ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हे न आए ऐसे विरले ही होते है l इसके नशे में व्यक्ति वह कामना भी करने लगता है जिस पर उसका कोई हक नहीं है l हमारे पुराणों में अनेक कथाएं हैं जो हमें शिक्षा देती हैं कि सफल होने पर हमें सफलता के मद में नहीं डूबना चाहिए , विवेकपूर्ण तरीके से जीवन जीना चाहिए ------ राजा नहुष को पुण्यफल के बदले इंद्रासन प्राप्त हुआ l स्वर्ग का वैभव पाकर वे भोग - विलास में लिप्त हो गए l उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी l वे विचार करने लगे कि जब वे इंद्रासन पर हैं तो इंद्राणी को अपने अंत:पुर में ले आएं l इस आशय का प्रस्ताव उन्होंने इंद्राणी के पास भेजा l राजाज्ञा के विरुद्ध खड़े होने का साहस उन्होंने अपने में नहीं पाया तो देवगुरु से परामर्श किया तो उन्होंने इस संबंध में बहुत होशियारी , विवेक और धैर्य से काम लेने को कहा l इंद्राणी ने नहुष के पास संदेश भिजवाया कि यदि वे सप्त ऋषियों को पालकी में जोतें और उस पर चढ़कर मेरे पास आएं तो मैं उनका प्रस्ताव स्वीकार कर लूंगी l आतुर नहुष ने अविलंब वैसी व्यवस्था की , ऋषि पकड़ बुलाए और उन्हें पालकी में जोत दिया और नहुष पालकी पर चढ़ बैठे l उनके लिए तो एक - एक पल एक युग के समान था , ऋषियों को बार -बार हड़काने लगे --- 'जल्दी चलो --- जल्दी चलो ! दुर्बलकाय ऋषि इतनी दूर तक इतना बोझा ढोने में समर्थ न हो सके l अपमान और उत्पीड़न से क्षुब्ध हो उठे और एक ने कुपित होकर शाप दे दिया --" दुष्ट ! तू स्वर्ग से पतित होकर , पुन: धरती पर सर्प योनि में जा गिर " बेचारे नहुष धरती पर दीन - हीन की तरह विचरण करने लगे l सत्पुरुषों का तिरस्कार करने और उन्हें सताने से नहुष की दुर्गति हुई l
22 November 2020
21 November 2020
WISDOM ------- अधर्म और अनीति का साथ देने वाले कितने भी सामर्थ्यवान , शक्तिशाली एवं प्रखर योद्धा क्यों न हों , उनका पराभव सुनिश्चित है
जब दुर्योधन ने पांडवों को सुई की नोक बराबर भूमि भी देने से इनकार कर दिया तब महाभारत का होना निश्चित हो गया l कर्ण के लिए विपरीत समय में काम आने वाले दुर्योधन का मित्रधर्म सर्वोपरि था l वो किसी भी कीमत पर अर्जुन को परास्त कर के अपने मित्रधर्म से उऋण होना चाहता था परन्तु ऐसा हो नहीं पा रहा था l अर्जुन के सामने पराजय का सामना करना पड़ता था l इसलिए इस समस्या पर भीष्म पितामह के मनोभाव जानने के लिए वह उनके पास गया l कर्ण ने कहा ----- " हे पितामह ! युद्ध में तो केवल उसी की जीत होती है जिसके योद्धा युद्ध कौशल में निपुण एवं अति साहसी हों l जिसके पक्ष में आप जैसा सेनापति हो , आचार्य द्रोण के समान शस्त्रवेत्ता हो , कृपाचार्य के समान कूटनीतिज्ञ हो , अश्वत्थामा , दुर्योधन, दु:शासन तथा मुझ जैसा धर्नुधर हो , कैसे भला कोई हमें परास्त कर सकता है l हमारे पास तो तमाम राज्यों की सेनाएं हैं , कृष्ण की ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएं भी हमारे साथ हैं l हमें किस बात की चिंता , हम तो अजेय और अपराजेय हैं l पांडवों के पास क्या है , कृष्ण हैं , वे भी निहत्थे , अस्त्र -शस्त्र न उठाने की उन्होंने प्रतिज्ञा की है l ऐसे में क्या हमारी जीत सुनिश्चित नहीं है ? " पितामह कुछ देर मौन रहे फिर बोले --- " वत्स कर्ण ! तुम श्री कृष्ण को निहत्था समझने की महान भूल कर रहे हो l उन्हें समझ पाना मानवीय बुद्धि की सीमा से परे है l तुम्हारी बुद्धि उस दिव्य एवं अदृश्य तत्व को परख नहीं पा रही है जो उनको एक सुरक्षा कवच से आच्छादित किए हुए है और उनका कवच है उनके कृष्ण , उनका धर्म ! धर्म की ही जीत होगी l जहाँ धर्म है , वहीँ श्रीकृष्ण हैं इसलिए अर्जुन जीतेगा l कौरव अधर्म के साथ खड़े हैं , अधर्म को पराजय का सामना करना पड़ेगा l "
20 November 2020
WISDOM ----- जो अहंकार से पीड़ित हैं , वे अपने मन में उतने ही ज्यादा असुरक्षित हैं
पुराणों में एक कथा है --- एक राजा था महिषध्वज , बहुत अहंकारी था l यह अहंकार उसे अपने पिता व दादा से विरासत में ही मिला था l वह कहता था कि मैंने ही गरीबों को धन दिया , भूखों का पेट भरा , मेरे कारण न जाने कितने घरों में चूल्हा जलता है l मैं ही सबका आश्रयदाता हूँ इसलिए लोग मुझे भगवान के समान पूजते हैं l जबकि सच यह था कि उसके हृदय में संवेदना नहीं थी l उसके विरुद्ध कोई दो शब्द भी बोलता , झुककर बात नहीं करता तो वह उसे दण्डित करता l औरों की पीड़ा उसे पीड़ित नहीं करती , उसे तो केवल अपने सुख - दुःख की परवाह थी l इसलिए लोग अपनी जान बचाने के लिए उसकी प्रशंसा कर दिया करते थे जिसे महिषध्वज सच मान लेता था l अहंकार में आधिपत्य की चाहत होती है इसलिए वह आसपास के राज्यों पर भी अपना अधिकार कर उन्हें अपने आतंक के नीचे रखना चाहता था l संयोग से एक संत धृतव्रत उस रियासत से होकर गुजर रहे थे , उनकी भेंट महिषध्वज से हुई l इन संत के पिता भी एक रियासत के राजा थे लेकिन संत ने अपनी रियासत अपने भाइयों को सौंप दी और स्वयं संत बन गए l महिषध्वज के कहने पर वे कुछ दिन उसकी रियासत में व्यतीत करने को तैयार हो गए l संत प्रात: उठकर बीमार लोगों की सेवा करते , असहायों की सहायता करते , दीन - दुःखियों का दर्द बांटते l उनके इस आत्मीय व्यवहार से राजा के आतंक से पीड़ित जनता में नई ऊर्जा का संचार हुआ l अब तो संत के द्वार विशाल जनसमूह अपने कष्टों के निवारण का मार्ग पूछने और जीवन के लिए सही मार्गदर्शन पाने के लिए इकट्ठा होने लगा l संत धृतव्रत की बढ़ती लोकप्रियता से राजा को बड़ी असुरक्षा हुई l उन्होंने संत से कह दिया कि प्रजा उसी पर आश्रित है और उसे भगवान की तरह पूजती है l संत ने कहा --- राजन ! तुम्हारे मन में भ्रम है कि यहाँ आता विशाल जनसमूह तुम्हारे साम्राज्य को चुनौती दे रहा है l तुम्हे यह विचारने की आवश्यकता है कि तुम्हारे राजा होते हुए ये सारा जनसमूह मेरे द्वार पर किस आशा के साथ खड़ा है ? न मेरे पास कोई धन है , न कोई अधिकार , फिर इन्हे यहाँ आने के लिए कौन सा कारण प्रेरित कर रहा है ? राजा महिषध्वज के पास इसका कोई उत्तर न था l संत धृतव्रत बोले ---- " मानवीय सम्बन्ध प्रेम के आधार पर खड़े होते हैं l यदि तुम यह चाहते हो कि लोग तुम्हे हृदय से चाहें तो उनके कष्ट के निवारण के लिए हृदय से प्रयास करना सीखो l यदि संबंधों का आधार स्नेह ,प्रेम और िश्वास हो तो तुम्हारी प्रजा भी तुम्हारे प्रति श्रद्धा और आदर का भाव रखने लगेगी l संत के विचारों से राजा बहुत प्रभावित हुआ , उसका आचरण बदलने लगा , अब उसके राज्य में आतंक के स्थान पर संवेदना का वातावरण था l अब प्रजा के हृदय में भी उसके लिए आदर भाव था l
WISDOM ------ मेघनाद क्यों हारा ?
हमारे महाकाव्य हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं , उचित -अनुचित और अच्छे - बुरे का भान कराते हैं l इनके अध्ययन - मनन से हमें अपने जीवन में सही दिशा चुनने की समझ आती है l ---- रावण का पुत्र था --मेघनाद l उसकी पत्नी का नाम था सुलोचना l राक्षस कुल में रहकर भी उसके जैसी महान पतिव्रता का होना एक आश्चर्य था l सुलोचना ने जीवन भर पतिव्रत धर्म की साधना कर मेघनाद को वह बल प्रदान किया था कि उसके आगे देवता भी नहीं टिकते थे l उसने स्वर्ग के राजा इंद्र को पराजित किया और इंद्रजीत कहलाया , जैसे मेघ गरजते हैं वैसी ही उसकी गर्जना थी , इसलिए वह मेघनाद था l राम - रावण के युद्ध में जब मेघनाद सेनापति बना , तब भगवान राम ने उससे युद्ध करने के लिए लक्ष्मण जी को भेजा l लक्ष्मण जी महारथी थे l मेघनाद ने शक्ति का प्रयोग किया , इस कारण वे मूर्छित हो गए l लेकिन श्री हनुमान जी द्वारा लाई गई संजीवनी बूटी और उनकी पत्नी उर्मिला के पतिव्रत धर्म की ताकत से लक्ष्मण जी को जीवन दान मिला l लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला महान पतिव्रता थी , उसने चौदह वर्ष तक अपने पति की अनुपस्थिति में पलक ऊपर उठाकर किसी पुरुष के दर्शन तक नहीं किए और राज्य - भोग , आभूषण , स्वादयुक्त भोजन आदि का परित्याग इसलिए कर दिया था , क्योंकि उनके पति वनवासी थे l जब लक्ष्मण जी स्वस्थ होकर पुन: मेघनाद से युद्ध के लिए जाने लगे तब भगवान राम ने उन्हें चेताया कि ध्यान रखना मेघनाद का सिर जमीन पर न गिरने पाए l ------- लक्ष्मण जी और मेघनाद में भयंकर युद्ध हुआ और अंत में मेघनाद पराजित हुआ और मारा गया l यह पूछने पर कि लक्ष्मण और मेघनाद दोनों ही महारथी थे , दोनों की पत्नी महान पतिव्रता थीं , जिनके सतीत्व की शक्ति उनके पति की रक्षा करती थी l फिर ऐसा क्या हुआ कि मेघनाद पराजित हुआ ? भगवान ने कहा --- मेघनाद ने एक ऐसे व्यक्ति का साथ दिया जिसने परस्त्री का अपहरण किया , अत्याचारी व अन्यायी था l ऐसे व्यक्ति का साथ देकर उसने स्वयं ही अपनी शक्ति को कम कर लिया और पराजित हुआ l इस प्रसंग से हमें शिक्षा मिलती है कि हम होश में रहें , अत्याचारी और अन्यायी का साथ देकर मनुष्य स्वयं अपने पतन की राह चुनता है l
19 November 2020
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है --- " दूरसंचार क्रान्ति का सकारात्मक उपयोग हो , तो इसे वैचारिक क्रान्ति का कारगर एवं असरदार हथियार बनाया जा सकता है l " महात्मा गाँधी स्वयं जनसंचार के हिमायती थे l वर्ष 1930 के दांडी मार्च के निपुण चित्रांकन ने शीघ्र ही नमक सत्याग्रह को विश्वप्रसिद्ध घटना बना दिया l दांडी के लिए प्रस्थान करने से पहले बापू ने तीन फिल्म कर्मचारियों और कुछ फोटोग्राफरों को चुनकर अपने साथ कर लिया था l मोटरकार में गाँधी जी पीछे - पीछे चलकर उन्होंने पूरे अभियान की तस्वीरें खींची , जो दुनियाभर में दिखाई गईं l धूलधूसरित मैदान में लंबे डग भरते हुए अपने अनुयायिओं का नेतृत्व करते हुए महात्मा गाँधी की छवि तब लाखों लोगों के दिलों में बस गई थी l आचार्य श्री का कहना है ---' यदि इरादे नेक हों , दुर्बुद्धि दूर हो तो दूरसंचार सुविधा विचार - क्रांति का अनोखा हथियार होगी l '
WISDOM -----
चित्रगुप्त महाराज के यहाँ समाधान न हो पाने से समस्या धर्मराज के सामने लाई गई l एक संत अपने त्याग के बदले सद्गति चाहते थे , जबकि चित्रगुप्त के हिसाब से उन्हें केवल कुलीन कुल में जन्म देने की व्यवस्था थी l धर्मराज ने विवरणों का सर्वेक्षण किया और बोले --- " संत जी , आपका यह कथन ठीक है कि आपने सांसारिक पद - प्रतिष्ठा का मोह नहीं किया और समय और शक्ति उसमे नष्ट नहीं की l त्याग के इस साहस के पुण्य से आपको श्रेष्ठकुल व सत्परिस्थितियों में जन्म मिलेगा l किन्तु आपने त्याग के द्वारा बचाई ईश्वरीय विभूतियों को किसी ईश्वरीय उद्देश्य में , लोक - कल्याण में नहीं लगाया l उन्हें सही दिशा में गति नहीं दी l इसलिए आप सद्गति के अधिकारी नहीं बनें l " संत का समाधान हो गया और अगले जीवन में त्याग के साथ शक्तियों के सुनियोजन का संकल्प लेकर विदा हुए l
18 November 2020
WISDOM -----
चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण की यात्रा पर निकले l रास्ते में एक सरोवर के किनारे उन्होंने एक ब्राह्मण को गीता - पाठ करते देखा l वह गीता के पाठ में इतना तल्लीन था कि उसे अपने शरीर की सुध नहीं थी , उसका हृदय गद्गद हो रहा था और नेत्रों से आँसुओं की धारा बह रही थी l उसका पाठ समाप्त होने पर चैतन्य महाप्रभु ने पूछा --- " तुम श्लोकों का अशुद्ध उच्चारण कर रहे थे , तुम्हे इसका अर्थ मालूम न होगा , परन्तु तब भी तुम इतने भाव-विभोर कैसे थे ? " उसने उत्तर दिया ---- " भगवन ! मैं क्या जानूँ संस्कृत l मैं तो जब पढ़ने बैठता हूँ तो ऐसा लगता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों ओर बड़ी भारी सेनाएं सजी हुई खड़ी हैं l जहाँ बीच में एक रथ पर भगवान कृष्ण अर्जुन से कुछ कह रहे हैं l इस दृश्य को देखकर मन भाव से भर उठता है l " चैतन्य महाप्रभु ने कहा --- ' भैया तुमने ही गीता का सच्चा अर्थ जाना है l " यह कहकर उन्होंने उसे अपने गले से लगा लिया l