पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " जीवन में उतार -चढ़ाव तो आते ही रहते हैं l अनुकूलता व प्रतिकूलताओं से ही जीवन बना है l ऐसा कभी नहीं हो सकता कि जीवन में सब कुछ अनुकूल हो और ऐसा भी नहीं हो सकता कि जीवन में सब कुछ प्रतिकूल हो l जीवन की परिस्थितियां तो बदलती ही रहती हैं l यदि व्यक्ति अपनी मन:स्थिति को परिस्थितियों के अनुरूप ढाल ले तो वह अनावश्यक उलझनों से बच जाता है और हर स्थिति का लाभ उठा सकता है l जीवन में कुछ ऐसी भी परिस्थितियां भी आती हैं , जिन्हें स्वीकार करना पड़ता है इसलिए जिनकी सोच सकारात्मक है , वे अनावश्यक संघर्ष में अपना समय और शक्ति नहीं गंवाते , बल्कि मन:स्थिति बदलकर उनका लाभ उठाते हैं l ये गुणग्राही होते हैं , उनके लिए हर स्थिति विकास का अवसर है l " एक प्रसंग है ----- एक दिन एक शिष्य ने अपने गुरु से कहा --- " गुरुदेव ! एक व्यक्ति ने आश्रम के लिए गाय भेंट की है " गुरु ने कहा --- " अच्छा हुआ दूध पीने को मिलेगा l " एक सप्ताह बाद शिष्य ने आकर कहा ---- "गुरूजी ! जिस व्यक्ति ने गाय दी थी , वह अपनी गाय वापस ले गया l " गुरु ने कहा --- "अच्छा हुआ ! गोबर उठाने के झंझट से मुक्ति मिलेगी l " बदलती परिस्थिति के साथ सकारात्मकता बनाये रखना ही जीवन में सफलता का एकमात्र सूत्र है l
18 April 2023
17 April 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " नियत के अनुसार नियति होती है l नियति कर्मों का परिणाम होती है l जैसा हम सोचते हैं एवं करते हैं , वैसी ही हमारी नियति होती है l सतत सत्कर्म , सदाचरण एवं सद्भाव के द्वारा हमारी नियति श्रेष्ठता से परिपूर्ण हो जाती है l लेकिन इसके विपरीत स्थिति में नियति अत्यंत कष्टसाध्य बन जाती है l " महाभारत में पांडवों के साथ तो भगवान श्रीकृष्ण थे लेकिन कौरव सदा से षड्यंत्रकारी , फरेबी , झूठे व अहंकारी थे l उनके जीवन का उदेश्य दूसरों को तरह -तरह से परेशान करना और स्वयं को स्थापित करना था l पांडवों के साथ निरंतर छल -कपट और षड्यंत्र कर के , भरी सभा में अपनी ही कुलवधू महारानी द्रोपदी का अपमान कर के दुर्योधन ने स्वयं ही कौरव वंश के विनाश की नियति लिख ली थी l नियति के अनुरूप कौरव मिट गए और पांडवों को विजय प्राप्त हुई l अनीति और अत्याचार जो करता है , वह तो डूबता ही है , जो उसके साथ जुड़े होते हैं , वह उन सबको ले डूबता है l किसी भी जाति या धर्म में पैदा होना व्यक्ति के वश की बात नहीं है , लेकिन श्रेष्ठ कर्मों से , पवित्र भावनाओं से और छल -कपट रहित जीवन से हम अपनी श्रेष्ठ नियति का निर्माण कर सकते हैं l
16 April 2023
WISDOM ------
अनमोल वचन ----- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " महत्वाकांक्षा की धुरी पर घूमने वाला जीवन वृत्त ही नरक है l महत्वाकांक्षा का ज्वर जीवन को विषाक्त कर देता है l जो इस ज्वर से पीड़ित हैं , शांति का संगीत और आत्मा का आनंद भला उनके भाग्य में कहाँ ? महत्वाकांक्षा यों तो प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक है , पर वह अनियंत्रित होने पर दुःख . शोक का कारण बनती है l "
आचार्य जी लिखते हैं --- " जब तक अहंकार जिन्दा है , आदमी दो कौड़ी का है l जिस दिन वह मिट जायेगा , आदमी बेशकीमती हो जायेगा l अहं ही है जिसके कारण न सिद्धांत , न सेवा , न आदर्श आ पाते हैं l व्यक्ति लोक सेवा के क्षेत्र में प्रवेश कर के भी अनगढ़ बना रहता है l "
15 April 2023
WISDOM -----
इस धरती पर असुरता का अंत कर देवत्व की अभिवृद्धि के लिए भगवान ने समय -समय पर अवतार लिए l ऋषियों की हड्डियों का पर्वत देखकर भगवान राम ने हाथ उठाकर पृथ्वी को राक्षसों से विहीन करने की प्रतिज्ञा की थी l ऋषि विश्वामित्र के यज्ञ में विध्न फ़ैलाने वाले ताड़का , सुबाहु , मारीचि आदि असुरों का वध किया l छोटे भाई सुग्रीव के साथ अन्याय करने वाले बालि का अंत किया l ऋषियों को त्रास देने वाले खर -दूषण का दमन किया और अंत में अधर्मी , अत्याचारी सत्ताधीश रावण का अंत किया l असुरता का अंत इसलिए भी आवश्यक होता है क्योंकि ये असुर स्वयं तो अत्याचार करते ही हैं , इसके साथ वे जनता के सामने अधार्मिकता की विजय के उदाहरण प्रस्तुत कर उसे भी कुमार्ग पर चलने का लालच उत्पन्न करते हैं l अच्छाई की अपेक्षा बुराई का मार्ग सरल है , इसलिए असुरता का साम्राज्य तेजी से फैलता है l रावण का अंत हो गया , लेकिन द्वापर युग में पुन: असुरता प्रबल हो गई l तब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लेकर अनीति बरतने वाले त्रनासुर , अघासुर , बकासुर , पूतना , कालिया नाग आदि का अपनी बाल्यावस्था में ही अंत किया फिर बड़े होने पर अत्याचारी अन्यायी शासक कंस का अंत किया l अपनी कुशल नीति से अत्याचारी और अहंकारी शासकों जरासंध , शिशुपाल आदि का अंत किया और अंत में अनीति और अत्याचार , अधर्म का अंत करने के लिए महाभारत में अर्जुन के सारथि बने l अधर्म का अंत और धर्म की स्थापना हुई l लेकिन समस्या समाप्त नहीं हुई , कलियुग में सम्पूर्ण धरती पर ही असुरता का बोलबाला है l छल , कपट , षड्यंत्र , अनीति , भ्रष्टाचार , स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा जैसी बुराइयों से कोई परिवार , कोई भी संस्था , यहाँ तक कि संसार में कोई भी अछूता नहीं बचा है l संभवतः ये धरती टिकी रहे , उसके लिए जितने अच्छे , सच्चे लोगों की जरुरत होगी , केवल मात्र उतने ही अच्छे -सच्चे धरती पर होंगे l समस्या ये है कि जब असुरता का साम्राज्य इतना व्यापक है तो उसका अंत कैसे हो ? यह समस्या ईश्वर के भी सामने है कि कहाँ तक अवतार लें ? ये पृथ्वीवासी तो सुधरते ही नहीं , असुरता का अंत होना तो दूर , संख्या बढ़ती ही जाती है l असुरों के नाम पर कुछ का अंत कर भी दिया तो क्या ? रावण एक विचार है , उस विचार का अंत होना जरुरी है l लोगों के विचार सकारात्मक हों , चेतना का परिष्कार हो , इसी कार्य के लिए दैवी शक्तियों ने पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी को धरती पर भेजा l उन्होंने बताया कि गायत्री मन्त्र में ही वह शक्ति है जो दुर्बुद्धि का नाश करती है और सद्बुद्धि को जाग्रत करती है l जब विचार अच्छे होंगे , तो कार्य भी सकारात्मक होंगे l इसके साथ जरुरी है कि अपने आचरण से शिक्षा दो , पहले स्वयं सुधरो , फिर दूसरों को सुधारो l 'अपना सुधार ही संसार की सबसे बड़ी सेवा है l '
14 April 2023
WISDOM -----
महाभारत एक ऐसा महायुद्ध था जिसके लिए कहा जाता है ---' न भूतो , न भविष्यति l ' उस युग में अनीति और अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था l महाभारत की यह कथा हमें बताती है कि अत्याचारी कभी अकेला नहीं होता , अनेक समर्थ और बुद्धिमान लोग सुख -वैभव का जीने की लालसा में उसके साथ होते हैं , उन्हीं की दम पर अत्याचार फलता -फूलता है l यदि भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य ---- दुर्योधन का साथ देने से इनकार कर देते तो महाभारत का युद्ध टल सकता था , लेकिन आरम्भ से ही उन्होंने दुर्योधन की गलत नीतियों का साथ दिया l ये सब ज्ञानी थे , धर्म , अधर्म , नीति अनीति का उन्हें ज्ञान था और जानते भी थे कि पांडवों के विरुद्ध दुर्योधन जो षड्यंत्र रचता है , उनका मौन रहकर समर्थन करने से उनका भी दर्दनाक अंत होगा l सब जानते हुए भी वे दुर्योधन के ही पक्ष में रहे l कहते हैं कि दुर्योधन को सबसे ज्यादा कर्ण पर विश्वास था , यदि कर्ण , दुर्योधन का साथ नहीं देता तो यह युद्ध नहीं होता l लेकिन युद्ध होना ' दैवीय विधान ' था l उस समय अनीति , अत्याचार , छल , कपट , षड्यंत्र आदि बुराइयाँ राजपरिवारों तक सीमित थीं , लेकिन अब ये जन -जन में व्याप्त हैं l इसलिए अब स्थिति भयावह है l स्वार्थ , लालच , महत्वाकांक्षा की अति है l हर व्यक्ति सोचता है कि उसकी दुकान चलती रहे , संसार से क्या लेना -देना ? लेकिन एक ' तीसरी आँख ' है , जिसे हर पल की खबर है l ईश्वर स्वयं किसी को दंड नहीं देते , बस ! उसके कर्मानुसार उसे सद्बुद्धि या दुर्बुद्धि दे देते हैं l व्यक्ति स्वयं अपनी राह चुनता है और उसके अनुरूप परिणाम प्राप्त करता है l
13 April 2023
WISDOM ----
श्रीराम और रावण में बुनियादी अंतर केवल अहंकार को लेकर था l भगवान श्रीराम अहंकार शून्य थे , जबकि रावण के अहंकार की कोई सीमा नहीं थी l अहंकार का मतलब है -- ' मैं ' को प्राथमिकता देना और यही ' मैं ' रावण के व्यक्तित्व का आधार था l रावण ने यमलोक पर आक्रमण किया l कालदंड भी कब्जे में कर लिया l भयवश यम भी अद्रश्य हो गए l नवग्रह भी उसके कब्जे में आ गए , तप व पुण्य का बल उसका साथ दे रहा था लेकिन कोई कितना ही बलशाली क्यों न हो , अहंकार कितना ही बड़ा क्यों न हो , काल उसे मिटा देता है l पानी का बुलबुला कितना ही बड़ा हो, फूट जाता है l अहंकारी संवेदनहीन होता है l संसार में जहाँ भी अत्याचार , अन्याय , हिंसा , शोषण , उत्पीड़न है उसके लिए कोई न कोई अहंकारी ही उत्तरदायी है l अहंकारी न तो स्वयं चैन से जीता है और न ही दूसरों को चैन से जीने देता है l
12 April 2023
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'आसक्ति ही सब दुःखों की जननी है , यहाँ तक कि वही पुन: जन्म लेने को बाध्य करती है l यह आसक्ति ही मनुष्य को तरह -तरह से दुःख देती है और बंधनों से बाँधती है l इसलिए मनुष्य को चाहिए कि कुल , वंश , पद तो क्या इस शरीर से भी आसक्ति न करे l मृत्यु के बाद भी इस शरीर से मोह नहीं छूटता l अनासक्त रहकर कर्तव्यपालन करे l " एक कथा है ------- एक सेठ जी थे l बहुत धर्मात्मा थे लेकिन उन्हें अपनी संपदा से और पुत्र से बहुत मोह था l संतों का उनके यहाँ सत्संग होता था l संतों ने उन्हें समझाया कि अति का मोह अच्छा नहीं होता लेकिन सेठजी विवश थे l उन्हें मालूम था कि इस मोह के कारण और कुछ दुष्कर्मों के परिणामस्वरुप उन्हें अगले जन्म में बन्दर का रूप धारण करना पड़ेगा l उन्होंने अपने प्रिय पुत्र से कहा --- " देखो , मृत्यु के बाद मैं बन्दर के रूप में जन्म लूँगा और जंगल में एक बरगद के पेड़ पर बैठा रहूँगा l तुम मुझे गोली से मार देना तो मेरी मुक्ति हो जाएगी l " पिता की मृत्यु के बाद पुत्र एक पंडित को लेकर जंगल पहुंचा तो देखा कि एक एक बंदरिया अपने बच्चे को सीने से चिपकाए बैठी हुई है l उसने बंदूक चलाई तो बंदरिया तो डर के कारण बेहोश हो गई और बच्चा कूदकर ऊँची डाल पर चढ़ गया l बहुत प्रयत्न करने के बाद भी वह उसे पा नहीं सका l साथ में जो पंडित जी थे उन्होंने कहा --- " इस सेठ को अब इस बन्दर शरीर से मोह हो गया है , चलो अब वापस चलो , अब वह मरना ही नहीं चाहता l शरीर चाहे बन्दर का हो या कीड़े का , कोई मरना नहीं चाहता l ये मोह है , जो मरकर भी नहीं छूटता l "