18 November 2019

WISDOM

    पं.  श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  का  कहना  है  ---- " विपरीत  परिस्थितियों  में  जो  साहस ,  ईमान  और  धैर्य   को  कायम  रख  सके  , वस्तुत:  वही  सच्चा  शूरवीर  है  l "
मनोविज्ञान  के  प्रोफेसर  रिचर्ड  वाइजमैन  का  कहना  है --- " बाधाएं  मनुष्य  के  रवैये  के  अनुसार  अपना  रंग  दिखाती   हैं  l  यदि  व्यक्ति  सकारात्मक  सोच  वाला  है  तो  बाधाएँ   स्पीड  ब्रेकर  से  अधिक   कुछ  नहीं  होतीं  ,  जिन्हे  थोड़ा  संभलकर   आसानी  से  पार  किया  जा  सकता  है   और  यदि  सोच  नकारात्मक  है   तो  बाधाएं  पहाड़  की  तरह  बड़ी  प्रतीत  होती  हैं  ,  जिन्हे  पार  करना  आसान  नहीं  दीखता  l "
       एक  बार  जब  विख्यात  खोजी  यात्री  डेविड  लिविंगस्टोन   अफ्रीका  के  घने  जंगलों  में   जांबेजी  नदी  के  मुहाने  की  खोज  के  लिए   निकल  रहे  थे  ,  तब  उनके  एक  दोस्त  ने   उन्हें  जंगल  के  मुश्किल  हालातों  का  जिक्र  करते  हुए    उन्हें  जाने  से  रोकना  चाहा  l   लेकिन  लिविंगस्टोन  ने  कहा --- ' जब  नदी  वहां  रास्ता  बना  सकती  है  ,  पेड़ - पौधे  व  जीव - जंतु  वहां  रह  सकते  हैं  ,  तो  मुझे  वहां  जाने  से  कौन  रोक  सकता  है  l  "  वे  उस  भयंकर  वन  में  गए    और  उन्होंने  उस  समय  की  जटिल  परिस्थितियों   में  भी  अनेक  खोजी  यात्राएं   कीं ,  जो  अफ्रीका  के  इतिहास  में  अभी  भी  दर्ज  है  l 

17 November 2019

WISDOM -----

    बड़प्पन  एक  मानवीय   गुण     है   l   इसका  तात्पर्य  --- अपने  नुकसान   एवं   हानि  को   सहर्ष  झेलते  हुए  ,  कष्ट - कठिनाइयों  को   सहजता  से अपनाते  हुए  ,  अपमान  को  भी  सहते  हुए  ,  केवल  दूसरों  का  कल्याण  सोचना ,  दूसरों  को   ख़ुशी  एवं   प्रसन्नता  प्रदान  करना  l   बड़प्पन  सत्य  का  साथ  देने  में  है  l   बड़प्पन  केवल  वही  प्राप्त  कर  सकता  है  ,  जो   वास्तव  में   बड़ा  होता  है  ,  आडम्बर  व  प्रदर्शन  नहीं  करता  l
  गाँधी जी  ने  वकालत  प्रारंभ   की   l  उन्होंने  केवल  सही  अधिकारों   के  लिए  ही  पैरवी  करने  का  फैसला  किया  l   उनके  एक  मुवक्किल  ने  उन्हें  अपना  गलत  पक्ष  नहीं  बताया  ,  उन्होंने  उसका  केस  ले  लिया  l  बाद  में  जब  पता  लगा  ,  तो  कोर्ट  में  उन्होंने  बहस  नहीं  की  ,  तारीख  बढ़  गई  l   कोर्ट  से  लौटकर  उन्होंने  उस  मुवक्किल   को  उसकी  दी  हुई  फीस   वापस  कर  दी  l
  लोगों  ने  कहा  --- आप  फीस  ले  चुके  हैं  ,  अब  केस  वापस  मत  कीजिए  l   वकीलों  को  थोड़ा - बहुत  तो  इधर - उधर  करना  ही  पड़ता  है   l   गाँधी जी  ने  कहा ---- " लोग  क्या  करते  हैं ,  यह  मेरा   आदर्श  नहीं  है  ,  मुझे  क्या  करना  चाहिए  ,  वह  मुझे  अच्छी  तरह   याद  है   l   मैं  परंपरा  या  धन  के  लोभ  में   सिद्धांतों  को  बट्टा   नहीं  लगाऊंगा   l  "   उच्च  आदर्शों  के  प्रति  इस  निष्ठा   ने  ही   उन्हें  महात्मा    और  ' राष्ट्रपिता '  का  पद  दिलाया  l 

16 November 2019

WISDOM ---- आचरणविहीन धर्म आडम्बर के सिवा और कुछ भी नहीं

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  ने  लिखा  है ---- ' पत्थरों  के  पुराने  मंदिरों  में   सिर   झुकाने  की   रीति   निभाने   वालों  की  दशा  भी   पत्थर  जैसी  हो  चली  है   l   विचार  और  आचरण  के  बीच   की  गहरी  खाई  ने    धर्म  को  प्रभावहीन  बना  दिया  है  l  '
आचार्य श्री  आगे  लिखते  हैं  ---- ' धर्म  का  प्रचार  तो  बहुत  हो  रहा  है  ,  लेकिन  इसका  आचरण  नहीं  के  बराबर    हो  रहा  है   l   जहाँ  देखो  ,  जिधर  सुनो  ,  वहीँ  प्रवचन  ,  जो  कि   यथार्थ  में  पर - वचन  हैं   , दिखाई - सुनाई  दे  रहे  हैं   l   जिसे  देखो - सुनो  ,  वही  शास्त्र  वचन  दोहराता  है  ,  लेकिन  अनुभव  से  एकदम   अनभिज्ञ  है   l   इसी  का  परिणाम  है  कि -- जीवन  निरंतर   दुःख  और  पीड़ा   में  डूबता  जा  रहा  है   l   बातें    देवत्व  की  हो  रहीं  हैं  ,  जबकि  जीवन  निरंतर  पशुता   की  ओर   झुकता   चला  जा  रहा  है   l 
  धर्मतंत्र  का  परिष्कार   अनिवार्य  है  l   

15 November 2019

WISDOM ----- भारतीय संस्कृति और गाय

 भारतीय  संस्कृति  में  गाय  का  स्थान  सबसे  ऊँचा  है  l  महाभारत  में  एक  कथा  है -----   यह  कथा  रघुकुल  के  राजा  नहुष  और  महर्षि  च्यवन  की  है   जिसे  भीष्म  पितामह  ने  युधिष्ठिर    को  सुनाया  था  l
  महर्षि  च्यवन  जलकल्प  करने  के  लिए  जल  में   समाधि   लगाए  बैठे  थे   l   एक  दिन  कुछ  मछुआरों  ने   उसी  स्थान  पर  मछलियां  पकड़ने  के  लिए  जाल  फेंका   l   जाल  में  मछलियों  के  साथ  महर्षि  च्यवन  भी  खिंचे   चले  आये   l   उन्हें  देखकर  मछुआरों  ने  उनसे  क्षमा  मांगी  और  कहा  अनजाने  में  उनसे  यह  पाप  हुआ   ,  हमें  आज्ञा  दें  कि   हम  आपकी  क्या  सेवा  करें   l
  महर्षि  ने  कहा --- यदि  ये  मछलियां  जियेंगी  तो  मैं  भी  जीवन  धारण  करूँगा , अन्यथा  नहीं   l '  यह  सुनकर  सारे  मछुआरे  राजा  नहुष  के  पास  गए   और  सारा  वृतांत  कह  सुनाया  l   राजा  नहुष  तत्काल   अपने  मंत्रीगणों  के  साथ   महर्षि  के  पास  पहुंचे   और   हाथ  जोड़कर  बोले  --- आज्ञा  दीजिये  मैं  आपकी  क्या  सेवा  करूँ   l
  महर्षि  च्यवन  ने  कहा --- मेरा  व  मछलियों  का  मूल्य   चुका    दिया  जाये   l   राजा  नहुष  ने    उसी  समय  पुरोहित  को  आज्ञा  दी  कि  मछुआरों  को  एक  हजार  स्वर्ण  मुद्राएं  दो  l   महर्षि  के  इनकार   करने  पर  पुन:  एक  लाख ,  एक  करोड़ ,  फिर  आधा  राज्य   और  अंत  में  पूरा  राज्य  देने  को  कहा  l
 महर्षि  ने  कहा --- आधा  राज्य  या  पूरा  राज्य  भी  मेरा  मूल्य  नहीं  है   l   आप  ऋषियों  से  विचार  कर  मेरा  उचित  मूल्य   दीजिए   l
  तब  ऋषियों  ने  कहा --- ' गाय   अमूल्य  है   l   गौधन  ( गाय )  का   कोई  मूल्य  नहीं  लगाया  जा  सकता   l   अत :  आप   महर्षि  के  मूल्य  के  रूप  में  एक - दो   गौ  दे  दीजिए   l   राजा  नहुष  ने  ऐसा  ही  किया  ,  मछुआरों  को  एक  गाय  दी  l   तब  महर्षि    उठ  गए    और  कहा --- हे  राजन !  आपने  मेरा  उचित  मूल्य  देकर  मुझे  खरीद  लिया  ,  इस  संसार  में   गाय    के  बराबर  और   और  उससे  उत्तम  कोई  धन  नहीं  है   l 

14 November 2019

जीवन कला के कलाकार ---- पं. जवाहर लाल नेहरू

    आनन्द   भवन  की  अपार  सम्पदा  ,  कमला  सी  कमनीय  पत्नी ,  पिता  का  विवेकपूर्ण  स्नेह  और   फूल  सी  कोमल  और  सुन्दर  इन्दिरा   इन  सबने  मिलकर  नेहरू जी  को  स्वर्गीय  सुख  प्रदान  किया   किन्तु  अकेले  भोगे  जाने  वाले  सुख  की  अपेक्षा    उन्हें  करोड़ों  लोगों  की  आजादी  आवश्यक  लगी  l   सब  सुखोपभोग  को  तिलांजलि  देकर   वे  कर्मक्षेत्र  में  आ  डटे   l
  जिसके  शरीर  पर  दिन भर  में  कितनी  ही  बार  अलग - अलग  कीमती  पोशाक   पहनी  जातीं ,  वही  जवाहर  अब  मोटी    खादी   पहनते  l   जिनके  ऐश्वर्य - सुख  को  देखकर   कई  धनी   मानी  व्यक्तियों  को  ईर्ष्या  होने  लगती  ,  वही  नेहरू   सीलन  और  बदबू  भरी   जेल  की  कोठरियों  में  जमीन   पर  सोने  लगे  l   जिन्हे  स्वादिष्ट  भोजन  मिलता  था  , वैभव  विलास  में  पला  राजकुमार   कई  दिनों  तक  उपवास  करने  लगा   l    दीखने   में  जमीन   का  बिस्तर , भूख - प्यास ,  जेल  के  कष्ट   सब  कुछ   कितना  असह्य  कष्टकर  लगता  है  ,   परन्तु     देश  की  आजादी  के  लिए   नेहरू जी  ने  इन्हे  स्वेच्छा  से  वरण   किया   l
   यह  सब  देख  पिता  मोतीलाल  तड़प  उठे  ,  उन्होंने  अपने  पुत्र  को  लाख  समझाया  लेकिन  वे  न  माने   l   आखिर  पं.  मोतीलाल  भी  उसी   पथ  के  पथिक  बन  गए   और  बेटी  इन्दिरा   भी  अपने  पिता  की  अनुगामिनी  बनी  l
`देशभक्ति , लोक मंगल  की  कामना  और  कर्तव्य निष्ठा   का  उनका  स्तर  सदा  इतना  ऊँचा  रहा  कि   व्यक्तिगत   लोभ ,  मोह  ,  स्वार्थ  , द्वेष  व  अहंकार   के   प्रवेश  की  पहुँच  वहां  तक  हो  ही  नहीं  सकी l   इन  बुराइयों  से  वे  कोसों  दूर  थे  l
 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   वाङ्मय  ' महापुरुषों  के  अविस्मरणीय  जीवन  प्रसंग  में  लिखते  हैं  --- ' जो  लोग  नेहरू  को  नास्तिक   कहते  और  मानते  हैं  ,  वे  भूल  करते  हैं  l  इतना  जरूर  था  कि   वे  धर्म  के  आडम्बर   और  प्रदर्शन  से   सर्वथा दूर  रहे   l   एकांत  के  क्षणों  में  गीता  का  अध्ययन  और  अध्यात्म  चिंतन  में  रत  ,  जीवन  सुखों  का  राष्ट्र   हित   में    त्याग ,  सेवा   और  परोपकार     के  लिए  समर्पित  व्यक्ति   यदि  नास्तिक  है    तो  फिर  इस  दुनिया  में  आस्तिक  व्यक्ति  कहीं  नहीं  मिल  सकता   l                             

13 November 2019

WISDOM ------

  श्रीकृष्ण  को  अपनाने  के  बाद  संकटों  में  ग्रस्त  मीराबाई   मानसिक  क्लेश  से  गुजर  रहीं  थीं  ,  उन्होंने  गोस्वामीजी  को  पत्र   लिखा  l   गोस्वामी  तुलसीदास जी  ने  उनकी  दुविधा  समझी    और  अपनी  सलाह   एक  पंक्ति  के  माध्यम  से  लिख  दी  l  ' विनय  पत्रिका '  की  यह  पंक्ति  हम  सबके  लिए  जीवन  संजीवनी  के  समान   है   l   गोस्वामी जी  लिखते  हैं ----
   " जाके  प्रिय  न  राम  वैदेही   l 
                    तजिये   ताहि   कोटि  बैरी  सम ,  जद्दपि   परम  सनेही   l l
                    तज्यो  पिता  प्रह्लाद ,  विभीषण  बंधु ,  भरत  महतारी  l
                     बलि  गुरु  तज्यो  कंत   ब्रज  बनितन्हि ,  भये  मुद  मंगलकारी   l l
   जाके  प्रिय  न  राम  वैदेही   l  "
    पं  .  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  --- " जब - जब  इसे  मैं  पढ़ता   हूँ    तो  हिम्मत  और  ताकत  से  भर  जाता  हूँ   l   भावार्थ  यह  है  कि  -- चाहे  कोई  कितना  ही  प्रिय  हो  ,  यदि  वह  भगवान   के  कार्य  में  ,  उनसे  मिलने  की  हमारी  साधना   में  बाधक  हो  तो   उसे  छोड़  देना  चाहिए   l   प्रह्लाद  ने  पिता  को  त्यागा ,  विभीषण  ने  भाई  रावण  से  संबंध - विच्छेद  किया ,  भरत  ने  अपनी  माँ  को  त्यागा  ,  गलत  परामर्श  देने  के  कारण   बलि  ने  गुरु  शुक्राचार्य  को  को  छोड़ा   l   व्रज  में  गोपिकाओं  ने   अपने  सगे - संबंधियों   को  छोड़कर   श्रीकृष्ण  का  वरण   किया  l   हम  भी  कभी  राम  को  न  भूलें   l   कोई  भी  आकर्षक  प्रस्ताव   चाहे  वह  कितने  ही  तुरंत  लाभ  का  हो  ,  यदि  भगवान   के  कार्य  में  बाधक  हो   तो  उसे  अपना  सबसे  बड़ा   वैरी  मानकर  छोड़  देना  चाहिए   l 

12 November 2019

WISDOM ------ मनुष्य की महानता उसकी विवेक शक्ति में ही है

  मनुष्य  के  विकास  का  और  पशुओं  से  उसकी  श्रेष्ठता  का  मुख्य  कारण  उसकी  विवेक शक्ति   अर्थात  बुद्धि  है  l   जब  यह  कार्य  करना  बंद  कर  दे  ,  तो  उसका  सर्वनाश  सुनिश्चित  है  l
  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  कहते  हैं  --- बुद्धि  के  नाश  से  गिरने  की   प्रक्रिया  को  रोकना  -- मनुष्य  को  संभालकर   ऊँचा  उठना  सिखाना   ही  अध्यात्म  है  l  आचार्य श्री  कहते  हैं  --- 'गिरना  सरल  है   l   उठना  कठिन  है  ---- इसलिए  उन्होंने  अध्यात्म  को  जिंदगी  का  शीर्षासन  कहा  है   l   जो  इस  शीर्षासन  को  सीख  लेगा  उसकी  जिंदगी  बन  जाएगी   l   अपनी  कामनाओं  पर  अंकुश  रखकर  ,  आसक्ति  से   दूर  हटकर   त्याग  भरा  जीवन  जीना  जिसने  सीख  लिया  ,   वही   सुख - शांति   में  रहता  है   l 
             बगदाद   के शासक  ने  जितना  कर  सकता  था   धन - सम्पति  जमा  की  l   उसके  लिए  वह  प्रजा  पर  तरह - तरह  के  अन्याय  व  अत्याचार  भी  करता  था   l  उससे  प्रजा  बड़ी  दुःखी   थी  l   एक  दिन  गुरु  नानक  घूमते - घूमते   बगदाद   जा  पहुंचे   l   शाही  महल  के  सामने  ही  कंकड़ों  का   छोटा  सा  ढेर  जमा  कर   उन्ही  के  पास  बैठ  गए  l   किसी  ने  गुरु  नानक  के  आने  की   सूचना    दी   l   राजा  स्वयं  वहां  पहुंचा  l   कंकड़ों  का  ढेर  देखते  ही  उसने  पूछा  --- ' महाराज  ! आपने  यह  कंकड़  किसलिए  इकट्ठे  किए   हैं   ? "  गुरु  नानक  ने  शीघ्र  उत्तर  दिया  --- " महाराज  ! प्रलय  के  दिन   इन्हे  ईश्वर  को  उपहार  में  दूंगा  l "
 सम्राट  जोर  से  हँसा   और  बोला --- " अरे  नानक  !  मैंने  तो  सुना  था  तू  बड़ा  ज्ञानी  है  ,  पर  तुझे  इतना  भी  नहीं  पता   कि   प्रलय  के  दिन  रूहें   अपने  साथ  कंकड़  तो  क्या  सुई - धागा  भी  नहीं   ले  जा  सकतीं  l
                    गुरु  नानक  ने  कहा ---- " मालूम  नहीं  महोदय  ,  पर  मैं   आया  तो  इसी  उद्देश्य  से  हूँ  कि   और  तो  नहीं  पर  शायद  आप   प्रजा  को  लूटकर  जो  धन  इकट्ठा  कर  रहे  हो  ,  उसे  अपने  साथ  ले  जायेंगे   तो  उनके  साथ  ही  यह  कंकड़ - पत्थर  भी  चले  जायेंगे   l  "  राजा  समझ  गया   और  अब  प्रजा  का  उत्पीड़न   बंद  कर  उनकी  सेवा  में  जुट  गया   l