पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---" मनुष्य को सदा अपना विवेक जाग्रत रखना चाहिए l दूसरों की नक़ल कर , बिना अपनी बुद्धि लगाए , वैसा ही करने वाला सदा उपहास का पात्र बनता है l " विज्ञानं ने सारी दुनिया को एक मंच पर ला दिया है l इसके फायदे भी हुए हैं लेकिन जहाँ विवेक का इस्तेमाल नहीं हुआ वहां नुकसान भी बहुत हुआ है l भारतीय संस्कृति जो चरित्र और नैतिक मूल्यों पर टिकी थी , उसका ही पतन हो रहा है l बुद्धिमत्ता इसमें है कि हम अपनी पहचान को बनाये रखें और दूसरे का जो श्रेष्ठ है उसे अपनाएं l विवेकहीन नक़ल कर के कहीं के नहीं रह जाते l ---- दो गधे बोझा उठाये चले जा रहे थे l एक की पीठ पर नमक की और दूसरे की पीठ पर रुई की बोरियां लदी थीं l रास्ते में एक नदी पड़ी l नदी के ऊपर रेत की बोरियों का कच्चा पुल बना था l जिस गधे की पीठ पर नमक की बोरी थीं उसका पैर फिसल गया और वह नदी में गिर पड़ा l नदी में गिरते ही नमक पानी में घुल गया और उसका वजन हल्का हो गया l वह यह बात दूसरे गधे को बड़ी प्रसन्नता से बताने लगा l दूसरे गधे ने सोचा कि बढ़िया युक्ति है , ऐसे तो मैं भी अपना भार हलका कर सकता हूँ और उसने बिना सोचे -समझे पानी में छलांग लगा दी किन्तु रुई के पानी सोख लेने के कारण भार कम होने की जगह बहुत बढ़ गया l ' नक़ल में अक्ल की जरुरत होती है l
13 December 2022
12 December 2022
WISDOM -----
आचार्य गुरुकुल में शिष्यों को पढ़ा रहे थे l एक शिष्य ने प्रश्न किया --- " गुरूजी ! धन , कुटुंब और धर्म में कौन सच्चा सहायक होता है ? " आचार्य बोले --- " वत्स ! धन वह है , जिसे मनुष्य जीवन भर प्रिय समझता है , लेकिन उसकी मृत्यु के बाद धन उसके साथ एक कदम की भी यात्रा नहीं करता l कुटुंब यथा संभव सहायता तो करता है , परंतु उसका सहयोग भी शरीर रहते तक ही है l मात्र धर्म ही ऐसा है , जो लोक और परलोक दोनों में मनुष्य का साथ देता है और उसे दुर्गति से बचाता है l यद्यपि मनुष्य जीते जी इसकी उपेक्षा करता है , तब भी यही धर्म मनुष्य को चिरस्थायी सुख -शांति प्रदान करता है l " यहाँ धर्म का अर्थ वह धर्म नहीं जिसके नाम पर लोग लड़ते हैं l स्वार्थी तत्वों ने धर्म को अपनी स्वार्थ पूर्ति का जरिया बना लिया इसलिए धर्म ही विकृत हो गया l यदि हमें धर्म को समझना है तो भगवान राम और रावण के युद्ध को देखें एक ओर आसुरी तत्वों का प्रतीक रावण था और दूसरी ओर मर्यादापुरुषोत्तम राम थे l महाभारत में कोई साम्प्रदायिकता नहीं थी , वह अधर्म के नाश और धर्म व न्याय की स्थापना के लिए युद्ध था l जिसमे सत्य ,न्याय और सन्मार्ग पर चलने वाले और सच्चे धर्म के प्रतीक पांडव थे तो दूसरी ओर छल , कपट , षड्यंत्र , अपनों का ही हक छीनना , अहंकार से ग्रस्त अधर्मी कौरव थे l यदि संसार में शांति चाहिए तो रामायण और महाभारत की शिक्षाओं को लोगों को जानना होगा और गीता के व्यवहारिक ज्ञान से जीवन जीने की कला सीखनी होगी l
11 December 2022
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- अपने दोष बताने वाले से क्रुद्ध न हों , उसका कारण समझें और उस दोष को दूर करें उस में अपना हित ही है l वे आगे लिखते हैं --- बड़ों की सीख याद रखने वाला अनर्थ से बच जाता है l ' एक कथा है ---- सम्राट वृष मातंग साधुता और शील में अद्वितीय थे लेकिन उन्हें क्रोध बहुत जल्दी आता था l एक बार उनकी परिचारिका ने उनकी सेवा परिचर्या करने से इनकार कर दिया और बोली -- " आपके शरीर से दुर्गन्ध आती है l " सम्राट क्षण भर को क्रोध से उबल पड़े पर तभी उन्हें अपने आचार्य के ये वचन याद आ गए --- " प्रशंसा और निंदा को समभाव से ग्रहण करने वाला ही सच्चा योगी होता है l " अत: वे अपने क्रोध को पी गए और मन में यह निश्चय किया कि यदि शरीर में कोई कमी है तो उसे दूर करेंगे l अपनी निंदा सुनकर हमारे मन में हीन भावना नहीं आनी चाहिए और न ही क्रोधित होना चाहिए l सम्राट ने वैद्यों को बुलाया और दुर्गन्ध का कारण पूछा l शरीर की परीक्षा हुई , पता चला कि उनके दांत में भयंकर रोग हो गया है l यदि एक दो दिन में चिकित्सा नहीं हुई तो वह असाध्य हो जायेगा l समय पर चिकित्सा हुई वे स्वस्थ और दुर्गन्ध रहित हो गए l
WISDOM
एक बार सम्राट अशोक के शासनकाल में अकाल पड़ा l जनता भूख और प्यास से त्रस्त हो उठी l राजा ने तत्काल राज्य में अन्न के भंडार खुलवा दिए l सुबह से लेने वालों का ताँता लगा रहता l एक दिन संध्या हो गई l जब सब लेने वाले निपट गए तो एक बहुत कमजोर बूढ़ा आया और उसने अन्न माँगा l बाँटने वाले तब तक थक चुके थे , उन्होंने उसे डांटकर कहा --' कल आना , अब खैरात बंद हो गई l ' तभी एक ह्रष्टपुष्ट नवयुवक आया और बाँटने वालों से कहा --- " बेचारा बूढ़ा है , शरीर से दुर्बल होने के कारण सबसे पीछे रह गया l इसे अन्न दे दो l " उसकी वाणी का प्रभाव था कि बाँटने वालों ने उसे अन्न दे दिया l उस नवयुवक की सहायता से उसने गठरी बाँध ली l लेकिन उठे कैसे ? तब वही नवयुवक बोला --- 'लाओ , मैं ही पहुंचा देता हूँ l ' गठरी उठाकर चलने लगा l बूढ़े का घर थोड़ी दूर पर ही रह गया था , तभी एक सैनिक टुकड़ी वहां से निकली l टुकड़ी के नायक ने घोड़े पर से उतरकर गठरी ले जाने वाले का फौजी अभिवादन किया l नवयुवक ने संकेत से आगे कुछ बोलने से मना कर दिया l बूढ़े की समझ में कुछ -कुछ आ गया , वह वहीँ खड़ा हो गया और बोला -- " आप कौन हैं , सच -सच बताइए ? " वह व्यक्ति बोला --- " मैं एक नौजवान हूँ और तुम वृद्ध हो दुर्बल हो l बस , इससे अधिक परिचय व्यर्थ है l चलो बताओ तुम्हारा घर किधर है ? ' अब तक बूढ़ा पूरी तरह से पहचान चुका था , वह उनके पैरों पर गिर पड़ा और क्षमा मांगते हुए बोला -- 'प्रजापालक ! आप सच्चे अर्थों में प्रजापालक हैं l "
9 December 2022
WISDOM -----
कर्म करने का व्यक्ति को अधिकार है लेकिन वह उसके परिणाम से बच नहीं सकता l महाभारत का प्रसंग है ---- दुर्योधन के कहने पर दु:शासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया l स्वयं भगवान कृष्ण ने द्रोपदी के चीर को अनंत कर दिया l दु:शासन में दस हजार हाथियों का बल था , वह थक गया , पस्त होकर गिर पड़ा , अपने उद्देश्य में वह तनिक भी सफल नहीं हो पाया l भगवान चाहते तो उसी समय दुर्योधन और दु:शासन का अपने सुदर्शन चक्र से अंत कर देते लेकिन यहाँ ईश्वर ने बताया कि पापियों को दंड तो अवश्य मिलता है , यह कब मिलेगा इसका ईश्वरीय विधान के अनुसार समय निश्चित हैं l द्रोपदी जब भी भगवान को अपने खुले केश दिखाती और कृष्ण जी से कहती -- हे माधव -! वह वक्त कब आएगा जब मैं अपने इन खुले केशों को बांधुंगी l तब कृष्ण जी यही कहते कि केवल दुर्योधन और दु:शासन के अंत के लिए ही अवतार नहीं लिया , अवतार का उद्देश्य है --अधर्म का अंत और धर्म की स्थापना l दैवीय विधान के अनुसार ही सबको अपने कर्मों का फल मिलेगा l पापियों को फलते -फूलते देख सामान्य जन का कर्म विधान से विश्वास हट जाता है और वह भी पाप और अनीति की राह पर चलने लगता है l संसार में ऐसे असंख्य उदाहरण देखकर हमें कर्म फल विधान पर विश्वास रखकर सदा सत्कर्म करने चाहिए l
8 December 2022
WISDOM
लघु -कथा ---- एक ऊंट बड़ा आलसी था l चरने के लिए जंगल जाना और परिश्रम करना उसे बहुत बुरा लगता था l एक बार महादेव और पार्वती वहां से निकले तो ऊंट उनके सामने गरदन झुककर खड़ा हो गया l महादेव जी ने कहा --- 'कहो क्या बात है , क्या चाहते हो ? ' ऊंट ने कहा --. भगवन ! यदि आप प्रसन्न हों तो मेरी गरदन एक योजन लम्बी कर दीजिये जिससे मैं एक ही स्थान पर बैठा -बैठा दूर तक के वृक्षों को चर लिया करूँ , इधर -उधर जाने का कष्ट मुझे न उठाना पड़े l ' महादेव जी ऊंट पर बहुत झल्लाए और उसे समझाया ---" आलस्य का पोषण करने वाला वरदान मांगता है , यह तो तेरे नाश का कारण बन जायेगा l उचित परिश्रम कर के कमाई गई वस्तुएं ही सुखदायक होती हैं l " लेकिन ऊंट ने कुछ भी नहीं समझा , वह गरदन झुकाए एक पैर से खड़ा रहा l पार्वती जी को उस पर दया आई , उन्होंने कहा --आप हजारों प्राणियों को नित्य ही वरदान देते हो , इसे भी दे दीजिए l महादेव जी ने देखा कि यह ऊंट बड़ा जिद्दी है , कुछ समझना नहीं चाहता तो उन्होंने भी कह दिया ' तथास्तु ' l अब ऊंट की गर्दन एक योजन लम्बी हो गई और चैन से उसका समय काटने लगा l लेकिन समय जाते देर नहीं लगती l वर्षा शुरू हुई , कहाँ तक वह पानी में भीगता सो एक लम्बी गुफा में उसने अपनी लम्बी गर्दन को किसी तरह टिका दिया l उसी समय एक श्रगाल भी भीगता हुआ उस गुफा में आ गया l वह भूखा था , उसने समझा यह मांस का इतना बड़ा लट्ठ पड़ा है l वह बहुत खुश हुआ और मजे से उस मान को खाने लगा l एक योजन लम्बी गर्दन को इतनी आसानी से गुफा से निकालना संभव नहीं था , ऊंट वैसे ही आलसी था जब तक प्रयास करता सियार ने उसकी गरदन को फाड़कर दो टुकड़े कर दिए l ऊंट मर गया और सियार को बहुत दिनों का भोजन मिल गया l आलसी और अकर्मण्य व्यक्ति बिना परिश्रम किए बड़ी सम्पदाएँ चाहते हैं l यदि किसी प्रकार वे उन्हें मिल भी जाएँ तो अंत में वे दुःख दायक ही होती हैं l
7 December 2022
WISDOM ----
पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' सामान्य जन प्रेरणा तभी लेते हैं , जब आदर्शों की चर्चा करने वाले , नीतिवेत्ता , नियम बनाने वाले स्वयं भी उनका पालन करें " आज संसार में एक -से -बढ़कर -एक उपदेश देने वाले , प्रवचन करने वाले हैं , जिन्हें सुनने के लिए हजारों , लाखों की भीड़ तो इकट्ठी हो जाती है लेकिन उनके उपदेशों का असर किसी पर भी नहीं होता l इसका कारण यही है कि उनमे से कुछ को छोड़ कर शेष सब उपदेश तो अच्छा देते हैं लेकिन उनकी असलियत सिर्फ ईश्वर ही जानते हैं , उनके उपदेश और आचरण में बहुत अंतर है l यही कारण है कि संसार में इतनी अशांति , इतना तनाव है l संसार को सही राह दिखाने की जिम्मेदारी ईश्वर ने जिनको सौंपी है उनकी राह ---- ? एक इतिहास का प्रसंग है ------ सम्राट बिंबसार का शासनकाल था l एक साल लू बहुत चली , प्रजा के झोंपड़े फूस के बने थे l लोग लापरवाही करने लगे ,इस कारण अग्निकांड की घटनाएँ बहुत अधिक होने लगीं और शासन द्वारा दी जाने वाली सहायता राशि का खरच भी बढ़ गया l लोगों की लापरवाही रोकने के लिए राजाज्ञा प्रसारित हुई कि जिसका घर जलेगा उसे एक वर्ष तक शमशान में रहने का दंड भुगतना पड़ेगा l लोग चौकन्ने हो गए l एक दिन राजा के भूसे के कोठे में आग लगी और देखते ही देखते वह जल गया l समाचार मिलने पर दरबार से राजा को श्मशान में रहने की आज्ञा हुई l दरबारियों ने समझाया कि ---- " नियम तो प्रजा जनों के लिए होते हैं , राजा तो उन्हें बनाता है इसलिए वे उस पर लागू नहीं होते l " परन्तु बिंबसार ने किसी की न मानी और वे एक वर्ष तक फूस की झोंपड़ी बनाकर श्मशान में रहने लगे l समाचार फैला तो सतर्कता सभी ने अपनाई और अग्निकांड का सिलसिला समाप्त हो गया l