लघु कथा ---- एक राजा ने अपने राज्य में एक नए पुरस्कार की घोषणा की l मंत्रियों से सलाह करने पर उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य के किसी वृद्ध व्यक्ति को यह सम्मान दिया जाये l महामंत्री इस बात से सहमत नहीं थे , उनका कहना था कि लंबी उम्र की प्रशंसा करने से कोई उदेश्य पूर्ण नहीं होता , यदि सम्मान प्रदान करना है तो उसको दिया जाए , जिसने अपने जीवन में सत्कर्म किए हों , स्वयं सन्मार्ग पर चला हो और अपने आचरण से लोगों को शिक्षा दी हो l " पर राजा ने महामंत्री की बात नहीं मानी और अपने चाटुकारों की बात मानकर एक व्यक्ति को यह पुरस्कार देने की घोषणा की l वह व्यक्ति पूर्व में दुर्दांत अपराधी था और जेल की सजा भी काट चुका था l जब वह राजदरबार में पुरस्कार लेने आया तो महामंत्री ने उसके निकट फूलों को चढ़ाकर उन फूलों को प्रणाम किया l राजा को महामंत्री का यह व्यवहार विचित्र लगा , उन्होंने इसका कारण पूछा तो महामंत्री ने कहा --- " राजन ! प्रणाम मैंने उन पुष्पों को किया है , जो अल्प आयु में ही अपनी सुगंध सब ओर फैला जाते हैं l यदि आपने किसी ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार दिया होता जिसने अपना जीवन सार्थक किया होता तो पुरस्कार की और आपकी गरिमा रह जाती l " राजा को अपनी गलती का भान हुआ l
30 June 2023
29 June 2023
WISDOM -----
1 . संत रैदास की एक बार इच्छा हुई कि वे चित्तौड़ की रानी झाली के यहाँ जाएँ , जिसने काशीवास में आमंत्रण दिया था l संत के आने पर भंडारा हुआ l सभी विद्वानों को आमंत्रित किया गया l एक अछूत चमड़ा गांठने वाले का इतना सम्मान देखकर ब्राह्मणों ने यह निर्णय लिया कि आवश्यक खाद्य सामग्री लेकर वे स्वयं भोजन बनाएंगे l जब वे अलग से भोजन करने बैठे तो देखा कि हर ब्राह्मण पंडित की बगल में , एक रैदास बैठें हैं l यह देख सभी रैदास के चरणों में गिर पड़े और क्षमा मांगी l ईश्वर की नजर में कोई बड़ा , छोटा , ऊँच -नीच नहीं है l जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव तो मनुष्य ने अपने स्वार्थ और अहंकार की पूर्ति के लिए किया है l
2 . रामकृष्ण परमहंस परस्पर चर्चा में शिष्यों को बता रहे थे --- मनुष्यों में कुछ देवता होते हैं , शेष तो नर पिशाच ही होते हैं l नरेंद्र ने पूछा --- भला इन नर पिशाचों , मनुष्यों और देवताओं की पहचान क्या है ? ' परमहंस जी ने कहा ----वे मनुष्य देवता हैं जो दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए स्वयं हानि उठाने के लिए तैयार रहते हैं l मनुष्य वे हैं जो अपना भी भला करते हैं और दूसरों का भी l नर पिशाच वे हैं जो दूसरों की हानि ही सोचते और करते हैं , भले ही इस प्रयास में उन्हें स्वयं भी हानि उठानी पड़े l "
28 June 2023
WISDOM -----
लघु कथा ---- एक गृहस्थ को सर्वोत्तम सौन्दर्य की खोज थी l सो वो एक तपस्वी के पास पहुंचे और अपनी जिज्ञासा प्रकट की l तपस्वी ने कहा --- श्रद्धा है तो पत्थर में भी भगवान हैं , मिटटी के ढेले से गणेश जी बन जाते हैं l एक भक्त से पूछा , तो उसने कहा --- प्रेम ही सुन्दर है साँवले कृष्ण गोपियों के प्राणप्रिय थे l उसका समाधान नहीं हुआ l वह आगे बढ़ा तो उसे एक सैनिक मिला , जो युद्ध भूमि से लौट रहा था l गृहस्थ ने उससे पूछा ---सच्चा सौन्दर्य कहाँ है ? " सैनिक का उत्तर था ----- ' शांति में l ' जितने मुँह उतनी बातें l निराश वह अपने घर लौटा l दो दिन से उसकी प्रतीक्षा में सभी व्याकुल थे l उसे देखकर दोनों छोटे बच्चे उछल -उछलकर अपनी ख़ुशी प्रकट कर उससे लिपट गए l माँ की आँखें इंतजार में रो -रोकर सूज गईं थीं , उन्होंने उसे ह्रदय से लगा लिया l पत्नी के मुरझाये चेहरे पर ख़ुशी लौट आई l गृहस्थ की सर्वोत्तम सौन्दर्य की खोज पूरी हुई l वह कहने लगा --- मैं कहाँ भटक रहा था l श्रद्धा , प्रेम और शांति --इन तीनों के दर्शन तो घर में ही हो रहे हैं l यही सबसे श्रेष्ठ और सर्वोत्तम सौन्दर्य है l
2 . लघु कथा --- एक देव मंदिर का पुजारी भगवान की पूजा तो पूरे विधि -विधान से करता था , किन्तु सुबह -शाम पूजा करने के बाद बचे हुए समय में वह स्वार्थ के वशीभूत होकर ऐसे कर्म करता जिससे अन्य प्राणी कष्ट पाते l और इतना कर्मकांड करने के बाद भी उसके जीवन में सुख -शांति नहीं थी l बहुत दुःखी होकर एक दिन उसने भगवान की प्रार्थना की --- 'हे प्रभु ! बताइए , इतनी पूजा -पाठ करने के बाद भी क्यों जीवन में दुःख है , अशांति है ? ' उसके ह्रदय में बैठे भगवान बोले , अंत:करण से आवाज आई ---' मूर्ख !मेरी पूजा करने के बाद भी यदि सेवा की इच्छा न हो तो ऐसी पूजा व्यर्थ है l क्या मैं इन पत्थर की मूर्तियों में ही हूँ , इन जीते -जागते प्राणियों में तुझे मेरा रूप नहीं दीखता l मेरी पूजा के बाद भी सत्कर्म करने की , सन्मार्ग पर चलने की और श्रेष्ठ विचारों को मन में रमने की प्रवृत्ति नहीं जागती तो ऐसी पूजा व्यर्थ है l ' अब पुजारी को पूजा का सही अर्थ समझ में आया और उसने पूजा के साथ लोकसेवा को अपने नित्य कर्म में सम्मिलित किया l
27 June 2023
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- 'प्रशंसा के अनेक भेद हैं l प्रशंसा को अपना स्वार्थ साधने के लिए , अपना काम निकालने के लिए , देश-काल-परिस्थिति का ज्ञान किए बगैर करने को चाटुकारिता कहा जाता है l जो इनसान चाटुकारिता प्रिय होता है , उसमे विवेक का घोर अभाव होता है और वह बिना विचारे अपनी प्रशंसा करने वालों पर मेहरबान हो जाता है l ' राजतन्त्र में राजा को खुश करने के लिए विशेष रूप से चाटुकारों की व्यवस्था की जाती थी l उनका काम ही था कि वे राजाओं के विभिन्न कार्यों , गुणों आदि की प्रशंसा करें l वे लोग बड़े विशेषज्ञ होते थे और वही बोलते थे , जो राजा को पसंद हो फिर चाहे वह सत्य हो या झूठ हो l वर्तमान समय में चाटुकारिता का दायरा बहुत व्यापक हो गया है l अब केवल मुँह से बोलकर ही चापलूसी नहीं होती l कहीं अपार धन दे कर , चुनाव जिताने में योगदान देकर , अपने नेता की वाहवाही करने वालों की संख्या बढ़ाकर आदि अनेक तरीकों से चापलूसी की जाती है l अपने अधिकारी को खुश करने के लिए लोग उनकी पत्नी और बच्चों तक की खुशामद करते हैं l कहीं तो हाल ऐसा भी है कि सुबह जागने से रात को सुलाने तक चापलूस पीछा नहीं छोड़ते l इस कारण चाहे छोटा अधिकारी हो या बड़ा नेता , उनकी स्वयं की बुद्धि काम करना बंद कर देती है , पूरी व्यवस्था चाटुकारों के इशारे पर चलती है l वर्तमान युग में जब सम्पूर्ण विश्व एक मंच पर है , चाटुकारिता का एक नया रूप संसार में है जो मानव सभ्यता के लिए खतरे की घंटी है l स्वयं को चापलूस कहलाने से कद कुछ कम हो जाता है , इसलिए जिनके पास अपार धन -वैभव है , वे उस धन का दान -पुण्य भी करते हैं लेकिन इसमें उनका नि :स्वार्थ भाव नहीं होता , वे अपने धन के बल पर बड़े -बड़े नेताओं , अधिकारियों , संस्थाओं को भी अपने नियंत्रण में कर लेते हैं l मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित नीति निर्धारण में भी उनका दखल हो जाता है l फिर वे ही नीतियाँ लागू होती हैं जिसमे उनका हित हो , उनकी संपदा बढ़े l प्रजा का हित उपेक्षित हो जाता है l धन मानव जीवन के लिए अति आवश्यक है लेकिन जब यही धन मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रो ---शिक्षा , चिकित्सा , कृषि , मनोरंजन आदि पर अपना कब्ज़ा कर लेता है तो वह उसे व्यवसाय बन देता है और व्यापार का मुख्य उदेश्य ही लाभ कमाना है l
25 June 2023
WISDOM ----
पुराण में एक कथा है ---- समुद्रमंथन के दौरान भगवान शिव ने जगत कल्याण के लिए विष का पान कर लिया था l इससे उनका कंठ नीला पड़ गया l ऐसा माना जाता है कि जिस माह में महादेव ने विषपान किया , वह सावन माह था l विषपान से भगवान शिव के शरीर का ताप बढ़ने लगा , जिसे शांत करने के लिए देवों ने शीतलता प्रदान की , लेकिन इससे भी भगवान शिव की तपन शांत नहीं हुई , तब उन्होंने शीतलता पाने के लिए चंद्रमा को अपने सिर पर धारण किया l देवराज इंद्र ने घनघोर वर्षा की जिससे भगवान शिव को शीतलता मिले l इसी घटना के बाद से सावन के महीने में शिवजी को प्रसन्न करने और शीतलता प्रदान करने के लिए जलाभिषेक किया जाता है l
24 June 2023
WISDOM ----
लघु कथा ---- एक बार महाराजा पुरंजय ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया l इसमें उन्होंने दूर -दूर से ऋषि -मुनियों को आमंत्रित किया l यज्ञ की पूर्णाहुति का दिन आया l महाराज , महारानी , राजकुमार सभी यज्ञ मंडप में विराजमान थे l वेद मन्त्रों की ध्वनि से वातावरण गुंजित हो रहा था l अचानक एक किसान के रोने की आवाज सुनाई दी l वह रोते हुए कह रहा था --- " डाकुओं ने मेरी संपत्ति लूट ली , मेरी गाय छिनकर ले गए l अभी वे थोड़ी ही दूर गए होंगे , राजा तुरंत उनको पकड़कर मेरी संपत्ति दिलाएं l " पंडितों ने कहा --- "इस व्यक्ति को दूर ले जाओ , यदि राजा इस पर दया कर के पूर्णाहुति किए बिना उठ गए तो देवता कुपित हो जायेंगे l " लेकिन राजा किसान का रुदन सुनकर व्याकुल हो गए और बोले --- " मेरा पहला कर्तव्य प्रजा का संकट दूर करना है l मैंने अनेक यज्ञ पूर्ण किए हैं l आज मैं पहली बार यज्ञ पूर्ण किए बिना अपने राज्य के किसान का संकट दूर करने जा रहा हूँ l " उनके यह कहने पर साक्षात् यज्ञ भगवान प्रकट हुए और बोले -- " राजन ! तुम्हे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है l यह तुम्हारी परीक्षा थी कि तुम अपनी प्रजा के प्रति कर्तव्य का पालन करते हो या नहीं l अब तुम्हे सौ राजसूय यज्ञों का फल मिलेगा l "
23 June 2023
WISDOM ---
शिष्य ने गुरु से पूछा --- " शास्त्रों में वर्णित योग प्रणालियों में कौन सी प्रणाली सर्वश्रेष्ठ है ? " गुरु बोले ---- "वत्स ! प्रणालियाँ श्रेष्ठ नहीं होतीं , उनको करने के पीछे की भावना उन्हें उचित स्वरुप प्रदान करती है l शरीर को हिलाने -डुलाने का नाम योग नहीं है , वरन योग का सच्चा अर्थ मनुष्य का भावनात्मक संतुलन है l यदि मनुष्य कर्म संस्कारों का क्षय करते हुए भावनात्मक रूप से संतुलित हो जाता है , तभी वह सच्चा योगी कहलाता है l " आज संसार में कितने ही लोग योग करते हैं , प्राणायाम करते हैं , माला जपते हैं लेकिन फिर भी संसार में कितनी ही घातक बीमारियाँ हैं , सभी सस्ते , महंगे अस्पताल , दवाखाने अस्वस्थ लोगों से भरे हैं l इसके मूल में कारण यही है कि मनुष्य का मन बड़ा चंचल है l योग , प्राणायाम करते समय मन में पवित्र भाव होने चाहिए , लेकिन उसी समय सारे ऊट -पटांग विचार मन में आते है l व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो , अपने भगवान का ध्यान करते समय , माला जपते समय , माला के मनगे तो खिसकते जाते हैं लेकिन मन बड़ी तेजी से कहीं का कहीं भागता है l संसार में आकर्षण इतना है कि मन को नियंत्रित करना बड़ा कठिन है l श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कहते हैं ---- निष्काम कर्म से मन निर्मल होता है , जन्म -जन्मान्तर के कुसंस्कार कटते हैं l आचार्य श्री कहते हैं --- अपने विचारों का परिष्कार करो , योग , प्राणायाम के साथ मानसिक पवित्रता भी जरुरी है l जो ऐसा कर पाते हैं वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ भी होते जाते हैं l