पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " मनुष्य का जीवन एक खेत है , जिसमे कर्म बोये जाते हैं और उन्ही के अच्छे - बुरे फल काटे जाते हैं l जो अच्छे कर्म करता है वह अच्छे फल पाता है , बुरे कर्म करने वाला , बुराई ही समेटता है l " वे अपने चिंतन में एक प्रचलित कहावत कहते हैं ---- " आम बोने वाला आम खायेगा , जो बबूल बोयेगा , वह हमेशा कांटे ही पायेगा l " बबूल बोकर आम प्राप्त करना जिस तरह प्रकृति का सत्य नहीं है , उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर अच्छाई पा लेना संभव नहीं है l कर्मफल का यह विधान अकाट्य व निरंतर है l जन्म व जीवन के साथ यह सतत प्रवाहमान रहता है l कर्म करने के लिए मनुष्य स्वतंत्र है किन्तु उसका फल कब और कैसे मिलेगा यह काल तय करता है l हमारे मन के तार ईश्वर से जुड़े हैं ,केवल कर्म ही नहीं , हम जो कुछ विचार करते हैं , कोई कार्य करते वक्त हमारी भावना क्या है , उसकी , हर पल की खबर ईश्वर को होती है l कर्म के फल से कोई नहीं बच सकता l
14 December 2021
13 December 2021
WISDOM -------
धन - वैभव , सम्पन्नता , सुख - सुविधाओं की प्रचुरता के आधार पर किसी समाज को सभ्य समाज नहीं कहा जा सकता l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का कहना है ---- " अनैतिक दृष्टि अपनाये हुए व्यक्तियों का समाज असभ्य ही कहला सकता है l आज संसार में अपराधों , क्लेशों , संघर्ष , अभाव , चिंता , तनाव और समस्याओं का घटाटोप दिखाई पड़ता है उसका एकमात्र कारण व्यक्तियों के मन में समाई हुई स्वार्थपरता , चरित्रहीनता एवं संकुचित दृष्टि है l आदर्शवाद का , धर्म - नीति एवं मर्यादाओं का उल्लंघन जब कभी भी अधिक मात्रा में होने लगता है तब उसका परिणाम सारे समाज को भुगतना पड़ता है l " आचार्य श्री लिखते हैं ---- ' उच्च भावनाओं के आधार पर मनुष्य देवता बन जाता है , लेकिन तुच्छ विचार के कारण वह पशु दिखाई पड़ता है और निकृष्ट पाप बुद्धि को अपनाकर वह असुर एवं पिशाच बन जाता है l कुमार्ग पर चलने वाले व्यक्ति सारे समाज को ही दुःख देते हैं l भौतिक और आत्मिक कल्याण के लिए उत्कृष्ट भावनाओं की अभिवृद्धि आवश्यक है l
12 December 2021
WISDOM -----
रामकृष्ण परमहंस के पास नरेंद्र ( स्वामी विवेकानंद ) को आते काफी अवधि हो चुकी थी l एक दिन वे अपने शिष्यों से बोले ---- " अब तक तो नरेंद्र के पास सब कुछ था , पर अब माँ इसे बहुत दुःख देंगी क्योंकि उन्हें इसका विकास करना है l " नरेंद्र को काफी दुःख वेदनाएं सहन करनी होंगी , तभी वह लोक - शिक्षण हेतु अपने आपको गढ़ पायेगा l उनने अपने शिष्यों को बताया कि दुःख ही भाव शुद्धि करते हैं , दुःख ही व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाते हैं l नरेंद्र के ऊपर दुःखों की बाढ़ आ गई l सब कुछ छिन गया , रोटी के लिए तरस गए l कई गहरी पीड़ाएँ एक साथ आईं l उनने अपनी बहन को आत्महत्या करते देखा , माँ का रुदन देखा l रामकृष्ण उनकी हर पीड़ा में दुःख व्यक्त करते , पर जानते थे कि यह सब भी जरुरी है l सामयिक है l इसी ने नरेंद्र को स्वामी विवेकानंद बनाया l
WISDOM ------- श्रीमद् भगवद्गीता जब हमारे मन के तारों में , हृदय के स्पंदन में धड़कने लगे , तभी इसकी सार्थकता है , यही गीता जयंती का मूल उद्देश्य है ---- पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी शर्मा
श्रीमद् भगवद्गीता कालजयी एवं शाश्वत ग्रन्थ है l गीता के निष्काम कर्म में जीवन जीने की सर्वोत्कृष्ट कला सन्निहित है l गीता के विभूतियोग में भगवान ने अर्जुन को विभूति को पहचानने का संकेत दिया l ऐसा संकेत जिससे ईश्वरीयता को पहचानना संभव है l भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा ---- " अगर तुम्हे सीधे ईश्वर समझ नहीं आ रहा है , तो उसे ऐश्वर्य में पहचानों, क्योंकि यह सब जगह स्थान स्थान पर बिखरा हुआ है l इसे देखना , पहचानना और अनुभव करना आसान है l जहाँ कोई फूल पूरा खिला हो , जहाँ भी लगे यहाँ तो ऐश्वर्य अपने शिखर पर है , जहाँ कांति , विभूति असाधारण है , वहां - वहां तुम मेरी उपस्थिति का अनुभव करो l एक प्रसंग है ----- बादशाह अकबर जब भी तानसेन का संगीत सुनते तो उन्हें लगता कि तानसेन संगीत की चरम सीमा हैं l एक रात जब वे तानसेन को विदा करने लगे तो उन्होंने अपने दिल की बात तानसेन से कही l यह सुनकर तानसेन ने कहा ---- " आप मेरे बारे में इतना अच्छा सोचते हैं यह मेरे लिए सौभाग्य है , लेकिन मेरे गुरु मुझसे बहुत आगे हैं l मैं तो उनके आगे कुछ भी नहीं l " अकबर ने कहा ---- " किसी भी तरह तुम अपने गुरु को दरबार में लाओ , मैं अपना सारा शाही खजाना लुटाने को तैयार हूँ l " इस पर तानसेन ने कहा ---- " यही तो मुश्किल है l उनके आने की कोई कीमत नहीं l उनका मन हो तो झोपड़ी में चले जाते हैं और मन न हो तो राजदरबार भी व्यर्थ है l वह किसी के कहने से अपने वाद्य को छूते भी नहीं l वे तभी गाते हैं जब उनका मन हो l " यह सुनकर अकबर मायूस हुआ और कहा ---- ' कोई तो उपाय होगा ? " तानसेन ने कहा ------- " वे ब्रह्म मुहूर्त में जब प्रभु की स्तुति करते , तभी अपने साज को हाथ लगाते हैं l " यह सुनकर अकबर तानसेन के साथ चल पड़े यमुना के तट पर l ब्रह्ममुहूर्त के समय तानसेन के गुरु हरिदास महाराज ने गाना शुरू किया तो अकबर की आँखों से आँसू बहने लगे l उस दिन उन्हें अनुभव हुआ संगीत के शिखर का , ईश्वरीयता का l लौटते समय अकबर ने तानसेन से कहा --- " तुम्हारे गुरु से वाकई तुम्हारा कोई मुकाबला नहीं l '' इस पर तानसेन बोले ----बादशाह सलामत ! मुकाबला हो भी नहीं सकता l मेरे और उनके बीच फारकं साफ़ है l मैं कुछ पाने के लिए बजाता हूँ , जबकि उन्होंने कुछ पा लिया है इसलिए बजाते हैं l " यही है विभूति l
10 December 2021
WISDOM ------
मनुष्य एक समझदार प्राणी है , लेकिन अपने बहुमूल्य मानव जीवन को लड़ाई - झगड़े , दंगे जैसे नकारात्मक कार्यों में गँवा देता है l यदि कुछ पल शांत होकर बैठें और चिंतन करें तो समझ आएगा कि जाति और धर्म के आधार पर नहीं , बल्कि दूषित मनोवृति के कारण समाज में अशांति होती है l घरेलू हिंसा , , सम्पति के झगड़े , पारिवारिक कलह , विवाद, महिला उत्पीड़न ---- इन सब में किसी अन्य जाति का हस्तक्षेप नहीं होता , लोग आपस में ही लड़ते हैं और तनाव व परेशानियों से घिरे रहते हैं l जब ईर्ष्या - द्वेष , लालच बहुत बढ़ जाता है तब अपनों को ही सताने , नीचा दिखाने के लिए गैरों की मदद लेते हैं l मनुष्य को जागरूक होकर जीवन में प्राथमिकताओं का चयन करना होगा कि सुख - शांति का जीवन जरुरी है या वैर - भाव , अशांति जरुरी है l
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----" सदुद्देश्य के लिए आक्रोश जरुरी है l संकीर्ण मनोवृत्ति से उभरा आक्रोश , स्वार्थ प्रेरित होता है और ऐसा क्रोध सदैव अनिष्टकारी होता है l लेकिन ऐसा आक्रोश जिसके पीछे परमार्थ हो , उसके सत्परिणाम सामने आते हैं l ऐसे व्यक्तियों को मनस्वी कहा जाता है , जो अन्याय और अनाचार के सामने घुटने नहीं टेकते , वरन उनसे लोहा लेते हैं और अन्यायी और अत्याचारी को भी सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं l " इस संदर्भ में एक प्रसंग है ------ तमिलनाडु के कंदकुरि वीरेश लिंगम जब स्कूली छात्र थे l वे जिस विद्दालय में अध्ययन कर रहे थे , उसके हेडमास्टर को भाषा का समुचित ज्ञान नहीं था l यद्द्पि प्रधानाध्यापक से उनकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी , लेकिन छात्र हित में कि सब छात्रों को सही ज्ञान व मार्गदर्शन मिले , उन्होंने विद्दालय के सभी छात्रों के साथ मिलकर उच्च अधिकारी को उनकी शिकायत लिख भेजी कि उनके , स्थान पर योग्य व सक्षम व्यक्ति को नियुक्त किया जाये l हेडमास्टर को इस आवेदन का पता चल गया , उन्होंने छात्रों को दंडित किया और वीरेश लिंगम को विद्दालय से निकाल देने की धमकी दी l लेकिन उनकी भावना निस्स्वार्थ थी , उन्होंने प्रतिवेदन की कई प्रतियां कर संबंधित शिक्षा अधिकारियों को भेजी और छात्रों को विद्दालय में न आने को कहा l छात्रों की हड़ताल को देखकर सरकार ने मामले की जाँच के आदेश दिए और अंतत: नए प्रधानाध्यापक की नियुक्ति कर दी गई l अनौचित्य के प्रति क्रोधित होने की परमार्थ परायण वृत्ति ने ही उन्हें आगे चलकर एक मनस्वी समाज सुधारक के रूप में ख्याति दिलाई l सामान्य लोग निज स्वार्थ के लिए क्रोधित होते हैं , परन्तु महापुरुष मात्र ऊँचे उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आक्रोश का परिचय देते हैं l
9 December 2021
WISDOM ------
मनुष्य जीवन है तो समस्याएं आती - जाती रहती हैं l अधिकांश लोगों का यह स्वभाव ही होती है कि वे अपनी परेशानियों और कष्टों के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं l सांसारिक उलझनें इतनी हैं कि हम अपने भीतर देख ही नहीं पाते कि वास्तव में कमी कहाँ है l चाहें पारिवारिक स्तर पर देखें या विशाल स्तर पर जब कमी अपने में होती है , अपना ही दांव कमजोर होता है तब दूसरे उसका फायदा उठाते हैं l इन सबके मूल में कारण है --- मनुष्य की कमजोरियां -- ईर्ष्या , द्वेष , महत्वाकांक्षा , लोभ , लालच , कामना , वासना -- इन दुर्गुणों के कारण व्यक्ति विवेक शून्य हो जाता है , उसे अच्छे - बुरे का ज्ञान ही नहीं होता l इन सब से निपटने के लिए हंस जैसी विवेक बुद्धि जरुरी है l अपनी और अपने परिवार की कमियों मको दूर कर के ही बाहरी तत्वों को पराजित कर सकते हैं l