पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " सामान्यतया आदमी निष्ठुर जोंक की तरह दूसरों का खून चूस - चूस कर साधन सम्पति बटोरते और क्रुद्ध नाग की तरह उनकी रक्षा करने में जिंदगी खपा देता है l ----- एक जमींदार ने विधवा बुढ़िया का खेत बलपूर्वक छीन लिया l बुढ़िया ने गाँव के सभी लोगों के पास इस अत्याचार से बचाने की पुकार की , पर जमींदार का ऐसा ' दबदबा ' था कि हर कोई स्वयं को बचाने में तत्पर था , जमींदार के सामने मुंह खोलने की हिम्मत ही किसी में नहीं थी l दुःखी बुढ़िया ने स्वयं ही साहस बटोरा और जमींदार के पास यह कहने पहुंची कि खेत नहीं लौटाते तो उसमें से एक टोकरी मिट्टी खोद लेने दे , ताकि कुछ तो मिलने का संतोष हो जाए l जमींदार राजी हो गया और बुढ़िया को साथ लेकर खेत पहुंचा l बुढ़िया रोती जाए और मिट्टी से टोकरी भरती जाए l टोकरी पूरी भर गई तो बहुत भारी हो गई , तो बुढ़िया ने कहा --- ' इसे उठवाकर मेरे सिर पर रखवा दे l ' जमींदार ने अकड़ कर कहा ---- " बुढ़िया ! इतनी सारी मिट्टी सिर पर रखेगी तो दबकर मर जाएगी l " बुढ़िया ने पलटकर पूछा ---- ' यदि इतनी सी मिट्टी से मैं दबकर मर जाऊँगी तो तू पूरे खेत की मिट्टी लेकर जीवित कैसे रहेगा ? " जमींदार से उत्तर देते न बना , अहंकार और लालच ने उसके हृदय की संवेदना को सुखा दिया था l
18 January 2021
17 January 2021
WISDOM ----- शक्ति का सदुपयोग जरुरी है
शक्ति का सदुपयोग वही कर सकता है जिसके हृदय में संवेदना होगी l शरीर बल हो , धन - बल अथवा सत्ता का बल हो --- यदि मन में स्वार्थ , लालच व अहंकार है तो शक्ति के सदुपयोग की कोई संभावना ही नहीं है l रावण बहुत शक्तिशाली था लेकिन ज्ञानी होते हुए भी वह बहुत अहंकारी था , उसने अपनी शक्ति का दुरूपयोग किया , बहुत अत्याचारी था l इसी तरह दुर्योधन बहुत अहंकारी था l उसके पास इतना बड़ा साम्राज्य था , यदि श्रीकृष्ण की बात मानकर पांच गांव दे देता तो उसे कोई नुकसान नहीं होता लेकिन अहंकारी किसी को सुख - चैन से देख नहीं सकता l परिणाम --महाभारत हुआ l आज हम वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं l विज्ञान में असीमित शक्ति है l इस शक्ति के साथ यदि संवेदना नहीं है तो यह मनुष्य जाति का विध्वंस भी कर सकती है l
WISDOM -----
श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं --- दुराचारी के लिए भी उनकी दृष्टि बड़ी सहानुभूतिपूर्ण है l भगवान दुराचारी के तो हो सकते हैं , पर कपटी के कभी नहीं हो सकते l ' मोहि कपट छल छिद्र न भावा l निर्मल मन जन सो मोहि पावा ll श्रीकृष्ण ने कुब्जा का कूबड़ ठीक कर दिया , अनन्य भाव से श्रीकृष्ण उसके हृदय में बसते थे l पर कपट लेकर आई रावण की बहन सूर्पणखा जो कहती थी --- '" तुम सम पुरुष न मो सम नारी " उसे अपनी नाक कटवा कर जाना पड़ा l भगवान कभी छल -कपट पसंद नहीं करते हैं l
16 January 2021
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " दु:संग भले ही कितना मधुर एवं सम्मोहक लगे , किन्तु उसका यथार्थ महाविष की भाँति संघातक होता है l " आचार्य श्री लिखते हैं ----- " यदि किसी दुराचारी को सत्संग और सत्पुरुषों का साथ मिल जाए तो उसका भी कल्याण हो जाता है l " लेकिन सत्संग चाहे वह सत्पुरुषों का हो या सद्विचारों का , ईश्वर की कृपा से ही मिलता है l ---------------------- एक डाकू फकीरों के ---दरवेशों के वेश में डाके डालता था l अपना हिस्सा वह गरीबों में बाँट देता था l हाथ में माला लिए जपता रहता l एक बार उसके दल ने काफिला लूटा l एक व्यापारी के हाथ में ढेर सारा पैसा था l लूट चल रही थी l उसने फकीर को देखा l उसके पास सारा धन लाकर रख दिया l काफिला लुट जाने के बाद जब वह धन लेने पहुंचा तो देखा कि वहां तो लूट का माल बांटा जा रहा है l सरदार वही था जो फकीर ---दरवेश बना हुआ था , उसी के पास व्यापारी का धन था l व्यापारी बोला ---- " हमने तो आपको दरवेश समझा था l आप तो कुछ और ही निकले l हमने डाकुओं के सरदार पर नहीं , फकीर पर , खुदा के बन्दे पर विश्वास किया था l आदमी का भरोसा साधु , फकीर पर से उठना नहीं चाहिए l यह धन आप रखिए , पर आपसे एक निवेदन है कि आप दरवेश के वेश में मत लूटिए l नहीं तो लोगों का विश्वास ही इस वेश पर से उठ जायेगा l वह डाकू तत्काल ही वास्तव में फ़क़ीर बन गया l उसके बाद उसने कभी डाका नहीं डाला l दुराचारी भी सन्मार्ग मिलने पर कल्याण पा जाता है l
15 January 2021
WISDOM ------
विश्व विजय का स्वप्न देखने वाले सिकंदर को मृत्यु के समय जीवन की एक - एक स्मृति मस्तकपटल पर आने लगी l उसे उन दो लड़कियों की स्मृति आ गई , जिनने उसे नैतिक दृष्टि से पराजित कर दिया था l भारत के उत्तर - पश्चिम प्रान्त के एक गाँव के पास उसकी सेनाओं ने डेरा डाला था l गाँव में उत्सव था l ग्रामीण युवक - युवतियों के मोहक नृत्य को देखकर सिकंदर अपनी सुध -बुध खो बैठा l उसने वहीँ भोजन मँगा लिया l दो सुन्दर ग्रामीण युवतियां एक थाली को कीमती चादर से ढक कर लाईं l चादर हटाते ही सिकंदर क्रुद्ध हो उठा l उस थाली में सोने - चांदी के आभूषण थे l युवतियों ने कहा --- " नाराज न हों सम्राट ! हमने सुना है आप इसी के लिए भूखें हैं l इसी के लिए आप हजारों - लाखों को मारकर इतनी दूर से हमारे बीच आए हैं l हमें हमारी जान की चिंता नहीं है l आप यह भोजन स्वीकार करें एवं हमारा सिर काट लें l " कहते हैं इसके बाद सिकंदर विक्षिप्त हो उठा और वापस लौट गया l
WISDOM ----
संकल्पवान व्यक्ति एक दीपक की तरह छोटा ही क्यों न हो , देर - सवेर भगवान किसी न किसी रूप में उसे सहारा देने पहुँच ही जाते हैं l ------- यज्ञ होना था l उसके लिए समिधाओं का ढेर लगा था l ऋषि ने डीप प्रज्वलन का क्रम किया l दीपक को टिमटिमाता देख समिधाओं का ढेर हँसा और बोला ---- " ये छोटा सा दीपक भला हमारा क्या बिगाड़ेगा ? " अग्नि स्थापना का क्रम आया तो दीपक से निकली छोटी सी लौ ने यज्ञ-अग्नि की स्थापना कर दी l आहुतियों के साथ एक - एक कर सभी समिधाएं होम हो गईं l सारी घटना को अंतर्दृष्टि से देखते हुए ऋषि अपने शिष्यों से बोले ---- " प्रखरता चाहे एक लौ के बराबर ही क्यों न हो , वो अकेले तमस के साम्राज्य से टकराने में सक्षम है l हमें भी अपनी तपस्या का प्रकाश इतना प्रबल और उज्ज्वल करना चाहिए कि हम गहन अंधकार के बीच भी अपना मार्ग बना सकें l
14 January 2021
WISDOM -----
सबसे समर्थ कालपुरुष है l समर्थ होते हुए भी भगवान राम ने वनवास का कष्ट सहा l श्रीकृष्ण के यादव कुल का नाश हुआ , नल को राज्य से हटना पड़ा , काल ने किसी को नहीं छोड़ा , भगवान कृष्ण स्वयं दुर्योधन को समझाने गए , वो कुछ समझने को तैयार ही नहीं था , आखिर महाभारत हुआ l ' काल बड़ा बलवान है ' ---- यदि कोई इस सत्य को समझ जाये तो उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाता है l --------- बेताल अवंतिका ( उज्जैन ) के महामात्य थे , बहुत बड़े तांत्रिक थे l उनका जीवन कभी तांत्रिक साधनाओं में बीता , कभी रणभूमि में l सम्राट विक्रमादित्य उनके बिना स्वयं को असहाय महसूस करते थे l लेकिन आज वे स्वयं में लीन थे , अपने आप को विवश महसूस करते हुए सोच रहे थे कि इतने षड्यंत्र - कुचक्र आखिर किसके लिए ? दूसरों को पराजित करने वाला आज महसूस कर रहा था कि सबसे सशक्त कालपुरुष है l मृत्यु से आज तक कोई नहीं बच पाया है l उनके विवेक - चक्षु खुल गए l सांसारिक मोह टूट गया , दंभ मर गया , जीवन भर के पाप आँखों के समक्ष आ रहे थे , मस्तिष्क में मानों हथौड़ों की चोट लग रही थी l उन्होंने राजसी परिधान उतारे , साधारण वेशभूषा पहनी l हाथ में लाठी और उत्तरीय कंधे पर डालकर निकल गए l क्षिप्रा नदी के तट पर खड़े होकर उन्होंने अवंतिका नगरी , भगवान महाकाल को प्रणाम किया और चल पड़े l अभी बीस कदम ही चले थे कि एक ओर से महाकवि कालिदास आ रहे थे l वे पूछ बैठे ---- " बेताल भट्ट ! आज किस कूटनीति के तहत वेश बदलकर जा रहे हैं ? " बेताल बोले ---- " अब मैं अंतिम और निर्णायक युद्ध अपने आप से करने जा रहा हूँ l " कालिदास ने फिर प्रश्न किया --- " किन्तु इस अवंतिका का क्या होगा ? " बेताल बोले ----- " सब व्यर्थ का मोह है l मनुष्य अहंकारवश सोचता है और भावी पीढ़ी के मार्ग में बाधक बनता है l " बेताल आगे बढ़ गए और देश में खबर फ़ैल गई कि महातांत्रिक , राज्य के महामात्य ने वानप्रस्थ लेकर स्वयं को समाजसेवा हेतु समर्पित कर दिया है l