26 July 2023

WISDOM ------

   हमारे  देश  में  अनेक  महान  आत्माओं  ने  जन्म  लिया  और  हमारी  संस्कृति  को  जीवित  रखने  का  अथक  प्रयास  किया  l  आदि शंकराचार्य  की  इच्छा  थी  कि  इस  देश  में  ज्ञानक्रांति  के  केंद्र  बनें  l  इसके  लिए  उन्होंने  चार  स्थानों  का  चयन  किया ---पूर्व  में  जगन्नाथपुरी , पश्चिम  में  द्वारका ,  उत्तर  में  बद्रिकाश्रम एवं  दक्षिण  में  श्रंगेरी  l   इन  केन्द्रों  को  स्थापित  करने  के  लिए  धन  की  आवश्यकता  थी  l  राजा  व  श्रेष्ठि  वर्ग   कहते  थे  कि  आप  आदेश  करें  धन  की  कोई  कमी  नहीं  होगी   लेकिन  आचार्य  का  कहना  था  कि  जन  सहयोग  से  कार्य  हो  l  सबके  द्वार  पहुँचने  से  ज्ञान  का  सहज  वितरण  होगा  l  इस  प्रयास  में  पद  यात्रा  करते  हुए  वे  एक  गाँव  में   पहुंचे  l  वहां  कच्चे  माकन  व  फूस  की  झोंपड़ियाँ  थीं  l  लेकिन  आचार्य  का  यश  तो  यहाँ  तक , जन -जन  तक  पहुँच  गया  था  l  जिसके  पास  जो  था  वह  बड़ी  उदारता  से  दान  कर  रहा  था  l  वे  लोग  सोच  रहे  थे  कि  जिन्हें  देने  के  लिए  राजा , महाराजा , संपन्न  वर्ग  उनके  पीछे -पीछे  घूमते  हैं  , वे   आज  हमारे  द्वार  पर  आए  हैं , यह  हमारा  सौभाग्य  है  l   आचार्य  एक  झोंपड़ी  के   द्वार  पर    भिक्षा  के  लिए  पुकार  लगाईं  l  उस  झोंपड़ी  में  एक  वृद्धा  थी  जिसके  पति  व  पुत्र  दोनों  का  ही  आकस्मिक  निधन  हो  गया  था  l  उसके  स्वयं  के  भोजन  पर  संकट  था  l  आचार्य  को  द्वार  पर  देख  वह  झोंपड़ी  खंगालने  लगी   कि  वह  आचार्य  को  क्या  दे  l  कुछ  भी  नहीं  था  उसके  पास  !  उसने  फिर  बाहर  झांककर  देखा  तो  आचार्य  अभी  तक  खड़े  थे  l  उसे  अपनी  गरीबी  पर  तरस  आ  रहा  था  , व्याकुल  होकर  वह  ईश्वर  से  कहने  लगी  --- हे  ईश्वर  !  तूने  मुझे  इतना  गरीब  क्यों  बनाया  ?  ईश्वर  को  उलाहना  देते  हुए  वह  फिर  ढूंढने  लगी  कि  कुछ  तो  मिल  जाये  l  इस  बार  उसे  कोने  में  पड़ा  हुआ  एक  सूखा  आंवला  मिला  l  उसने  आंवला  उठा  लिया  और  बड़े  जातन   से  दौड़ते  हुए  द्वार  पर  आई   l  आचार्य  वहीँ  खड़े  थे  l  उसने  उनके  हाथों  पर  वह  सूखा  आंवला  रख  दिया  l  इस  आंवले  के  रखते  ही  आचार्य  की  हथेली  पर  आँसू  की  चार  बूंदे  गिरी  l  इनमे  से  दो  आँसू   वृद्धा    के  थे  और  दो  आचार्य  के  l  आंवले  के  रूप  में   वृद्धा    अपनी  सम्पूर्ण  संपत्ति  दान  कर  रही   थी  l    ऐसी  उदारता  और  ऐसी  दरिद्रता  के   विरल   संयोग  को  देखकर   आचार्य  भावुक  हो  गए  , उन्होंने  विकल  होकर   माता  महालक्ष्मी  को  पुकारा  --- "  हे  माता  ! इस  उदारता  को  सम्पन्नता  का  वरदान  दो  ! "  उनके  मुख  से  स्वत:  स्फुरित  स्तवन  के  स्वर  फूटने  लगे  --------- आचार्य  द्वारा  किए  जाने  वाले  इस  स्तवन  के  प्रारम्भ  होते  ही   सम्पूर्ण  वातावरण  में  प्रकाश  छा  गया   और  सुगंध  बिखर  गई  l  स्तवन  के  पूर्ण  होते  ही    वृद्धा    की  झोंपड़ी  में  आकाश  से  स्वर्ण  आंवलों  की  कनक धाराएँ  बरसने  लगीं  l  महालक्ष्मी  की  कृपा  और  आचार्य  की  भक्ति  के  सभी  साक्षी  बने  l  आचार्य   द्वारा  कहा  गया   स्तोत्र  --- कनकधारा  स्तोत्र  के  नाम  से   सिद्ध  स्तोत्र  के  रूप  में  वंदित  हुआ  l 

25 July 2023

WISDOM -----

   वक्त  के  साथ   सब  कुछ  बदलता  जाता  है  , यदि   कोई  परिवर्तन  नहीं  हुआ  है  तो  वह  है  मनुष्य  की  मानसिकता   l  काम , क्रोध , लोभ , मोह , ईर्ष्या , द्वेष , महत्वाकांक्षा  --- ये  सब  बुराइयाँ  पहले  भी  मनुष्य  में  थीं  और  आज  भी  हैं  l  इनका  रूप  अब  और  भी  अधिक  विकृत  हो  गया  है  l   आज  स्थिति  ये  है  कि  मनुष्य  को  मनुष्य  से  ही  डर  लगने  लगा  है  l  धन -दौलत  को  इतना  अधिक  महत्त्व  देने  के  कारण  अब  रिश्तों  का  भी  महत्त्व  नहीं  रहा  l   कब  किस  पर  पशुता  हावी  हो  जाए  , कहा  नहीं  जा  सकता  l  व्यक्ति  के  भीतर  जो  बुराइयाँ  हैं   , वे  बड़ी  श्रंखलाबद्ध  तरीके  से  समाज  को  पतन  की  ओर  ले  जाती  हैं   जैसे  एक  व्यक्ति   का  स्वभाव षडयंत्र रचने  का  है , छल , कपट  उसके  स्वभाव  में  है   तो  वह  ऐसा  किसी  एक  के  साथ  नहीं  करता , वह  अनेक  लोगों  को  अपना  निशाना   बनाता  है  l  उसके  लिए   रिश्ते   , मित्रता  कोई  मायने  नहीं  रखती  l  लालची  व्यक्ति  बेईमानी  और  भ्रष्टाचार  को  बढाता  है  l  कामी  व्यक्ति  पूरे  समाज  को  पतन  के  गर्त  में  धकेल  देता  है  l    कामना , वासना  और  लोभ  की  दूषित  मानसिकता  का  परिणाम  ही  आज  की  फ़िल्में  हैं   जिनमे  अश्लीलता , अपराध  को  ऐसे  चित्रित  किया  जाता  है   कि   वह  लोगों  के  दिलो,-दिमाग  में  बैठ  जाती  है   l   भीतर  की  पशुता  को  उभारने  में  फिल्मों  का  बहुत  बड़ा  योगदान  है  l   ईश्वर  ने  मनुष्य  को  बुद्धि  दी  है  और  उसे   चयन  की  स्वतंत्रता  दी  है  l  यह  मनुष्य  को  ही  चयन  करना  है  कि  वह  पशु  बने  या  इनसान  बने  l    इस  बात  का  ध्यान  अवश्य  रखना  होगा  कि  यदि  वह  पशु  बनना  पसंद  करता  है   तो  वह  अपने  चारों  ओर  अपनी  ही  जैसी  प्रवृत्ति  के  लोगों  को  आकर्षित  करेगा  l  ऐसे  में  वह  स्वयं , उसका परिवार , उसके  अपने  कोई  भी  सुरक्षित  नहीं  रहेगा  l  

23 July 2023

WISDOM ------

   कहते  हैं  कोई  भी  संस्कृति   तभी  तक  जीवित  रहती  है   जब  तक  उस  देश  के  लोगों  का  चरित्र  श्रेष्ठ  होता  है  l   सारे  सद्गुण  जैसे  --सत्य , अहिंसा , कर्तव्यपालन , ईमानदारी , संवेदना , रिश्ते  में  शुचिता , दया , करुणा ,  परस्पर  प्रेम  आदि  सभी  सद्गुण  मिलकर  व्यक्ति  के  चरित्र  का  निर्माण  करते  हैं  l  जब  व्यक्ति  पतन  की   राह    पर  चल  देता  है   तब  उसका  पतन  इतनी  तेजी  से  होता  है   जैसे   कोई  गेंद  बड़ी  तेजी  से  नीचे  गिरती  है  l  पुरुष  और  नारी  से  मिलकर  ही  यह  समाज  बना  है   जिसमे  अमीर , गरीब , ऊँच -नीच , विभिन्न  जाति  और  धर्म  के  लोग  हैं  l  अब  यह  मनुष्य  को  ही  चुनाव  करना  है  कि  उसे  कौन  सी  राह  पसंद  है --- उत्थान  की  या  पतन  की  l   समाज  का  पतन  जब  होता  है  तो  चारों  दिशाओं  से  ही  होता  है --कहीं  गरीबी , मज़बूरी ,   दंगे , युद्ध  आदि  के  समय  मौके  का  फायदा  उठाना  आदि  अनेक  कारण  है  जो   पीड़ित    को  तरक्की  की  राह  में  आगे  नहीं  बढ़ने  देते  l  दूसरी  ओर  समाज  का  एक  बहुत  बड़ा  वर्ग  ऐसा  भी  है   जो  शिक्षित  है , समर्थ  है  लेकिन  दूषित  सामाजिक  वातावरण , अश्लील  फिल्म ,  सस्ते  साहित्य  का  असर   और  अपनी  मानसिक  कमजोरियों  के  कारण  स्वेच्छा  से  ही   चारित्रिक  पतन  के  रास्ते  पर  चल  देता  है  l    मुखौटा  लगाकर   सभ्य   होने  का  ढोंग  रचता  है  l   इन  सब  कारणों  से  व्यक्ति  का  आत्मबल  कम  हो  जाता  है   और  पीढ़ी -दर -पीढ़ी  पतन  होता  जाता  है  l  भगवान  श्रीकृष्ण  का  पूरा  वंश  अति  धन वैभव  के  कारण  भोग -विलास  में  लिप्त  हो  गया  था  ,  वे  सब  आपस  में  ही  लड़ मरे  और  पूरी  द्वारका  समुद्र  में  डूब  गई   l  आज  जरुरी  है  कि  हर  व्यक्ति   अपने  ही  अंतर  में , अपने  ह्रदय  में  झांके  कि  वह  आने  वाली  पीढ़ियों  के  लिए    अपने  जीवन  के  कौन  से  उदाहरण  पेश  कर  के  जा  रहा  है   और  कौन  से  संस्कार  दे  कर  जा  रहा  है  l  बबूल  के  पेड़  में  कभी  आम   नहीं  लगता  l  

22 July 2023

WISDOM ----

  पुराणों  में  अनेक  कथाएं  हैं   जिनमें  यह  बताया  गया  है  कि  असुर  बड़े  तपस्वी  होते  हैं ,  वे  कठोर  तपस्या  कर  के  ईश्वर  से  वरदान  प्राप्त  कर  लेते  हैं  l  तपस्या  से  शक्ति  तो   प्राप्त  हो  जाती  है  लेकिन  असुर  संवेदनहीन  होते  हैं  इसलिए  वे  अपनी  शक्ति  का  दुरूपयोग  करते  हैं  l  असुर  कोई  ऐसा  व्यक्ति  नहीं  होता  जिसके  बड़े -बड़े  सींग  हों , डरावनी  शक्ल  हो  l  व्यक्ति  में  यदि  दुर्गुण  ज्यादा  हैं ,  उसके  कर्म  दूसरों  को  कष्ट  देने  वाले  हैं  तो  वह  असुर  है  l  पुराण  में  कथा  है ---- भस्मासुर  की   l  इसने  कठिन  तपस्या  कर  के  शिवजी  से  वरदान  प्राप्त  कर  लिया  था  कि  वह  जिसके  सिर  पर  हाथ  रख  दे  , वह  भस्म  हो  जाये  l  ऐसा  वरदान  पाकर  वह  अहंकार  से  मतवाला  हो  गया   और  प्रजा  पर  अत्याचार  करने  लगा  l  असुरता  के  राज्य  की  सबसे  बुरी  बात  यह  होती  है  कि   वह  असुर  स्वयं  तो  प्रजा  पर  अत्याचार  करता  है  ,  उसके  राज्य  में  उसके  आधीन  जितने  भी  अधिकारी , कर्मचारी   और  राज्य  के  अन्य  ताकतवर  लोग  होते  है   वे  अपने -अपने  तरीके  से  प्रजा  का  शोषण  व  अत्याचार  करते  हैं  l  प्रजा  पर  दोहरी  मार  हो  जाती  है  l  भस्मासुर  के  अत्याचार  से   दुःखी  होकर   प्रजा  ने  भगवान  से  प्रार्थना  की  कि  इस  अत्याचारी  से  हमारी  रक्षा  करो  l  क्योंकि   कोई  भी  उसके  विरुद्ध  एक  शब्द  बोलता , , उसकी  आज्ञानुसार  नहीं  चलता  , वह  उसके  सिर  पर  हाथ  रख  देता    और  वह  व्यक्ति  भस्म  हो  जाता  l   अहंकार  व्यक्ति  की  बुद्धि  भ्रष्ट  कर  देता  है ,  उसने  सोचा   कि  वह  क्यों  न  शिवजी  को  ही  भस्म  कर  दे  और  पार्वती जी  से  विवाह  कर  ले  l  उसके  चापलूसों  ने  भी  उसे  ऐसा  करने  के  लिए  प्रेरित  किया  l  अब  क्या  था   , वह  चला  शिवजी  के  सिर  पर  हाथ  रखकर  उन्हें  भस्म  करने l  शिवजी  क्या  करें , वरदान  देकर  वह  बंधे  थे  l  अपनी  समाधि  से  उठकर  भागे  l  आगे -आगे  शिवजी  और  पीछे -पीछे  भस्मासुर  !  भागते -भागते  वे  विष्णु  लोक  पहुंचे  और  भगवान  से  कहा  कि  मुझसे  वरदान  पाकर  यह  तो  मुझे  ही  भस्म  करना  चाहता  है , अब  आप  ही  कोई  तरकीब  निकालो  , जिससे  इस  असुर  से  मुझे  और  इसकी  प्रजा  को  छुटकारा  मिले  l  विष्णु  भगवान  मोहिनी  रूप  बनाकर  बैठ  गए  l  जैसे  ही  भस्मासुर  शिवजी  का  पीछा  करते  विष्णुलोक  पहुंचा  ,  वहां  इस  मोहिनी  रूप  को  देखकर  अपनी  सुधबुध  खो  बैठा  l   अब  शिव -पार्वती  सबको  भूलकर  वह  इस  मोहिनी  रूप  पर  बावला  हो  गया  l  मोहिनी  बने  विष्णु जी  ने  कहा ---मुझे  पाना  है  तो  मेरे  साथ  नृत्य  करो  जैसी  मेरी  मुद्रा  हो  वैसी  ही  तुम  करो  l  नृत्य  करते -करते    विष्णु जी  ने  अपने  सिर  पर  हाथ  रखा  l  भस्मासुर  तो  मोहिनी  रूप  में  खो  चुका  था , उसने  भी  अपने  सिर  पर  हाथ  रखा  , और  वह  तत्काल  ही  भस्म  हो  गया  l  शक्ति  के  साथ  सद्बुद्धि  और  संवेदना  भी  जरुरी  है  , अन्यथा  वह  उसे  पाने  वाले  को  भस्मासुर  की  तरह  ही  नष्ट  कर  देती  है  l   

21 July 2023

WISDOM -----

  कहते  हैं  जो  कुछ  महाभारत  में  है , वही  इस  धरती  पर  है  l  व्यक्ति  उसके  विविध  प्रसंगों  से  शिक्षा  नहीं  लेता  l  महाभारत  के  विभिन्न  प्रसंगों  में  जो  छल , कपट , अनीति , अत्याचार , षडयंत्र  है  उसे  लोग  बहुत  जल्दी  सीख  लेते  हैं , सबने  मिलकर  अभिमन्यु  का  वध  किया  , इसे  भी  सीखकर   लोगों  ने  समाज  में  उदाहरण  पेश  किए  हैं   लेकिन  ऐसे  अनैतिक  कार्यों  का  जो  दुष्परिणाम  हुआ  , उसे   देखकर   किसी  ने  शिक्षा  नहीं  ली  l  धृतराष्ट्र   अंधे  थे  ,  दुर्योधन     अहंकारी  था  , सत्ता  के  लोभ  में  उसने  अनीति , षडयंत्र  और  अत्याचार  का मार्ग  अपनाया  l  दुर्योधन  युवराज  था , इसलिए   स्वाभाविक   था  ,  उसके  सभी  कौरव  भाई  उसी  के  जैसे  अनीति  और  अत्याचार  का  समर्थन  करने  वाले  थे l  जब  द्रोपदी  का  चीरहरण  हुआ   तो  सब  चुप  थे , चरित्र  के  अभाव  में    अनेक   तमाशा  देखते  हैं   और   अनेक   राज सुख  की  लालसा  में   भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य  और  कृपाचार्य  की  तरह    मौन  रहते  हैं  l  यही  स्थिति  आज  भी  है  , जिन  पर  समाज  को  दिशा  देने  की  जिम्मेदारी  है  , वे  अपनी  दुकान  सजाकर  मौन  रहते  हैं  l  धन   और  सुख -भोग  की  लालसा  ने  लोगों  के  मनोबल  को  कमजोर  कर  दिया  है  l    वैज्ञानिक  प्रगति  और  इस  विकास  ने  मनुष्य  को  संवेदनहीन  बना  दिया  है  l  युद्ध  और  दंगों  की  असली  वजह  जो   भी   हो  ,  ये  अच्छे  भले  मनुष्य  को  दो  पैरों  का  पशु   बना  देते  हैं  l  किसी  की  पशुता  और  असुरता  समाज  के  सामने  आ  जाती  है   और  किसी  की  परदे  के  पीछे  होती  है  l   इसी  तरह  रावण  कितना  महान  विद्वान् , महावीर , तपस्वी  और  शिवभक्त  था  , लेकिन  उसके   गुणों  को  अपनाने  वाले  बहुत  कम  होंगे  l  उसकी  तरह  वेश  बदलकर ,  मुखौटा  लगाकर  अनैतिक  कार्य  करने  वाले  बहुत  हैं   l  जब  लोगों  के  विचारों  की  दिशा  सकारात्मक  होगी ,  संवेदनशील  होंगे  तभी  सुख -शांति  होगी  l  

20 July 2023

WISDOM -----

 पुराण  की  कथाएं  मनुष्य  को  जीवन  जीने  की  शिक्षा  देती  हैं  l ---- ' योगवासिष्ठ '  में   भगवान  राम  को  महर्षि  वसिष्ठ  उपदेश  दे  रहे   थे  l  इसी  बीच   वे  लघुशंका  हेतु  गए  l  लघुशंका  के  दौरान   वे  जोर  से  हँसे  l   रामचंद्र जी  ने  सोचा,  इतने  बड़े  महर्षि  लघुशंका  के  दौरान  हँस  रहे  हैं  !  क्या  उन्हें  इतना  ज्ञान  नहीं  है  कि  इस  समय  कोई  भी  क्रिया  नहीं  करनी  चाहिए  l  जब  लौटकर  आए  तो  श्रीराम  ने  पूछा  ---- " भगवान  क्या  बात  थी  ,  आप  हँसे  क्यों  ?  ऐसे  समय  में  आपको  हँसी  आना   किसी  विशेष  रहस्य  का  कारण  है  ? "   महर्षि  बोले ----   " मैं  एक  द्रश्य  देखकर   हँस  पड़ा  l  एक   चींटा   नीचे  नदी  के  प्रवाह  में  बहा  जा  रहा  था  l  वह  चींटा   नौ  बार  इन्द्रपद  पर  रह  चुका  है  ,  पर  अपने  भोग  के  कारण   वह  चींटे  की  योनि  को  प्राप्त  हुआ  है  l "  आचार्य  श्री  लिखते  हैं ---- हम -आप  कल्पना  कर  सकते  हैं  कि   जब  इन्द्रपद  प्राप्त  करने  वाले   की  यह  स्थिति  है   तो  हमारी  -आपकी  क्या  स्थिति  होगी  l  "  यह  सत्य  है  कि  मनुष्य  स्वयं   ही   अपने  कर्मों  द्वारा   यह तय  कर  लेता  है  कि  उसको  अगले  जन्म  में  कौन  सी  योनि  मिलेगी  l  मनुष्य   एक  सामाजिक  प्राणी  है  l  मनुष्यों  से  मिलकर  ही  परिवार , समाज  और  राष्ट्र  बना  है  l  एक  मनुष्य  को  उसके  कर्मों  का  फल  तो  मिलता  ही  है  ,  लेकिन  उसके  कर्म   उसके  परिवार , समाज  और  राष्ट्र   की  दिशा  को  भी  तय  करते  हैं l  छल , कपट ,  षडयंत्र , धोखाधड़ी ,   अनैतिक , अमर्यादित  कार्य , विभिन्न  अपराध  कोई  अकेला  नहीं  करता , उसमे  समाज  का  बहुत  बड़ा  तबका  जुड़ा  होता  है  l   भौतिक  द्रष्टि  से  चाहे  उनके  पास  धन -वैभव  हो   लेकिन  मानवीय  द्रष्टि  से   वे  परिवार  और  समाज  को   पतन  के  गर्त  में  और  निम्न  योनियों  में  ले    जाते  हैं  l    संसार  में  सुख  शांति  के  लिए   जरुरी  है  कि   ' विकास '  को  भौतिक  द्रष्टिकोण  से  नहीं , इंसानियत  के  आधार  पर  परिभाषित  किया  जाये  l  इस  आधार  पर  यदि  विभिन्न  देशों  का  निष्पक्ष  सर्वेक्षण  किया  जाये   तो  यह  सत्य  सामने  आएगा  कि  विकास   ने  मनुष्य  को  क्या  बना  दिया --- पशु , नर पशु , पिशाच  या  खूंखार  पशु   !    इनसान  तो  बहुत  ही  कम   होंगे  l  विभिन्न  योनियाँ  तो  मृत्यु  के  बाद  ही  मिलती  हैं   लेकिन  व्यक्ति  के  गलत  कार्य   उसे   पशु  और  जिन्दा  प्रेत  बना  देते  हैं   जो  न  तो  स्वयं  चैन  से  रहता  है  और  न  दूसरों  को  चैन  से  जीने  देता  है  l  मनुष्य  बुद्धिमान  है   इसलिए  वह  अपने  इस  रूप  पर   आदर्शवादी   और  समाजसेवी  होने  का  आवरण  डाल  लेता  है  l  आज  जरुरी  है  कि   हर  व्यक्ति  ईश्वर  से  सद्बुद्धि  की  प्रार्थना  करे   ,  ईश्वर  हमें  विवेक  दें   जिससे  हम   किसी  व्यक्ति  की  सच्चाई  को , उसके  असली  रूप  को  समझकर   जागरूक  रहें   l  

18 July 2023

WISDOM -----

   यदि  आपको  तनाव रहित  जीवन  जीना  है ,  संसार  में  निडर  होकर , निश्चिन्त   रहकर  जीना  है  तो  ईश्वर  के  सच्चे  भक्त  बनिए  l  क्योंकि  जो  सच्चा  ईश्वर  भक्त  है  , उसके  लिए  ईश्वर  ही  पर्याप्त  है , वह  संसार  में  किसी  से  कोई  उम्मीद  नहीं  रखता  l  उसे  मृत्यु  का  भी  डर  नहीं  होता  क्योंकि  उसे  पता  है  कि  उसके  जीवन  की  डोर  भगवान  के  हाथ  में  है  l  भगवान  और  भक्त  का  एक  अटूट  रिश्ता  होता  है  l  भक्त  हर  पल  भगवान  का  स्मरण  करता  है   तो  भगवान  भी  अपने  भक्त  का  स्मरण  करते  हैं   l -------- यह  अधिकार  मात्र  नारद जी  को  प्राप्त  था   कि  वे  जब  चाहे  श्रीकृष्ण  के  अंत:पुर   तक  चले  जाते  थे  , कहीं  भी  कोई  उन्हें  टोकता  नहीं  था  l  एक  बार  नारद जी  द्वारका  पहुंचे   तो  देखा  भगवान  कहीं  दीख  नहीं  रहे  हैं  l  रुक्मणी  जी  के  पास  पहुंचे   और  पूछा ---- " प्रभु  कहाँ  विराज  रहे  हैं  ?  दिखाई  नहीं  दे  रहे  हैं  l "  रुक्मणी जी  ने  पूजा  घर  की  ओर  संकेत  किया   और  कहा ----" वहां  बैठे  जप  कर  रहे  हैं  l "  नारद जी  को  बड़ा  आश्चर्य  हुआ  l  वे  पूजा  घर  पहुंचे  तो  देखा  भगवान  ध्यानस्थ  हैं  l  थोड़ी  देर  में  उन्होंने  आँखें  खोली   और  देवर्षि  का  हँसकर  स्वागत  किया  l  नारद जी  ने  पूछा ---- " भगवान  !  सारी  दुनिया  आपका  ध्यान  करती  है  l  आप  किसका  ध्यान  करते  हैं  ? "  भगवान  श्रीकृष्ण  ने  गंभीर  होकर  कहा ---- " देवर्षि  !  मैं  सदा  अपने  भक्तों  को  स्मरण  करता  हूँ  l  "  देवर्षि  को  एक  नई  अनुभूति  हुई   कि  भक्त  , भगवान  के  ह्रदय  में  बसते  हैं  , भगवान  अपने  भक्तों  को  कभी  नहीं  भूलते  l