13 February 2024

WISDOM ----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " इस  संसार  में  सज्जन  को  सज्जन  और  दुष्ट    को  दुष्ट  सलाहकार  मिल  जाते  हैं  l  यदि  हमारा  विवेक  जागृत  नहीं  है   तो  दूसरों  की  सलाह  हमें  भटका  भी  सकती  है  l "    पुराण  में  भगवान  श्रीकृष्ण  के  जन्म  की  कथा  है  ----  देवकी  कंस  की  चचेरी  बहन  थीं  , उनका  विवाह  वसुदेव  से  हुआ  l l  विदा  के  समय  स्नेहवश  कंस  स्वयं   रथ  हाँक  रहा  था  l  उस  समय  भविष्यवाणी  हुई  कि   देवकी  के  आठवें  पुत्र  द्वारा  ही  उसका  वध  होगा   l  यह  सुनकर  वह  तलवार  लेकर  देवकी  को   मारने    दौड़ा  l   तब  वसुदेव  ने  उसे  समझाया  कि  मृत्यु  तो  निश्चित  है  , तुम  स्त्री  और  वो  भी  बहन  की  हत्या  का  कलंक  क्यों  लेते  हो  ?  तुम्हे  इसके  पुत्र  से  खतरा  है   तो  मैं  इसके  पुत्र  होते  ही  तुम्हे  सौंप  दूंगा  l  जब  देवकी  के  प्रथम  पुत्र  को  लेकर  वसुदेव  कंस  के  पास  गए  तो  कंस  ने   यह  कहकर  कि  आपके  आंठ्वे  पुत्र  से  खतरा  है  ,  उस  पुत्र  को  वापिस  कर  दिया  l  लेकिन  जब  उसे  पता  चला  कि  देवता  उसे  मारने  की  योजना  बना  रहे  हैं   तब  उसने  वासुदेव  और  देवकी   को  जेल  में  बंद  कर  दिया  और  उसके    सभी  पुत्रों  को  मारता  गया l   उसके  पिता   उग्रसेन  ने  विरोध  किया  तो  उन्हें  भी  बंदी  बना  लिया  l  उसने    अपने  मंत्रियों  को  बुलाकर  उनकी  राय  मांगी  l   श्रीमद् भागवत   में  शुकदेव जी    परीक्षित  से  कहते  हैं ----  एक  तो  कंस   की  बुद्धि  स्वयं  बिगड़ी  हुई  थी  l  फिर  उसे  मंत्री  ऐसे  मिले  जो   उससे  बढ़कर  दुष्ट  थे  l  उन्होंने  सलाह  दी  कि  जब  देवता   हमें  मारने  का  प्रयास  कर  रहे  हैं   तो  हमें   भी  देवताओं  को  और  देव शक्तियों  को  पोषण  करने  वाली  सद्प्रव्रत्तियों   को  ही  समाप्त  कर  देना  चाहिए  l   कंस  भी  काल  के  फंदे  में  फँसा  हुआ  था  ,  सबने  मिलकर  निर्णय  लिया  कि  जहाँ  भी  अच्छे  कार्य  होते  मिलेंगे   , उन्हें  नष्ट  कर  दिया  जायेगा  l  कंस  को  मारने  वाला    कहाँ  पैदा  हुआ  है   यह  पता  न  होने  से  उन  राक्षसों  ने   सभी  नवजात  शिशुओं  की  हत्या  करने  की  योजना  बनाई    और  तरह -तरह  के  उत्पात  करने  शुरू  कर  दिए   l   कहते  हैं  जब  मौत  सिर  पर  नाचती  है  तब  व्यक्ति  की  बुद्धि  काम  करना  बंद  कर  देती  है  l  नवजात  शिशुओं  का  वध  और  श्रेष्ठ  प्रवृत्तियों  का  अंत   आदि   अत्याचारों  के  कारण   उनका  पाप  का  घड़ा  भर  गया  और  एक -एक  कर  के  सभी  राक्षसों  और  कंस  का  वध  हुआ   l  विवेक रहित  व्यक्ति  न  अपना  हित  कर  सकते  हैं  न  दूसरों  का  l 

12 February 2024

WISDOM ------

  प्रत्येक  प्राणी  का  एक  स्वभाव  होता  है  , वह  नहीं  बदलता   जैसे  बिच्छू  का  स्वभाव  है  डंक  मारना , वह  हर  हाल  में  डंक   मारेगा  l  गिरगिट  रंग  बदलता  है  l  मनुष्य  को  भगवान  ने  बुद्धि  दी  है  ,  वह  चाहे  तो   संकल्प  लेकर , सतत  प्रयास  कर  के  अपनी  दूषित  प्रवृत्तियों  को  त्याग  कर  सन्मार्ग  पर  चल  सकता  है   लेकिन  कामना , वासना , तृष्णा , महत्वाकांक्षा , ईर्ष्या , द्वेष , स्वार्थ  , लालच   आदि  उसके  भीतर  इतनी  गहरी  जड़  जमाए  हुए  हैं   कि  वह  स्वयं  को  इन  दुष्प्रवृत्तियों  से  अलग  कर  ही  नहीं  सकता  ,  उसे   इन  दुष्प्रवृत्तियों  की  दुर्गन्ध  के  बीच  रहना  ही  अच्छा  लगता  है  l    एक  कथा  है ----रास्ते  में  चलते -चलते  रात  हो  जाने  से   एक  मछली वाली  ने   एक  मालिन  के  घर  का  आश्रय  लिया  l  मालिन  ने  उसे  पुष्प गृह  के  बरामदे  में  ठहराया  और  यथायोग्य  उसकी  सेवा  की   परन्तु  मछली वाली  को   रात  में  किसी  तरह  नींद  ही  नहीं   आ  रही  थी  l  अंत  में  वह  समझ  गई  कि  पुष्प गृह  में  रखे  हुए  नाना  प्रकार  के  खिले  हुए  फूलों  की  महक  के  कारण  ही  उसे  नींद  नहीं  आ  रही  है  l  तब  उसने   मछलियों  की   टोकरी  में  जल  छिड़ककर   अपने  सिराहने  रख  लिया   और  फिर  सुख  से  सो  गई   l  अज्ञानी  और  दूषित  संस्कारों  में  जकड़ा  हुआ  व्यक्ति   इस  मछली वाली  की  भांति  है  ,  इस  दुर्गन्ध  को  छोड़कर  उसे  कुछ  अच्छा  नहीं लगता  l  l  

11 February 2024

WISDOM -----

देवता  और  असुर  शुरू  से  ही  इस  संसार  में  हैं  l  देखने  में  तो  ये  दोनों  शरीर  से  मनुष्य  ही  हैं  ,  केवल   उनके  गुण -अवगुण  के  आधार  पर  उन्हें  देव  या  असुर  कहा  जा  सकता  l  जो  असुर  हैं  , उनमें  गुणों  की  कोई  कमी  नहीं  होती  l  बहुत  ज्ञानी , तपस्वी ------ अनेक  गुणों  से  संपन्न  होते  हैं  ,  केवल  एक  विशेष  दुर्गुण        ' अहंकार '  उनके  सब  गुणों  पर  पानी  फेर  देता  है  l  इस  अहंकार  के  कारण  अनेक  दुर्गुण  उनमे  स्वत:  ही  खिंचे  चले  आते  हैं  l  पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- " गुणवान  होना  बहुत  अच्छी  बात  है  l  गुणों  से  ही  संसार  में  कीर्ति  मिलती  है , यश  फैलता  है  l  सफलता  और  कुशलता   दोनों  खिंचे  चले  आते  हैं  l  लेकिन  इन  गुणों  के  साथ  यदि  अहंकार  भी  हो  तो   इन  सबका  दायरा  संसार  तक  ही  सिमट  जाता  है  l  अहंकारी  व्यक्ति  अपने  समस्त  गुणों, विभूतियों  के  बावजूद   दैवी  प्रयोजनों  के  लिए  अनुकूल  नहीं  रह  जाता  l "     अहंकारी  स्वयं  को  श्रेष्ठ  समझता  है  और  अपने  अहंकार  के  पोषण  के  लिए  छल , कपट , षड्यंत्र , कुटिलता  , कठोरता  ----- आदि  का  सहारा  लेता  है   l  रावण  कितना  विद्वान्  था   लेकिन  अहंकारी  था  , अपनी  महत्वाकांक्षा  के  अतिरिक्त  वह  किसी  का  सगा  नहीं  था  l  बालि  से   उसकी  मित्रता  केवल  छल  और  छद्म  थी  , वह  वानरों  में   फूट  डालकर  उनकी   शक्ति  को  कम  करना  चाहता  था  l   इस  अहंकार  के  कारण  ही  उसने  ऋषियों  पर  अत्याचार  किए , सीता -हरण  किया   l  दसों  दिशाओं  में  उसका  आतंक  था  ,  उसका  अहंकार  उसे  ले   डूबा   l   रावण  को  युगों  से  हर  वर्ष  जलाते  हैं  , लेकिन  यह  अहंकार  समाप्त  नहीं  हुआ  l  आज  संसार  में  जितनी  अशांति , युद्ध , अपराध  आदि  अनेक  समस्याएं  हैं  उनके  मूल  में  किसी  न  किसी  का  अहंकार  ही  है  l  संसार  में  जितने  भी  अहंकारी  हैं  वे  यदि  अपने  अहंकार  को  त्याग  दें   तो   संसार  में  कितनी  शांति   हो  l 

10 February 2024

WISDOM ------

   1 . दिन  का  अधिकांश  समय   एक  बच्चा  एकांत  में  बिताता  l  न  खाने  में  कोई  तर्क , न  बाहर  निकलने  की  इच्छा  l  कहीं  जाता   तो  शीघ्र  ही  अपनी  राह  लौट  आता  l  पिता  को  चिंता  हुई  l  एक  दिन  पूछ  ही  लिया  --- "  बेटा  !  आजकल  काम -धंधा   कुछ  नहीं  करते  l  कुछ  कष्ट  रहता  है  क्या   ? "  बेटे  ने  विनीत  भाव  से  उत्तर  दिया  ---- " पिताजी  !  आप  ही  तो  कहते  हैं  , मनुष्य  को  शांति  का  जीवन  बिताना  चाहिए   l "  पिता  ने  हँसकर  कहा ---- "बेटे !  चुपचाप  पड़े  रहने  का  नाम  शांति  नहीं  है  l  कैसी  भी  स्थिति  हो  धैर्य  रखकर  , अनिवार्य  दुःखों   को  स्वयं  वीरता  पूर्वक  झेलता  हुआ  भी   उद्विग्न  न  हो   उसे  शांति  कहते  हैं   l "                                                

2.  राजा  भोज  ने  नगरवासियों  को  एक  सार्वजनिक  भोज  दिया  l  लाखों  लोग  भांति -भांति  के  पकवानों -मिष्टान्न  खाकर  तृप्त  हुए  l  अपनी  उदारता  की  चर्चा  व  प्रशंसा  सुनकर   राजा  का  सीना   गर्व  से  फूल  गया  l  शाम  को  एक   लकड़हारा    सिर  पर  लकड़ी  का  गट्ठर  लिए   उन्हें  नगर  के  द्वार  पर  मिला  , उन्होंने  उससे  पूछा  ---- " क्या  तुम्हे  पता  नहीं  था  कि  राजा  भोज  ने  आज   सार्वजनिक  भोज  दिया  है  अन्यथा  तुम्हे   यह  श्रम  क्यों  करना  पड़ता  ?  "   लकड़हारा  बोला ---- "नहीं ,  मुझे  पूरी  तरह  पता  था  ,  पर  जो  परिश्रम  की  कमाई  खा  सकता  है  , उसे  राजा  भोज  के  सार्वजनिक  भोज  से  क्या  लेना -देना  ?  परिश्रम  की  रुखी  रोटी  का  आनंद   मुफ्त  के  पकवानों  में  कहाँ  ? "  ' श्रम  और  पसीने  से  उपार्जित  जीविका  से  जो  आत्मगौरव  जुड़ा  है  , उसका  आनंद    इन   व्यंजनों  से  अधिक  है  l  

9 February 2024

WISDOM -----

  भौतिक  प्रगति  के  साथ   नैतिकता  और  चरित्र  की  श्रेष्ठता  की  ओर  कोई  ध्यान  नहीं  दिया  गया  ,  इसलिए  यह  विकास    अधूरा  है   l   मनुष्य    अपनी  बुद्धि  का   उपयोग    अपने  स्वार्थ  को  सिद्ध  करने  के  लिए  करने  लगा  है  l  जैसे  पहले  तीर्थ  यात्रा  का  बहुत  महत्त्व  था  ,  लोगों  को  तीर्थ  स्थान  जाकर  असीम  शांति  और  ऊर्जा  मिलती  थी  l   लेकिन  अब  तीर्थ  भी  मनोरंजन   के  स्थान  हो  गए  हैं  l  लोगों  ने  पुरानी    मान्यता  को  दूषित  कर  दिया  l   यह  मान्यता  है  कि  तीर्थ  स्नान  से  सारे  पाप  धुल  जाते  हैं   ,  इसका  अर्थ  यही  था  कि   ऐसे  पवित्र  स्थल  पर  जाने  से  जीवन  में  नई  चेतना  का  संचार  होता  है   और  बुद्धि  सन्मार्ग  की  ओर  प्रेरित  होती  है   l  दुर्बुद्धि  के  कारण  लोग  इस  पवित्र  भाव  को  भूल  गए  , सोच  विकृत  हो  गई  कि ' पाप  कमाओ  और  गंगा  में  स्नान  कर  के  उनसे  छुटकारा  पा  लो , , ऐसी  सोच  ने  अपराध  में  और  वृद्धि  कर  दी  l  आचार्य श्री  लिखते  हैं  ----"  यदि  इस  प्रकार  गंगा  स्नान  से  पापों  से  छुटकारा  मिल  जाता  तो   सबसे  पहले  मछलियाँ  और  मगरमच्छ  स्वर्ग  पहुँच  जाते   जो  हर  समय  गंगाजल  में  ही  रहते  हैं  l  "   श्रीमद् भगवद्गीता  में   भगवान  ने  कहा  है  कि  निष्काम  कर्म  से  मनुष्य  की  बुद्धि  निर्मल  होती  है  ,  जाने -अनजाने  जो  पाप  किए  हैं  वे  कटते  हैं  l '   नि 'स्वार्थ  भाव  से  सेवा  के  कार्य  करने  से  घर  बैठे  ही  तीर्थ  का  पुण्य  मिल  जाता  है   l  

8 February 2024

WISDOM -----

   पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  ' प्रज्ञा  पुराण ' में  लघु  कथाओं  और  प्रसंग  के  माध्यम  से  हमें  जीवन  जीने  की  कला  सिखाई   है  l  --- संसार  में    विभिन्न  धर्मों  के  लोग  अपने -अपने  धर्म  के  कर्मकांड , उपासना   करते  हैं  l  हर  धर्म  के  अलग  तरीके  हैं  l  मनुष्य  पूजा -उपासना  करने  में  निश्चित  रूप  से  अपना  कुछ  समय  भी   देता  है  l   यह  सब  भी  जरुरी  है  अपने  धर्म  और  संस्कृति  को  जीवित  रखने  के  लिए   l   लेकिन  मन  चंचल  है  ,  केन्द्रित  नहीं  होता  , हर  समय  कुलांचे  भरता  रहता  है   l  यही  कारण  है  कि  संसार  में   विभिन्न  तरीकों  से   उस  परम  सत्ता  को  पूजने  और    धर्म  के  नाम  पर  विभिन्न  कार्य  करने  के  बावजूद  भी  संसार  में  शांति  नहीं  है  l   आचार्य श्री  लिखते  हैं --- ' केवल  माला  घुमाते  रहना  जप  नहीं  है  l  भगवान  की  सच्ची  पूजा   कर्तव्यपालन   और  दुःखियों  की  सेवा  है  l  यदि  कोई  व्यक्ति  बड़े -बड़े  व्रत -उपवास  रखता  है  , पूजा -पाठ  करता  है , किसी  इच्छापूर्ति  के  लिए  यज्ञ -अनुष्ठान  करता  है  ,  लेकिन  गरीबों  का  शोषण  करता  है , किसी  का  हक  छीनता  है  ,  लोगों  का  दिल  दुखाता  है  तो  उससे  भगवान  कभी  प्रसन्न  नहीं  हो  सकते   l  -------- एक  बार  रामलीला  खेलने  के  लिए   दो  गरीब  बच्चों  को  चुना  गया  l  उन्हें  राम -लक्ष्मण  बना  दिया  गया  l  सबने  उनकी  आरती  उतारी   l  खूब  पैसे  इकट्ठे  हुए  l  तीन  दिन  तक  इसी  प्रकार  कार्यक्रम  चलता  रहा  l  उन  बच्चों  ने  सोचा  था  कि  उन्हें  भी  कुछ  रूपये -पैसे  मिलेंगे  l  लेकिन  अंतिम  दिन  प्रसाद   बंटा  , सबने  खूब  मौज -मस्ती  की  , ठर्रा  पिया   किन्तु  उन  दोनों  बच्चों  को  जिन्हें  राम लक्ष्मण  बनाया  गया  था  , किसी  ने  खाने  के  लिए  भी  नहीं  पूछा   और  उन  बच्चों  से  कहा --- "  अभी  पैसे  नहीं  मिले  हैं  , बाद  में  तुम्हे   कपड़े  देंगे , अभी  जाओ  l  "  वे  दोनों  बेचारे  रोते  हुए  चले  गए  l    यह  सोचने  का  प्रश्न  है   क्या  ऐसे  धार्मिक  कार्य  से  ईश्वर  प्रसन्न  होंगे  ?  '      एक  प्रसंग  है ---- एक  बार  गुरु  नानकदेव जी  किसी  खां  साहब  से  मिलने  गए   l  वे  उस  समय  नमाज  पढ़  रहे  थे  l  गुरूजी  को  हँसी  आ  गई  l  नमाज  से  उठकर  खां  साहब  ने  नानकजी  से  पूछा  ---- "  आप  क्यों  हँस  रहे  थे  , मेरी  नमाज  देखकर  l "  नानकदेव जी  ने  कहा ---- " मैं  हँस  रहा  था  इसलिए  कि  तुम  नमाज  नहीं  पढ़  रहे  थे  ,  अरब  में  घोड़े  खरीद  रहे  थे   l "  यह  सुनकर  खां  साहब  शर्मिंदा  हुए   क्योंकि  वे  नमाज  पढ़ते  समय  अरब  में  घोड़े  खरीदने  की  बात   सोच  रहे  थे  l    इसलिए  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी   ने  पूजा -उपासना  के  साथ    नि:स्वार्थ  सेवा  के  कार्यों  को  करना  अनिवार्य  बताया  है   तभी  वह  पूजा   सार्थक  है  l  उनका  कहना  है --- 'यदि  भक्ति  में  कटौती  कर  के  सेवा  में  समय  लगाना  पड़े   तो  उसे  घाटा  नहीं  समझना  चाहिए   l '

7 February 2024

WISDOM ------

   युग  बदलते  हैं  , इसके  साथ  मनुष्य  की  प्रवृत्ति  भी  बदलती  है , सोचने -विचारने  का  तरीका  भी  बदलता  जाता  है  l  कलियुग  को  कलियुग  क्यों  कहते  हैं   ?  यदि  हम  इस  उदाहरण  से  देखें  तो  उत्तर  मिल  जायेगा  ------- त्रेतायुग  में  ---- सीता  का  अपहरण  रावण  कर  रहा  था   l  सीताजी  की  करुण  पुकार  जब  जटायु  ने  सुनी   तो  वह  उनकी  रक्षा  के  लिए  निकल  पड़ा  l  कहाँ  रावण  जैसा  शक्तिशाली  राजा  और  कहाँ  वृद्ध , शक्तिहीन  गिद्ध  जटायु   !   किन्तु  जटायु  अपने  को  रोक  नहीं  सका  और   सीताजी  की  रक्षा  के  लिए  अपने  प्राण  दे  दिए  l   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --यदि  हनुमान  नहीं  बन  सकते  तो  गिद्ध  और  गिलहरी  बन  जाओ  l    भगवान  राम  वन  चले  गए  थे  इसलिए  अपने  पिता  दशरथ  का  अंतिम  संस्कार  अपने  हाथ  से  नहीं  कर  सके    किन्तु  जटायु    की  दाह -क्रिया  अपने  हाथ  से  की  ,  जटायु    को  वह  सम्मान   और  गति  मिली   जो  दशरथ  को   भी  नहीं  मिली  l  वह  जटायु  आज  भी  इतिहास   में  अमर  है  l                                                                         द्वापर  युग  में   ---- द्रोपदी  का  चीर -हरण  हो  रहा  था   और  सब  वृद्ध   धर्म  और  न्याय  के  ज्ञाता  भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य  सब   सिर  झुकाए  बैठे  रहे  l  अपनी  ही  कुलवधू  के  साथ  होने  वाले  अन्याय  के  विरुद्ध  कोई  एक  शब्द  भी  नहीं  बोला  l  हस्तिनापुर  के  वृद्ध   एक  गिद्ध  की  गरिमा  को  भी  नहीं  पहुँच  सके  l     अत्याचार , अन्याय  तो  हर  युग  में  रहा  है   लेकिन  कलियुग  में  ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार  , लालच , छल कपट , षड्यंत्र    आदि  दुष्प्रवृत्तियाँ   मनुष्य  पर  इतनी  हावी  हो  गईं  है  कि  मनुष्य  के  ह्रदय  की  करुणा , संवेदना  बिलकुल  समाप्त  हो  गई  है  l  अब  किसी  की  रक्षा  करना  तो  बहुत  दूर  की  बात  है  ,  वीडियो  बनाना , ब्लैकमेल  करना  ,  समाज  के  सामने  शरीफ  बनकर   अपनी  काली -करतूतों  को  छिपाना  ----   आदि    ऐसे  तथ्य  हैं  जो  इस  बात  को  बताते  हैं  कि   इस  युग  में  चरित्र  और  नैतिकता  का  स्तर  बहुत   गिर  गया  है  l   समाज  को  दिशा  देने  के  लिए  जिन  अनुभवी  लोगों  की  आवश्यकता  है  ,  उनकी इच्छाएं , लालसाएं  किसी  तरह  समाप्त  ही  नहीं  होतीं   l  सच्चाई  को  अपमानित  किया  जाता  है  और  अपराधी  समाज  में  सम्मान  पाते  हैं  l  एक  वाक्य  में  यदि  कहा  जाए   तो  --- धन , बुद्धि  , शक्ति  का  दुरूपयोग   होने  के  कारण  ही  यह  युग  कलियुग  है  l  एक  ऐसा  युग  जिसमें  सुख -शांति  हो ,  लोगों  में  तनाव  न  हों ,   अस्पताल  बीमारों  से  भरे  न  हों  ,  छीना -झपटी  न  हो ------ यह  सब  तभी  संभव  होगा  जब  धन  के  स्थान  पर    व्यक्ति  की  पहचान  उसके  गुणों  से  होगी  l  कामना , वासना , लालच , महत्वाकांक्षा  ही  व्यक्ति  को   जीवन  में  और  जीवन  के  बाद  भी  भटकाते  हैं   और  युग  को  कलियुग  बनाते  हैं   l