लघु -कथा ---- ' खुदा क्या करता है l '------- एक सुल्तान के पास एक काजी पहुंचा l उसका धर्म -आडम्बर देखकर सुल्तान ने सोचा कि उसकी परीक्षा ली जाए l सुल्तान ने काजी से पूछा --- 'खुदा कहाँ रहता है ? और क्या करता है ? ' और कहा --इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर देने पर तुम्हे ऊँचा पद दिया जाएगा अन्यथा दंड l काजी ने आठ दिन की मोहलत मांगी , उसे कोई उत्तर नहीं सूझ रहा था l बहुत परेशान था , चिंता के कारण खाना -पीना भी छूट गया l उसके नौकर की हैसियत तो साधारण थी किन्तु वह वेदांत का पंडित था l उसने काजी से कहा आप मुझे बताएं , मैं आपकी मदद करूँगा l काजी ने उसे सुल्तान की कही सब बात बताई तब नौकर ने कहा --- 'आप मुझे सुल्तान के पास भेज दें , मैं सब संभाल लूँगा और न संभाल सका तो दंड मुझे ही मिलेगा , आप बच जायेंगे l इसी बीच सुल्तान के सिपाही आ गए तो काजी ने बीमारी का बहाना कर के नौकर को भेज दिया l वह निडर होकर सुल्तान के पास पहुंचा और बोला --- फरमाइए जहाँपनाह , क्या पूछना चाहते हैं ? सुल्तान ने कहा --- 'क्या तुम उन सवालों के जवाब दे सकते हो , जो तुम्हारे मालिक से पूछे गए हैं ? ' नौकर ने कहा --- "जरुर दे सकता हूँ , लेकिन आप एक सच्चे मुसलमान की तरह मुझे बाइज्जत ऊँची जगह बख्शें और खुद नीची जगह बैठें क्योंकि मजहब के मुताबिक जो पूछता है , वह शागिर्द होता है और जो बताता है वह उस्ताद होता है l ' सुल्तान ने उसे बेशकीमती पोषक पहनवाकर अपना तखत पेश किया और स्वयं सीढ़ियों पर बैठ गया l अब सुल्तान ने पूछा --- ' खुदा कहाँ रहता है ? नौकर ने दूध मंगवाया और सुल्तान से पूछा -- क्या इस दूध में मक्खन है ? सुल्तान ने हामी भरी l फिर उसने पूछा --- यह मक्खन कहाँ है ? इस प्रश्न का सुल्तान कोई जवाब नहीं दे सका , तब नौकर ने कहा ---- ' जिस प्रकार दूध में मक्खन है पर वह दीखता नहीं है , उसे पाने के लिए दूध को मथना पड़ता है , इसी तरह जर्रे -जर्रे में मौजूद है , उसे पाने के लिए साधना करनी पड़ती है , अपने विचारों को , ह्रदय को परिष्कृत करना पड़ता है l " इस उत्तर से सुल्तान संतुष्ट हुआ और उसे बहुत आनंद हुआ l अब उसने दूसरा प्रश्न पूछा ---" खुदा क्या करता है l " अब नौकर ने काजी को बुलाया और और सुल्तान को काजी के स्थान पर बैठने को कहा और काजी को सीढ़ियों पर बैठने को कहा l नौकर बोला अब ध्यान से सुनो --- " खुदा भी यही करता है l वह रंक को राजा , राजा को काजी और काजी को रंक बना सकता है l वह लगातार परिवर्तन करता रहता है l किसी को ऊपर उठाता है , किसी को नीचे गिराता है , किसी को बनाता है , किसी को मिटाता है l यह काल चक्र है और वह इस चक्र का नियंत्रण करता है l "
29 October 2022
28 October 2022
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " अशांति से आज सभी परेशान हैं l एक मनुष्य के पास पर्याप्त साधन , संपत्ति , जीवन निर्वाह की वस्तुएं हैं , फिर भी वह अशांत , परेशान है l उच्च शिक्षा संपन्न , अच्छे पद पर प्रतिष्ठित होकर भी भूला -भटका सा दिखाई देता है l " आचार्य श्री लिखते हैं --- अभिमान , अहंकार चाहे वह किसी भी गुण , रूप व वस्तु का क्यों न हो , मनुष्य को वास्तविक सुख और आत्मिक आनंद से दूर रखता है l ' पुराण की एक कथा है ----- एक बार देवता भी भोग - विलास में डूब गए जिससे उनकी सामर्थ्य नष्ट हो गई l उस समय असुरों ने उन पर आक्रमण किया ,तब प्रजापति ब्रह्मा ने पृथ्वी के प्रतापी और बलशाली महाराज मुचकुंद को सेनापति बनाया l ब्रह्माजी का कहना था ---संयमी और सदाचारी व्यक्ति मनुष्य तो क्या देव -दानव सभी को परस्त कर सकता है l अब देवताओं की सेना का सञ्चालन महाराज मुचकुंद कर रहे थे l एक माह तक घनघोर युद्ध हुआ l असुर बुरी तरह पराजित हुए , उन्होंने बीसियों सेनापति बदल डाले लेकिन मुचकुंद की वीरता के आगे वे सब परस्त हो गए l धरती और देवलोक सब तरफ मुचकुंद की जयकार हो रही थी l अपनी प्रशंसा सुनते -सुनते मुचकुंद के मन में अहंकार जाग गया और अब वे अपनी शक्ति भोग -विलास में नष्ट करने लगे l प्रजापति ब्रह्मा ने इस बात को देख लिया और देवराज इंद्र को बुलाकर कहा कि मनुष्य में अहंकार आ जाने से उसका पतन होने लगता है इसलिए तुम अब शिवजी के पुत्र स्वामी कार्तिकेय को सैन्य संचालन के लिए राजी कर लो l प्रजापति का कहना सही था , विलासिता के कारण मुचकुंद की शक्ति कम हो गई और असुरों ने उन्हें बंदी बनाकर धरती पर पटक दिया l ब्रह्माजी ने उन्हें समझाया कि ---- संयमी और पराक्रमी होने के साथ निरहंकारी भी होना चाहिए l संयम से ही स्वर्ग जीते जाते हैं l
27 October 2022
WISDOM ----
कबीरदास जी का दोहा है ---- धीरे -धीरे रे मना , धीरे सब कुछ होय l माली सींचै सौ घड़ा , ऋतु आए फल होय l अर्थात माली किसी पौधे को सौ घड़े पानी से भी सींचे , पर उसमें फल तो समय आने पर ही होंगे l आचार्य श्री लिखते हैं --"- सत्कर्मों का बीज बोते ही हमें फल प्राप्ति नहीं हो सकती , समय आने पर ही हमें सत्कर्मों का फल मिलता है l इसलिए हमें कुशल किसान की तरह सत्कर्मों की खेती निरंतर करनी चाहिए l " एक कथा है ----- देव नामक एक लड़का बहुत गरीब था , जीविका और स्कूल की फीस भरने के लिए वह फेरी लगाता था l एक दिन वह दिन भर घूमा लेकिन उसका कोई सामान नहीं बिका l वह बहुत थक गया और उसे बहुत भूख भी लागी l बहुत व्याकुल था वह , कुछ खाना मांगने के लिए उसने एक घर का दरवाजा खटखटाया l एक लड़की बाहर आई l संकोचवश उसने खाना तो नहीं माँगा , एक गिलास पानी माँगा l उसे देखकर लड़की समझ गई कि वह बहुत भूखा है , वह एक बड़ा गिलास दूध भरकर ले आई l लड़के ने दूध पी लिया और इसके पैसे के लिए लिए पूछा l लड़की ने मना कर दिया कि हम इस तरह पैसे नहीं लेते l लड़का धन्यवाद देकर चला गया l वर्षों बीत गए l वह लड़की गंभीर रूप से बीमार पड़ी , स्थानीय चिकित्सक सफल नहीं हुए तो उसे शहर के बड़े अस्पताल भेज दिया l वहां विशेषज्ञ चिकित्सक को बुलाया गया , उन्होंने उस लड़की को देखा , रोग की जांच की , उनकी मेहनत रंग लाई और कुछ ही दिनों में वह पूर्ण स्वस्थ हो गई l उसने किसी सहायक से कहकर अस्पताल के कार्यालय से बिल बिल मंगवाया l बिल को देखकर लड़की को लगा कि वह बीमारी से तो बच गई लेकिन अब बिल कैसे भरेगी ? तभी उसकी द्रष्टि बिल के कोने पर लिखे एक सन्देश पर गई , वहां पर लिखा था ---- ' आपको भुगतान करने की कोई आवश्यकता नहीं l एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान वर्षों पहले किया जा चुका है l ' उसे याद आया कि वर्षों पहले उसने जिस बालक को एक गिलास दूध देकर उसकी सहायता की थी , उसी ने उसे संकट से बचाया है l हमें सत्कर्मों का सुफल अवश्य मिलता है चाहे वह संसार में कहीं से भी मिले l
WISDOM ----
एक बार एक अपराधी पकड़ा गया , उसे फाँसी की सजा मिली l फाँसी की कोठरी में जाने से पूर्व , वह राजा को बुरी -बुरी गाली और दुर्वचन कहने लगा l वह विदेशी था , उसकी भाषा को सभा के एक -दो सरदार ही जानते थे l राजा ने विदेशी भाषा जानने वाले एक सरदार से पूछा --- " यह अपराधी क्या कह रहा है ? " उसने उत्तर दिया --- " आपकी प्रशंसा करते हुए , अपनी दीनता बताता हुआ , यह दया की प्रार्थना कर रहा है l " इतने में दूसरा सरदार उठ खड़ा हुआ , उसने कहा --- " नहीं सरकार ! यह झूठ बोलता है l अपराधी ने आपको गाली दी है और दुर्वचन बोले हैं l राजा तो विदेशी भाषा जानता न था और कोई तीसरा आदमी फैसला करने वाला नहीं था l इसलिए सत्य का कैसे पता चले ? राजा ने स्वयं विचार किया और पहले सरदार को ही सत्यवादी कहा तथा अपराधी की सजा कम कर दी l दूसरे सरदार से राजा ने कहा --- " चाहे तुम्हारी बात सत्य अवश्य ही हो , पर उसका परिणाम दूसरों को कष्ट मिलना तथा हमारा क्रोध बढ़ाना है , इसलिए वह सत्य होते हुए भी असत्य जैसी है l और इस पहले सरदार ने चाहे असत्य ही कहा हो , पर उसके फलस्वरूप एक व्यक्ति के जीवन की रक्षा होती है तथा हमारे ह्रदय में दया उपजती है , इसलिए वह सत्य के ही समान है l "
26 October 2022
WISDOM ---
मानव जीवन अनमोल है , ईश्वर ने सबको कोई न कोई विभूति अवश्य दी है l किसी के पास धन -वैभव है , किसी के पास अच्छा स्वास्थ्य , किसी के पास बुद्धि , विद्या ----- l जो कुछ मनुष्य को मिला है , वह उसका महत्त्व नहीं समझता और दुर्बुद्धि के कारण उसका दुरूपयोग करता है ----- एक बार पांच असमर्थ , अपंग लोग एकत्र हुए और कहने लगे कि यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो हम परमार्थ के कार्य करते , पर क्या करें ! अँधा बोला ---- मेरी आँखें होतीं तो जहाँ कहीं बिगाड़ दिखाई देता , उसे सुधारने में लग जाता l लंगड़े ने कहा --- मेरे पैर होते तो दौड़ -दौड़ कर भलाई के कार्य करता l निर्बल ने कहा --- मेरे पास ताकत होती तो अत्याचारियों को मजा चखा देता l निर्धन ने कहा --- मेरे पास धन होता तो दीन -दुखियों के लिए लुटा देता l मूर्ख ने कहा --- विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता चारों ओर विद्या ही विद्या दिखाई देती l वरुण देव ने उनकी बातें सुनी और सच्चाई परखने के लिए उन्होंने सात दिन के लिए उन्हें सशर्त आशीर्वाद दिया l जैसे ही रूप बदला , पाँचों के विचार भी बदल गए l अंधे ने कामुकता की वृत्ति अपना ली l लंगड़ा घूमने निकल पड़ा l धनी ठाठ -बाट एकत्र करने में लग गया l बलवान दूसरों को सताने लगा l विद्वान् ने सबको उल्लू बनाना शुरू कर दिया l वरुण देव लौटे तो देखा वे स्वार्थ सिद्धि में लगे थे l देवता नाराज हुए और वरदान वापस ले लिए l उन्हें जो अनमोल वक्त मिला था वह बीत गया , अब पछताने से क्या होता है ?
25 October 2022
WISDOM -----
चीन का एक अमीर च्यांग भेड़ पालने का धंधा करता था l एक बार उसने दो लड़के नौकर रखे और चराने के लिए भेड़ें बाँट दीं l देखने पर पता चला कि भेड़ें दुबली भी हो गईं और कुछ मर भी गईं l अमीर ने चरवाहों को जिम्मेदार ठहराया और जाँच की कि किस कारण इतनी हानि हुई l पता लगा कि दोनों अपने -अपने व्यसनों में लगे रहे l एक को जुआ खेलने की आदत थी , जब भी दाँव लगता जुए में जा बैठता l भेड़ें कहीं -से -कहीं जा पहुँचती और भूखी -प्यासी कष्ट पातीं l यही बात दूसरे की थी , वह पूजा -पाठ का व्यसनी था l वह भेड़ों पर ध्यान न देता और अपनी रूचि के काम में लगा रहता l दोनों पकड़े गए और न्याय के लिए कन्फ्यूशियस के सामने प्रस्तुत किए गए l दोनों के कारणों में भेद था , पर कर्तव्यपालन की उपेक्षा करने के लिए दोनों समान रूप से दोषी थे l न्यायधीश ने दोनों को समान रूप से दंड दिया और कहा --- " कर्तव्य भाव के बिना जो किया जाता है वह व्यसन है , व्यसन में जुआ खेला या पूजा की l कर्तव्य की तो उपेक्षा की l उसी का दंड दिया गया है l " 'कर्तव्य ही धर्म है l '
23 October 2022
WISDOM
हमारे महाकाव्य हमें जीवन जीना सिखाते हैं l महाभारत में प्रसंग है --- चक्रव्यूह l उस युग में वीरता का एक मापदंड यह था कि युद्ध के लिए कोई ललकारे , चुनौती दे तो उसे स्वीकार करना अनिवार्य था l उस दिन के युद्ध में अर्जुन को एक अन्य राजा ने ललकारा और जहाँ द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह रचा था , उस स्थान से काफी दूर युद्ध के लिए ले गए l अब शेष चारों पांडवों को चक्रव्यूह बेधना नहीं आता था तब अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने कहा , उसने यह विद्या माँ के गर्भ में सीखी है , उसे छह दरवाजे पार करना आता है , फिर आप सभी पांडव और सेना साथ होगी तो हम आज के युद्ध में विजय श्री प्राप्त होगी l इसकी पूरी कथा है कि सात महारथियों ने मिलकर सत्रह वर्षीय अभिमन्यु का वध कर दिया l यह प्रसंग हमें बहुत महत्वपूर्ण शिक्षा देता है --- उस युग में जब भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इस धरती पर थे और अभिमन्यु उनकी बहन सुभद्रा और अर्जुन का पुत्र था , जब उसे सबने मिलकर युद्ध के नियमों के विपरीत छल से मारा तो फिर इस कलियुग की बात क्या कहें ? इस युग में जब मानसिक विकृतियाँ अपने चरम पर हैं तो यह प्रसंग हमें शिक्षा देता है कि ---दुश्मन के और कुटिल व्यक्ति के खेमे में जाने का जोखिम न लो l यदि किसी से दुश्मनी रहने के बाद सुलह हो गई हो , मित्रता हो गई हो तब भी उसका विश्वास न करो क्योंकि बिच्छू अपना स्वाभाव नहीं बदलता है l इतिहास में ऐसे अनेकों प्रसंग है और अनेकों घटनाएँ हम वर्तमान में भी देखते -सुनते हैं कि मित्रता की आड़ में छल -कपट , धोखा मिलता है ,जीवन को भी खतरा रहता है l इतिहास की एक घटना है ---- ओरंगजेब ने जोधपुर के महाराज जसवंतसिंह से मित्रता की और उनके पराक्रम का जी भर कर लाभ उठाया l वह मन ही मन उनकी वीरता से डरता था और जोधपुर पर कब्ज़ा करना चाहता था l औरंगजेब ने महाराज जसवंतसिंह को निरंतर युद्धों में उलझाए रखा जिससे उनका शरीर जर्जर हो गया l काबुल के पठानों के साथ युद्ध में उनके दो पुत्र मारे गए l औरंगजेब बहुत कुटिल और लोभी था उसने उनके अंतिम पुत्र पृथ्वीसिंह को अजमेर का विद्रोह दबाने भेजा , उसने सोचा था की ये अनुभवहीन है , मारा जायेगा लेकिन पृथ्वी सिंह विजयी होकर लौटा l आचार्य श्री लिखते हैं --- दुष्ट की भलाई और अनाचारी का संग करने वाले का कल्याण नहीं होता l ' औरंगजेब ने विजय के उपलक्ष्य में खिल्लत देने के बहाने पृथ्वी सिंह को बुलाया और विष बुझे कपड़े पहनाकर आदर पूर्वक विदा किया l कुमार पृथ्वीसिंह दरबार से अपने निवास स्थान तक भी न जा सके , रास्ते में ही कपड़ों में लगे घातक विष ने अपना काम कर दिया और जसवंत सिंह का दीप्तिमान दीपक अस्त हो गया l ऐसे इतिहास में अनेकों प्रसंग हैं जहाँ हमने जिसका विश्वास किया , उन्ही ने धोखा दिया , छल किया l ऐसे प्रसंग ही हमें सिखाते हैं कि कलियुग में जब दुर्बुद्धि का प्रकोप है तो अपने सामान्य जीवन में भी ऐसे जोखिम न लें जहाँ अपने सम्मान और जीवन को खतरा हो l किसी विद्वान् ने कहा भी है ---प्रेम सब से करो , पर विश्वास किसी का न करो l