4 May 2023

WISDOM ------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- ' इस  संसार  की  सभी  समस्याओं  का  एकमात्र  हल  ' संवेदना '  है   और  स्वार्थ  इनसान  को  संवेदनहीन  बना  देता  है  l  '                                                                                               संवेदनहीन  मनुष्य  हिंसक  पशु  के  समान  है  l  भौतिक  द्रष्टि  से  मानव  समाज  बहुत  विकसित  हो  गया  है   लेकिन  चेतना  के  स्तर  पर  वह  आज  भी  पशु  है  l  यदि  मनुष्य  और  पशु  की  तुलना  की  जाए  तो  कई  बातों  में  पशु  श्रेष्ठ  हैं  --- पशु  कभी  किसी  को  धोखा  नहीं  देते , किसी  के  विरुद्ध  छल , कपट  षड्यंत्र  नहीं  रचते , किसी  का  शोषण , उत्पीड़न  नहीं  करते  , स्वयं  को  श्रेष्ठ  सिद्ध  करने  के  लिए  कभी  किसी  को  अपमानित  नहीं  करते  l  यह  सब  इसलिए  संभव  है  क्योंकि  पशुओं  के  पास  बुद्धि  नहीं  है  l  ईश्वर  ने  मनुष्यों  को  बुद्धि  दी  है  , अपनी  चेतना  को  विकसित  करने  के  लिए  उसके  पास  अनेक  अवसर  हैं   लेकिन  स्वार्थ , लोभ , लालच , कामना , वासना , महत्वाकांक्षा   आदि  दुष्प्रवृत्तियां   इतनी  प्रबल  हैं   की  मनुष्य  अपनी  सारी  बुद्धि  इन  बुराइयों  के  पोषण  में  ही  लगा  देता  है   और  इससे  भी  बड़ी  बात  यह  है  कि  इन  दुष्प्रवृतियों  को  पोषण  मिलता  रहे    , इसके  लिए  समान  विचारों  के  लोग  परस्पर  सहयोग  भी  करते  हैं  l  यही  कारण  है  की  सम्पूर्ण  समाज  का  वातावरण  दूषित  हो  जाता  है  l  संसार  में  अच्छे  लोग  भी  हैं  लेकिन  वे  संगठित  नहीं  है जबकि  असुरता  बहुत  मजबूती  से  संगठित  है  l  समाज  के  नैतिक  पतन  का  एक  कारण  यह  भी  है  कि   सभ्य    समाज  में  व्यक्ति  स्वयं  को   बहुत  सभ्य  , सेवाभावी और  श्रेष्ठ  व्यक्तित्व  का  दिखाना  चाहता  है   लेकिन  इसके  पीछे  का  जो  काला  पक्ष  है  , वे  उसे  छुपाना  चाहते  हैं   l   लेकिन  आसुरी  प्रवृत्ति  के  व्यक्ति   एक  दूसरे  के  काले  पक्ष  को  अच्छी  तरह  जानते  हैं  और  इस  सिद्धांत  के  अनुसार  कि  'तुम  हमारी  न  कहो , हम  तुम्हारी  न  कहें  ' परस्पर  मजबूती  से  संगठित  रहते  हैं  l  इसी  कारण  समाज  में  इतनी  अशांति , तनाव , लड़ाई , झगड़े  , असंतोष  है  l  

3 May 2023

WISDOM -----

 देवता  और  असुरों  के  संबंध  में  पुराण  में  अनेक  कथाएं  हैं  l  कहते  हैं  असुर  बहुत  तपस्वी  और  अहंकारी  होते  हैं  l  इनके  पास  तपस्या  का  अथाह  बल  होता  है   किन्तु  ये  अपने  इस  बल  को  अहंकार  के  प्रदर्शन  में  लगा  देते  हैं  और  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  करते  हैं  l  लेकिन  सभी  असुर  एक  जैसे  नहीं  होते  ,  कई  भगवान  के  बड़े  भक्त  होते  हैं  जैसे  भक्त  प्रह्लाद  l  ऐसे  ही  एक  और  असुर  भक्त  हुआ  है  जिसका  नाम  था  ---- गयासुर  l   यह  विलक्षण  भक्त  था  , भक्ति  और  तपस्या  का  उसमें  अनोखा  संगम  था  l  उसने  तपस्या  से  प्राप्त  ऊर्जा  का  दुरूपयोग  नहीं  किया  l   इस    उर्जा  को  उसने  अपने  आंतरिक  परिष्कार  में  लगाया  l  जब  भी  कोई  असुर  कठिन  तपस्या  करता  है  ,  ईश्वर  की  भक्ति  करता  है  तो  उससे  सबसे  ज्यादा  भय  स्वर्ग  के  राजा  इंद्र  को  होता  है  l  उन्हें  अपने  सिंहासन  को  खोने  का  भय  सताता  है  l  इसलिए  उन्होंने  देवगुरु  ब्रहस्पति  के  साथ  एक  षड्यंत्र  की  रचना  की  ,  जिसके  अंतर्गत  एक  ऐसा  यज्ञ  करने  की  योजना  बनाई  जो  धरती  पर  संपन्न  नहीं  हो  सकता  था  l  इसके  लिए  उन्होंने  निर्णय  किया  कि   गयासुर  से  कहा  जाए  कि  वह  अपने  शरीर  का  इतना  विस्तार  कर  दे  कि  उसके  ऊपर  यज्ञ   संपन्न  किया  जा  सके  l  इंद्र  और  ब्रहस्पति  दोनों  गयासुर  के  पास  गए  और  उससे  कहा --- "  स्रष्टि  के  कल्याण  के  लिए  परमात्मा  ने  हमें  एक  यज्ञ  करने  का  आदेश  दिया  है   और  वह  यज्ञ   केवल  तुम्हारे  शरीर  के  ऊपर  ही  संपन्न  किया  जा  सकता  है  क्योंकि  तुम  भगवान  के  भक्त  हो  और  तुम  में  असीम  धैर्य  और  सहनशीलता  है  l  "    गयासुर  ने  कहा --- " यदि  भगवान  और  स्रष्टि  के  निमित्त   मेरी  देह  जरा  सी  भी   उपयोगी  है   तो  अवश्य  ही  आप  इसका  उपयोग  करें  और  वह  यज्ञ   मेरी  देह  के  ऊपर  संपन्न  करें  l "  निश्चित  मुहूर्त  में  गयासुर  ने  अपनी  देह  का  विस्तार  किया   और  उसके  ऊपर  देवताओं  का  यज्ञ  दीर्घकाल  तक   चला  l  यज्ञ  की  अग्नि  उसकी  देह  को  जलाने -गलाने  लगी  , पीड़ा  से  गयासुर  का  शरीर  टूटने  लगा   l  लेकिन  वह  इस  पीड़ा  को  भगवान  की  कृपा  मानकर  सहन  करता  रहा   और  इस  असीम  कष्ट  भगवान  का  नाम  स्मरण  करता  रहा  l  देवताओं  का  यज्ञ  समाप्त  हुआ  , इसके  साथ  ही  गयासुर  की  देह  भी  मृतप्राय  हो  चुकी  थी  l   देवताओं  का  षड्यंत्र  सफल  हुआ  l  अंत  में  देवताओं  ने  उससे  वरदान  मांगने  को  कहा   तो  गयासुर  ने  कहा --- " आप  मुझे  कुछ  देना  चाहते  हैं  तो  इतनी  कृपा  करें   कि  जहाँ  तक  मेरी  देह  है  ,  पृथ्वी   के  उस  स्थान  पर   यदि  मानव   अपने  पितरों  का  श्रद्धापूर्वक   विधिवत   पिंडदान  करे   तो  उनके  पितरों  को  अवश्य  मुक्ति  मिले  l  "  देवताओं  ने  कहा ---- " गयासुर  !  तुम  धन्य  हो  !  तुम्हारी  देह  वाले  इस  स्थान  को   ' गया '  नाम  से  प्रसिद्धि  मिलेगी   और  इस  गया जी  में  पिंडदान  करने  वालों  के  पितर   अवश्य  ही  मुक्त  होंगे  l  "  

2 May 2023

WISDOM -----

 मांसाहार  का  संबंध  किसी  जाति  या  वर्ग  से  नहीं  है , जिसे  भी  स्वाद  लग  जाये  , वह  मांसाहार  करता  है  l  इसका  सबसे  बड़ा  दोष  यह  है  कि  जब  सब  चीजों  में  मिलावट  है , बेईमानी  है   तब  आर्थिक  या  किसी  भी  प्रकार  का  लाभ  कमाने  के  लिए  कोई  आपको  क्या  खिला  दे   और  उसका  क्या  असर  हो  यह  कोई  नहीं  जानता   ?   पुराण  की  एक  कथा  है  ----- अगस्त्य  मुनि  की  पत्नी  लोपामुद्रा  एक  राजकन्या  थी  लेकिन  विवाह  के  बाद  वन  में  सादगी  का  जीवन  था  l  एक  बार  लोपामुद्रा  की  इच्छा  हुई  कि  सुख -साधन  हों  , इसके  लिए  उन्होंने  पति  से  धन  की  याचना  की   l  पत्नी  की  इच्छा  पूरी  करने  के  लिए  अगस्त्य  मुनि  अनेक  राजाओं  के  पास  गए   और  धन  की  याचना  की  , लेकिन  यह  भी  कहा   कि  दान  से  प्रजा  और  जरूरतमंद  को  तकलीफ  नहीं  होनी   चाहिए  l  उन  दिनों  में   न्यायोचित  ढंग  से  राज -काज  होता  था   और  राजा  से  दान  लेने  का  अर्थ  था  प्रजा  को  कष्ट  पहुंचना  l  इसलिए  यह  निश्चित  किया  कि  किसी  असुर  से  धन  लिया  जाये  . जो  जनता  को  पीड़ित  कर  के  , अन्यायपूर्वक  धन  जमा  करते  हैं  , उनके  पास  अपार  संपदा  होती  है  l  अत:  अगस्त्य  मुनि  इलवल  नामक  एक  अत्याचारी  असुर  राजा  के  पास  गए  ताकि  आवश्यक  धन  प्राप्त  हो  सके  l     इलवल  और  वातापी  दोनों  असुर  भाई -भाई  थे  l  ब्राह्मणों  से  उन्हें  बड़ी  नफरत  थी  l  उन  दिनों  भी  ब्राह्मण  लोग  मांस  खाते   थे  l   इलवल  चालाक  था , ब्राह्मणों  का  स्वागत  भी  हो  जाए  और  उनका  अंत  भी  l  इसके  लिए   इलवल  ब्राह्मणों  को  भोजन  का  न्योता  देता   और  अपने  भाई  वातापी  को  अपनी  माया  से  बकरा  बनाकर  उसका  मांस  ब्राह्मण  मेहमानों  को  खिला  देता  l  ब्राह्मणों  के  खा  चुकने  के  बाद   इलवल  पुकारता  " वातापी  !  आ  जाओ  l "  इलवल  को  यह  शक्ति  प्राप्त  थी  जिससे  वातापी  ब्राह्मणों  का  पेट  चीरकर  हँसते  हुए  बाहर  निकल  आता  l  इस  प्रकार  कितने  ही  ब्राह्मणों  को   इन    असुरों  ने  मार  डाला  l  अगस्त्य  मुनि  के  आने  पर  दोनों  असुर  भाई  बहुत  खुश  हुए  कि  अच्छा  मोटा  ताजा  शिकार  फंसा  है  l  उन्होंने  ऋषि  का  बहुत  स्वागत  किया  और  हमेशा  की  तरह  वातापी  को  बकरा  बना  कर  उसका  मांस  अगस्त्य  मुनि  को  खिला  दिया  l  वे  सोच  रहे  थे  कि  मुनि  अब  थोड़ी  देर  के  मेहमान  हैं  l  अगस्त्य  मुनि  जब  भोजन  कर  चुके  तो   इलवल   ने  पुकारा  ---- "  वातापी  आओ  भाई , जल्दी   आओ  l "  यह  सुन  अगस्त्य  मुनि  बोल  उठे  --- ""  वातापी  !  अब  आने  की  जल्दी  न  कर  l  संसार  की  भलाई  के  लिए   तू    हजम  कर  लिया  गया  है  l "  यह  कहते  हुए  मुनि  ने  जोर  की  डकार  ली  न और  अपने  पेट  पर  हाथ  फेरा   l   इल्वल  घबरा  कर  जोर -जोर  से  वातापी  को  बुलाने  लगा  l अगस्त्य  मुनि  बोले  अब  क्यों  अपना  गला  फाड़  रहे  हो , वातापी  तो  कभी  का  हजम  हो  चुका  l  इलवल  ने  अपने  कृत्यों  के  लिए  क्षमा  मांगी  और  मुनि  को  बहुत  सा  धन  देकर  विदा  किया  l ---यह  कथा  एक  संकेत  है   कि  वे  तो  मुनि  थे  जो  ऐसा  मांस   अपने  तप  की  शक्ति  से  हजम  कर  गए   लेकिन   अब  ऐसा  तपस्वी  कोई  नहीं  है  इसलिए  ये  मांसाहार   शरीर  से  विभिन्न   लाइलाज   बीमारियों  रूपी  वातापी   बनकर  बाहर  निकलता   है  l  जागरूकता  जरुरी जरुरी  है  l  

1 May 2023

WISDOM -----

     कहते  हैं  ' जो  महाभारत  में  है  ,  वही  इस  धरती  पर  है  l '  महाभारत  की  कथा   शक्ति  और  सत्ता  के  दुरूपयोग  की  कथा  है  l  सत्ता  ने  न्याय  नहीं  किया  l  जब  अनीति  और  अन्याय  की  चरम  सीमा  हो  गई  , तो  युद्ध  निश्चित  हो  गया  l  कहने  के  लिए  धृतराष्ट्र   हस्तिनापुर  की  राजगद्दी  पर  थे  पर  लेकिन  वे  दुर्योधन  के  मोह  में  अंधे  थे  , इसलिए  वास्तविक  सत्ता  दुर्योधन  के  हाथ  में  थी  , वह  मनमानी  करता  था   और  पांडवों  को  उनके  हक़  से  वंचित  करने  के  लिए  षड्यंत्र  रचता  था  l   उस  युग  में  जो  बुराइयाँ  राजपरिवारों  तक  सीमित  थीं  , वे  कलियुग  में   सम्पूर्ण  समाज  में  व्याप्त  हो  गईं  l  चाहे  कोई  छोटी  संस्था  हो  या  बड़ी  से  बड़ी  संस्था  हो  , जिसने  भी  अपने  हाथ  में  सत्ता  ले  ली  , वह  दुर्बुद्धि  के  कारण  अहंकारवश  उसका  दुरूपयोग  करता  है  l  प्रजा  अत्याचार  सहन  भी  करती  है  , और  जैसी  जिसकी  सामर्थ्य  उसका  मुकाबला  भी  करती  है  l    पांडव  जब   अज्ञातवास  में  राजा   विराट  के  यहाँ   भेष  बदलकर  थे  तब  महारानी  द्रोपदी   सैरंध्री  नाम  से    रनिवास  में  रानी  सुदेष्णा  की  सेवा   का  काम     करने  लगीं  l  रानी  सुदेष्णा  का  भाई  कीचक  बड़ा  ही  बलिष्ठ  था  ,  कुश्ती  में  वो  भीम  और  बलराम  जैसा  ही  निपुण  था  लेकिन  उसे  अपने  बल  का  बहुत  घमंड  था  l  अपने  बल  और  प्रभाव  से  उसने  बूढ़े  विराट राज  की  शक्ति  और  सत्ता  में  बहुत  वृद्धि  कर  दी  थी  l  कीचक  की  ऐसी  धाक  थी  कि  लोग  कहा  करते  थे  कि  मत्स्य  देश  का  राजा  तो  कीचक  है ,  विराट  नहीं  l  स्वयं  राजा  विराट  भी  कीचक  से  डरते  थे  और  उसका  कहा  मानते  थे  l   कीचक  की  नजर  जब  से  सैरंध्री   पर  पड़ी  , उसके  मन  की  वासना  प्रबल  हो  गई  , वह   जब -तब  सैरंध्री ( द्रोपदी )  को  परेशान  करने  लगा  l  कीचक  के  व्यवहार  से  कुंठित  होकर  जब  द्रोपदी  राजा  की   दुहाई  मचाती  राजसभा  में  पहुंची  तो  अपनी  शक्ति  और  पद  के  मद  में  कीचक  ने  उन्हें  भरी  सभा  में  ठोकर  मारी  और  अपशब्द  कहे  l  सभा  में  किसी  की  हिम्मत  नहीं  हुई  कि   कोई  इस  अन्याय  का  विरोध  करे  , सब  चुप्पी  साधे  डरे  बैठे  रहे  l  द्रोपदी  से  यह  अपमान  सहन  नहीं  हुआ  l  उसने  भीम  से  अपनी  व्यथा  कही   कि  कैसे  उस  दुरात्मा  कीचक  का  अंत  हो  l   उस  समय  वे  अज्ञातवास  में  थे  इसलिए  भीम  ने  कहा   हमें  युक्ति  से  काम  लेना  होगा  l  योजना  के   अनुसार  जब  दूसरे  दिन  कीचक  से   द्रोपदी  का  सामना  हुआ  तो  द्रोपदी  ने  ऐसा  भाव  जताया  मानो  वह  कीचक  से  सहमत  हों  , उन्होंने  कहा  कि  नृत्य शाला  में  रात्रि  को  कोई  नहीं  रहता  ,  अत :   आप    वहां   आएं  l    कीचक  के  आनंद  का  ठिकाना  न  था   l   नृत्य शाला  में  अँधेरा  था  , जैसे  ही  वह  वहां  पहुंचा  भीम  ने  उस  पर  झपटकर  उसे  गिरा  दिया  l  भीम  और  कीचक  में  भयंकर  मल्ल -युद्ध  हुआ   l  थोड़ी  ही  देर  में  भीम  ने  कीचक  की  ऐसी  गति  बना  दी  कि  वह  गोलाकार  मांस  का  पिंड  बन  गया  l  अज्ञातवास  में  द्रोपदी  ने  सबसे  कह  रखा  था  कि  उसके  पति  गंधर्व  हैं   ,जो  किसी  कार्य  में  व्यस्त  हैं  इसलिए  वह  यहाँ  काम  कर  रही  है  l  द्रोपदी  ने  सुबह  नृत्य शाला  के  रखवालों  को  जगाया  और  कहा  कि  कीचक  हमेशा  मुझे  तंग  किया  करता  था   और  आज  भी  वह  इसी   उदेश्य    से  आया  था  l  वह  अधर्मी  था  इसलिए  क्रोध  में  आकर  मेरे  गंधर्व  पति  ने  उसका  वध  कर  दिया  l  

WISDOM ------

  ' लालच  बुरी  बला  '------- पुराण  की  एक  कथा  है ----- महापंडित  कौत्स  स्नान  कर   एक  ऊँची  शिला  पर  बैठकर  सूर्य  को  अर्घ्य  दान   दे  रहे  थे  l  एक  घड़ियाल  उन्हें  बहुत  देर  से  ताक  रहा  था  ,  पर  वे  सावधान  थे , अत: पानी  से  हटकर  बैठे  थे  l  यमुना  की  तलहटी  से  रत्नों  की  राशि   उछलकर  उस  घड़ियाल  ने  कौत्स  के  आसपास  बिखेर  दी   और  स्वयं  पानी  में  छिप  गया  l  कौत्स  ने  जब  देखा  कि  रत्न  बिखरे  हुए  हैं  , कोई  देख  नहीं  रहा  ,  तो  उन्होंने  जल्दी -जल्दी  बीनकर  उन्हें  अपने  उत्तरीय  में  बाँध  लिया  l  घड़ियाल  को  मौका  मिल  गया  l  उसने  सिर  ऊपर  कर  कहा  --- " आचार्य  !  यह  तो  एक  तुच्छ  भेंट  थी  l  आप  मुझे  त्रिवेणी  तक  पहुंचा  दें  l  मैंने  वहां  का  मार्ग  नहीं  देखा  l   आपको  पीठ  पर  बैठा  लेता  हूँ  l  मैं  आपको  वहां  अनगिनत  रत्न  दूंगा  l  "  महापंडित  कौत्स  को  लालच  आ  गया   और  उन्होंने   प्रसन्नतापूर्वक  वह  प्रस्ताव  स्वीकार  कर  लिया  l  अभी  वह  घड़ियाल  बीच  धार  में  ही  था  कि  हँस  पड़ा  l  कौत्स  ने  पूछा ---- "ग्राहराज  !  आप  हँसे  क्यों  ?  "  ग्राह  बोला  ---- " पंडितप्रवर  !  आप  जीवनभर  दूसरों  को  उपदेश  देते  रहे  कि  लालच  नहीं  करना  चाहिए  ,  पर  स्वयं  उसका  पालन  नहीं  कर  पाए  l  आज  आपका  सर्वनाश  सुनिश्चित  है  l  "   यह  कहकर  उसने  उन्हें  उछाला   और  उदरस्थ  कर  लिया  l  

30 April 2023

WISDOM -----

  1 .  लघु -कथा ---- एक  बिच्छू  की  कछुए  से  दोस्ती  हो  गई  l  बिच्छू  बोला --- " तुम  मुझे  पार  पहुंचा  दो  , डंक  नहीं  मारूंगा  l "  कछुआ  राजी  हो  गया   और  बिच्छू  को  पीठ  पर   बैठाकर  पानी  में  तैर  चला  l  अभी  कुछ  ही  दूर  चला  था  कि  बिच्छू  ने  डंक  मार  दिया  l  कछुए  ने  पूछा --- ' यह  क्या  किया  ? "  बिच्छू  बोला --- "यह  तो  मेरा  स्वभाव  है  l " कछुए  ने  कहा --- "  अच्छा  हुआ  मैंने   अपने  को  सुरक्षित  किया  हुआ  है  ,  पर  तेरे  आततायीपन  का  दंड  तो  तुझे  मिलना  ही  चाहिए  l "  यह  कहकर   कछुए  ने  पानी  में  दुबकी  मार  ली   और  बिच्छू  पानी  में  डूबकर  मर  गया  l   ' अपने  ही  दोष  अंततः  विनाशकारी  सिद्ध  होते   हैं  l '

2 .  लघु -कथा  ---- एक  भला  खरगोश  था  l  सभी  पशुओं  की  सहायता  करता  और  मीठा  बोलता  था  l  जंगल  के  सभी  जानवर  उसके  मित्र  थे  l  एक  बार  खरगोश  बीमार  पड़ा  , उसने  आड़े  समय  के  लिए  कुछ  चारा -दाना  अपनी  झाड़ी  में  छिपा  रखा  था  l  सहानुभूति  प्रदर्शन  के  लिए  जिस  मित्र  ने  सुना  वही  दौड़ा  आया   और  आते  ही  संचित  चारे -दाने  में  मुंह   मारना    शुरू  किया  l  एक  ही  दिन  में  वह  सब  समाप्त  हो  गया  l  खरगोश  अच्छा  तो  होने  लगा  , पर  कमजोरी  में  चारा  ढूंढने  के  लिए  जा  न  सका   और  भूखों  मर  गया  l  उथली  मित्रता  और  कुपात्रों  की  सहानुभूति  सदा  हानिकारक  ही  सिद्ध  होती  है  l  सच्चे  मित्र  थोड़े  ही  हों  पर  भले  हों  , वक्त  पर  काम  आ  सकें  l  

27 April 2023

WISDOM -----

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  के  विचार और  उनके  द्वारा  लिखे  गए  ' प्रेरणाप्रद  द्रष्टान्त  '  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाते  हैं  l  आज  की  परिस्थितियों  में  जब  लोग  बड़ी  जल्दी  निराश  होकर  आत्महत्या  कर  लेते  हैं  ,  ऐसे  में  आचार्य जी  के  विचार   मनुष्यों  को  सकारात्मक  सोच  प्रदान  करते  हैं   l   आचार्य जी  लिखते  हैं ------- -----" जो  उपलब्ध  है  उसे  कम  या  घटिया  मानकर   अनेक  लोग  दुःखी   रहते  हैं  l  यदि  हम  इन  लालसाओं  पर  नियंत्रण  कर  लें और  अपना  स्वाभाव  संतोषी  बना  लें   तो  शांतिपूर्वक  रह  सकते  हैं   l  अपने  से  अधिक  सुखी  , अधिक  साधन संपन्न  लोगों  के  साथ   यदि  अपनी  तुलना  की  जाये   तो  प्रतीत  होगा  कि   सारा  अभाव  और  दारिद्रय   हमारे  ही  हिस्से  में  आया  है  l  परन्तु  यदि  उन  असंख्य  दीन -हीन  , पीड़ित , परेशान  लोगों  के  साथ  अपनी  तुलना  करें  तो  अपने  सौभाग्य  की  सराहना  करने  को  जी  चाहेगा  l  l  केवल  मात्र  द्रष्टिकोण  के   परिवर्तन  से   सुख -शांति  से  जीवन  जिया  जा  सकता  है  l  "   एक  कथा  है ----- एक  अँधा  भीख  माँगा  करता  था  l  जो  पैसे  मिल  जाते  उसी  से  अपनी  गुजर -बसर  करता  l  एक  दिन  एक  व्यक्ति  ने  उसके  हाथ  में  पांच  रूपये  का  नोट  रखा  l  उसने   उस  कागज  को  टटोला  और  समझा  कि  किसी  ने  ठिठोली  की  है   l  उसका  मन  उदास  हो  गया  और  उसने   खिन्न  मन  से  उसे  जमीन  पर  फेंक  दिया  l  एक  सज्जन  ने  उसे  वह  नोट  उठाकर  दिया  और  कहा  यह  पांच  रूपये  का  नोट  है  , तब  वह  प्रसन्न  हुआ  और  उससे  अपनी  आवश्यकता  पूरी  की   l   आचार्य जी  लिखते  हैं ---- "  ज्ञान  चक्षुओं  के  अभाव  में  हम  भी   परमात्मा  की  अपार  देन   को  देख  और  समझ  नहीं  पाते  हैं   और  सदा  यही  कहते  रहते  हैं  कि  हमारे  पास  कुछ  नहीं  है  , हम  साधनहीन  हैं  ,  पर  यदि  हम   जो  कुछ  हमें  नहीं  मिला  है , उसकी  शिकायत  करना  छोड़कर  ,  जो  मिला  है  ,  उसी  की  महत्ता  समझें  तो  मालूम  होगा  कि   जो  कुछ  मिला  हुआ  है  वह  अद्भुत  है   l "