हमारे महाकाव्य जिस युग में भी लिखे गए हों , वे हर युग की समस्याओं के अनुरूप मार्गदर्शक हैं l उनमे हर समस्या का समाधान है l लेकिन कलियुग में लोगों में विवेक या सद्बुद्धि का अभाव होता है इसलिए वो इनसे प्रेरणा लेना ही नहीं चाहते l महर्षि को पता था कि कलियुग में धर्म और जाति के नाम पर बहुत दंगे होंगे , ये मनुष्य की स्वार्थ पूर्ति का साधन होंगे l उन्हें यह भी पता था कि कलियुग में भगवान राम बहुतों के आदर्श होंगे , उनकी पूजा करेंगे इसलिए उन्होंने बताया कि भगवान राम ने शबरी के झूठे बेर खाए , निषादराज से मित्रता की l ईश्वर की निगाह में कोई ऊँच -नीच नहीं है l लेकिन कलियुग में केवल लोग चाहे किसी भी धर्म के हों वे केवल कर्मकांड करते हैं , अपने धर्म की शिक्षाओं पर कोई आचरण नहीं करता l रामायण से एक और सत्य सामने आता ही कि अत्याचारी , अन्यायी से सब लोग डरते तो हैं , लेकिन उन्हें अपने सुख वैभव की बड़ी तीव्र लालसा होती है इसलिए वे अत्याचार , अन्याय को देखते हुए भी अपना मुंह , आंख बंद रखते हैं l केवल विभीषण ने ही उस सुख वैभव का त्याग किया l भगवान राम का साथ तो मानव समाज में से किसी ने नहीं दिया , वे वनवासी थे l उन्होंने रीछ , वानरों की मदद से लंका पर विजय प्राप्त की l रावण का आतंक तो दसों दिशाओं में था , वह स्वयं राक्षसों को भेजता था कि जाओ , ऋषियों के हवन , यज्ञ और सत्कार्यों को नष्ट करो , अत्याचार कर के भय का वातावरण बनाओ जिससे सब नियंत्रण में रहें l
30 July 2023
28 July 2023
WISDOM ------
सम्राट अशोक अपने सेनापति के साथ राज्य में भ्रमण के लिए गए l देखा एक पेड़ के नीचे एक भिक्षुक बैठा है l राजा उससे बात करते रहे फिर अपना सर उसके चरणों में झुकता , दंडवत प्रणाम किया l सेनापति ने यह सब देखा उसे अच्छा नहीं लगा l महल आकर सम्राट से कहा --- आपकी अनुमति हो तो एक बात पूछूं l ' सम्राट ने कहा --पूछो l सेनापति बोला ---- आप इतने बड़े सम्राट हो , सब आपके सामने सिर झुकाते हैं , फिर आपने उस भिक्षुक के चरणों में अपना सिर क्यों रखा ? ' सम्राट ने उस समय कुछ उत्तर नहीं दिया l दूसरे दिन सेनापति को एक थैला दिया और कहा कि इसमें जो सामान है उसे आज बेच आओ l सेनापति ने देखा उसमें चार सिर थे --घोड़े का , भैंसे का , बकरी का और आदमी का l तीन सिर तो बिक गए , आदमी का सिर किसी ने नहीं खरीदा l सेनापति बड़ा परेशान कि सम्राट आखिर क्या बताना चाहते हैं l राजा ने उससे कहा --तुम फिर से बाजार जाओ बिना किसी कीमत के फ्री में ही यह आदमी का सिर किसी को दे दो l सेनापति पुन: बाजार गया लेकिन किसी ने भी उस सिर को नहीं लिया और सेनापति को बुरा -भला कहा कि कोई हम पर हत्या का इल्जाम लगा देगा , इसे तुम ही रखो l सेनापति वापस लौट आया l सम्राट ने उसे समझाया --- यह सिर किसी के काम का नहीं है , इसकी कोई कीमत नहीं है l यह हमारा अहंकार है जो सिर पर चढ़कर बोलता है l अहंकारी व्यक्ति न तो स्वयं चैन से जीता है और न ही दूसरों को चैन से जीने देता है l इस अहंकार को समय रहते मिटा देने में ही कल्याण है क्योंकि यदि इस अहंकार को पोषण नहीं मिला तो यह घाव की भांति रिसने लगता है l
26 July 2023
WISDOM ------
हमारे देश में अनेक महान आत्माओं ने जन्म लिया और हमारी संस्कृति को जीवित रखने का अथक प्रयास किया l आदि शंकराचार्य की इच्छा थी कि इस देश में ज्ञानक्रांति के केंद्र बनें l इसके लिए उन्होंने चार स्थानों का चयन किया ---पूर्व में जगन्नाथपुरी , पश्चिम में द्वारका , उत्तर में बद्रिकाश्रम एवं दक्षिण में श्रंगेरी l इन केन्द्रों को स्थापित करने के लिए धन की आवश्यकता थी l राजा व श्रेष्ठि वर्ग कहते थे कि आप आदेश करें धन की कोई कमी नहीं होगी लेकिन आचार्य का कहना था कि जन सहयोग से कार्य हो l सबके द्वार पहुँचने से ज्ञान का सहज वितरण होगा l इस प्रयास में पद यात्रा करते हुए वे एक गाँव में पहुंचे l वहां कच्चे माकन व फूस की झोंपड़ियाँ थीं l लेकिन आचार्य का यश तो यहाँ तक , जन -जन तक पहुँच गया था l जिसके पास जो था वह बड़ी उदारता से दान कर रहा था l वे लोग सोच रहे थे कि जिन्हें देने के लिए राजा , महाराजा , संपन्न वर्ग उनके पीछे -पीछे घूमते हैं , वे आज हमारे द्वार पर आए हैं , यह हमारा सौभाग्य है l आचार्य एक झोंपड़ी के द्वार पर भिक्षा के लिए पुकार लगाईं l उस झोंपड़ी में एक वृद्धा थी जिसके पति व पुत्र दोनों का ही आकस्मिक निधन हो गया था l उसके स्वयं के भोजन पर संकट था l आचार्य को द्वार पर देख वह झोंपड़ी खंगालने लगी कि वह आचार्य को क्या दे l कुछ भी नहीं था उसके पास ! उसने फिर बाहर झांककर देखा तो आचार्य अभी तक खड़े थे l उसे अपनी गरीबी पर तरस आ रहा था , व्याकुल होकर वह ईश्वर से कहने लगी --- हे ईश्वर ! तूने मुझे इतना गरीब क्यों बनाया ? ईश्वर को उलाहना देते हुए वह फिर ढूंढने लगी कि कुछ तो मिल जाये l इस बार उसे कोने में पड़ा हुआ एक सूखा आंवला मिला l उसने आंवला उठा लिया और बड़े जातन से दौड़ते हुए द्वार पर आई l आचार्य वहीँ खड़े थे l उसने उनके हाथों पर वह सूखा आंवला रख दिया l इस आंवले के रखते ही आचार्य की हथेली पर आँसू की चार बूंदे गिरी l इनमे से दो आँसू वृद्धा के थे और दो आचार्य के l आंवले के रूप में वृद्धा अपनी सम्पूर्ण संपत्ति दान कर रही थी l ऐसी उदारता और ऐसी दरिद्रता के विरल संयोग को देखकर आचार्य भावुक हो गए , उन्होंने विकल होकर माता महालक्ष्मी को पुकारा --- " हे माता ! इस उदारता को सम्पन्नता का वरदान दो ! " उनके मुख से स्वत: स्फुरित स्तवन के स्वर फूटने लगे --------- आचार्य द्वारा किए जाने वाले इस स्तवन के प्रारम्भ होते ही सम्पूर्ण वातावरण में प्रकाश छा गया और सुगंध बिखर गई l स्तवन के पूर्ण होते ही वृद्धा की झोंपड़ी में आकाश से स्वर्ण आंवलों की कनक धाराएँ बरसने लगीं l महालक्ष्मी की कृपा और आचार्य की भक्ति के सभी साक्षी बने l आचार्य द्वारा कहा गया स्तोत्र --- कनकधारा स्तोत्र के नाम से सिद्ध स्तोत्र के रूप में वंदित हुआ l
25 July 2023
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वक्त के साथ सब कुछ बदलता जाता है , यदि कोई परिवर्तन नहीं हुआ है तो वह है मनुष्य की मानसिकता l काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष , महत्वाकांक्षा --- ये सब बुराइयाँ पहले भी मनुष्य में थीं और आज भी हैं l इनका रूप अब और भी अधिक विकृत हो गया है l आज स्थिति ये है कि मनुष्य को मनुष्य से ही डर लगने लगा है l धन -दौलत को इतना अधिक महत्त्व देने के कारण अब रिश्तों का भी महत्त्व नहीं रहा l कब किस पर पशुता हावी हो जाए , कहा नहीं जा सकता l व्यक्ति के भीतर जो बुराइयाँ हैं , वे बड़ी श्रंखलाबद्ध तरीके से समाज को पतन की ओर ले जाती हैं जैसे एक व्यक्ति का स्वभाव षडयंत्र रचने का है , छल , कपट उसके स्वभाव में है तो वह ऐसा किसी एक के साथ नहीं करता , वह अनेक लोगों को अपना निशाना बनाता है l उसके लिए रिश्ते , मित्रता कोई मायने नहीं रखती l लालची व्यक्ति बेईमानी और भ्रष्टाचार को बढाता है l कामी व्यक्ति पूरे समाज को पतन के गर्त में धकेल देता है l कामना , वासना और लोभ की दूषित मानसिकता का परिणाम ही आज की फ़िल्में हैं जिनमे अश्लीलता , अपराध को ऐसे चित्रित किया जाता है कि वह लोगों के दिलो,-दिमाग में बैठ जाती है l भीतर की पशुता को उभारने में फिल्मों का बहुत बड़ा योगदान है l ईश्वर ने मनुष्य को बुद्धि दी है और उसे चयन की स्वतंत्रता दी है l यह मनुष्य को ही चयन करना है कि वह पशु बने या इनसान बने l इस बात का ध्यान अवश्य रखना होगा कि यदि वह पशु बनना पसंद करता है तो वह अपने चारों ओर अपनी ही जैसी प्रवृत्ति के लोगों को आकर्षित करेगा l ऐसे में वह स्वयं , उसका परिवार , उसके अपने कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा l
23 July 2023
WISDOM ------
कहते हैं कोई भी संस्कृति तभी तक जीवित रहती है जब तक उस देश के लोगों का चरित्र श्रेष्ठ होता है l सारे सद्गुण जैसे --सत्य , अहिंसा , कर्तव्यपालन , ईमानदारी , संवेदना , रिश्ते में शुचिता , दया , करुणा , परस्पर प्रेम आदि सभी सद्गुण मिलकर व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं l जब व्यक्ति पतन की राह पर चल देता है तब उसका पतन इतनी तेजी से होता है जैसे कोई गेंद बड़ी तेजी से नीचे गिरती है l पुरुष और नारी से मिलकर ही यह समाज बना है जिसमे अमीर , गरीब , ऊँच -नीच , विभिन्न जाति और धर्म के लोग हैं l अब यह मनुष्य को ही चुनाव करना है कि उसे कौन सी राह पसंद है --- उत्थान की या पतन की l समाज का पतन जब होता है तो चारों दिशाओं से ही होता है --कहीं गरीबी , मज़बूरी , दंगे , युद्ध आदि के समय मौके का फायदा उठाना आदि अनेक कारण है जो पीड़ित को तरक्की की राह में आगे नहीं बढ़ने देते l दूसरी ओर समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो शिक्षित है , समर्थ है लेकिन दूषित सामाजिक वातावरण , अश्लील फिल्म , सस्ते साहित्य का असर और अपनी मानसिक कमजोरियों के कारण स्वेच्छा से ही चारित्रिक पतन के रास्ते पर चल देता है l मुखौटा लगाकर सभ्य होने का ढोंग रचता है l इन सब कारणों से व्यक्ति का आत्मबल कम हो जाता है और पीढ़ी -दर -पीढ़ी पतन होता जाता है l भगवान श्रीकृष्ण का पूरा वंश अति धन वैभव के कारण भोग -विलास में लिप्त हो गया था , वे सब आपस में ही लड़ मरे और पूरी द्वारका समुद्र में डूब गई l आज जरुरी है कि हर व्यक्ति अपने ही अंतर में , अपने ह्रदय में झांके कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने जीवन के कौन से उदाहरण पेश कर के जा रहा है और कौन से संस्कार दे कर जा रहा है l बबूल के पेड़ में कभी आम नहीं लगता l
22 July 2023
WISDOM ----
पुराणों में अनेक कथाएं हैं जिनमें यह बताया गया है कि असुर बड़े तपस्वी होते हैं , वे कठोर तपस्या कर के ईश्वर से वरदान प्राप्त कर लेते हैं l तपस्या से शक्ति तो प्राप्त हो जाती है लेकिन असुर संवेदनहीन होते हैं इसलिए वे अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हैं l असुर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसके बड़े -बड़े सींग हों , डरावनी शक्ल हो l व्यक्ति में यदि दुर्गुण ज्यादा हैं , उसके कर्म दूसरों को कष्ट देने वाले हैं तो वह असुर है l पुराण में कथा है ---- भस्मासुर की l इसने कठिन तपस्या कर के शिवजी से वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख दे , वह भस्म हो जाये l ऐसा वरदान पाकर वह अहंकार से मतवाला हो गया और प्रजा पर अत्याचार करने लगा l असुरता के राज्य की सबसे बुरी बात यह होती है कि वह असुर स्वयं तो प्रजा पर अत्याचार करता है , उसके राज्य में उसके आधीन जितने भी अधिकारी , कर्मचारी और राज्य के अन्य ताकतवर लोग होते है वे अपने -अपने तरीके से प्रजा का शोषण व अत्याचार करते हैं l प्रजा पर दोहरी मार हो जाती है l भस्मासुर के अत्याचार से दुःखी होकर प्रजा ने भगवान से प्रार्थना की कि इस अत्याचारी से हमारी रक्षा करो l क्योंकि कोई भी उसके विरुद्ध एक शब्द बोलता , , उसकी आज्ञानुसार नहीं चलता , वह उसके सिर पर हाथ रख देता और वह व्यक्ति भस्म हो जाता l अहंकार व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है , उसने सोचा कि वह क्यों न शिवजी को ही भस्म कर दे और पार्वती जी से विवाह कर ले l उसके चापलूसों ने भी उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया l अब क्या था , वह चला शिवजी के सिर पर हाथ रखकर उन्हें भस्म करने l शिवजी क्या करें , वरदान देकर वह बंधे थे l अपनी समाधि से उठकर भागे l आगे -आगे शिवजी और पीछे -पीछे भस्मासुर ! भागते -भागते वे विष्णु लोक पहुंचे और भगवान से कहा कि मुझसे वरदान पाकर यह तो मुझे ही भस्म करना चाहता है , अब आप ही कोई तरकीब निकालो , जिससे इस असुर से मुझे और इसकी प्रजा को छुटकारा मिले l विष्णु भगवान मोहिनी रूप बनाकर बैठ गए l जैसे ही भस्मासुर शिवजी का पीछा करते विष्णुलोक पहुंचा , वहां इस मोहिनी रूप को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठा l अब शिव -पार्वती सबको भूलकर वह इस मोहिनी रूप पर बावला हो गया l मोहिनी बने विष्णु जी ने कहा ---मुझे पाना है तो मेरे साथ नृत्य करो जैसी मेरी मुद्रा हो वैसी ही तुम करो l नृत्य करते -करते विष्णु जी ने अपने सिर पर हाथ रखा l भस्मासुर तो मोहिनी रूप में खो चुका था , उसने भी अपने सिर पर हाथ रखा , और वह तत्काल ही भस्म हो गया l शक्ति के साथ सद्बुद्धि और संवेदना भी जरुरी है , अन्यथा वह उसे पाने वाले को भस्मासुर की तरह ही नष्ट कर देती है l