30 June 2023

WISDOM ----

  लघु कथा ---- एक  राजा  ने  अपने   राज्य  में  एक  नए  पुरस्कार  की  घोषणा  की  l  मंत्रियों  से  सलाह  करने  पर  उन्होंने  सुझाव  दिया  कि  राज्य  के  किसी  वृद्ध  व्यक्ति  को  यह  सम्मान  दिया  जाये  l   महामंत्री  इस  बात  से  सहमत  नहीं  थे   , उनका  कहना  था  कि   लंबी  उम्र  की  प्रशंसा  करने  से  कोई  उदेश्य  पूर्ण  नहीं  होता  ,  यदि  सम्मान  प्रदान  करना  है   तो  उसको  दिया  जाए  , जिसने  अपने  जीवन  में  सत्कर्म  किए  हों  ,  स्वयं  सन्मार्ग  पर  चला  हो  और  अपने  आचरण  से  लोगों  को    शिक्षा  दी  हो  l "  पर  राजा  ने  महामंत्री  की  बात  नहीं  मानी  और   अपने  चाटुकारों  की  बात  मानकर  एक   व्यक्ति  को  यह  पुरस्कार  देने  की  घोषणा  की  l  वह  व्यक्ति  पूर्व  में  दुर्दांत  अपराधी  था  और  जेल  की  सजा  भी  काट  चुका  था  l  जब  वह  राजदरबार  में  पुरस्कार  लेने  आया  तो  महामंत्री  ने  उसके  निकट  फूलों  को  चढ़ाकर  उन  फूलों  को  प्रणाम  किया  l  राजा  को  महामंत्री  का  यह  व्यवहार  विचित्र  लगा  ,  उन्होंने  इसका  कारण  पूछा   तो  महामंत्री  ने  कहा --- " राजन  !  प्रणाम  मैंने  उन  पुष्पों  को  किया  है  ,  जो  अल्प आयु  में  ही  अपनी  सुगंध   सब  ओर  फैला  जाते  हैं  l  यदि  आपने  किसी  ऐसे  व्यक्ति  को  पुरस्कार  दिया  होता   जिसने  अपना  जीवन   सार्थक  किया  होता   तो  पुरस्कार   की  और  आपकी  गरिमा  रह  जाती  l  " राजा  को  अपनी  गलती  का  भान  हुआ  l 

29 June 2023

WISDOM -----

 1 .    संत  रैदास  की  एक  बार  इच्छा  हुई  कि  वे  चित्तौड़  की  रानी  झाली  के  यहाँ  जाएँ  , जिसने  काशीवास  में   आमंत्रण  दिया  था  l  संत  के  आने  पर  भंडारा  हुआ  l  सभी  विद्वानों  को  आमंत्रित  किया  गया  l  एक  अछूत  चमड़ा  गांठने  वाले  का   इतना  सम्मान  देखकर   ब्राह्मणों  ने  यह  निर्णय  लिया  कि   आवश्यक  खाद्य  सामग्री  लेकर  वे  स्वयं  भोजन  बनाएंगे  l  जब  वे  अलग  से  भोजन  करने  बैठे   तो  देखा   कि  हर  ब्राह्मण  पंडित  की  बगल  में  , एक  रैदास  बैठें  हैं  l  यह  देख  सभी  रैदास  के  चरणों  में  गिर  पड़े  और  क्षमा  मांगी  l  ईश्वर  की  नजर  में  कोई  बड़ा , छोटा , ऊँच -नीच  नहीं  है  l  जाति  और  धर्म  के  आधार  पर  भेदभाव  तो  मनुष्य  ने  अपने  स्वार्थ  और  अहंकार  की  पूर्ति  के  लिए  किया  है  l  

2 .     रामकृष्ण  परमहंस  परस्पर  चर्चा  में  शिष्यों  को  बता  रहे  थे  --- मनुष्यों  में  कुछ  देवता  होते  हैं  ,  शेष  तो  नर पिशाच  ही  होते  हैं  l  नरेंद्र  ने  पूछा --- भला  इन  नर पिशाचों ,  मनुष्यों  और  देवताओं  की  पहचान  क्या  है  ? '  परमहंस जी  ने  कहा ----वे  मनुष्य  देवता  हैं   जो  दूसरों  को  लाभ  पहुँचाने  के  लिए   स्वयं  हानि  उठाने  के  लिए   तैयार  रहते  हैं  l      मनुष्य  वे  हैं   जो  अपना  भी  भला  करते  हैं  और  दूसरों  का  भी   l  नर पिशाच  वे  हैं   जो  दूसरों  की  हानि  ही  सोचते  और  करते हैं  ,  भले  ही  इस   प्रयास  में  उन्हें   स्वयं  भी  हानि  उठानी  पड़े  l "

28 June 2023

WISDOM -----

   लघु कथा ----  एक  गृहस्थ  को  सर्वोत्तम  सौन्दर्य  की  खोज  थी  l  सो  वो  एक  तपस्वी  के  पास  पहुंचे   और  अपनी  जिज्ञासा  प्रकट  की  l  तपस्वी  ने  कहा --- श्रद्धा  है  तो  पत्थर  में  भी  भगवान  हैं , मिटटी  के  ढेले  से  गणेश जी  बन  जाते  हैं  l   एक  भक्त  से  पूछा  , तो  उसने  कहा  --- प्रेम  ही  सुन्दर  है  साँवले  कृष्ण  गोपियों  के  प्राणप्रिय  थे  l  उसका  समाधान  नहीं  हुआ  l  वह  आगे  बढ़ा  तो  उसे  एक  सैनिक  मिला  , जो  युद्ध  भूमि  से  लौट  रहा  था  l  गृहस्थ  ने  उससे  पूछा  ---सच्चा  सौन्दर्य  कहाँ  है   ? "  सैनिक  का  उत्तर  था ----- ' शांति  में  l '  जितने  मुँह  उतनी  बातें  l  निराश  वह  अपने  घर  लौटा  l  दो  दिन  से  उसकी  प्रतीक्षा  में  सभी  व्याकुल  थे  l  उसे  देखकर  दोनों  छोटे  बच्चे  उछल -उछलकर  अपनी  ख़ुशी  प्रकट  कर  उससे  लिपट  गए  l  माँ  की  आँखें  इंतजार  में  रो  -रोकर  सूज  गईं  थीं  , उन्होंने  उसे  ह्रदय  से  लगा  लिया l  पत्नी  के  मुरझाये  चेहरे  पर  ख़ुशी  लौट  आई  l   गृहस्थ  की  सर्वोत्तम  सौन्दर्य  की  खोज  पूरी  हुई  l  वह  कहने  लगा --- मैं  कहाँ  भटक  रहा  था  l  श्रद्धा , प्रेम  और  शांति  --इन  तीनों  के  दर्शन  तो  घर  में  ही  हो  रहे  हैं  l  यही  सबसे  श्रेष्ठ  और   सर्वोत्तम  सौन्दर्य  है  l   

2 . लघु कथा ---  एक  देव मंदिर  का  पुजारी  भगवान  की  पूजा  तो  पूरे  विधि -विधान  से  करता  था  , किन्तु  सुबह -शाम  पूजा  करने  के  बाद   बचे  हुए  समय  में   वह  स्वार्थ  के  वशीभूत  होकर  ऐसे  कर्म  करता   जिससे  अन्य  प्राणी  कष्ट  पाते  l   और  इतना  कर्मकांड  करने  के  बाद  भी  उसके  जीवन  में  सुख -शांति  नहीं  थी  l  बहुत  दुःखी  होकर  एक  दिन  उसने  भगवान  की  प्रार्थना   की --- 'हे  प्रभु  !  बताइए , इतनी  पूजा -पाठ  करने  के  बाद  भी   क्यों  जीवन  में  दुःख  है , अशांति  है  ? ' उसके  ह्रदय  में  बैठे  भगवान  बोले , अंत:करण  से  आवाज  आई  ---' मूर्ख  !मेरी  पूजा  करने  के  बाद  भी  यदि  सेवा  की  इच्छा  न  हो  तो  ऐसी  पूजा  व्यर्थ  है  l  क्या  मैं  इन  पत्थर  की  मूर्तियों   में  ही  हूँ  ,  इन  जीते -जागते  प्राणियों  में  तुझे  मेरा  रूप  नहीं  दीखता   l  मेरी  पूजा  के  बाद  भी  सत्कर्म  करने  की  ,  सन्मार्ग  पर  चलने  की  और  श्रेष्ठ  विचारों   को  मन  में  रमने  की  प्रवृत्ति  नहीं  जागती   तो  ऐसी  पूजा  व्यर्थ  है  l '  अब  पुजारी  को  पूजा  का  सही  अर्थ  समझ  में  आया   और  उसने  पूजा  के  साथ  लोकसेवा  को  अपने  नित्य  कर्म  में  सम्मिलित  किया   l  

27 June 2023

WISDOM -----

     पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं ---- 'प्रशंसा  के  अनेक  भेद  हैं  l    प्रशंसा  को  अपना  स्वार्थ  साधने  के  लिए , अपना  काम  निकालने  के  लिए  , देश-काल-परिस्थिति  का  ज्ञान  किए   बगैर  करने  को   चाटुकारिता  कहा  जाता  है  l    जो  इनसान  चाटुकारिता प्रिय   होता  है  , उसमे  विवेक  का  घोर  अभाव  होता  है   और  वह  बिना  विचारे  अपनी  प्रशंसा  करने  वालों  पर  मेहरबान  हो  जाता  है  l  '  राजतन्त्र  में  राजा  को  खुश  करने  के  लिए  विशेष  रूप  से  चाटुकारों  की  व्यवस्था  की  जाती  थी  l  उनका  काम  ही  था  कि  वे  राजाओं  के  विभिन्न  कार्यों , गुणों  आदि  की  प्रशंसा  करें  l  वे  लोग  बड़े  विशेषज्ञ   होते  थे   और  वही  बोलते  थे  , जो  राजा  को  पसंद  हो  फिर  चाहे  वह  सत्य  हो  या  झूठ  हो  l    वर्तमान  समय  में  चाटुकारिता  का  दायरा  बहुत  व्यापक  हो  गया  है   l  अब  केवल  मुँह  से  बोलकर  ही  चापलूसी  नहीं  होती  l   कहीं  अपार  धन  दे  कर ,   चुनाव  जिताने  में  योगदान  देकर  , अपने  नेता   की  वाहवाही  करने  वालों  की  संख्या  बढ़ाकर   आदि   अनेक  तरीकों  से  चापलूसी  की  जाती  है  l  अपने  अधिकारी  को  खुश  करने  के  लिए   लोग  उनकी  पत्नी  और  बच्चों  तक  की  खुशामद  करते  हैं  l  कहीं  तो  हाल  ऐसा  भी  है  कि  सुबह  जागने  से  रात  को  सुलाने  तक  चापलूस  पीछा  नहीं  छोड़ते  l  इस  कारण  चाहे  छोटा  अधिकारी  हो  या  बड़ा  नेता  ,  उनकी   स्वयं  की  बुद्धि  काम  करना  बंद  कर  देती  है , पूरी  व्यवस्था  चाटुकारों  के  इशारे  पर  चलती  है  l   वर्तमान  युग  में  जब  सम्पूर्ण  विश्व  एक  मंच  पर  है  , चाटुकारिता  का  एक  नया  रूप  संसार  में  है  जो  मानव  सभ्यता  के  लिए  खतरे  की  घंटी  है  l  स्वयं  को  चापलूस  कहलाने  से  कद  कुछ  कम  हो  जाता  है  , इसलिए   जिनके  पास  अपार  धन -वैभव  है ,  वे   उस  धन  का  दान -पुण्य  भी  करते  हैं   लेकिन  इसमें  उनका  नि :स्वार्थ  भाव  नहीं  होता  , वे  अपने  धन  के  बल  पर  बड़े -बड़े  नेताओं ,  अधिकारियों  , संस्थाओं  को  भी  अपने  नियंत्रण  में  कर  लेते  हैं  l  मानव जीवन  के  विभिन्न  क्षेत्रों  से  संबंधित  नीति  निर्धारण  में  भी  उनका  दखल  हो  जाता  है  l  फिर  वे  ही  नीतियाँ   लागू  होती  हैं  जिसमे  उनका  हित  हो , उनकी  संपदा  बढ़े  l  प्रजा   का  हित  उपेक्षित  हो  जाता  है  l  धन  मानव  जीवन  के  लिए  अति  आवश्यक  है   लेकिन  जब   यही  धन  मानव  जीवन  के  विभिन्न  क्षेत्रो ---शिक्षा , चिकित्सा , कृषि , मनोरंजन   आदि  पर  अपना  कब्ज़ा  कर  लेता  है  तो  वह  उसे  व्यवसाय  बन  देता  है   और   व्यापार    का  मुख्य  उदेश्य  ही  लाभ  कमाना  है  l  

25 June 2023

WISDOM ----

 पुराण  में  एक  कथा  है ---- समुद्रमंथन  के  दौरान  भगवान  शिव  ने  जगत  कल्याण  के  लिए  विष  का  पान  कर  लिया  था  l  इससे  उनका  कंठ  नीला  पड़  गया  l  ऐसा  माना  जाता  है  कि  जिस  माह  में  महादेव  ने  विषपान  किया  , वह  सावन  माह  था  l  विषपान  से  भगवान  शिव  के  शरीर  का  ताप  बढ़ने  लगा  ,  जिसे  शांत  करने  के  लिए  देवों  ने  शीतलता  प्रदान  की  ,  लेकिन  इससे  भी  भगवान  शिव  की  तपन  शांत  नहीं  हुई  ,  तब  उन्होंने   शीतलता  पाने  के  लिए   चंद्रमा  को  अपने   सिर  पर  धारण  किया   l  देवराज  इंद्र  ने  घनघोर  वर्षा  की  जिससे   भगवान  शिव  को  शीतलता  मिले  l  इसी  घटना  के  बाद  से   सावन  के  महीने  में   शिवजी  को  प्रसन्न  करने  और  शीतलता  प्रदान  करने  के  लिए  जलाभिषेक  किया  जाता  है  l 

24 June 2023

WISDOM ----

 लघु कथा ---- एक  बार  महाराजा  पुरंजय  ने  राजसूय यज्ञ  का  आयोजन  किया  l  इसमें  उन्होंने  दूर -दूर  से  ऋषि -मुनियों  को  आमंत्रित  किया  l  यज्ञ  की  पूर्णाहुति  का  दिन  आया l  महाराज , महारानी , राजकुमार  सभी  यज्ञ मंडप  में विराजमान  थे  l  वेद  मन्त्रों  की  ध्वनि  से  वातावरण  गुंजित  हो  रहा  था  l  अचानक  एक  किसान  के  रोने  की  आवाज  सुनाई  दी  l  वह  रोते  हुए  कह  रहा  था --- " डाकुओं  ने  मेरी  संपत्ति  लूट  ली  , मेरी  गाय  छिनकर  ले  गए  l  अभी  वे  थोड़ी  ही  दूर  गए  होंगे  ,  राजा  तुरंत  उनको  पकड़कर  मेरी  संपत्ति  दिलाएं  l "  पंडितों  ने  कहा --- "इस  व्यक्ति  को  दूर  ले   जाओ  ,  यदि  राजा   इस  पर  दया  कर  के  पूर्णाहुति  किए  बिना  उठ  गए   तो  देवता  कुपित  हो  जायेंगे  l  "  लेकिन  राजा  किसान  का  रुदन  सुनकर  व्याकुल  हो  गए   और  बोले --- " मेरा  पहला  कर्तव्य  प्रजा  का  संकट  दूर  करना  है  l  मैंने  अनेक  यज्ञ  पूर्ण  किए  हैं  l  आज  मैं  पहली  बार  यज्ञ  पूर्ण  किए  बिना   अपने  राज्य  के  किसान  का  संकट  दूर  करने  जा  रहा  हूँ  l "  उनके  यह  कहने  पर  साक्षात्  यज्ञ  भगवान  प्रकट  हुए   और  बोले -- " राजन  !  तुम्हे  कहीं  जाने  की  आवश्यकता  नहीं  है  l  यह  तुम्हारी  परीक्षा  थी  कि  तुम  अपनी  प्रजा  के  प्रति  कर्तव्य  का  पालन  करते  हो  या  नहीं  l  अब  तुम्हे  सौ  राजसूय  यज्ञों   का  फल  मिलेगा  l  "

23 June 2023

WISDOM ---

  शिष्य  ने  गुरु  से  पूछा --- " शास्त्रों  में  वर्णित  योग  प्रणालियों में  कौन  सी  प्रणाली  सर्वश्रेष्ठ  है  ? "   गुरु  बोले ---- "वत्स  ! प्रणालियाँ  श्रेष्ठ  नहीं  होतीं  ,  उनको    करने  के  पीछे  की  भावना   उन्हें  उचित  स्वरुप  प्रदान  करती  है  l  शरीर  को  हिलाने -डुलाने   का  नाम  योग  नहीं  है  ,  वरन  योग  का  सच्चा  अर्थ  मनुष्य  का  भावनात्मक  संतुलन  है  l  यदि  मनुष्य  कर्म  संस्कारों  का  क्षय  करते  हुए   भावनात्मक  रूप  से   संतुलित  हो  जाता  है  , तभी  वह  सच्चा  योगी  कहलाता  है  l  "           आज  संसार  में  कितने  ही  लोग  योग   करते  हैं  , प्राणायाम  करते  हैं , माला  जपते  हैं   लेकिन  फिर  भी  संसार  में  कितनी  ही  घातक  बीमारियाँ  हैं , सभी  सस्ते , महंगे  अस्पताल , दवाखाने  अस्वस्थ  लोगों  से  भरे  हैं  l  इसके  मूल  में  कारण  यही  है  कि   मनुष्य  का  मन  बड़ा  चंचल  है  l योग , प्राणायाम  करते  समय  मन  में  पवित्र  भाव  होने  चाहिए ,  लेकिन  उसी  समय  सारे  ऊट -पटांग  विचार  मन  में  आते  है l  व्यक्ति  चाहे  किसी  भी  धर्म  का  हो , अपने  भगवान  का  ध्यान  करते  समय , माला  जपते  समय , माला  के  मनगे  तो  खिसकते  जाते  हैं  लेकिन  मन  बड़ी  तेजी  से  कहीं  का  कहीं   भागता  है  l  संसार  में  आकर्षण  इतना  है  कि  मन  को  नियंत्रित  करना  बड़ा  कठिन  है  l  श्रीमद् भगवद्गीता  में  भगवान  कहते  हैं ---- निष्काम  कर्म  से  मन  निर्मल  होता  है  , जन्म -जन्मान्तर  के  कुसंस्कार  कटते  हैं  l   आचार्य श्री  कहते  हैं --- अपने  विचारों  का  परिष्कार  करो , योग , प्राणायाम  के  साथ  मानसिक  पवित्रता  भी  जरुरी  है  l  जो  ऐसा  कर  पाते  हैं   वे  शारीरिक  और  मानसिक  रूप  से  स्वस्थ  भी   होते  जाते  हैं  l