विश्व युद्ध , विभिन्न देशों के बीच समय - समय पर होने वाले युद्ध , दंगे , विभाजन जैसी त्रासदी --यह सब मनुष्य के ही अहंकार , स्वार्थ , अति महत्वाकांक्षा , 'स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझना जैसी मानसिक दुष्प्रवृतियों का ही दुष्परिणाम थे l ऐसी घटनाओं में सबसे दुःखद बात यह होती है कि कितने ही बच्चे जिन्होंने बोलना , खड़े होना ही नहीं सीखा , वे बिना वजह मारे जाते है , कुछ माँ के गर्भ से बाहर आने को ही तरस जाते हैं , अचानक ही धरती पर अनाथों , अपाहिजों , विधवाओं , और बेसहारा लोगों की संख्या बढ़ जाती है , धरती लाशों से पट जाती है l बेवजह हुई ऐसी त्रासदी से धरती तो बोझिल होती है , वायुमंडल भी जख्मी हो जाता है l इसके दुष्परिणाम केवल वर्तमान पीढ़ी ही नहीं , भावी पीढ़ियाँ भी झेलती हैं l इसी कारण वातावरण को परिष्कृत करने के लिए भगवान राम ने लंका विजय के उपरांत राजसूय यज्ञ कराया l महाभारत के युद्ध के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने भी राजसूय यज्ञ कराया l भारत के प्राचीन इतिहास में ऐसे यज्ञ कराने के अनेक उदाहरण हैं l इन यज्ञों का उद्देश्य यही था कि ऐसी विभीषिका से वातावरण में जो नकारात्मकता भर गई है उसे दूर किया जाये l लेकिन वर्तमान युग में जब भौतिक प्रगति , समृद्धि को ही सब कुछ माना जाता है , अब संवेदना नहीं है l पद पाने की , धन कमाने की , अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की भागदौड़ है l जब जीवन का लक्ष्य ही स्वार्थ है तो युद्ध हो या न हो , शांति नहीं होगी l
24 January 2022
23 January 2022
WISDOM ------
अणुबम कितना शक्तिशाली होता है कि उसके दुष्परिणाम भावी पीढ़ियों को भी दशकों तक झेलने पड़ते हैं l विनाश तो पल भर में हो जाता है , पुनर्निर्माण की प्रक्रिया दीर्घकाल तक चलती है l कहते हैं मनुष्य का मन परमाणु बम से भी ज्यादा शक्तिशाली है l मन से उठने वाली तरंगे , विचार वायुमंडल में रहते हैं l युद्ध , दंगे बम विस्फोट जैसी घटनाओं के बाद भौतिक रूप से पुनर्निर्माण के कार्य तो किए जाते हैं लेकिन इन युद्धों , दंगे , जाति , धर्म , रंग भेद , ऊंच - नीच आदि के कारण कितने बच्चे - बूढ़े निर्दोष व्यक्ति बेरहमी से मारे गए , उनके मन , आत्मा से निकलने वाली कराह , चीत्कार जो अणु विस्फोट से भी ज्यादा शक्तिशाली हैं वायुमंडल में भर गईं l वे देश , वे क्षेत्र जहाँ उत्पीड़न , लूटपाट ,भेदभाव , हत्याएं आदि हृदयविदारक घटनाएं बहुत हुई हैं , यदि निष्पक्ष रूप से वहां सर्वेक्षण किया जाये तो यह सत्य सामने आएगा कि आज भी उन क्षेत्रों में अपराध किसी न किसी रूप में ज्यादा होते हैं , वातावरण बोझिल है , लोग संपन्न होने के बावजूद भी तनाव , मानसिक बीमारियों आदि से पीड़ित हैं l जो क्षेत्र डाकुओं की समस्या से ग्रस्त थे , वहां लोगों में षड्यंत्र , साजिश , हक छीनना आदि आपराधिक मनोवृति होगी l जो क्षेत्र दंगा रहित रहे , पवित्र धार्मिक स्थल हैं वहां शांति सद्भाव देखने को मिलेगा l जिन स्थानों पर एक्सीडेंट बहुत होते हैं , वहीँ पर अक्सर होते हैं l मनुष्य के भीतर देवता और असुर दोनों हैं , उसकी मानसिक स्थिति के अनुसार वातावरण में विद्यमान तरंगे उसके भीतर की प्रवृति को जाग्रत कर देती हैं l इसलिए वातावरण के परिष्कार के प्रयास बड़े पैमाने पर होने चाहियें l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने वातावरण के परिष्कार के लिए यज्ञ , हवन करने के लिए कहा , इसके अतिरिक्त यदि जो वास्तव में पीड़ित हैं उनके पीड़ा निवारण के कार्य यदि बड़े स्तर पर हों , खुशियां छीनने का नहीं , खुशियाँ बाँटने का प्रयास हो वातावरण परिष्कृत होगा , लोगों का मन भी शांत रहेगा l
22 January 2022
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कहते हैं जब कलियुग ने राजा परीक्षित से पूछा कि , मैं कहाँ निवास करूँ ? तब उन्होंने उसके लिए जो स्थान निश्चित किए उनमे एक था --- सोने का मुकुट l अब मुकुट तो कोई पहनता नहीं है , इसलिए कलियुग ने लोगों की बुद्धि में सरलता से प्रवेश कर लिया l और बुद्धि को दुर्बुद्धि में बदल दिया , यही कारण है कि आज संसार में चारों और समस्याएं हैं , उन्ही की चर्चा है , कहीं समाधान नहीं है क्योंकि बुद्धि पर लोभ , स्वार्थ और अति महत्वाकांक्षा हावी है , जो उस समस्या का समाधान होने ही नहीं देती l अब यह जरुरी है कि सब लोग सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना करें l सद्बुद्धि होने पर संवेदना जागेगी और तब सब समस्याएं स्वत: ही हल हो जाएँगी l
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इस संसार में हर युग में किसी न किसी रूप में देवासुर संग्राम होता रहा है l असुरता कभी नहीं चाहती कि देवत्व शक्तिशाली हो , इसलिए वह किसी न किसी तरह देवत्व को कमजोर करने के प्रयास करते रहते हैं l आज का युग ज्ञान - विज्ञान का युग है , परिश्रम करने और कर्मयोगी बनने का युग है l लेकिन यदि लोग ज्ञानी और कर्मयोगी हो गए तो वे असुरता को समझ जायेंगे और उसे मिटा देंगे l इसलिए असुरता ऐसे हथकंडे अपनाती है कि लोगों के ज्ञान प्राप्त करने में अनेक बाधाएं उपस्थित हो जाएँ , ज्ञान ही नहीं होगा तो वे जागरूक भी नहीं होंगे , इससे असुरता को अपना वर्चस्व कायम करना आसान होगा l इस सत्य को स्पष्ट करने वाली एक लघु कथा है ----- सतयुग धरती की ओर बढ़ रहा था l यह देखकर कलियुग ने अपने सहायकों की सभा बुलाई l किसी ने कहा , मैं पृथ्वी पर जाकर धन का लालच फैला दूंगा , किसी ने कहा , हम लोगों को कामनाओं में फंसा देंगे l किसी ने कामिनी का दर्प दिखाया , पर कलि को संतोष न हुआ l एक बुड्ढा सहायक एक कोने में बैठा था , वह बोला ----- मैं जाकर लोगों में निराशा और आलस्य पैदा कर दूंगा l उनके साहस को नष्ट कर दूंगा , बस , फिर वे किसी काम के न रहेंगे और न वे किसी बुराई को दूर करने के लिए संघर्ष कर सकेंगे और न ही किसी अच्छाई को उपार्जित करने का साहस उनमे रहेगा l इस वृद्ध सहायक की बात कलि महाराज को बहुत पसंद आई , उन्होंने इसे राज्य में प्रमुख पद दे दिया l आज के निराश और आलसी लोग कलि महाराज की प्रजा बने हुए हैं l इन परिस्थितियों में बेचारा सतयुग कहाँ ?
21 January 2022
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वर्तमान समय में भौतिक और वैचारिक प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि संयमित जीवन जीने और एक अच्छी जीवनशैली के बाद भी लोग स्वस्थ नहीं रह पाते , कोई न कोई बीमारी उन्हें अपनी चपेट में ले ही लेती है l इसका कारण है कि कीटनाशक , हानिकारक तत्वों के कारण वायु , जल , अन्न सब प्रदूषित है जो व्यक्ति की जीवनीशक्ति को कमजोर कर रहे है l प्रकृति से दूर और दवाइयों पर अत्यधिक निर्भर रहकर व्यक्ति अपने जीवन को जीता नहीं , ढोता है l यदि समाज जागरूक हो जाये तो इस बाहरी प्रदूषण को तो दूर किया जा सकता है लेकिन जो प्रदूषण व्यक्ति के भीतर है , काम , क्रोध , लोभ , ईर्ष्या , द्वेष , अति महत्वाकांक्षा , असत्य बोलना , बेईमानी , धोखा देना , षड्यंत्र करना ये सब दुर्गुण व्यक्ति को तनाव और बड़ी बीमारियों से ग्रस्त कर देते हैं l इस मानसिक प्रदूषण को दूर करना आसान नहीं है l श्रीमद्भगवद्गीता में इन दोषों से मुक्ति पाने का सरल रास्ता बताया गया है कि निष्काम कर्म करने से मन निर्मल हो जाता है , इसके लिए धैर्य और विश्वास की जरुरत है l
20 January 2022
WISDOM ----
आज के युग की सबसे बड़ी समस्या ' तनाव ' है l गरीब व्यक्ति मेहनत - मजदूरी कर पत्थर पर भी चैन की नींद सो जायेगा लेकिन जिसके पास जितनी सुविधाएँ हैं वह उतना ही तनावग्रस्त है l विकसित देशों में आर्थिक समस्या नहीं है लेकिन फिर भी अशांति है , तनाव है l इसका कारण यही है कि विज्ञानं ने मानव शरीर को यंत्र बना दिया है और मानव मन की भावनाओं की उपेक्षा करने से जीवन खोखला हो गया है l भौतिकता के सामने मानवीय संवेदना कहीं खो गई l विज्ञान आँसुओं का वैज्ञानिक विश्लेषण तो कर सकता है कि उसमे कितना पानी , खनिज , क्षार आदि है लेकिन आँख से गिरने वाला आँसू स्नेह , ममता , व्यथा , वेदना , करुणा , दुःख आदि कौन सी भावना को व्यक्त कर रहा है , इसका विश्लेषण नहीं कर सकता इसलिए विज्ञानं संवेदनहीन है l मनुष्य का केवल रासायनिक पदार्थों का सम्मिश्रण नहीं है , श्रद्धा , निष्ठां , साहस , उमंग , नैतिकता , ईमानदारी , आत्मविश्वास आदि श्रेष्ठ भावनाएं उसके व्यक्तित्व को , उसके आभामंडल को निर्मित करती है l भावनाओं की उपेक्षा के कारण ही लोग तनावग्रस्त हैं , नई -नई बीमारियां उसे घेर लेती हैं l फिर उन बीमारियों का इलाज भी उसी तरह होता है जैसे मशीनों में तेल डालकर उनके कल -पुर्जों को सुधारा जाता है l भौतिकता की अंधी दौड़ में मनुष्य ने भावनाएं तो खो दीं , और वह प्रकृति से भी दूर हो गया l जिन पांच तत्वों से मिलकर उसका शरीर बना , उन्ही तत्वों को प्रदूषित कर रहा है l अपने ही विनाश पर उतारू है l
19 January 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम आचार्य जी लिखते हैं ---- " जीवन की अनंत संभावनाएं हैं l हमें अपने विचारों को विधेयात्मक बनाते हुए भावनाओं को पवित्र बनाना चाहिए l सदा औरों के प्रति प्रेमपूर्ण सद व्यवहार करने से हमारे जीवन में भी ख़ुशी आ सकती है l परिस्थिति का समझदारी और बहादुरी के साथ सामना करने पर ही हमारी संकुचित क्षमता का विकास संभव है l " जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने से अनेक समस्याएं आसानी से हल हो जाती हैं l संत तुकाराम के जीवन का किस्सा है ------- एक बार वे कहीं से एक गणना लाये थे , उनकी पत्नी ने उसे उनकी पीठ पर दे मारा और उसके दो टुकड़े हो गए l एक टुकड़े को उन्होंने अपनी पत्नी के हाथ में थमा दिया और एक को स्वयं चूसने लगे l उन्होंने कहा कि पीठ में लग गई , सो लग गई लेकिन तुमको कितने ठीक तरीके से निशाना मारना आता है l गन्ना मारने की कला कैसी बढ़िया है , एक बार में ही दो बराबर टुकड़े कर दिए l उन्होंने अपनी पत्नी की गलती नहीं देखी , बल्कि उसमे भी अच्छाई ढूंढ ली l सकारात्मक दृष्टिकोण से अनेक समस्याएं आसानी से हल हो जाती हैं l