इच्छा शक्ति मनुष्य को परमात्मा द्वारा दिए गए समस्त दिव्य अनुदानों में सबसे बढ़कर शक्तिशाली और दिव्य है । मनुष्य को महानता के शिखर पर पहुँचाने में इच्छा शक्ति या संकल्प बल सर्वोपरि है । प्रत्येक मनुष्य में अपनी इच्छा शक्ति होती है , यदि उसे ईश्वर अर्पित कर श्रेष्ठ कार्यों के लिए सदुपयोग किया जाये तो जीवन में कोई कमी नहीं रहती है । यह संकल्प ही मनुष्य जीवन का वास्तविक बल है । परिस्थितियां इसी संकल्प भरी मन: स्थिति के आधार पर खींचतीं चली आती हैं ।
3 February 2017
2 February 2017
आदर्श वीरांगना ------- रानी लक्ष्मीबाई
' वास्तव में स्त्री हो या पुरुष उसकी श्रेष्ठता का आधार उसका उज्ज्वल चरित्र और सच्ची कर्मनिष्ठ है । ' झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को राज्य - भार संभाले कुछ ही समय हुआ था किओरछा के दीवान नत्थे खां ने 20 हजार सैनिकों की फौज लेकर झाँसी पर आक्रमण कर दिया । उसकी ताकत को देखकर कितने ही सरदार डर गए और झाँसी का शहर और किला नत्थे खां को सुपुर्द करने की सलाह देने लगे । यह सुनकर रानी को बड़ा क्रोध आया और उसने कहा ---- " बड़ी लज्जा की बात है आप मर्द होकर ऐसी बात मुख से निकलते हैं । मैं स्त्री होने पर भी अपने हक से पीछे न हटूंगी ।
यदि हम अपने न्याय पूर्ण अधिकार के लिए युद्ध में वीरता दिखाकर मर भी जाएँ तो हमको परलोक में भी सम्मानीय स्थान प्राप्त होगा । मैं युद्ध से पीछे नहीं हटूंगी । '
जब नत्थे खान की जौज झाँसी के किले के पास पहुंची तो उस पर तोपों की ऐसी गोलाबारी की गई वह सामने ठहर न सकी । तब उसने अपनी सेना को चार भागों में बांटकर नगर के चारों दरवाजों पर हमला किया । यहाँ भी झाँसी की सेना ने बड़ी वीरता से उसका मुकाबला किया । रानी स्वयं फाटकों पर घूमती हुई सिपाहियों का साहस बढ़ाती रहती थी । कई दिन बाद नत्थे खां का साहस टूट गया और वह हार मानकर अपने स्थान वापिस चला गया ।
यदि हम अपने न्याय पूर्ण अधिकार के लिए युद्ध में वीरता दिखाकर मर भी जाएँ तो हमको परलोक में भी सम्मानीय स्थान प्राप्त होगा । मैं युद्ध से पीछे नहीं हटूंगी । '
जब नत्थे खान की जौज झाँसी के किले के पास पहुंची तो उस पर तोपों की ऐसी गोलाबारी की गई वह सामने ठहर न सकी । तब उसने अपनी सेना को चार भागों में बांटकर नगर के चारों दरवाजों पर हमला किया । यहाँ भी झाँसी की सेना ने बड़ी वीरता से उसका मुकाबला किया । रानी स्वयं फाटकों पर घूमती हुई सिपाहियों का साहस बढ़ाती रहती थी । कई दिन बाद नत्थे खां का साहस टूट गया और वह हार मानकर अपने स्थान वापिस चला गया ।
1 February 2017
विश्व - मानव के पुजारी --------- महात्मा फ्रांसिस
महात्मा फ्रांसिस न केवल संत - साधक ही थे बल्कि जन -सेवा , सहानुभूति और करुणा की साकार प्रतिमा भी थे |' कर्तव्य ' के सम्बन्ध में वे कहा करते थे ---- मानव जीवन के सारे छोटे और बड़े , कठोर और कोमल सभी कर्तव्य ईश्वर प्रदत्त होते हैं । इनका नि:स्वार्थ और निष्कलंक पालन , भले ही देखने में आध्यात्मिक प्रकृति का न हो , किन्तु वस्तुत: उसका परिणाम आध्यात्मिक ही होता है सावधानी केवल यह रखनी होती है कि वे कर्तव्य , कर्तव्य ही हैं या उनमे कर्तव्य का भ्रम मात्र है । इसका निर्णय विवेक के आधार पर आसानी से हो जाता है ।
मानव जीवन के लिए विद्दा को इसलिए आवश्यक बताया गया है क्योंकि उसमे पग - पग पर कर्तव्य - अकर्तव्य की परख करने की क्षमता होती है । अन्यथा इस योग्यता के अभाव में मनुष्य और पशु में आकर के अतिरिक्त और कोई विशेष अंतर ही नहीं रह जाता ।
मानव जीवन के लिए विद्दा को इसलिए आवश्यक बताया गया है क्योंकि उसमे पग - पग पर कर्तव्य - अकर्तव्य की परख करने की क्षमता होती है । अन्यथा इस योग्यता के अभाव में मनुष्य और पशु में आकर के अतिरिक्त और कोई विशेष अंतर ही नहीं रह जाता ।
31 January 2017
श्रमिक वर्ग की, जनसमाज की सेवा करना जिनके जीवन का लक्ष्य था ------- डेविड मोर्स
' उच्च लक्ष्य को सामने रखकर चलने वाले व्यक्ति को किस प्रकार व्यक्तिक लाभ अनायास ही प्राप्त होते जाते हैं इसका अनुपम उदाहरण मोर्स के जीवन में देखने को मिलता है ।
एक साधारण श्रमिक परिवार में जन्म लेने वाला साधारण बालक ' मोर्स ' अपने अंत:करण में उठने वाली सद्प्रेरणाओं का अनुगमन करता हुआ विश्व विख्यात हुआ , उसकी योग्यता को देखते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का महा निदेशक बनाया गया ।
डेविड मोर्स कहा करते थे ---- जिस प्रकार एक कसाई की दुकान पर काम करने वाले व्यक्ति को अपने उपार्जन के साथ निरन्तर घ्रणा तथा हत्या के घ्रणित व्यापर की नारकीय वेदना भोगनी पड़ती है वैसे ही ओछे लक्ष्य को अपनाकर व्यक्ति को भी कष्ट क्लेश भोगने पड़ते हैं । गुलाब की खेती करने वाला किसान अपने उपार्जन के साथ मनभावन सौरभ भी पाता है तथा चित में प्रसन्नता का अनुभव करता है ---- आम के उपवन का रखवाला जिस प्रकार पके आम मुफ्त में ही खा लेता है वैसे ही मैं भी श्रमिक वर्ग की , जन समाज की सेवा का लक्ष्य चुनकर इस महत्वपूर्ण पद पर पहुँच सका हूँ नहीं तो मैं भी कोलंबिया की उस एसबेस्टस फैक्टरी में काम करते - करते तन मन से जर्जर हो गया होता ।
एक साधारण श्रमिक परिवार में जन्म लेने वाला साधारण बालक ' मोर्स ' अपने अंत:करण में उठने वाली सद्प्रेरणाओं का अनुगमन करता हुआ विश्व विख्यात हुआ , उसकी योग्यता को देखते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का महा निदेशक बनाया गया ।
डेविड मोर्स कहा करते थे ---- जिस प्रकार एक कसाई की दुकान पर काम करने वाले व्यक्ति को अपने उपार्जन के साथ निरन्तर घ्रणा तथा हत्या के घ्रणित व्यापर की नारकीय वेदना भोगनी पड़ती है वैसे ही ओछे लक्ष्य को अपनाकर व्यक्ति को भी कष्ट क्लेश भोगने पड़ते हैं । गुलाब की खेती करने वाला किसान अपने उपार्जन के साथ मनभावन सौरभ भी पाता है तथा चित में प्रसन्नता का अनुभव करता है ---- आम के उपवन का रखवाला जिस प्रकार पके आम मुफ्त में ही खा लेता है वैसे ही मैं भी श्रमिक वर्ग की , जन समाज की सेवा का लक्ष्य चुनकर इस महत्वपूर्ण पद पर पहुँच सका हूँ नहीं तो मैं भी कोलंबिया की उस एसबेस्टस फैक्टरी में काम करते - करते तन मन से जर्जर हो गया होता ।
30 January 2017
महात्मा गाँधी का दैवी व्यक्तित्व
संसार में गाँधी जी के देहान्त होने का जितना अधिक शोक मनाया गया और सब तरह के लोगों ने इसको जिस प्रकार अपनी व्यक्तिगत हानि माना , वैसा संसार में शायद ही पहले कभी हुआ हो ।
प्रसिद्ध दार्शनिक 'रोमा रोलां ' ने कहा ----- " महात्मा गाँधी का नाम सदैव उस श्रेणी में लिखा जायेगा , जो मनुष्य मात्र को सुखी बनाने में अपने जीवन का बलिदान करते हैं । "
अमरीका के दिव्तीय महासमर को जीतने वाले प्रसिद्ध सेनापति डागलस मैकार्थर ने कहा ---- " अगर मानव सभ्यता को जीवित रहना है , तो हमको एक दिन गाँधी जी का यह सिद्धान्तमानना ही पड़ेगा कि किसी झगड़े के निपटारे के लिए सामूहिक शक्ति ( सैनिक शक्ति ) का प्रयोग गलत है । इस प्रकार की नीति में नाश का बीज अपने भीतर ही निहित रहता है । "
' न्यूयार्क टाइम्स ' ने लिखा ---- " गाँधी जी अपने उत्तराधिकार स्वरुप एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति छोड़ गये हैं जो भगवान के निर्देशित समय पर अवश्य ही हथियारों और हिंसा की दूषित नीति पर विजय प्राप्त करेगी । "
प्रसिद्ध दार्शनिक 'रोमा रोलां ' ने कहा ----- " महात्मा गाँधी का नाम सदैव उस श्रेणी में लिखा जायेगा , जो मनुष्य मात्र को सुखी बनाने में अपने जीवन का बलिदान करते हैं । "
अमरीका के दिव्तीय महासमर को जीतने वाले प्रसिद्ध सेनापति डागलस मैकार्थर ने कहा ---- " अगर मानव सभ्यता को जीवित रहना है , तो हमको एक दिन गाँधी जी का यह सिद्धान्तमानना ही पड़ेगा कि किसी झगड़े के निपटारे के लिए सामूहिक शक्ति ( सैनिक शक्ति ) का प्रयोग गलत है । इस प्रकार की नीति में नाश का बीज अपने भीतर ही निहित रहता है । "
' न्यूयार्क टाइम्स ' ने लिखा ---- " गाँधी जी अपने उत्तराधिकार स्वरुप एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति छोड़ गये हैं जो भगवान के निर्देशित समय पर अवश्य ही हथियारों और हिंसा की दूषित नीति पर विजय प्राप्त करेगी । "
29 January 2017
सच्चे अर्थों में बादशाह ----- शेरशाह सूरी
' संख्या और साधन नहीं , मनोबल और साहस किसी की विजय का कारण बनते हैं , रणभूमि में भी और जीवन संग्राम में भी । '
शेरखां एक बार अपने मित्रों के साथ आगरा गया , उस समय बाबर हिन्दुस्तान का बादशाह था । आगरा की शासन व्यवस्था तथा मुगलों का रहन - सहन देखकर शेरखां ने अनुमान लगाया कि ये लोग ऐशोआराम में पड़कर निकम्मे हो चुके हैं । ' भोग - विलास में डूबे व्यक्तियों की शक्तियां वैसे ही कुंठित हो जाती हैं । फिर सामान्य सी परिस्थितियां या संघर्ष भी आसानी से उनको बेधने में सफल हो जाती हैं । '
बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमांयू गद्दी पर बैठा । उस समय तक शेरखां बहुत थोड़े ही सैनिक संगठित कर पाया था । एक ओर हुमांयू की विशाल फौज और बंगाल के बादशाह का लश्कर था तो दूसरी ओर शेरखां के मुट्ठी भर जवान थे । परन्तु अपनी संगठन शक्ति और सूझबूझ का प्रयोग कर शेरखां ने एक - एक राज्य जीतना शुरू कर दिया । दिल्ली पहुँचते - पहुँचते शेरखां की हुमांयू से दो बार टक्कर हुई और अंतिम बार हुमांयू को दिल्ली छोड़कर ईरान भागना पड़ा । और दिल्ली के सिंहासन पर शेरखां, शेरशाह सूरी के नाम से बैठा ।
अपनी सफलता से गर्वोन्नत न होकर उसने तत्काल राज्य व्यवस्था को सुधारने और जनता की सुख - शान्ति बढ़ाने के प्रयत्न आरम्भ कर दिए । उसने सस्ता , शीघ्र और निष्पक्ष न्याय दिलवाने की व्यवस्था की । उसने ऐसी व्यवस्था बनायीं कि कोई कर्मचारी एक स्थान पर अधिक समय टिका न रह सके । स्थानांतरण की यह व्यवस्था तभी से चली आ रही है । फकीरों और भूखों से लेकर यात्रियों तक के लिए उसने आवश्यक प्रबंध किये । पांच वर्ष की अवधि में उसने इतना काम कर दिया जितना लोग पांच वर्ष में भी नहीं कर पाते ।
शेरखां एक बार अपने मित्रों के साथ आगरा गया , उस समय बाबर हिन्दुस्तान का बादशाह था । आगरा की शासन व्यवस्था तथा मुगलों का रहन - सहन देखकर शेरखां ने अनुमान लगाया कि ये लोग ऐशोआराम में पड़कर निकम्मे हो चुके हैं । ' भोग - विलास में डूबे व्यक्तियों की शक्तियां वैसे ही कुंठित हो जाती हैं । फिर सामान्य सी परिस्थितियां या संघर्ष भी आसानी से उनको बेधने में सफल हो जाती हैं । '
बाबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र हुमांयू गद्दी पर बैठा । उस समय तक शेरखां बहुत थोड़े ही सैनिक संगठित कर पाया था । एक ओर हुमांयू की विशाल फौज और बंगाल के बादशाह का लश्कर था तो दूसरी ओर शेरखां के मुट्ठी भर जवान थे । परन्तु अपनी संगठन शक्ति और सूझबूझ का प्रयोग कर शेरखां ने एक - एक राज्य जीतना शुरू कर दिया । दिल्ली पहुँचते - पहुँचते शेरखां की हुमांयू से दो बार टक्कर हुई और अंतिम बार हुमांयू को दिल्ली छोड़कर ईरान भागना पड़ा । और दिल्ली के सिंहासन पर शेरखां, शेरशाह सूरी के नाम से बैठा ।
अपनी सफलता से गर्वोन्नत न होकर उसने तत्काल राज्य व्यवस्था को सुधारने और जनता की सुख - शान्ति बढ़ाने के प्रयत्न आरम्भ कर दिए । उसने सस्ता , शीघ्र और निष्पक्ष न्याय दिलवाने की व्यवस्था की । उसने ऐसी व्यवस्था बनायीं कि कोई कर्मचारी एक स्थान पर अधिक समय टिका न रह सके । स्थानांतरण की यह व्यवस्था तभी से चली आ रही है । फकीरों और भूखों से लेकर यात्रियों तक के लिए उसने आवश्यक प्रबंध किये । पांच वर्ष की अवधि में उसने इतना काम कर दिया जितना लोग पांच वर्ष में भी नहीं कर पाते ।
WISDOM
सफलता के लिए अनुकूल परिस्थितियों की राह नहीं देखी जाती । संकल्प शक्ति को जगाया , उभारा और विकसित किया जाता है । आशातीत सफलता जीवन के हर क्षेत्र में प्राप्त करने का एक ही राजमार्ग है ---- प्रतिकूलताओं से टकराना , अन्दर छिपी सामर्थ्य को उभारना ।
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