एक वृद्धा नियम से चर्च जाती और पादरी का प्रवचन मन लगाकर सुनती , जब भगवान का नाम आता तो बुढ़िया बड़े भक्ति भाव से सिर झुकाती और जब जब शैतान का प्रसंग आता तो भी बुढ़िया उसी भाव से सिर झुकाती l पादरी चकित हुआ l उसकी उत्सुकता बड़ी l वह अपने को रोक नहीं सका l एक दिन प्रवचन समाप्त होते ही चर्च के बाहर बुढ़िया को रोक कर पूछने लगे --- माँ , परमात्मा का नाम आने पर सिर झुकाने की बात तो समझ में आती है , किन्तु शैतान का नाम आने पर जो सिर झुकाती हो यह बात समझ में नहीं आती l ' बुढ़िया बोली --- ' कौन जाने किस वक्त किससे काम पड़ जाए ? '
13 July 2023
11 July 2023
WISDOM -----
ऋषियों का वचन है कि --- दुष्ट लोगों का साथ हमेशा दुःख देने वाला होता है l दुष्ट लोगों का कभी कोई एहसान न ले और उनकी संगत से हमेशा दूर रहे l ' दुष्ट की संगत यदि हम छोड़ भी दें , तो वे अपनी दुष्टता के कारण हमारा पीछा नहीं छोड़ते क्योंकि दूसरों को कष्ट पहुँचाना ही उनका स्वभाव होता है l ---- हकीम लुकमान ने अपने अंतिम समय में अपने बेटे को जीवनोपयोगी शिक्षा देने के लिए उसे एक कोयला और एक चन्दन का टुकड़ा लाने के लिए कहा l वह दोनों को लेकर पिता के पास पहुंचा l पिता ने दोनों को नीचे फेंक देने के लिए कहा l बेटे ने उन्हें नीचे फेंक दिया तो लुकमान ने बेटे से हाथ दिखाने के लिए कहा l फिर वह उसका कोयले वाला हाथ पकड़ कर बोले ---- "बेटा ! देखा तुमने l कोयला पकड़ते ही हाथ काला हो गया l उसे फेंक देने के बाद भी हाथ में कालिख लगी रह गई l गलत लोगों की संगति ऐसी ही दुःखदाई होती है l दूसरी ओर सज्जनों का संग इस चन्दन की लकड़ी की तरह है ---- जो साथ रहते हैं तो दुनुया भर का ज्ञान मिलता है और उनका साथ छूटने पर भी उनके विचारों की महक जीवन भर साथ रहती है l सदैव अच्छे लोगों की संगति में रहना , तुम्हारा जीवन भी सुखद रहेगा l " महाभारत में भी इसी सत्य को बताया गया है ----- दुर्योधन को तो बाल्यकाल से ही शकुनि की संगत मिली इसलिए वह उसके साथ मिलकर पांडवों के विरुद्ध छल , कपट और षडयंत्र करने लगा लेकिन पितामह भीष्म , गुरु द्रोणाचार्य , कृपाचार्य महाज्ञानी , वीर और विद्वान् थे लेकिन दुर्योधन आदि कौरवों की संगति के कारण , और दुर्योधन युवराज था उसके शासन से मिली सुविधाओं को भोगने के कारण वे उसकी हर अनीति और षड्यंत्र का मौन रहकर समर्थन करते रहे l भीष्म पितामह को तो इच्छा मृत्यु का वरदान था , जिस हस्तिनापुर साम्राज्य की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन्होंने ली थी , उसी कौरव वंश का अंत उन्होंने अपनी आँखों से देखा l दुर्योधन की संगत ने उन्हें शर शैया पर पहुंचा दिया l वर्तमान समय में भी हम देखें तो अधिकांश लोग क्षणिक लाभ के लिए , अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए दुष्टों का साथ देते हैं l इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा इसे वे समझ नहीं पाते l जब ईश्वरीय न्याय होता है तब विलाप करते हैं l
10 July 2023
WISDOM ------
संसार में अनेक धर्म और अनेक जातियाँ हैं , इन सभी में अनेक रूढ़िवादी परम्पराएँ और अन्धविश्वास हैं l रूढ़िवादिता में जकड़ा व्यक्ति सबसे पहले अपना और अपने परिवार का ही अहित करता है , वक्त के साथ बदलना नहीं चाहता l ऐसी रूढ़िवादी विचारधारा के साथ जब अहंकार भी जुड़ जाए तब स्थिति और भी विकट हो जाती है l आचार्य श्री लिखते हैं ---- यदि मान्यता उचित है तो उसे करने में कोई परहेज नहीं है लेकिन यदि वह असंगत और अनुचित है तो भले ही वह सदियों से क्यों न चली आ रही हो , उससे परहेज करना ही श्रेयस्कर है , परन्तु इसे करने में विवेक के साथ साहस की भी आवश्यकता है l हमें उचित का वरण करना चाहिए और दुराग्रही मान्यताओं को द्रढ़ता के साथ त्याग देना चाहिए l ' भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बाल -लीला के माध्यम से बताया कि हमें परंपराओं और परिपाटियों में बंधना नहीं चाहिए l ईश्वर चाहते हैं कि हम उन बेड़ियों से निकलें और विवेक व साहस का वरण करें l ----------- ' नंदबाबा इंद्र यज्ञ की तैयारी कर रहे थे l सभी गोप उसी में लगे थे l श्रीकृष्ण ने नंदबाबा से पूछा ---" यह आप क्या कर रहे हैं ? यह शास्त्र सम्मत है या लौकिक ? ' नंदबाबा बोले ---- " बेटा ! इंद्र मेघों के स्वामी हैं l उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम यज्ञ करते हैं l यह क्रम हमारी कुल परंपरा से चला आया है l " श्रीकृष्ण बोले ---- " पिताजी ! यह त्रिविध जगत ईश्वर की स्रष्टि है , उसी की प्रेरणा से मेघ जल बरसाते हैं l इसमें भला इंद्र का क्या लेना -देना ! हम तो सदा वनवासी हैं l हम गौ व गिरिराज का भजन करें l गिरिराज को भोग लगाया जाए व उनकी प्रदक्षिणा की जाए l " नंदबाबा ने वही किया जो उनके लाड़ले पुत्र ने उन्हें विद्वतापूर्ण ढंग से समझाया l स्वर्ग के राजा इंद्र का अहंकार अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था , उस पर चोट पहुंची तो उन्होंने मेघों से कहा ---" ब्रज पर जल की अनंत राशि बरसाओ , वहां जल प्रलय आ जाए l " भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया से जल प्रलय से ओत -प्रोत व्रज की रक्षा गोवर्धन धारण कर की l इंद्र का अहंकार चूर -चूर हो गया l ईश्वर अवतार लेकर अपनी लीलाओं से मानव जाति को प्रेरणा देने , उसे जीवन जीने की कला सिखाने और अपनी चेतना को विकसित करने की प्रेरणा देने के लिए ही इस धरती पर आते हैं l
5 July 2023
WISDOM ----
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान ने कहा है कि कोई भी कार्य बड़ा या छोटा नहीं होता , उस कार्य को करने के पीछे हमारी भावना क्या है , हमारे मनोभाव क्या हैं , इस पर उस का परिणाम निर्भर करता है l यज्ञ को एक सात्विक कर्म माना जाता है लेकिन उसके करने के पीछे यज्ञ करने की भावना क्या है , उसी के अनुरूप उसे परिणाम मिलता है l राम -रावण युद्ध में भगवान श्री राम और रावण दोनों ने ही युद्ध की शुरुआत यज्ञ से की थी l भगवान राम का उदेश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश था l असुरों के आतंक से मानवता की रक्षा करना था l इसके विपरीत रावण का उदेश्य अपने अहंकार का पोषण करना था l जैसे मनोभाव थे वैसा ही परिणाम मिला श्रीराम की विजय हुई और रावण का अपने नाती -पोतों सहित अंत हुआ l पुराण में कथा है कि दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ किया l इस यज्ञ को करने का उनका एकमात्र उदेश्य अपने दंभ का प्रदर्शन करना था l परिणाम स्वरुप माता सती को उस यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी और अंततः भगवान शिव के रूद्र रूप ने उस यज्ञ को विनष्ट कर दिया l
3 July 2023
WISDOM ----
' सच्चे गुरु के लिए सैकड़ों जन्म समर्पित किए जा सकते हैं l सच्चा गुरु वहां पहुंचा देता है , जहाँ शिष्य अपने पुरुषार्थ से कभी नहीं पहुँच सकता l ' केवल गुरु का नाम लेना ही पर्याप्त नहीं है , गुरु के विचारों को अपने जीवन में उतार कर और उसके अनुरूप आचरण कर के ही सच्चा शिष्य बना जा सकता है l गुरु ही हैं जो हमारी चेतना को जगाते हैं ताकि हम अध्यात्म के पथ पर आगे बढ़ सकें l ---- एक प्रसंग है ---नाथ परंपरा में दीक्षित योगी माणिकनाथ के जीवन का l उन्हें अपनी सिद्धियों का बहुत अहंकार हो गया था l उनका आश्रम गुजरात में माणिक नदी के तट पर था l उन दिनों वहां के शासक अहमदशाह थे , वे अपने नाम पर ' अहमदाबाद ' नगर बसाना चाहते थे , इसके लिए उस स्थान का चयन हुआ जहाँ माणिकनाथ का आश्रम था l जब आश्रम के सामने निर्माण कार्य शुरू हुआ तो माणिकनाथ को बहुत गुस्सा आया कि यदि कोई निर्माण कार्य करना था तो हम से पूछ लिया होता l बिना पूछे करने से योगी का अपमान होता है l अब वे अपनी सिद्धियों के बल पर निर्माण कार्य में रूकावट डालने लगे l सुल्तान परेशान होकर उनके पास गए , उनकी बहुत प्रशंसा की और कहा आप तो सिद्धियों के स्वामी है , कार्य में अड़चन डालना आपको शोभा नहीं देता l अपनी प्रशंसा सुनकर योगीजी का अहंकार और बढ़ गया l वे कहने लगे --मैं चाहूँ तो आकाश में उड़ जाऊं , मैं चाहूँ तो तुम्हारे सामने रखे इस गंगासागर लोटे में समा जाऊं , तुमने मेरा अपमान किया ! सुलतान चतुर थे , उन्होंने कहा --- इतनी बड़ी काया और इतना छोटा सा लोटा , आप कैसे इसमें समा सकते हैं , हमें दिखाइए l सुलतान ने उनकी तारीफ़ कर के उन्हें उकसाया l योगी माणिक नाथ भी फूले नहीं समाये l अपनी सिद्धियों का प्रयोग कर के उन्होंने अपने को एकदम लघु बना लिया और लोटे में प्रवेश कर गए l सुल्तान ने अपने दीवान को इशारा किया कि लोटे का मुँह बंद कर दो l अब तो योगी लोटे में बंद बड़ी मुश्किल में फंस गए l अन्दर से धमकी देने लग गए कि मैं तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा , राज्य को नष्ट कर दूंगा l जब सुल्तान नहीं माने तो योगी ने कहा --- सावधान ! मैं लोटा फोड़कर बाहर आ रहा हूँ और तुम्हे सबक सिखाऊंगा l माणिक नाथ वज्रास्त्र का प्रयोग करने को तत्पर हुए , लेकिन यह क्या ! वे तो सब सिद्धियाँ भूल गए क्योंकि उनके गुरु ने उनको पहले ही समझा दिया था कि सामान्य मनुष्य हो या योगी , उसे अहंकार से दूर रहना चाहिए , यदि तुम अहंकार प्रदर्शन करोगे तो संपूर्ण विद्या भूल जाओगे l अपनी ऐसी हालत देखकर योगी रो पड़े और अपने गुरु गोरखनाथ जी का स्मरण किया l बाबा गोरखनाथ जी उनके लोटे में प्रकट हुए और कहा --- अहंकार उचित नहीं है , सुल्तान के काम में विध्न पैदा न करो l इतना कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए l माणिक नाथ ने सुल्तान से निवेदन किया कि लोटे का मुँह खोल दो , मेरे गुरु मुझे समझा गए , अब मैं तुम्हारे कार्य में बाधा नहीं डालूँगा l सुल्तान के संकेत पर लोटे का मुँह खोल दिया गया , वे उससे बाहर आ गए l सुल्तान उनके चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगे l योगी ने उन्हें अभयदान और आशीर्वाद दिया l इसके बाद उसी स्थान पर उन्होंने अपने शरीर का परित्याग कर दिया l उनकी स्मृति में सुलतान ने नगर के परकोटे के एक बुर्ज का नाम माणिक बुर्ज और नगर के मुख्य चौक का नाम माणिक चौक रखा l अहमदाबाद का माणिक बुर्ज और माणिक चौक आज भी योगी माणिकनाथ की याद दिलाते हैं l
1 July 2023
WISDOM --
1 . शिष्य ने पूछा --- " काँसा आवाज करता है , सोना क्यों नहीं ? " गुरु ने उत्तर दिया --- " आडंबर की आवश्यकता निस्सार वस्तुओं को ही पड़ती है l जिनके पास स्व -अर्जित ज्ञान होता है , उन्हें व्यर्थ हल्ला करने की आवश्यकता नहीं होती l "
WISDOM ----
लघु कथा ----गिरगिट , कछुए और गिलहरी में वार्तालाप चल रहा था l अपनी शेखी बघारते हुए गिरगिट बोला ---- "देखो ! मैं कितना चतुर हूँ , जब चाहे अपना रंग बदल लेता हूँ और मेरी असलियत कोई नहीं जान पाता l " कछुआ कहाँ पीछे रहने वाला था , वो कहने लगा ---- " " अरे मित्रों ! मेरी जैसी विशेषता तो किसी में भी नहीं है l बाहर नगाड़े पिटते रहें , पर एक बार मैं अपने खोल में समा जाता हूँ तो मैं अलग और जमाना अलग l " गिलहरी बोली ---- " भाइयों ! मैं तुम दोनों की तरह स्वार्थी और अवसरवादी तो नहीं कि अपने को दुनिया से अलग मानने और मौका देखकर रंग बदलने को कोई गुण मानूँ l मुझे इतना पता है कि ऊँचे उदेश्य के लिए कार्य करने वाली मेरी ही जैसी गिलहरी की पीठ पर भगवान के हाथ पड़े थे l मेरी पीठ पर जो तीन रेखाएं तुम देख रहे हो , वह उन्हीं सत्कार्यों के लिए ईश्वर का वरदान है , जो पीढ़ी -दर -पीढ़ी हमारे साथ चला आ रहा है l " गिरगिट और कछुए के सिर यह सुनकर शरम से झुक गए l