का उत्पीड़न कर सकेगा l रावण भक्त नहीं , तपस्वी है l आज उसे अपने तप का फल मिल रहा है , परन्तु उसकी संवेदना को उसके अहंकार ने निगल लिया है l फिर यदि किन्ही अर्थों में वह मेरा भक्त भी है तो अपने भक्त का उद्धार करना मेरा ही दायित्व है l ' युद्ध से पूर्व जब रावण ने शक्ति पूजा की तब देवी ने उसे वरदान दिया था --- ' तुम्हारा कल्याण हो l ' रावण का अंत होने में ही उसका कल्याण था l