8 October 2017

WISDOM ------ सम्पति कमाना आसान है , लेकिन लोगों को प्रभावित करना , उनके दिलों को जीतना कठिन है

 अब्राहम  लिंकन  ने   एक  बार  अपने  एक  पत्र  की  शुरुआत  में  लिखा  था --- " हर  एक  को  तारीफ  अच्छी  लगती  है  l "
  हर  मनुष्य  के  दिल  की  गहराई  में   यह '  लालसा '  छिपी  होती  है  कि   उसे  सराहा  जाये  l    और  वह  दुर्लभ  व्यक्ति ,  जो   इस  ' लालसा '  को  संतुष्ट  करता  है  ,  लोगों  को  अपने  वश  में  कर  सकता  है   l
 चार्ल्स  श्वाब  एक  ऐसे  व्यक्ति  का  नाम  है  ,  जिसने  सहानुभूति  और  सच्ची  प्रशंसा   के  द्वारा  लोगों  के  दिलों  पर  राज  किया   l  एन्ड्रयु  कारनेगी  ने   चार्ल्स  श्वाब  को  एक  साल  में  दस  लाख  डालर   से  अधिक  की  तनख्वाह  दी  l  इसका  कारण  श्वाब  ने  बताया  कि   वे  लोगों  के  साथ  व्यवहार  करने  की  कला  में  निपुण  थे   l  श्वाब  का  कहना  था  कि   ---- " मैं  मानता  हूँ  कि  मेरी  सबसे  बड़ी  पूंजी   अपने  कर्मचारियों  का  उत्साह  बढ़ाने  की  कला  है   और  मैं   सराहना  और  प्रोत्साहन  के  द्वारा  लोगों  से  सर्वश्रेष्ठ  प्रदर्शन  करवा  लेता  हूँ  l "
       एन्ड्रयु  कारनेगी  गरीबी में  पले  स्काटलैंड  के  किशोर  थे  ,   जिन्होंने  अपनी  नौकरी  की  शुरुआत    दो  सेंट  प्रति  घंटे  काम  से  की  थी    और  बाद  में  उन्होंने    365  मिलियन  डॉलर   दान  में  दिए   l  उन्होंने  जीवन  की  शुरुआत  में  ही  सीख  लिया  था  कि   लोगों  को  प्रभावित  करने  का  इकलौता  तरीका   सामने  वाले  की   इच्छाओं  के  बारे  में  बात  करना  है   l  वे  केवल  चार  साल  तक  ही  स्कूल  गए  थे  , परन्तु  उन्होंने  यह   सीख  लिया  था   कि  लोगों  के  साथ किस  तरह व्यवहार  किया  जाये      l         "                                                                                                                                                                                                                                     

7 October 2017

WISDOM ------ आत्मविश्वास मानव जीवन की दृढ़ पतवार है जो उसे विषमताओं में गतिशील और सुस्थिर बनाये रखती है

   जीवन  में  प्रकाश  देने  वाले  सभी  दीप  बुझ  जाएँ , किन्तु  मनुष्य  के  अन्तर  में  अपने  विश्वास  की  ज्योति  जलती  रहे   तो  वह  गहन  अंधकार  में  भी   अपना  पथ  स्वयं  ढूंढ  निकालेगा  l 
  अहंकार     और     आत्मविश्वास  में  बड़ा  अंतर  है  l   अहंकार  का  आधार  भौतिक  पदार्थ  और  मनोविकार  होते  हैं   l  यह  शोषण ,  निर्दयता   और  पीड़ा  का  कारण  बनता  है   l  हिटलर , मुसोलिनी , तैमूरलंग, नादिरशाह  आदि  में  यही  था   जो  उनके  और  जन  समाज  के  लिए  अहितकर  सिद्ध  हुआ  l
                      ईश्वर  विश्वास  ही  आत्मविश्वास  है   l   आत्मविश्वास  की  इस  ज्योति  को  जलाने  और  प्रज्वलित  रखने  के  लिए   मनुष्य  का  अपने  विकारों ,  चिंता , भय  आदि  पर  नियंत्रण  जरुरी  है   l  यदि  मनुष्य  इन  विकारों  में  जकड़ा  हुआ  है  तो  वह  पराधीन  है ,   ऐसी  पराधीनता  में  आत्मविश्वास  नहीं  होता    l    जब  मनुष्य   अपने  मन   को  नियंत्रण  में  रखता  है   तभी  वह  आत्मविश्वास  की  शक्ति  को  पाता  है  और  इससे  मनुष्य  की  साधारण  शक्तियां   असाधारण  बन  जाती  हैं   l
   स्वामी  विवेकानन्द  ने   अपने  अनुभवों  के  आधार  पर  इसकी  महत्ता   बताते  हुए  श्री  ई. टी. स्टरडी  को  एक  पत्र  में  लिखा  था ---- " हमारे  गुरुदेव  के  शरीर  त्याग  के  बाद  हमलोग  बारह  निर्धन  और  अज्ञात  नवयुवक  थे  l  हमारे  विरुद्ध  अनेक  शक्तिशाली  संस्थाएं  थीं  जो  हमें  नष्ट  करने  का  भरसक  प्रयत्न  कर  रहीं  थीं  l  परन्तु  श्री  रामकृष्ण देव  ने  हम  सबके  भीतर   जो  आत्मविश्वास  की  ज्योति  जलाई  थी  उसके  प्रभाव  से   सारे  अंधकार  नष्ट  हो  गए   और  प्रभु    की    शिक्षाएं  दावानल  की  तरह  फैल   रही  हैं   l  "
       आत्मविश्वास  से बाधाएं  भी  मंजिल  पर  पहुँचने  वाली   सीढियाँ  बन  जाती  हैं   l   प्रसिद्ध  वैज्ञानिक    जगदीश  चन्द्र बसु   पौधों  में  जीवन  है  ,  इस  प्रतिपादन  को  इंग्लैंड  की  वैज्ञानिक  मंडली  के  सम्मुख  प्रयोग  द्वारा  सिद्ध  करने  जा  रहे  थे   l   कुछ  ईर्ष्यालु  लोगों  ने    तीक्षण  जहर  पोटेशियम  सायनाइड  की  जगह  सामान्य  चूर्ण  रख  दिया   l  चूर्ण  के  घोल  की  सुई  पौधे  में  इंजेक्ट  करने  पर   कोई  असर  नहीं  हुआ  ,  तब  उन्होंने  आत्मविश्वास  भरे  स्वर  में  कहा --- 'यदि  इससे  पौधा  नहीं  मरता  है   तो  मैं  भी  नहीं  मरूँगा   और  सारा  चूर्ण  खा  गए   l   ईर्ष्यालुओं  का   मुख  लज्जा  से  नत  हो  गया   l   असली  पोटेशियम  सायनाइड  लाया  गया   और  उन्होंने  सफल  प्रयोग  कर  के  दिखा  दिया   l 
   

6 October 2017

WISDOM ------ अच्छे स्वास्थ्य के लिए परिश्रम जरुरी है















एक  बार   कन्फ्यूशियस  के  शिष्य   चांग हो चांग  भ्रमण  के  लिए  निकले   l  मार्ग  में  उन्होंने  देखा  कि  एक   युवा  माली  कुंए  से  बालटी  से  पानी  निकाल कर   एक - एक  पौधे  में  डाल  रहा  है   l   उन्हें  दया  आई  और  ऐसी  व्यवस्था  करा  दी  कि   एक  जगह  खड़े  होकर  पानी  निकाल  ले  जो  नाली  की  सहायता  से  पेड़ों  में  पहुँच  जाये  l  ऐसी  व्यवस्था  से  माली  को  आराम  तो  हुआ  किन्तु  चलना - फिरना   व  झुकने  आदि  कई  व्यायाम  नही  हो  रहे  थे   l  चांग  एक  बार  फिर  उसी  रास्ते  से  गुजरे  तो  उन्होंने  सोचा  कि  कुएं  में  भाप  से  चलने  वाली  मशीन  डाल  दी  जाये   तो  परिश्रम  बहुत  कम  होगा  और  सब  पेड़ों  को  पानी  भी  मिल  जायेगा  l   यह  प्रस्ताव  भी  स्वीकार  हो  गया , भाप  का  इंजन  लग  गया  और  माली  को  बहुत  आराम  हो  गया  l  
बहुत  दिन  बीत  गए  चांग    की    उस  बगीचे  को  देखने  की  इच्छा  हुई   l  वहां  जाकर  देखा  तो  स्तब्ध  रह  गए  पूरा  बगीचा   सूख    चुका  था  l  माली  को  देखा  तो  उसके  हाथ  सूख  गए ,  टांगे  पतली  हो  गईं,  भोजन  हजम  नहीं  होता  , चेहरा  पीला  पड़  गया  l  चांग  ने  उससे  कहा --- क्या  अभी  भी  बहुत  परिश्रम  करना  पड़ता  है ,  कोई  और  तरकीब  सोचें  ?  
  माली    की    पत्नी  ने  हाथ  जोड़कर  कहा ---' आप  तरकीब  न  सोचें  ,  ऐसी  सलाह   आप  इन्हें   दें  कि     फिर  से  परिश्रम  करने  लगें  l  यह  आराम  ही  बीमारी  का  कारण  है  l ' 
  माली  अपनी  पूर्व  जीवन पद्धति  में  आकर  पुन:  स्वस्थ  हो  गया  l 
  चांग  अपने  एकांगी  चिंतन  पर  बहुत  पछताए  l  यह  समझ  गए  कि  बिना  परिश्रम  के  जीवन  मूल्यहीन  और  नाकारा  हो  जाता  है   l 




















5 October 2017

युवाओं के मार्गदर्शक ----- सुभाषचंद्र बोस

  घटना  उन  दिनों  की  है -----  सुभाषचंद्र  बोस  ने   20  सितम्बर  1920  को   इंग्लैंड  में  आई. सी. एस.  की  परीक्षा  में  सफलता  प्राप्त  की  थी  ,  सफल  छात्रों    की    सूची  में  उनका  स्थान  चौथा  था  l  अंग्रेजी  कम्पोजिशन  में  उन्हें  प्रथम  स्थान  मिला  था ,  उन्होंने  अंग्रेजों  को  उन्ही  की  भाषा  में  धूल  चटा  दी   l   इसके  कुछ  ही  महीनों  बाद  समाचार   पत्र    में   मुखर  पृष्ठ  पर   यह  समाचार   प्रकाशित   हुआ कि   -----
  'सुभाषचंद्र  बोस  ने   आई. सी. एस.  पद  से  त्यागपत्र  दे  दिया ,   22  अप्रैल  1921  का  यह  दिन   भारतीय  इतिहास  में  अमिट  हो  गया  ---  स्वतंत्र  और  सशक्त  भारत  के  निर्माण  के  लिए  उन्होंने  स्वयं  को  समर्पित  कर  दिया  ----------
       एक  अंग्रेज    पुलिस  अधिकारी    जो   सुभाषचंद्र  बोस  से  इंग्लैंड  के  दिनों  से  परिचित  था  ,  उसने  उनके  कमरे  में  प्रवेश  किया  और  कहा ---- ' मिस्टर  सुभाष  ! मेरे  पास  तुम्हारी  गिरफ्तारी  के  लिए  वारंट  है  l " इतना  कहकर  उसने  विचित्र  नजरों  से  उन्हें  देखा  और  कहा ---- " तुम  क्या  हो  सकते  थे  और  क्या  हो  गए   ? "    इस  अंग्रेज  अधिकारी  को  यह  मालूम  था  कि  यदि  आज  वह  आई. सी. एस.  अधिकारी  होते  तो  वह  उनका  अधीनस्थ  होता   l
      उस  अंग्रेज  की  इस  बात  के  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ---  "  ठीक  कहा  तुमने  मिस्टर  ग्रिफिथ  !  मैं  गुलाम  हो  सकता  था  ,  लेकिन  आज  मैं  अपने  देश  की  स्वाधीनता  का  सजग   सिपाही  हूँ  l  '
 अंग्रेज  अधिकारी  ने  कहा --- ' मुझे  तुम्हारे  कमरे  की  तलाशी  लेनी  है  l '    वह  उनके  कमरे  कि  हर  चीज  को  बड़े  ध्यान  से  उलटता - पुलटता   रहा   ---- एक  पुस्तक  थी  जिसमे  स्वामी  विवेकानन्द  के  पत्रों  का  संकलन  था  ,  एक  चांदी  की  डिब्बी  में  कुछ  चूर्ण  जैसा  था ,  उसने  पूछा ---- " यह  क्या  है   मिस्टर  सुभाष  ? '  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ----- "  यह  मेरे  देश  की  मिटटी  है ,  मैं  हर  रोज  इसकी  पूजा  करता  हूँ   इसे  अपने  माथे  पर  लगाता  हूँ   और  देश  की  स्वाधीनता  के   अपने  उद्देश्य  का  स्मरण  करता  हूँ   l  " 
  यह  बात   अंग्रेज  की  समझ  के  बाहर  थीं  l   उनके  चेहरे  पर  प्रसन्नता  के  भाव  देखकर  वह  बोला ---- " तुम्हे  गिरफ्तार  होने  का  जरा  भी  दुःख  नहीं  है  मिस्टर  सुभाष  ? "
  उत्तर  में  उन्होंने  कहा ---- " कष्ट  और  त्याग --- दोनों  स्वराज्य  की  नींव  हैं ,  मिस्टर ग्रिफिथ  l  यदि  देश  के   युवक  उसके  लिए  स्वयं  को  अर्पित  करने  के  लिए  तैयार  हों   तो  स्वतंत्रता  की  कल्पना  को  साकार  होने  में  देर  न  लगेगी  l  " 
  इस   गिरफ्तारी  के  बाद  उन्हें  बर्मा  की  मांडले  जेल  भेज  दिया  गया  l  जेल  की  यातनाएं  उनकी  साधनाओं  में  परिवर्तित  होने  लगीं  ,  यह  जेल  उनके  लिए  तपोभूमि  बन  गई   l   बीतते  समय  के  साथ  वे  सबके  प्रिय   महानायक   नेताजी  बन  गए  l
  भारत  के  युवाओं  ने    उनसे  कहा ---- " इस  विपदा  के  समय  में  जब  पूरा  देश  अंधकार  में  डूबा  है  ,  आपका  व्यक्तित्व   हम  सबके  लिए  प्रकाश  पुंज  है   l  "  नेताजी  सुभाषचंद्र  बोस  आज  भी  राष्ट्र  के  लिए  प्रेरणा  और  प्रकाश  का  अमर  स्रोत  हैं   l
      

2 October 2017

WISDOM ------ गांधीजी अहिंसा को कायरों का नहीं वीरों का भूषण कहा करते थे

 , अहिंसात्मक  प्रतिकार  से  उनका   आशय  था ---- बिना  किसी  को  कष्ट  दिए  ऐसा  नैतिक  दबाव  उत्पन्न  करना  कि  अत्याचारी  को  हारकर  सही  रास्ते  पर  आना  पड़े   l  इसके  लिए  बड़े  साहस ,  संतुलन  और  धैर्य  की  आवश्यकता  है   l
      घटना  1923    की    है  -----  तब  गुजरात  के  पंचमहल  एवं  गोधरा  में   भीषण  साम्प्रदायिक  उपद्रव  हुए  l  वहां  के  बहुसंख्यक  वर्ग  द्वारा  पीड़ित   व्यक्ति  भागकर   महात्मा  गाँधी  के  पास  पहुंचे   और  उन्होंने    अत्याचारियों    द्वारा  किये  गए  अत्याचार  की  शिकायत  उनसे  की   l  बापू  ने  सारी  बातें  ध्यानपूर्वक  सुनी    और  पूछा --- ' तुम  लोगों  ने  इसके  मुकाबले  क्या  किया   ? '
 आगंतुकों  में  से  एक  नेता  जैसे  व्यक्ति  ने  कहा --- '  करते  क्या  ?  आपकी  अहिंसा  का  अर्थ  सुनकर  ! '
 बापू   क्षुब्ध  मन  से  बोले ---- ' मेरी  अहिंसा  ने  यह  थोड़े  ही  कहा  था  कि  तुम  वहां  से   कायरों  की  तरह  भागकर   अपनी  बुजदिली  की   रिपोर्ट  देने  के  लिए  मेरे  पास  आओ  l  मेरी  अहिंसा  तो  साहसपूर्वक  मर - मिटने  का  सन्देश  देती  है  l  तुम  में  यदि  मर  मिटने  का  साहस  नहीं  था    तो  अपने  मन  के  अनुसार  उस  स्थिति  का  मुकाबला  करना  चाहिए  था  l   तुमने  मेरे  मत  को  समझा  नहीं  और  अपने  मत  पर  चलने  की  हिम्मत  नहीं  की  l    जहाँ  किसी  तरह  जान  बचा  लेने  की  भावना  है  ,  खतरों  से  मुंह  मोड़ने  या  भाग  जाने  की  संभावना  है  वहां  अहिंसा  नहीं  हो  सकती  l  अहिंसा   कायरों   की    नहीं   वीरों  की  है " l
        दुष्टता   या   अवांछनीयता    का  दमन  किसी  भी  प्रकार   किया  जाये  ,  ऐसा  ' मन्यु '     अहिंसा  के  अंतर्गत  ही  आता  है   l  क्योंकि    दुष्टों  का ,  अत्याचारी  का  दमन  करने  से   उसके  कारण  पीड़ित  होने  वाले   अधिक  लोगों  को  सुख - चैन  से  रहने  का  अवसर  मिलेगा   l 

1 October 2017

WISDOM ------ जब जागा आत्मबल ------

   विश्व  के  शक्ति भंडार  में  आत्मबल  सर्वोपरि  है  l   जो  अपने  मानवीय  विकारों  पर  नियंत्रण  रखता  है  ,  अपने  आंतरिक  और   बाह्य    जीवन  पर  शासन  करता  है    वही  आत्मबल  संपन्न  हो  जाता  है  और  तब  उस  पर  दैवी   अनुग्रह    अनायास  बरसता  है -------
       चन्द्रगुप्त  जब  विश्वविजय  की  योजना  सुनकर  सकपकाने  लगा   तो  चाणक्य  ने  कहा ----- "  तुम्हारी  दासीपुत्र  वाली  मनोदशा  को    मैं    जानता    हूँ   l   उससे  ऊपर  उठो   l  चाणक्य  के  वरद  पुत्र   जैसी  भूमिका  निभाओ  l  विजय  प्राप्त  कराने  की  जिम्मेदारी   तुम्हारी  नहीं ,  मेरी  है  l "
                     शिवाजी  जब  अपने  सैन्यबल  को  देखते  हुए  असमंजस  में  थे   कि  इतनी  बड़ी  लड़ाई  कैसे  लड़ी  जा  सकेगी  ,  तो  समर्थ  रामदास  ने  उन्हें  भवानी  के  हाथों   अक्षय  तलवार  दिलाई  थी    और  कहा  था ------- "तुम  छत्रपति  हो  गए ,  पराजय  की  बात  ही  मत  सोचो   l "
                     महाभारत  लड़ने  का  निश्चय  सुनकर  अर्जुन  सकपका  गया   और  कहने  लगा ----- "  मैं  अपने  गुजारे  के  लिए  तो  कुछ  भी  कर  लूँगा  ,  फिर  हे  केशव  !  आप  इस  घोर  युद्ध  में   मुझे  नियोजित  क्यों  कर  रहे  हैं  ? '  इसके  उत्तर  में  भगवान  ने  एक  ही  बात  कही ----    "  इन  कौरवों  को  तो  मैंने  पहले  ही   मार    कर   रख  दिया  है  l   तुझे  यदि  श्रेय  लेना  है    तो  आगे  आ ,  अन्यथा  तेरे  सहयोग  के  बिना  भी   वह  सब  हो  जायेगा ,  जो  होने  वाला  है   l   घाटे  में  तू  ही  रहेगा ---- श्रेय  गँवा  बैठेगा   और  उस  गौरव  से  भी  वंचित  रहेगा   ,  जो  विजेता  और  राजसिंहासन    के  रूप  में  मिला  करता  है   l  "
  अर्जुन  ने  वस्तुस्थिति  समझी   और   कहा कि  आपका  आदेश  मानूंगा   l 
    उच्चस्तरीय  प्रतिभाओं  का  पौरुष  जब  कार्यक्षेत्र  में  उतरता  है    तो  न  केवल  कुछ  व्यक्तियों   को ,  वरन  समूचे  वातावरण  को  ही  उलट - पुलट  कर  रख  देता  है   l 

30 September 2017

WISDOM

  आपत्तियों  का  कारन  है  ---- अधर्म  --- जब  मनुष्य  के  मन  में  सद्वृत्तियाँ  रहती  हैं  ,  तो  उनकी  सुगंध  से  दिव्यलोक  भरा - पूरा  रहता  है   और  जैसे  यज्ञ  की  सुगंध  से   अच्छी  वर्षा ,  अच्छा  अन्न  उत्पादन  होता  है  ,  वैसे  ही  जनता  की  सदभावनाओं   के  फलस्वरूप   ईश्वरीय   कृपा   की,  सुख - शांति    की    वर्षा  होती  है     l  यदि  लोगों  के  ह्रदय  छल कपट ,  द्वेष ,  छल  आदि   दुर्भावों  से    भरे   रहें  ,  तो  उनसे  अद्रश्य  लोक   एक  प्रकार  से   आध्यात्मिक    दुर्गन्ध  से    भर  जाते  हैं   l  जैसे   वायु  के  दूषित ,   दुर्गंधित   होने  से  हैजा  आदि  बीमारियाँ   फैलती  हैं   ,  वैसे  ही   पाप वृत्तियों  के  कारण  सूक्ष्म  लोकों  का  वातावरण    गन्दा  हो  जाने  से      युद्ध , महामारी  ,  दरिद्रता ,   अर्थ संकट ,  दैवी  प्रकोप  आदि    उपद्रवों  का   आविर्भाव     होता  है   l