31 December 2019

WISDOM ------- समयानुसार कार्य करना बुद्धिमानी है

   हमारे  पुराणों  की  कथाएं  हमें   नीति   की  शिक्षा  देती  हैं ,  जीवन  जीना  सिखाती  हैं  l   एक  कथा  है -----  समुद्र  मंथन  होना  था  ,  इस  मंथन  से  अमृत  निकाल   कर  पीने  से  देवता  अमर  हो  जाते   लेकिन    यह  कार्य  अकेले  देवताओं  के  वश  का  नहीं  था   l  सब  देवता  भगवान   विष्णु  के  पास  गए   l   तब  विष्णु  भगवान   ने  देवताओं  को  समझाते   हुए  कहा --- देवताओं  !  कोई  भी  बड़ा  कार्य  करना  हो  तो   सबसे  चाहे  वे  शत्रु  ही  क्यों  न  हों , सबसे  मेल - मिलाप  कर  लेना  चाहिए  l  समाज  की  सर्वांगीण  उन्नति  तथा  सुख - शांति  ही  मुख्य  लक्ष्य  है   l  संकट  काल  को  मैत्री पूर्ण  भाव  से  व्यतीत  करना  चाहिए  
   देवताओं  ने  असुरों  के  राजा  बलि   से  मंत्रणा  की  ,   दोनों  में   समझौता  हुआ l     मंदराचल  पर्वत  की   रई   और  वासुकि  नाग  की  नेती  ( रस्सी के रूप में )   समुद्र मंथन  को  उद्दत  हुए  l  बिना  आधार  के  पर्वत  समुद्र  में  डूबने  लगा  तब  स्वयं  भगवान  ने  कच्छप  रूप  में  उसे  अपनी  पीठ  पर  धारण  किया  l
  देवता  लोग  पूँछ   की  तरफ  रहे  और  असुर  वासुकि  नाग  के  मुंह  की  और  थे  l   इस  प्रकार  सबके  मेल - जोल   से  ,  सबके  सहयोग  से  समुद्र  मंथन  होने  लगा  l   सबसे  पहले उग्र  विष  निकला   ,  उसकी  ज्वाला  से  सब  जलने  लगे   तब  देवता  और  दैत्यों  ने  शिवजी  से  प्रार्थना  की   कि   वे  इस  विष  का  पान  करें   l वे  भोले बाबा  हैं  उन्होंने   हलाहल  विष  को  अपने  कंठ  में  धारण  किया  और  नीलकंठ  कहलाए  l
  इसके  बाद  कामधेनु  निकली  जिसे  देवताओं  ने  लिया ,  उच्चै :श्रवा  घोड़ा   दैत्यराज  बलि  को  दिया  गया ,  ऐरावत  हाथी   इंद्र  ने  लिया ,   कौस्तुभ मणि  भगवान  ने ग्रहण की  l  समुद्र मंथन  में  रम्भा  अप्सरा  निकली  जो  देवलोक  चली  गई  l  फिर  लक्ष्मी जी  प्रकट  हुईं  , उन्होंने  विष्णु  भगवान   को  वरण   किया  l  चन्द्रमा , पारिजात  वृक्ष  तथा  शंख  उत्पन्न  हुआ  l   सबसे  अंत  में  धन्वन्तरि  वैद्द्य  अमृत का  घट   लिए  प्रकट  हुए  l   दैत्यों  ने  अमृत  घट   देखा  तो  उसे  झपट  कर  ले  गए  l  और  उसे  पीने  के  लिए  आपस  में  लड़ने  लगे  l
अमृत  दैत्यों  के  हाथ  में  देख  भगवान   ने  विचार  किया    असुर  तो  जन्म  से  ही  क्रूर  स्वाभाव  के  हैं ,  इन्हे  अमृत  पिलाना  सांप  को  दूध  पिलाना  है   l   दुष्टता  का  पोषण  खतरनाक  है ,  दुष्प्रवृतियां   कहीं  भी  हों   उन   को  कुचला   जाना  चाहिए  ,  यदि  ऐसा  नहीं  किया  गया  तो  हमारा  अस्तित्व  खतरे  में  पड़   जायेगा  l  सत्प्रवृत्तियाँ   अर्थात  देवत्व  ही  अमरता   का  अधिकारी  है  l   दुष्टता  का  प्रतिरोध  ईश्वरीय  कार्य  है  l 
विष्णु भगवान   ने  विश्व मोहिनी  रूप  धारण  किया  ,  दैत्य  उनके  सौंदर्य  में  मदहोश  हो  गए   और   मोहिनी   रूप    धारी   भगवान   ने  देवताओं  को  अमृत   पिला    दिया  l
देवता  और  दैत्य  दोनों  ने  ही   एक  ही  कर्म  व  एक  सा  परिश्रम  किया   लेकिन   देवताओं  में  सद्गुण  थे  ,  सद्प्रवृति  थी  इसलिए  ईश्वर  की  कृपा  उन्हें  अमृत   रूप  में  मिली  l 

30 December 2019

WISDOM ----- ' जियो और जीने दो '

  ईश्वर  चाहते  हैं  कि   हम  ' जियो  और  जीने  दो '  के  सिद्धांत  के  अनुसार  स्वयं  भी  सुख पूर्वक  जीवन  यापन  करें   और  दूसरों  को  भी  जीने  दें   l  किन्तु  जब  हम  मोह - वश  इस  व्यवस्था  को   भंग    कर   अपने  और  दूसरों  के  लिए  पतन  और  पीड़ा  का  सृजन  करते  हैं  तब  अपनी  सृष्टि  व्यवस्था  में  संतुलन  स्थापित  करने  के  लिए   प्रभु  अवतरित  होते  हैं  l
  महाभारत  में  प्रसंग  है  ---  जब  भगवान   कृष्ण  कौरव - पांडवों  में  सन्धि   के  लिए  हस्तिनापुर  पहुंचे  तो  उन्होंने  धृतराष्ट्र   से  कहा  कि  आप  पांडवों  को  उनका  न्यायोचित  अधिकार  प्रदान  कर  इस  भयंकर  युद्ध  को  टालिए   l   तब  धृतराष्ट्र  ने  कहा ---  मैंने  और  गांधारी , भीष्म , द्रोणाचार्य , विदुर  सभी  ने  उसे  बहुत  समझाया  ,  वह  बहुत  हठी व  दुष्ट  है , आप  ही  उसे  समझाने   का  प्रयास  करें  l '
   श्रीकृष्ण  ने  दुर्योधन  को  समझाया  कि   ज्यादा  लोभ  अच्छा  नहीं  है  ,  तुम्हे श्रेष्ठ  पुरुषों   जैसा आचरण  करना  चाहिए  l   दुर्योधन  ने  किसी  की  बात  नहीं  मानी  और  कहा  कि   मैं  सुई  की  नोक  बराबर  भूमि  भी  पांडवों  को  नहीं  दे  सकता।  फिर  सभा  से  उठकर  चला  गया  l   तब  श्रीकृष्ण   ने    भीष्म   आदि  को  संबोधित   करते  हुए  कहा ----  दुर्योधन  किसी की  बात  मानता  ही  नहीं ,  अब  कुरुवंश  का   हित    इसी में  है  कि    इस  पर बलपूर्वक    नियंत्रण  कर   इसे  कैद  कर  लिया  जाये   तभी   यह    भयंकर  युद्ध  रुक  सकता  है  l    जिस तरह  शरीर  में  पनपने  वाले   विषैले  फोड़े  को  माँ  बेरहमी  से  निकलवा  देती  है   ,  ताकि  उसके   बच्चे  का  भविष्य  सुखमय  हो  सके    उसी प्रकार  दुष्ट  को  कुल , समाज  व  राष्ट्र  की  भलाई  के  लिए  रास्ते  से  हटा  देना  चाहिए   l   दुष्टता  का  प्रतिरोध  भी  ईश्वरीय  कार्य  का  ही  एक  अंग  है  l 
 धृतराष्ट्र   तो  मोह  में  अंधे  थे , भीष्म  प्रतिज्ञा  से  विवश  थे  ,  कुछ  न  कर  सके  l  उलटे  दुर्योधन  ही  अपने  मंत्रियों  की  सलाह  से  कृष्ण  को  बंदी  बनाने  चला  l   तब  भगवान   ने  अपना  विश्वरूप  दिखाया   l
         दुर्योधन  के  अहंकार  में  पूरा  कुरुवंश  का  अंत  हो  गया  l 

29 December 2019

WISDOM ------ अनीति करने वाले के साथ - साथ वे भी पाप के भागी होते हैं जो उसे चुपचाप देखकर चुप रह जाते हैं , उसे रोकने का प्रयास नहीं करते

     ' महाभारत  तो  होना  ही  था  ,  क्योंकि  दुर्योधन  की  अनीति  और  अन्याय  को  देखकर  उस  समय  के  शिखर  पुरुष   भीष्म  पितामह ,  द्रोणाचार्य   खामोश  रहे  l   जिस  समय  भगवान   श्रीकृष्ण  दूत  बनकर  सन्धि   करने  को  हस्तिनापुर  जा  रहे  थे  ,  द्रोपदी  ने  उन्हें  देखा  तो  कहा ---- " भैया  ! तुम  उनसे  सन्धि   करने  जा  तो  रहे  हो   किन्तु  मेरे  बालों  को  न  भूल  जाना  ,  इन्ही  बालों  को  खींचकर  उन्होंने  एक  अबला  का  अपमान  किया  था  l  "
  तब  श्रीकृष्ण  ने  उत्तर  दिया --- " हे  द्रोपदी  ! चाहे  हिमालय  पर्वत  चलने  लग  पड़े ,  पृथ्वी  सौ   टुकड़े  हो  जाये   और  आकाश  नक्षत्रों  सहित  गिर  पड़े ,  किन्तु  मेरा  वचन  असत्य  नहीं  हो  सकता ,  मैं  उन  आततायियों  से  बदला  लेकर  रहूँगा  l  "  श्रीकृष्ण  ने  जैसा  कहा  वैसा  कर  के  दिखाया   और  दुनिया  के  सामने  एक  ज्वलंत  आदर्श  रख  दिया  l   जब  युद्ध  के  मैदान  में  अपने  संबंधियों   को  देख  अर्जुन  को  मोह  हो  गया   और  वह  युद्ध  करने  से  मना  करने  लगा  तब  भगवान   ने  उसे  गीता  का  उपदेश  दिया   कि ---- हृदय  की  दुर्बलता  और  क्षुद्रता  को  छोड़कर  उठो  और  शत्रुओं  से  जाकर  लड़ो ,  यदि  तुम  क्षात्र   धर्म  का  पालन  नहीं  करोगे  तो  पातकी  कहलाओगे  l   संसार  में  प्रतिष्ठित  व्यक्ति  की  निंदा  मृत्यु  से  भी  भयंकर  है    l  "
    वर्तमान    परिस्थितियों  के  सन्दर्भ  में  पं. श्रीराम  शर्मा  वाङ्मय  ' संस्कृति - संजीवनी  श्रीमद भागवत   एवं  गीता '  में  लिखते  हैं ---- ' हिन्दुस्तान   की  वीर  जाति   का  दुर्भाग्य  है  ,  उसने  स्वदेशाभिमान  और  वीरता  में  विश्वास  के  स्थान  पर   केवल  मात्र   अपने  ही  भाइयों  का  खून  चूसकर  पूंजी  इकट्ठी  करना  सीख  लिया  है  l   ये  भावनाएं  ही  उनमे  कायरता  भर  रही  हैं  l   निरंतर  सुख  निद्रा  में  सोये  रहने  के  कारण   इनमे  देश भक्ति  और  धीरता  के  भाव  ही  जाते  रहे  हैं  l   देश  की  चिंता  के  स्थान  पर  इन्हे  अपनी  पूंजी  की  चिंता  लग  पड़ी  है  l   विपत्ति  काल  में  अपनी  अन्याय  से  कमाई  हुई  पूंजी  के  साथ   कायरों  की  तरह  लुक छिप  जाना  ही  इसने  अपना  आदर्श  समझ  लिया  है   l   इस  बुजदिली  को  जन्म  देने  वाले  अधिकांश  पूंजीपति  हैं   जिन्होंने  गीता  के  पवित्र  सिद्धांतों  को  ठुकरा  कर   समय  से  अनुचित  लाभ  उठाया  है   और  देश  को  हर  संभव   उपाय   से  चूस - चूस  कर  अस्थि  शेष  कर  डाला  है   l 
 आजकल  देश  में  जितनी   अशांति  है  उसका  मुख्य  कारण    व्यक्तियों   का  स्वार्थ  और  दुर्बलता  है    और  दूसरी  और  हमारे  ही  भाई   '  पैसा  गुरुणां   गुरु  '   वाली  कहावत  चरितार्थ  कर  रहे  हैं   l   '

28 December 2019

WISDOM ----- इस संसार में सज्जन को सज्जन तथा दुष्ट को दुष्ट सलाहकार मिल जाते हैं

  श्रीमद भागवत   कथा   शुकदेव जी  ने  राजा  परीक्षित  की  सुनाई   l   इस  कथा  में   प्रसंग  है ---  कंस  की  चचेरी  बहन  देवकी  का  विवाह ,  वसुदेव   से  हुआ  , तब  विदा  के  समय   स्नेहवश  कंस  स्वयं   रथ  हाँक  रहा  था   l  रास्ते  में  आकाशवाणी  हुई  कि   तू  जिसका  रथ  हाँक  रहा  है  ,  उसके  आठवें  पुत्र  द्वारा  ही  तेरा  वध  होगा  l   यह  सुनकर  कंस  तलवार  लेकर  देवकी  को  मारने  दौड़ा  l   तब  वसुदेव   ने  उसे  समझाया  --- मृत्यु  तो  सब  की  निश्चित  होती  है  ,  तुम  अपनी  बहन , जो  तुम्हारी  पुत्री  जैसी  है ,  उसे  मारने  का  कलंक  क्यों  अपने  ऊपर  ले  रहे  हो  l   उन्होंने  कंस  को  बहुत  समझाया  लेकिन  वह  माना  नहीं  l   नीति   कहती  है ---भाग्य  के  नाम  पर   जो  अपने , प्रयास  और  पुरुषार्थ  को  छोड़  बैठते  हैं   वे  दोष  के , पाप  के  भागी  होते  हैं ,  इसलिए  किसी  भी   परिस्थिति  में  से  मार्ग  निकालने   का  प्रयत्न  करना  चाहिए  l '    ऐसा  सोचकर   वसुदेव   ने  कहा --- आपको  देवकी  के  पुत्रों  से  खतरा  है   l  मैं  इसके  पुत्र  होते  ही  आपको  सौंप  दूंगा  l   अपने  मंत्रियों  की  सलाह  से  उसने  देवकी  और  वसुदेव   को   कैद  कर  लिया  और  उसके  सभी  पुत्रों  को  मारता  गया  l    आठवें  पुत्र  के  रूप  में  भगवान   कृष्ण  का  जन्म  हुआ  l  सब  कुछ  ईश्वर  की  लीला  थी  , वसुदेव  कृष्णजी  को  लेकर  गोकुल  गए  , वहां  यशोदा  मैया  के  पास  उन्हें  सुला  दिया  और  उनकी  नवजात  कन्या  को  लेकर  बंदीगृह  में  वापस  आ  गए   l  जब  पहरेदारों  ने  बच्चे  के  रोने  की  आवाज  सुनी  तो  कंस  को  सूचना   दी   l   कंस  भागता  हुआ  आया  (  कोई  कितना  भी  ताकतवर  हो  मृत्यु  से  डरता  है )  और  देवकी  की   गोद    से  कन्या  को  छीनकर  उसे  चट्टान  पर  पटक  दिया  l   वह  कन्या  उसके  हाथ  से  छूटकर  आकाश  में  चली  गई   और  कहा --- अरे  मूर्ख  !  तुझे  मारने  वाला  तो  कहीं  और  पैदा  हो   चुका    है   l
  अब  कंस  ने  यह  सुनकर  अपने  मंत्रियों  को  सलाह  के  लिए  बुलाया  l   शुकदेव जी  कहते  हैं ---- एक  तो  कंस  बुद्धि   स्वयं  भ्रष्ट  थी ,  फिर  उसे  मंत्री  ऐसे  मिले  जो  एक  से  बढ़कर  एक  दुष्ट  थे   l   शुकदेव जी  कहते  हैं --- यदि  हमारा  विवेक  जाग्रत  नहीं  है    तो  दूसरों  की  सलाह  हमें  भटका  सकती  है   l  
  मंत्रियों  की  सलाह  से   कंस  ने    सबने  मिलकर   निर्णय  किया  कि   जहाँ  भी  सत्प्रवृत्तियाँ  होंगी ,  अच्छे  कार्य  होंगे  उन्हें  नष्ट  कर  देंगे   और  सभी  नवजात  शिशुओं  की  हत्या  करने  की  योजना  बनाई  l
  राक्षसों  ने  उत्पात  मचाना  शुरू  कर  दिया  ,  सब  जगह  त्राहि - त्राहि  मच  गई  l
निरपराध   को  सताना   ,  श्रेष्ठता  को  मिटाना   पतन  का  कारण   है   l   कृष्णजी  के  हाथों  कंस  का  वध  हुआ  l 

27 December 2019

WISDOM -------

       महर्षि  व्यास  ने    महाभारत    जैसे  महाकाव्य  की  रचना  के  बाद  यह  अनुभव  किया  कि   यह  पर्याप्त  नहीं  है  l   ज्ञान , विज्ञान   तो  रावण  और  कंस   आदि  राक्षसों  के  पास  भी  था  ,  किन्तु  उनमे  संवेदना ,  आदर्श  परायणता  का  अभाव   होने  से   वह  लाभ  की  जगह  हानिकारक  सिद्ध  हुआ   l  इसलिए  श्री  व्यासदेव  ने   भागवत   की  रचना  की  l    श्रीकृष्ण  कथा   को  ' श्रीमद् भागवत  कथा  '    भी  कहा  जाता  है  l   श्रीकृष्ण  की  विभिन्न  लीलाओं  को  कथा  के  माध्यम  से  बताया   जिससे  लोग  ईश्वर  के  आदर्श  रूप  को  समझें    और  उसको  अपना  कर  अपने  जीवन  को  सफल  बनायें  l 
   कथा  में  बताया  गया  है  कि -----  संसार  में  धर्म  और  अधर्म   दोनों  रहते  हैं  l   कुछ  व्यक्ति  जो  अधर्म   से  ग्रस्त  हो  जाते  हैं   तो  उनके  कारण   संसार  में  दुःख   और  कष्ट  बढ़ते  हैं   l   ऐसे  ही  व्यक्तियों  को   राक्षस ,  दैत्य  और  नर - पिशाच  कहा  जाता  है   l   असुरता  आकृति  पर  नहीं  प्रकृति  पर  आधारित  है   l   निरपराध   लोगों  को  सताना   असुरता  की  पहचान  है    और  असुरता  की  वृद्धि  से  सामूहिक  चेतना  में  व्याकुलता  बढ़  जाती  है  l   भगवान   कृष्ण  के  जन्म  से  पूर्व   असुरता  बहुत  बढ़  गई  थी ,  इसे  समाप्त   करने   के  लिए  भगवान   ने  जन्म  लिया   l   धर्म  के   नाश  और  अधरम  की  वृद्धि  होने  से  सृष्टि  का  संतुलन  बिगड़ता  है    तब   भगवान   जन्म  लेकर    इस  असंतुलन  को  दूर  करते  हैं  और  धर्म  की    होती  है   l 

26 December 2019

WISDOM -----

    मर्यादा  में  रहने  पर   शक्ति , विजय ,  कीर्ति    और  विभूतियाँ  उपलब्ध  होती  हैं   l   उनसे  विचलित   होने  पर   ही  अनिष्ट  होता  है  l  मानवीय  मर्यादाओं  के  उल्लंघन  के  कारण  ही    आज  मानव  एवं   समाज   की  दुर्दशा  हुई  है   l   
  भगवान   राम   के  पास  अतुलनीय  शक्ति  थी   l   उनके  पास  ऐसे   दिव्यास्त्र  थे  कि   पल भर  में  ही  रावण  एवं   लंका  की   सभी  आसुरी  शक्ति  को  ढेर  कर  सकते  थे  , परन्तु  उन्होंने  ऐसा  नहीं  किया  l   सामान्य  रूप  से  अधिक  शक्ति  का  अर्जन  अहंकार  को  जन्म  देता  है  l   शक्ति  का  प्रदर्शन  इसी  दर्प  का  परिणाम  है  l    रावण  इसी  का  जीता  जागता  रूप  था   l   रावण  ने  शक्ति  का  अर्जन  बहुत  किया  था  ,  परन्तु  वह  उसका  लोक कल्याण    के  लिए  उपयोग  करना  भूल  गया  l  वह  अपने  अहंकार  के  प्रदर्शन  में  और  मर्यादाओं  को  छिन्न - भिन्न  करने  में  लग  गया  ,  इसलिए  उसका  अंत  मर्यादा  पुरुषोत्तम  भगवान   राम  के  हाथों  हुआ   l
  भगवान   राम  ने  शक्ति  का  उपयोग  लोकहित   में  किया  ,  नीति   की  स्थापना  के  लिए  किया   ताकि  लोग  इस  राह  पर  चलकर  स्वयं  को  धन्य  मान  सकें   l   यही  तत्व  संसार  में  यश  और  कीर्ति  बढ़ाने  वाला  होता  है   l   यही  कारण  है   भगवन  राम  आज  भी  जन  - जन  के  मन  में  बसे   हैं  l 

25 December 2019

WISDOM ------ धर्मप्राण - महामना पं. मदनमोहन मालवीय

    मालवीय  जी  एक  प्रसिद्ध   सनातन धर्मी  माने  जाते  थे  l   वे  धर्म भक्त , देशभक्त  और  समाज - भक्त  होने  के  साथ   ही  सुधारक  भी  थे  l   पर  उनके  सुधार  कार्यों  में  अन्य  लोगों  से  कुछ  अंतर  था  l  अन्य  सुधारक  जहाँ   समाज  से  विद्रोह , संघर्ष  करने  लग  जाते  हैं   वहां  मालवीय जी  समाज  से  मिलकर  चलने  के  पक्षपाती  थे  l   वे  सुधार  अवश्य  करते  थे  जैसे  उन्होंने   स्वयं  काशी   में  गंगातट  पर  बैठकर   चारों  वर्णों  के  लोगों  को  ---- यहाँ  तक  कि   चाण्डालों  को  भी   मन्त्रों  की  दीक्षा  दी  l   जब  वे  नासिक  गए  तो  गोदावरी  के  तट   पर  हरिजनों  को  दीक्षा  दी  l   -- पर  उन्होंने  यह  कार्य  लोगों  को  समझा - बुझा   कर  और  राजी  कर  के   ही   किया   l
 मालवीय जी  का  मत  था   कि  समाज  से  विद्रोह  कर  के  अथवा  उससे  पृथक  होकर  अपने  नए  रास्ते  पर  चलने  से    कोई  ठोस  कार्य  नहीं  कर  सकते   l   उस  अवस्था  में  समाज  हमारी  बात  पर  ध्यान  ही  नहीं  देगा   वरन  उल्टा  उसका  विरोध  ही  करेगा  l   जिससे  सुधार  का  उद्देश्य  कुछ  भी  पूरा  न   हो  सकेगा  l 
  यही  बात  उन्होंने  अपने   भतीजे  कृष्णकांत  मालवीय  को  लिखी  थी  ,  जब  उन्होंने  विधवाओं  की  समस्या  पर  एक  लेख  ' अभ्युदय '  में  लिखा  l   उसकी  कई  बातें  मालवीय जी  को  अपने  सिद्धांतों  के  विपरीत  जान  पड़ीं   और  उन्होंने  कृष्णकांत जी  को  एक  पत्र   द्वारा  उनकी  भर्त्सना   करते  हुए  लिखा  ----    " तुम  समाज  का  हित   करना  चाहते  हो ,  समाज  की  सेवा  करना  चाहते  हो  ,  किन्तु  समाज  कभी  तुम्हारी  सेवा  स्वीकार  नहीं  करेगा  --- तुमको  सेवा  का  अवसर  ही  नहीं  देगा  l   यदि  तुम  मर्म  की  बातों  में   समाज  की  मर्यादा  का  पालन  नहीं  करोगे   और  समाज  को  मर्मवेधी  वचन  प्रकट  रूप  में  कहकर  दुखित  और  लज्जित  करोगे  l ------ सत्कार्य  का  उत्साह  प्रशंसनीय  है  ,  किन्तु  तभी  जब  वह  मर्यादा   के  भीतर  रहे   l   यदि  उत्साह  की  बाढ़  में   विवेक  और  विचार   को  बह   जाने  दोगे   तो  समाज  का   कुछ  भी  उपकार  न  कर  सकोगे   l   "
  यही   कारण  था  कि   मालवीय  जी  ने  सुधार  के  कार्यों  में  कभी  जल्दबाजी  नहीं  की   l   उनका  कहना  था   कि   जब  हम  समाज  का  सुधार  करना  चाहते  हैं  ,  उसके  कल्याण  के  लिए  प्रयत्न  कर  रहे  हैं   तो  उसके  साथ  रहकर  ही  वैसा  किया  जा  सकता  है   l   समाज  से  लड़कर ,  उसकी  निंदा  , बुराई  कर  के   तो  और  भी  बिगाड़  होगा  ,  सुधार  की  आशा  कैसे  की  जा  सकती  है   ?