18 April 2023

WISDOM -----

 पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " जीवन  में  उतार -चढ़ाव  तो  आते  ही  रहते  हैं  l  अनुकूलता  व  प्रतिकूलताओं  से  ही  जीवन  बना  है  l  ऐसा  कभी  नहीं  हो  सकता  कि  जीवन  में  सब  कुछ  अनुकूल  हो   और  ऐसा  भी  नहीं  हो  सकता  कि  जीवन  में  सब  कुछ  प्रतिकूल  हो  l   जीवन  की  परिस्थितियां  तो  बदलती  ही  रहती  हैं   l   यदि  व्यक्ति  अपनी  मन:स्थिति   को  परिस्थितियों  के  अनुरूप  ढाल  ले   तो  वह  अनावश्यक  उलझनों   से  बच  जाता  है   और  हर  स्थिति  का  लाभ  उठा  सकता  है  l  जीवन  में  कुछ  ऐसी  भी  परिस्थितियां   भी   आती  हैं  , जिन्हें  स्वीकार  करना  पड़ता  है   इसलिए  जिनकी  सोच  सकारात्मक  है    , वे  अनावश्यक  संघर्ष  में   अपना  समय  और  शक्ति  नहीं  गंवाते  ,  बल्कि  मन:स्थिति  बदलकर   उनका  लाभ  उठाते  हैं  l  ये  गुणग्राही  होते  हैं  , उनके  लिए  हर  स्थिति  विकास  का  अवसर  है  l  "     एक  प्रसंग  है -----   एक  दिन  एक     शिष्य  ने  अपने  गुरु  से  कहा --- "  गुरुदेव  !  एक   व्यक्ति    ने   आश्रम  के  लिए  गाय  भेंट  की  है   "  गुरु  ने  कहा  --- " अच्छा  हुआ  दूध  पीने  को  मिलेगा  l "  एक   सप्ताह   बाद  शिष्य  ने  आकर  कहा ---- "गुरूजी  !  जिस  व्यक्ति  ने  गाय  दी  थी  , वह  अपनी  गाय  वापस  ले  गया  l  "  गुरु  ने  कहा --- "अच्छा  हुआ   !  गोबर  उठाने  के  झंझट  से  मुक्ति    मिलेगी  l "  बदलती  परिस्थिति  के  साथ  सकारात्मकता  बनाये  रखना  ही  जीवन  में  सफलता   का   एकमात्र   सूत्र  है  l  

17 April 2023

WISDOM -----

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " नियत  के  अनुसार   नियति  होती  है  l  नियति  कर्मों  का  परिणाम  होती  है  l  जैसा  हम  सोचते  हैं   एवं  करते  हैं ,   वैसी  ही   हमारी  नियति  होती  है  l  सतत  सत्कर्म ,  सदाचरण   एवं   सद्भाव  के  द्वारा हमारी  नियति  श्रेष्ठता  से  परिपूर्ण  हो  जाती  है  l  लेकिन  इसके  विपरीत  स्थिति  में  नियति  अत्यंत   कष्टसाध्य  बन  जाती  है  l "       महाभारत  में  पांडवों  के  साथ  तो  भगवान  श्रीकृष्ण  थे   लेकिन  कौरव  सदा  से  षड्यंत्रकारी , फरेबी , झूठे  व  अहंकारी  थे  l   उनके  जीवन  का  उदेश्य  दूसरों  को  तरह -तरह  से  परेशान  करना   और   स्वयं   को  स्थापित  करना  था l   पांडवों  के  साथ  निरंतर  छल -कपट  और  षड्यंत्र  कर  के , भरी  सभा  में   अपनी  ही   कुलवधू  महारानी  द्रोपदी  का  अपमान  कर  के   दुर्योधन  ने  स्वयं  ही  कौरव  वंश  के  विनाश  की  नियति  लिख  ली  थी   l  नियति  के  अनुरूप  कौरव  मिट  गए   और  पांडवों  को  विजय  प्राप्त  हुई  l  अनीति  और  अत्याचार  जो  करता  है  , वह  तो  डूबता  ही  है  , जो  उसके  साथ  जुड़े  होते  हैं , वह  उन  सबको  ले  डूबता  है  l   किसी  भी  जाति  या  धर्म  में  पैदा  होना  व्यक्ति  के  वश  की  बात  नहीं  है  ,  लेकिन  श्रेष्ठ  कर्मों  से  , पवित्र  भावनाओं  से   और  छल -कपट  रहित  जीवन  से  हम  अपनी  श्रेष्ठ  नियति  का  निर्माण  कर  सकते  हैं  l  

16 April 2023

WISDOM ------

   अनमोल  वचन ----- पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " महत्वाकांक्षा  की  धुरी  पर  घूमने  वाला  जीवन वृत्त  ही  नरक  है  l  महत्वाकांक्षा  का  ज्वर  जीवन  को  विषाक्त  कर  देता  है  l  जो  इस  ज्वर  से  पीड़ित  हैं  , शांति  का  संगीत   और  आत्मा  का  आनंद  भला  उनके  भाग्य  में  कहाँ  ?    महत्वाकांक्षा  यों  तो   प्रगति  के  लिए   अत्यंत   आवश्यक  है  ,  पर  वह  अनियंत्रित  होने  पर   दुःख . शोक  का   कारण  बनती  है  l " 

 आचार्य जी  लिखते  हैं --- "  जब  तक  अहंकार  जिन्दा  है  ,  आदमी  दो  कौड़ी  का  है  l   जिस  दिन  वह  मिट  जायेगा  ,   आदमी    बेशकीमती   हो  जायेगा  l   अहं  ही  है   जिसके  कारण   न  सिद्धांत , न  सेवा  , न  आदर्श  आ  पाते  हैं  l  व्यक्ति  लोक सेवा  के  क्षेत्र    में   प्रवेश  कर  के  भी  अनगढ़  बना  रहता  है  l  "

15 April 2023

WISDOM -----

   इस  धरती  पर  असुरता  का  अंत  कर  देवत्व  की  अभिवृद्धि  के  लिए  भगवान  ने  समय -समय  पर  अवतार  लिए  l  ऋषियों  की  हड्डियों  का  पर्वत  देखकर  भगवान  राम  ने  हाथ  उठाकर  पृथ्वी  को  राक्षसों  से  विहीन  करने  की  प्रतिज्ञा  की  थी  l   ऋषि  विश्वामित्र  के  यज्ञ   में  विध्न  फ़ैलाने  वाले  ताड़का , सुबाहु ,  मारीचि  आदि  असुरों  का  वध  किया  l  छोटे  भाई  सुग्रीव  के  साथ  अन्याय  करने  वाले  बालि  का  अंत  किया  l  ऋषियों  को  त्रास   देने  वाले  खर -दूषण  का  दमन  किया   और  अंत  में  अधर्मी , अत्याचारी  सत्ताधीश  रावण  का  अंत  किया  l  असुरता  का  अंत  इसलिए  भी  आवश्यक  होता  है   क्योंकि  ये  असुर  स्वयं  तो  अत्याचार  करते  ही  हैं  , इसके  साथ  वे  जनता  के  सामने   अधार्मिकता  की  विजय  के  उदाहरण  प्रस्तुत  कर   उसे  भी  कुमार्ग  पर  चलने  का  लालच  उत्पन्न  करते  हैं  l  अच्छाई  की  अपेक्षा  बुराई  का  मार्ग  सरल  है  , इसलिए  असुरता  का  साम्राज्य  तेजी  से  फैलता  है  l  रावण  का  अंत  हो  गया  , लेकिन  द्वापर  युग  में  पुन:  असुरता  प्रबल  हो  गई   l  तब  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अवतार  लेकर   अनीति  बरतने  वाले   त्रनासुर ,  अघासुर , बकासुर , पूतना , कालिया  नाग  आदि  का  अपनी  बाल्यावस्था  में  ही  अंत  किया  फिर  बड़े  होने  पर  अत्याचारी  अन्यायी  शासक  कंस  का  अंत  किया  l  अपनी  कुशल   नीति   से  अत्याचारी  और  अहंकारी  शासकों  जरासंध , शिशुपाल  आदि  का  अंत  किया   और  अंत  में  अनीति  और  अत्याचार , अधर्म  का  अंत  करने   के  लिए  महाभारत  में  अर्जुन  के  सारथि  बने  l  अधर्म  का  अंत  और  धर्म  की  स्थापना  हुई  l  लेकिन  समस्या  समाप्त  नहीं  हुई ,   कलियुग   में  सम्पूर्ण  धरती  पर  ही  असुरता  का  बोलबाला  है  l  छल , कपट , षड्यंत्र , अनीति , भ्रष्टाचार , स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा   जैसी  बुराइयों  से   कोई  परिवार , कोई  भी  संस्था ,  यहाँ  तक  कि  संसार  में  कोई  भी  अछूता  नहीं  बचा  है  l  संभवतः  ये  धरती  टिकी  रहे , उसके  लिए  जितने  अच्छे , सच्चे  लोगों  की  जरुरत  होगी  , केवल  मात्र  उतने  ही   अच्छे -सच्चे  धरती  पर  होंगे  l  समस्या  ये  है  कि  जब  असुरता  का  साम्राज्य  इतना  व्यापक  है  तो  उसका  अंत  कैसे  हो  ?  यह  समस्या  ईश्वर  के  भी  सामने  है  कि  कहाँ  तक  अवतार  लें  ?  ये  पृथ्वीवासी  तो  सुधरते  ही  नहीं  ,  असुरता  का  अंत  होना  तो  दूर  , संख्या  बढ़ती  ही  जाती  है  l  असुरों  के  नाम  पर  कुछ  का  अंत  कर  भी  दिया  तो  क्या  ?  रावण  एक  विचार  है  , उस  विचार  का  अंत  होना  जरुरी  है  l   लोगों  के  विचार  सकारात्मक  हों , चेतना  का  परिष्कार  हो  , इसी  कार्य  के  लिए   दैवी  शक्तियों  ने  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  को  धरती  पर  भेजा  l  उन्होंने  बताया  कि  गायत्री मन्त्र  में  ही  वह  शक्ति  है   जो  दुर्बुद्धि  का  नाश  करती  है   और  सद्बुद्धि  को  जाग्रत  करती  है  l  जब  विचार  अच्छे  होंगे , तो  कार्य  भी  सकारात्मक  होंगे  l  इसके  साथ  जरुरी  है  कि  अपने  आचरण  से  शिक्षा  दो , पहले  स्वयं  सुधरो , फिर  दूसरों  को  सुधारो  l  'अपना  सुधार  ही  संसार  की  सबसे  बड़ी  सेवा  है  l '

14 April 2023

WISDOM -----

   महाभारत  एक  ऐसा  महायुद्ध  था  जिसके  लिए  कहा  जाता  है  ---' न  भूतो  , न  भविष्यति  l '  उस  युग  में  अनीति  और  अत्याचार  अपनी  चरम सीमा  पर  था  l  महाभारत  की  यह  कथा  हमें  बताती  है  कि  अत्याचारी  कभी  अकेला  नहीं  होता  , अनेक  समर्थ  और  बुद्धिमान  लोग  सुख -वैभव  का  जीने  की  लालसा  में  उसके  साथ  होते  हैं  , उन्हीं  की   दम    पर  अत्याचार   फलता -फूलता  है  l  यदि  भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य    ---- दुर्योधन  का  साथ  देने  से  इनकार  कर  देते   तो  महाभारत  का  युद्ध  टल  सकता  था  ,  लेकिन  आरम्भ  से  ही  उन्होंने  दुर्योधन  की  गलत  नीतियों  का  साथ  दिया  l  ये  सब  ज्ञानी  थे  ,  धर्म , अधर्म , नीति  अनीति  का  उन्हें  ज्ञान  था   और  जानते  भी  थे   कि   पांडवों  के  विरुद्ध  दुर्योधन  जो  षड्यंत्र  रचता  है  , उनका  मौन  रहकर  समर्थन  करने  से  उनका  भी  दर्दनाक  अंत  होगा  l  सब  जानते  हुए  भी   वे  दुर्योधन  के  ही  पक्ष  में  रहे  l  कहते  हैं  कि  दुर्योधन  को  सबसे  ज्यादा  कर्ण  पर  विश्वास  था  ,  यदि  कर्ण   , दुर्योधन  का  साथ  नहीं  देता  तो  यह  युद्ध  नहीं  होता  l  लेकिन  युद्ध  होना  ' दैवीय  विधान  '  था  l  उस  समय   अनीति , अत्याचार , छल , कपट , षड्यंत्र  आदि  बुराइयाँ  राजपरिवारों  तक   सीमित  थीं  ,  लेकिन  अब  ये  जन -जन  में  व्याप्त  हैं  l  इसलिए  अब  स्थिति  भयावह  है  l स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा   की  अति  है   l  हर  व्यक्ति  सोचता  है  कि  उसकी  दुकान  चलती  रहे , संसार  से  क्या  लेना -देना  ?   लेकिन   एक ' तीसरी  आँख  '  है  ,  जिसे  हर  पल  की  खबर  है  l  ईश्वर  स्वयं  किसी  को  दंड  नहीं  देते , बस !  उसके  कर्मानुसार  उसे  सद्बुद्धि  या  दुर्बुद्धि  दे  देते  हैं   l  व्यक्ति  स्वयं  अपनी    राह   चुनता  है   और  उसके  अनुरूप  परिणाम  प्राप्त  करता  है  l 

13 April 2023

WISDOM ----

     श्रीराम  और  रावण  में   बुनियादी  अंतर   केवल  अहंकार  को  लेकर  था  l  भगवान  श्रीराम  अहंकार शून्य  थे  ,  जबकि  रावण  के  अहंकार  की  कोई  सीमा  नहीं  थी  l अहंकार  का  मतलब  है -- ' मैं '  को  प्राथमिकता  देना   और  यही  ' मैं ' रावण  के  व्यक्तित्व  का  आधार  था  l  रावण  ने  यमलोक  पर  आक्रमण  किया  l कालदंड  भी  कब्जे  में  कर  लिया  l भयवश  यम  भी  अद्रश्य  हो  गए  l  नवग्रह  भी  उसके  कब्जे  में  आ  गए  ,  तप  व  पुण्य  का  बल  उसका  साथ  दे  रहा  था   लेकिन  कोई  कितना  ही  बलशाली   क्यों  न  हो  ,  अहंकार  कितना  ही  बड़ा  क्यों  न  हो  , काल  उसे  मिटा  देता  है  l  पानी  का  बुलबुला  कितना  ही  बड़ा  हो,  फूट  जाता  है  l  अहंकारी  संवेदनहीन  होता  है   l  संसार  में  जहाँ  भी  अत्याचार , अन्याय , हिंसा , शोषण , उत्पीड़न  है  उसके   लिए  कोई  न  कोई  अहंकारी  ही  उत्तरदायी  है  l अहंकारी  न  तो  स्वयं  चैन  से  जीता  है  और  न  ही  दूसरों  को  चैन  से  जीने  देता  है  l  

12 April 2023

WISDOM ------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- 'आसक्ति  ही  सब  दुःखों  की  जननी  है  , यहाँ  तक  कि  वही  पुन:  जन्म  लेने  को  बाध्य  करती  है  l  यह  आसक्ति  ही  मनुष्य  को  तरह -तरह  से  दुःख  देती  है   और  बंधनों  से  बाँधती  है  l  इसलिए  मनुष्य  को  चाहिए  कि  कुल , वंश , पद  तो  क्या  इस   शरीर  से  भी  आसक्ति  न  करे  l  मृत्यु  के  बाद  भी  इस  शरीर  से  मोह  नहीं  छूटता   l    अनासक्त  रहकर  कर्तव्यपालन  करे  l  "  एक  कथा  है  -------  एक  सेठ जी  थे  l  बहुत  धर्मात्मा  थे   लेकिन  उन्हें  अपनी  संपदा  से  और  पुत्र  से  बहुत  मोह  था  l   संतों  का  उनके  यहाँ   सत्संग  होता  था l  संतों  ने  उन्हें  समझाया  कि  अति  का  मोह  अच्छा  नहीं  होता  लेकिन  सेठजी  विवश  थे  l  उन्हें  मालूम  था  कि  इस  मोह  के  कारण  और  कुछ  दुष्कर्मों  के  परिणामस्वरुप   उन्हें  अगले  जन्म  में  बन्दर  का  रूप  धारण  करना  पड़ेगा  l   उन्होंने  अपने  प्रिय  पुत्र  से  कहा --- " देखो , मृत्यु  के  बाद  मैं  बन्दर  के  रूप  में  जन्म  लूँगा   और  जंगल  में  एक  बरगद  के  पेड़  पर   बैठा  रहूँगा  l  तुम  मुझे  गोली  से  मार  देना  तो  मेरी  मुक्ति  हो  जाएगी  l  "  पिता  की  मृत्यु  के  बाद  पुत्र  एक  पंडित  को  लेकर  जंगल  पहुंचा   तो  देखा  कि  एक एक  बंदरिया  अपने  बच्चे  को  सीने  से  चिपकाए   बैठी  हुई  है  l   उसने  बंदूक   चलाई  तो  बंदरिया  तो  डर  के   कारण  बेहोश  हो  गई   और  बच्चा  कूदकर  ऊँची  डाल  पर  चढ़  गया  l  बहुत  प्रयत्न  करने  के  बाद  भी  वह  उसे  पा  नहीं  सका  l  साथ  में  जो  पंडित जी  थे  उन्होंने  कहा --- " इस  सेठ  को  अब  इस  बन्दर  शरीर  से  मोह  हो  गया  है  ,  चलो  अब  वापस  चलो  , अब  वह  मरना  ही  नहीं  चाहता  l  शरीर  चाहे  बन्दर  का  हो  या  कीड़े  का , कोई  मरना  नहीं  चाहता  l  ये  मोह  है ,  जो  मरकर  भी  नहीं  छूटता  l  "