14 December 2021

WISDOM --------

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ----- " मनुष्य  का  जीवन  एक  खेत  है  ,  जिसमे  कर्म  बोये  जाते  हैं   और  उन्ही  के  अच्छे - बुरे  फल  काटे  जाते  हैं  l   जो  अच्छे  कर्म  करता  है  वह  अच्छे  फल   पाता   है  , बुरे  कर्म  करने  वाला  ,  बुराई  ही  समेटता  है   l  "  वे  अपने  चिंतन  में  एक  प्रचलित  कहावत  कहते  हैं  ---- " आम   बोने  वाला  आम  खायेगा  ,  जो  बबूल   बोयेगा  ,  वह  हमेशा  कांटे  ही  पायेगा   l  "  बबूल   बोकर   आम  प्राप्त  करना  जिस  तरह  प्रकृति  का  सत्य  नहीं  है  ,  उसी  प्रकार  बुराई  के  बीज  बोकर  अच्छाई  पा  लेना  संभव  नहीं  है  l   कर्मफल  का  यह  विधान  अकाट्य  व   निरंतर  है  l   जन्म  व  जीवन  के  साथ  यह   सतत   प्रवाहमान  रहता  है  l  कर्म  करने  के  लिए  मनुष्य  स्वतंत्र  है  किन्तु    उसका     फल  कब  और कैसे  मिलेगा  यह  काल  तय  करता  है  l   हमारे  मन  के  तार  ईश्वर  से  जुड़े  हैं  ,केवल  कर्म  ही  नहीं ,  हम  जो  कुछ  विचार  करते  हैं  , कोई  कार्य  करते  वक्त  हमारी  भावना  क्या  है ,  उसकी , हर  पल  की  खबर  ईश्वर  को  होती  है  l   कर्म  के  फल  से  कोई  नहीं  बच  सकता   l 

13 December 2021

WISDOM -------

  धन - वैभव , सम्पन्नता ,  सुख - सुविधाओं  की  प्रचुरता   के  आधार  पर  किसी  समाज  को  सभ्य  समाज  नहीं   कहा  जा  सकता  l  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  का  कहना  है ---- " अनैतिक  दृष्टि  अपनाये  हुए   व्यक्तियों  का  समाज   असभ्य  ही  कहला  सकता  है  l   आज   संसार  में   अपराधों , क्लेशों , संघर्ष , अभाव ,  चिंता , तनाव   और  समस्याओं  का  घटाटोप   दिखाई  पड़ता  है   उसका  एकमात्र  कारण   व्यक्तियों  के  मन  में   समाई  हुई   स्वार्थपरता ,  चरित्रहीनता   एवं  संकुचित  दृष्टि  है  l   आदर्शवाद  का ,  धर्म - नीति  एवं   मर्यादाओं  का  उल्लंघन    जब  कभी  भी   अधिक  मात्रा  में  होने  लगता  है   तब  उसका  परिणाम  सारे  समाज  को  भुगतना  पड़ता  है   l "  आचार्य श्री  लिखते  हैं ---- ' उच्च  भावनाओं  के  आधार  पर  मनुष्य  देवता  बन  जाता  है   ,  लेकिन  तुच्छ  विचार  के  कारण   वह  पशु  दिखाई  पड़ता  है    और    निकृष्ट  पाप  बुद्धि   को  अपनाकर  वह  असुर  एवं  पिशाच   बन  जाता  है   l   कुमार्ग  पर  चलने  वाले  व्यक्ति   सारे  समाज   को ही  दुःख  देते  हैं   l   भौतिक  और  आत्मिक  कल्याण  के  लिए   उत्कृष्ट  भावनाओं  की  अभिवृद्धि  आवश्यक  है   l 

12 December 2021

WISDOM -----

   रामकृष्ण  परमहंस  के  पास  नरेंद्र  ( स्वामी  विवेकानंद )  को  आते    काफी  अवधि  हो  चुकी  थी  l   एक  दिन  वे  अपने  शिष्यों  से  बोले ---- " अब  तक  तो  नरेंद्र  के  पास  सब  कुछ  था  ,  पर  अब  माँ  इसे  बहुत  दुःख  देंगी    क्योंकि  उन्हें  इसका  विकास  करना  है  l  "  नरेंद्र  को  काफी  दुःख  वेदनाएं  सहन  करनी  होंगी  ,  तभी  वह  लोक - शिक्षण  हेतु    अपने  आपको  गढ़  पायेगा   l   उनने  अपने  शिष्यों  को  बताया  कि   दुःख   ही  भाव  शुद्धि  करते  हैं  ,  दुःख  ही  व्यक्ति  को  अंदर  से  मजबूत  बनाते  हैं   l   नरेंद्र  के  ऊपर  दुःखों   की  बाढ़   आ  गई  l   सब  कुछ    छिन   गया ,   रोटी  के  लिए  तरस  गए  l   कई  गहरी  पीड़ाएँ  एक  साथ  आईं  l   उनने  अपनी  बहन  को  आत्महत्या  करते  देखा  ,  माँ  का  रुदन  देखा  l   रामकृष्ण  उनकी  हर   पीड़ा  में  दुःख  व्यक्त  करते  ,  पर  जानते  थे  कि    यह  सब  भी  जरुरी  है  l   सामयिक  है   l   इसी  ने  नरेंद्र  को  स्वामी  विवेकानंद   बनाया  l 

WISDOM ------- श्रीमद् भगवद्गीता जब हमारे मन के तारों में , हृदय के स्पंदन में धड़कने लगे , तभी इसकी सार्थकता है , यही गीता जयंती का मूल उद्देश्य है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी शर्मा

  श्रीमद् भगवद्गीता   कालजयी  एवं  शाश्वत  ग्रन्थ  है   l   गीता  के  निष्काम  कर्म  में  जीवन  जीने  की  सर्वोत्कृष्ट   कला  सन्निहित   है  l   गीता  के   विभूतियोग  में   भगवान  ने  अर्जुन  को   विभूति  को  पहचानने  का  संकेत  दिया   l   ऐसा  संकेत  जिससे   ईश्वरीयता  को  पहचानना  संभव  है   l   भगवान  श्रीकृष्ण  ने  अर्जुन  से  कहा ---- " अगर  तुम्हे  सीधे  ईश्वर   समझ  नहीं  आ  रहा  है  ,  तो  उसे  ऐश्वर्य  में  पहचानों,  क्योंकि  यह  सब  जगह   स्थान स्थान  पर  बिखरा   हुआ  है  l   इसे  देखना , पहचानना  और  अनुभव  करना  आसान  है   l  जहाँ  कोई  फूल  पूरा  खिला  हो ,  जहाँ   भी लगे   यहाँ   तो ऐश्वर्य   अपने  शिखर  पर  है  ,  जहाँ  कांति , विभूति  असाधारण  है  ,  वहां - वहां   तुम मेरी  उपस्थिति  का  अनुभव  करो   l        एक  प्रसंग  है ----- बादशाह   अकबर   जब  भी  तानसेन  का  संगीत  सुनते   तो  उन्हें  लगता  कि   तानसेन  संगीत  की  चरम  सीमा   हैं   l   एक  रात  जब  वे  तानसेन   को  विदा  करने  लगे  तो  उन्होंने  अपने  दिल  की  बात  तानसेन  से  कही   l   यह  सुनकर  तानसेन  ने  कहा ---- "  आप  मेरे  बारे  में  इतना  अच्छा   सोचते  हैं  यह  मेरे  लिए  सौभाग्य  है  ,  लेकिन  मेरे  गुरु  मुझसे  बहुत  आगे  हैं   l   मैं  तो  उनके  आगे  कुछ  भी  नहीं   l  "  अकबर  ने  कहा  ---- " किसी  भी  तरह  तुम   अपने गुरु  को  दरबार  में  लाओ  , मैं  अपना  सारा  शाही  खजाना  लुटाने  को  तैयार  हूँ   l  "  इस  पर  तानसेन  ने  कहा  ---- " यही  तो  मुश्किल  है  l  उनके  आने  की  कोई  कीमत  नहीं  l  उनका  मन  हो  तो  झोपड़ी   में  चले  जाते  हैं   और  मन  न  हो   तो  राजदरबार  भी  व्यर्थ  है  l  वह  किसी  के  कहने  से   अपने  वाद्य  को  छूते   भी  नहीं   l   वे  तभी  गाते  हैं  जब  उनका  मन  हो   l  "  यह  सुनकर  अकबर  मायूस  हुआ  और  कहा  ---- ' कोई  तो  उपाय  होगा  ? "  तानसेन  ने  कहा  ------- " वे  ब्रह्म मुहूर्त  में   जब  प्रभु  की  स्तुति  करते  , तभी  अपने  साज  को  हाथ  लगाते   हैं   l  "  यह  सुनकर  अकबर  तानसेन  के  साथ  चल  पड़े  यमुना  के  तट  पर   l   ब्रह्ममुहूर्त  के  समय   तानसेन  के  गुरु  हरिदास  महाराज   ने  गाना   शुरू  किया  तो   अकबर  की  आँखों   से   आँसू   बहने  लगे   l   उस  दिन   उन्हें  अनुभव  हुआ   संगीत  के  शिखर  का ,  ईश्वरीयता  का   l   लौटते  समय  अकबर ने  तानसेन   से कहा  --- " तुम्हारे  गुरु  से  वाकई    तुम्हारा  कोई  मुकाबला  नहीं  l  ''  इस  पर  तानसेन  बोले  ----बादशाह   सलामत  !  मुकाबला  हो  भी  नहीं  सकता  l  मेरे  और उनके   बीच फारकं  साफ़  है   l   मैं  कुछ  पाने   के  लिए    बजाता  हूँ ,  जबकि   उन्होंने  कुछ  पा  लिया  है   इसलिए  बजाते  हैं  l  "        यही  है  विभूति   l 

10 December 2021

WISDOM ------

  मनुष्य  एक  समझदार  प्राणी  है   , लेकिन  अपने  बहुमूल्य  मानव  जीवन  को   लड़ाई - झगड़े ,  दंगे  जैसे  नकारात्मक  कार्यों  में  गँवा  देता  है  l   यदि  कुछ  पल  शांत  होकर  बैठें  और  चिंतन  करें  तो  समझ  आएगा  कि  जाति   और  धर्म  के  आधार  पर  नहीं ,  बल्कि   दूषित  मनोवृति  के  कारण   समाज  में  अशांति   होती  है  l  घरेलू   हिंसा ,  , सम्पति  के  झगड़े ,  पारिवारिक  कलह , विवाद, महिला  उत्पीड़न   ----  इन  सब  में  किसी  अन्य  जाति   का  हस्तक्षेप  नहीं  होता ,  लोग  आपस  में  ही  लड़ते  हैं  और  तनाव  व  परेशानियों  से  घिरे  रहते  हैं  l   जब  ईर्ष्या - द्वेष , लालच  बहुत  बढ़  जाता  है   तब  अपनों  को  ही  सताने ,  नीचा   दिखाने   के  लिए  गैरों  की  मदद  लेते  हैं  l  मनुष्य  को  जागरूक  होकर   जीवन  में  प्राथमिकताओं  का  चयन  करना  होगा   कि   सुख - शांति  का  जीवन  जरुरी  है  या   वैर - भाव  , अशांति  जरुरी  है  l 

WISDOM ------

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----" सदुद्देश्य   के  लिए  आक्रोश   जरुरी  है   l  संकीर्ण  मनोवृत्ति   से  उभरा  आक्रोश  ,  स्वार्थ प्रेरित  होता  है   और   ऐसा क्रोध  सदैव  अनिष्टकारी  होता  है  l  लेकिन  ऐसा  आक्रोश  जिसके  पीछे  परमार्थ  हो  ,  उसके  सत्परिणाम  सामने  आते  हैं  l   ऐसे  व्यक्तियों  को  मनस्वी  कहा  जाता  है  ,  जो  अन्याय  और  अनाचार  के  सामने  घुटने  नहीं  टेकते  ,  वरन  उनसे  लोहा  लेते  हैं   और  अन्यायी  और  अत्याचारी  को  भी   सही  मार्ग  पर   चलने  के  लिए  प्रेरित  करते  हैं   l  "  इस  संदर्भ   में  एक  प्रसंग  है ------       तमिलनाडु   के  कंदकुरि  वीरेश  लिंगम   जब  स्कूली  छात्र  थे   l   वे  जिस  विद्दालय  में  अध्ययन  कर  रहे  थे  ,  उसके  हेडमास्टर  को  भाषा  का  समुचित  ज्ञान  नहीं  था  l   यद्द्पि  प्रधानाध्यापक  से  उनकी  कोई  व्यक्तिगत  दुश्मनी  नहीं  थी  ,  लेकिन  छात्र  हित    में     कि   सब  छात्रों  को  सही  ज्ञान  व  मार्गदर्शन  मिले ,  उन्होंने  विद्दालय  के  सभी  छात्रों  के  साथ  मिलकर  उच्च  अधिकारी   को  उनकी  शिकायत  लिख  भेजी  कि   उनके , स्थान  पर  योग्य  व  सक्षम  व्यक्ति  को  नियुक्त  किया  जाये  l   हेडमास्टर  को  इस  आवेदन  का  पता  चल  गया  ,  उन्होंने  छात्रों  को  दंडित   किया  और  वीरेश  लिंगम  को  विद्दालय  से  निकाल  देने  की  धमकी  दी   l   लेकिन  उनकी  भावना  निस्स्वार्थ  थी  ,  उन्होंने  प्रतिवेदन  की  कई   प्रतियां   कर  संबंधित   शिक्षा  अधिकारियों   को  भेजी   और  छात्रों  को  विद्दालय  में  न  आने  को  कहा  l   छात्रों  की  हड़ताल  को  देखकर   सरकार  ने  मामले  की  जाँच  के  आदेश  दिए   और  अंतत:  नए   प्रधानाध्यापक  की  नियुक्ति   कर  दी  गई  l    अनौचित्य   के  प्रति  क्रोधित  होने   की  परमार्थ परायण  वृत्ति   ने  ही  उन्हें   आगे  चलकर   एक  मनस्वी  समाज  सुधारक   के  रूप  में  ख्याति  दिलाई   l   सामान्य  लोग  निज  स्वार्थ  के  लिए  क्रोधित  होते  हैं  ,  परन्तु  महापुरुष  मात्र  ऊँचे  उद्देश्यों  की  पूर्ति  के  लिए   आक्रोश  का  परिचय  देते  हैं   l     

9 December 2021

WISDOM ------

   मनुष्य  जीवन  है   तो  समस्याएं  आती - जाती  रहती  हैं   l   अधिकांश  लोगों  का  यह  स्वभाव   ही  होती  है  कि   वे  अपनी  परेशानियों  और  कष्टों  के  लिए  दूसरों  को  जिम्मेदार  ठहराते  हैं  l  सांसारिक  उलझनें  इतनी  हैं  कि   हम  अपने  भीतर  देख  ही  नहीं  पाते  कि   वास्तव  में  कमी  कहाँ  है  l   चाहें  पारिवारिक  स्तर  पर  देखें  या  विशाल  स्तर  पर    जब  कमी  अपने  में  होती  है ,  अपना  ही  दांव  कमजोर  होता  है    तब  दूसरे  उसका  फायदा  उठाते  हैं  l   इन  सबके  मूल  में  कारण  है  --- मनुष्य  की  कमजोरियां  -- ईर्ष्या , द्वेष , महत्वाकांक्षा , लोभ , लालच ,  कामना , वासना  -- इन  दुर्गुणों  के  कारण  व्यक्ति  विवेक शून्य  हो  जाता  है  ,  उसे   अच्छे - बुरे   का ज्ञान  ही  नहीं  होता  l   इन  सब  से  निपटने  के  लिए  हंस  जैसी  विवेक  बुद्धि  जरुरी  है  l   अपनी  और  अपने  परिवार  की  कमियों मको  दूर  कर  के  ही  बाहरी  तत्वों  को  पराजित  कर  सकते  हैं    l