एक बार रेगिस्तान में मुसाफिरों का एक काफिला सफर कर रहा था l रास्ते में लुटेरों के एक दल से काफिले की मुठभेड़ हुई l सरदार के हुक्म से हर एक यात्री की तलाशी ली गई , जो मिला उसे छीन लिया गया l एक लड़के की तलाशी में फटे - पुराने कपड़ों के सिवाय कुछ न मिला , तो सरदार ने पूछा ---- क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है l लड़के ने कहा ---- " मेरे पास चालीस अशर्फियाँ हैं , जो माँ ने कपड़ों में सिल दी थीं l ये मैं अपनी बहन के लिए ले जा रहा हूँ l " सरदार ने कहा --- ' जब ये तुम्हे छिपानी न थीं तो फटे कपड़े में सिलवाने की क्या जरुरत थी ? ' लड़के ने कहा ---- माँ ने इस वास्ते सी दीं की कहीं कोई छीन न ले और नसीहत भी दी कि बेटा , कभी झूठ न बोलना l मैंने अपनी माँ का आज्ञापालन किया l ' लड़के की इस सच्चाई से लुटेरों का सरदार खुश हुआ और मुसाफिरों का लूटा माल वापस कर दिया l सभी लुटेरों को बदल कर सच्चा रास्ता बताने वाला और कोई नहीं अपितु खलीफा अमीन था l
30 October 2020
WISDOM -----
एक दिन राजा भोज गहरी निद्रा में सोए हुए थे l उन्हें स्वप्न में एक अत्यंत तेजस्वी वृद्ध पुरुष के दर्शन हुए l भोज ने उनसे पूछा ---- " महात्मन ! आप कौन हैं ? " वृद्ध ने कहा ---- " राजन ! मैं सत्य हूँ l तुझे तेरे कार्यों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूँ l मेरे पीछे - पीछे चला आ और अपने कार्यों का वास्तविक रूप देख l " राजा उस वृद्ध के पीछे चल दिया l राजा भोज बहुत दान - पुण्य , यज्ञ , व्रत , तीर्थ , कथा - कीर्तन करते थे l उन्होंने अनेक मंदिर , कुएं तालाब , बगीचे आदि भी बनवाये थे l राजा के मन में उन कर्मों के कारण अभिमान आ गया था l वृद्ध पुरुष के रूप में आया सत्य सबसे पहले राजा को फल , फूलों से लदे बगीचे में ले गया l वहां सत्य ने जैसे ही पेड़ों को छुआ , सब एक - एक कर के ठूंठ हो गए l राजा आश्चर्यचकित रह गया l फिर सत्य राजा भोज को मंदिर ले गया l सत्य ने जैसे ही उसे छुआ , वह खंडहर हो गया l वृद्ध पुरुष ने राजा के यज्ञ , तीर्थ , कथा , पूजन , दान आदि के निमित बने स्थानों आदि को ज्यों ही छुआ वे सब राख हो गए l राजा यह सब देखकर विक्षिप्त - सा हो गया l सत्य ने कहा --- " राजन ! यश की इच्छा के लिए जो कार्य किए जाते हैं , उनसे केवल अहंकार की पुष्टि होती है , धर्म का निर्वहन नहीं l सच्ची भावना से निस्स्वार्थ होकर कर्तव्यभाव से जो कार्य किए जाते हैं , उन्ही का फल पुण्य रूप में मिलता है l " इतना कहकर सत्य अंतर्धान हो गया हो गया l राजा ने निद्रा टूटने पर स्वप्न पर विचार किया और सच्ची भावना से निष्काम कर्म करने लगा l
29 October 2020
WISDOM -----
अर्मीनिया के सर्वोच्च सेनापति सीरोजग्रिथ का व्यक्तित्व उनकी माता ने बनाया l विधवा नार्विन ग्रीथ कपड़े सीकर किसी तरह अपने बच्चों का पेट पालती थी l बड़े बेटे ग्रिथ ने अपनी मर्जी से गरीबी के कारण स्कूल में फीस माफ कराने की अर्जी दे दी l जो परिस्थिति से पूर्णत: जानकार अध्यापक की सिफारिश पर मंजूर भी हो गई l ग्रिथ की माता को जब यह पता चला , तो उन्होंने उस सुविधा को अस्वीकार कर दिया l उनने लिखा हम लोग मेहनत कर के गुजारा करते हैं तो फीस क्यों नहीं दे सकेंगे l गरीबों में अपनी गणना कराना हमें मंजूर नहीं l हमारा स्वाभिमान कहता है कि हम गरीब नहीं , स्वावलम्बन से इन परिस्थितियों से जूझ लेंगे l
28 October 2020
WISDOM -----
हकीम अजमल खाँ जाने - माने चिकित्सक होने के अतिरिक्त प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भी थे l एक बार वे किसी रजवाड़े में बीमार नवाब को देखने गए l नवाब और बेगम शाही लिबास पहने बैठे थे l जब अजमल खां उन्हें देखकर चलने लगे तो नवाब साहब ने उनसे उनका मेहनताना पूछा l हकीम साहब ने उत्तर दिया --- " बुरा न माने नवाब साहब तो मेरा मेहनताना सिर्फ इतना होगा कि आप लोग खादी धारण कर लें l जब देश का एक आम आदमी तन ढंकने के लिए चंद कपड़े नहीं जुटा पाता तो ऐसे में रत्नजड़ित पोशाकों को पहनना आपको शोभा नहीं देगा l " बेगम साहिबा बोलीं ---- " पर हकीम साहब ! खादी खुरदरी बहुत है , पहनने में जरा तकलीफ होती है l " हकीम अजमल खां बोले --- " बेगम साहिबा ! अपनी माँ बदसूरत हो तो भी माँ तो अपनी ही है l कपड़े खुरदरे ही सही पर स्वदेशी तो हैं l " अजमल खां की बात से प्रभावित होकर नवाब साहब और उनकी बेगम ने आजादी के आंदोलन में भाग लेना प्रारंभ कर दिया l
27 October 2020
WISDOM -----
जगद्गुरु शंकराचार्य चाहते थे कि देश में चारों दिशाओं में ज्ञानक्रांति के केंद्र बने l इसके लिए समस्या धन की थी l इसलिए वे भिक्षाटन के लिए निकले थे l देश के श्रेष्ठि वर्ग ने उनसे अनेकों बार कहा कि ---' आप हमें आदेश दें , हम धन की कोई कमी नहीं पड़ने देंगे l लेकिन आचार्य ने उनके इस प्रस्ताव को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया और कहा ---- " यदि ज्ञान , जन के लिए हो तो धन भी जन का होना चाहिए l जनभागीदारी से जो कार्य किए जाते हैं , जन उन कार्यों को महत्व भी देता है l फिर सबके द्वार पहुँचने से ज्ञान का सहज वितरण होगा और जनसहयोग भी प्राप्त होगा l " अपने इसी प्रयास में वे पदयात्रा करते हुए एक गांव में पहुंचे l अभी जिस द्वार पर उन्होंने भिक्षा के लिए पुकारा वह झोंपड़ी एक निर्धन वृद्ध विधवा ब्राह्मणी की थी l उसके पति व पुत्र का आकस्मिक निधन हो गया था l आचार्य द्वारा भिक्षा की याचना सुनकर वह व्याकुल हो उठी l उसने अपनी पूरी झोंपड़ी खंगाल ली पर कुछ न मिला l बाहर देखा तो आचार्य अभी तक खड़े थे l व्याकुल होकर उसने कहा --- ' हे ईश्वर ! तूने मुझे इतना गरीब क्यों बनाया ? ' ईश्वर को यह उलाहना देते हुए उसने फिर से अपनी झोंपड़ी में सब तरफ ढूंढा l इस बार उसे कोने में पड़ा हुआ सूखा आंवला मिला l उसने बड़े जतन से आंवला उठा लिया और दौड़ते हुए बाहर आई और आचार्य के हाथ पर वह सूखा आंवला रख दिया l इस आंवले के साथ ही आचार्य की हथेली पर आँसू की चार बूँद गिरी l दो आँसू वृद्धा के थे और दो आचार्य के l आचार्य भावाकुल हो गए , आंवले के रूप में वृद्धा अपनी सम्पूर्ण सम्पति दान दे रही थी l ऐसी उदारता और ऐसी दरिद्रता के विरल संयोग को देखकर आचार्य विकल हो उठे l उन्होंने माता महालक्ष्मी को पुकारा --- " हे माता ! इस उदारता को संपन्नता का वरदान दो " उनके मुख से स्वत: स्तवन स्फुरित होने लगा ----- सारे वातावरण में प्रकाश छा गया l स्तवन के पूर्ण होते ही वृद्धा की झोंपड़ी में आकाश से स्वर्ण आंवलों की कनकधाराएँ बरसने लगीं l महालक्ष्मी की कृपा और आचार्य की भक्ति के सभी साक्षी बने l और आचार्य द्वारा कहा गया स्रोत --- कनकधारा स्रोत के नाम से सिद्ध स्रोत के रूप में वंदित हुआ l
26 October 2020
WISDOM -------
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- जो मान - अपमान में , शत्रु - मित्र में तथा -सुख- दुःख आदि द्वंदों में सम है और आसक्ति से रहित है वही भक्त मुझे प्रिय है l भगवान कहते हैं --- मान - अपमान का संबंध हमारे अहं से है l अहं के कारण ही इनका अनुभव होता है l पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- ' मान से यदि अहंकार को पोषण मिलता है , तो अपमान से अहं को चोट लगती है l इसलिए जब हम अपने अहंकार को त्याग देते हैं तो ये मान - अपमान की अनुभूतियाँ स्वत: ही विसर्जित हो जाती हैं l फिर न हम में मान पाने की लालसा बची रह जाती है और न ही हमें अपमानित होने का भय सताता है l -------- स्वामी रामतीर्थ प्रव्रज्या हेतु अमरीका गए हुए थे l उनका उद्बोधन प्रसिद्ध चिंतकों और विचारकों के मध्य हुआ तो सभी ने एक स्वर में उनके अद्भुत व्यक्तित्व और प्रकांड पांडित्य की प्रशंसा की l उद्बोधन के पश्चात् वे जिस महिला के घर रुके हुए थे , उनके घर पहुंचे और उस महिला से बोले --- " बहन ! आज ईश्वर ने इस नाचीज को बहुत प्रशंसा दिलवाई l ' कुछ दिनों उपरांत वे न्यूयार्क शहर के ब्रौंक्स क्षेत्र से गुजर रहे थे कि उनकी वेशभूषा को देखकर कुछ अराजक तत्वों की भीड़ लग गई l उनमें से कुछ उन पर छींटाकशी करने लगे तो कुछ ऐसे भी थे जो बेवजह उनके साथ दुर्व्यवहार करने लगे l घटना की खबर जब महिला को लगी तो वह कुछ साथियों को लेकर स्वामीजी को लेने पहुंची l स्वामी रामतीर्थ उसी निर्विकार भाव से बोले --- " बहन ! आप हस्तक्षेप न करो l आज ईश्वर का अपने इस भक्त को अपमान से भेंट कराने का मन है l भगवान के भक्त के लिए मान क्या और अपमान क्या ? श्रीमद्भगवद्गीता में जिस स्थितप्रज्ञ का वर्णन है , उस स्वरुप का दर्शन उनमे सबको उन क्षणों में हुआ l
25 October 2020
WISDOM -----
रामकृष्ण परमहंस काली के उपासक थे l अनेक दिन बीत गए , वे रोज रोते l घंटों पूजा करते l एक दिन क्रोध में आकर बोले ---- " माँ ! इतने दिन से बुला रहा हूँ l तू आती ही नहीं l या तो तू प्रकट हो या मैं अप्रकट होता हूँ l या तो तू रहे या मैं मिटता हूँ l " तलवार हाथ में ले ली l गरदन पर चलाने वाले ही थे कि माँ प्रकट हो गईं l मूर्ति के स्थान पर साक्षात् माँ विराजमान थी l हँसती -- खिलखिलाती सौंदर्य की प्रतिमूर्ति माँ काली l तलवार फर्श पर गिर गई , वे छह दिन तक बेहोश पड़े रहे l सभी भक्त परेशान l छह दिन बाद जब होश आया तो पहली बात जो उनने कही , वह यही कि इतने दिन तो माँ तूने बेहोश रखा , अब जब छह दिन होश में रहा तो फिर बेहोशी में क्यों भेजती है ! तू मुझे फिर से बुला ले l जा मत , रुक जा l यह उनकी पहली समाधि थी l