क्रोध एक ऐसा मनोविकार है जो बुद्धि , विवेक और भावना सबको नष्ट कर देता है l क्रोध का पहला प्रहार विवेक पर व दूसरा प्रहार होश पर होता है l इसलिए कठिन कार्यों , संकट के समय और अपमान होने पर धैर्य धारण करने की सलाह दी जाती है l क्रोध करने से शारीरिक व मानसिक ऊर्जा का क्षय होता है l जिस तरह जब पानी को गरम किया जाता है तो थोड़ी देर में वह गरम होकर उबलने लगता है और उबलने पर पानी भाप में बदलता जाता है , इसी तरह जब व्यक्ति क्रोध में गरम होकर उबलता है तो उस समय उसकी ऊर्जा सर्वाधिक मात्रा में व्यय होती है l इसलिए मनुष्य को सर्वप्रथम अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए ऐसा होने पर दुर्भावनाएं मन को घेर नहीं पाएंगी और व्यक्ति पूर्ण रूप से स्वस्थ रहेगा l
30 January 2021
29 January 2021
WISDOM -----
कर्म फल को समझाने वाली एक पौराणिक कथा है ---- एक बार महर्षि वसिष्ठ श्रीराम को उपदेश दे रहे थे l इस बीच वे लघुशंका हेतु गए l लघुशंका के दौरान वे जोर से हँसे l रामचंद्र जी ने सोचा इतने बड़े महर्षि लघुशंका के दौरान हँस रहे हैं ! क्या इन्हे इतना ज्ञान नहीं है कि इस समय कोई क्रिया नहीं करनी चाहिए l जब लौटकर आए तो श्रीराम ने पूछा --- " भगवन ! क्या बात थी आप हँसे क्यों ? ऐसे समय आपको हँसी आना किसी विशेष रहस्य का कारण है ? " महर्षि बोले ---- " मैं एक दृश्य देखकर हंस पड़ा l एक चींटा नीचे नदी के प्रवाह में बहा जा रहा था l वह चींटा नौ बार इंद्र पद पर रह चुका है , पर अपने भोग के कारण चींटे की योनि को प्राप्त हुआ है l " जब इंद्र पद प्राप्त करने वाले की यह स्थिति है तो मनुष्यों को होश में रहकर कर्म करना चाहिए l
WISDOM ---- अपने लक्ष्य को पाने के लिए सर्वाधिक महत्व की बात है कमिटमेंट l
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " कमिटमेंट अर्थात जो हम कहते हैं , उसे निभाना आना चाहिए l कमिटमेंट लक्ष्य प्राप्ति का उत्तम साधन है l जो अपने दिए वचन पर अडिग रहता है , वही प्रामाणिक होता है l ऐसे व्यक्ति को सहयोग व सहायता भी मिलती है और उसके लिए सफलता का द्वार खुल जाता है l वचन दिया है तो उसे निभाना चाहिए l सफलता के लिए यह एक अपरिहार्य शर्त है l " आचार्य श्री लिखते हैं - लक्ष्य के लिए चल पड़े हो तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए l आगे की ओर आने वाली हर कठिनाई का डटकर सामना करना चाहिए l पीठ दिखाने वाले कायर कहलाते हैं और उनका उपहास उड़ाया जाता है , जबकि चुनौती का सामना करने वाले बहादुर कहे जाते हैं और उन्ही के सिर पर सेहरा सजता है l हर चुनौती हमें एक नई सीख दे जाती है कि किस प्रकार हम अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाएं l अत: हमें कभी डरना नहीं चाहिए तथा सूझ - बूझ के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए l "
28 January 2021
WISDOM ------
सिकंदर एक ऐसा व्यक्ति था , जिसके पास किसी भी चीज की कमी नहीं थी , लेकिन वह हीनता की ग्रंथि का शिकार था और इसी मनोग्रंथि के कारण पुरे विश्व को जीतने की महत्वाकांक्षा मन में संजोये था l अपनी विश्वविजय यात्रा पर निकलने से पहले वह डायोजिनीस नामक फकीर से मिलने गया , जो हमेशा नग्न और परमानंद की अवस्था में रहते थे l सिकंदर को देखते ही डायोजिनीस ने पूछा ---- " तुम कहाँ जा रहे हो ? " सिकंदर ने कहा --- " मुझे पूरा एशिया महाद्वीप जीतना है l " डायोजिनीस ----- "उसके बाद क्या करोगे ? " सिकंदर ---- " उसके बाद भारत जीतना है l " डायोजिनीस ----- " उसके बाद ? " सिकंदर ----- " शेष दुनिया को जीतूंगा l " डायोजिनीस ---- " और उसके बाद l " सिकंदर ने खिसियाते हुए उत्तर दिया --- " उसके बाद मैं आराम करूँगा l " डायोजिनीस हँसने लगे और बोले ----- " जो आराम तुम इतने दिनों बाद करोगे , वह तो मैं अभी भी कर रहा हूँ l यदि तुम आख़िरकार आराम ही करना चाहते हो तो इतना कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता ? तुम भी यहाँ पर आराम कर सकते हो l " सिकंदर सोचने लगा उसके पास सब कुछ है , पर शांति नहीं और डायोजिनीस के पास कुछ नहीं , पर उसका मन शांति और आनंद से भरा हुआ है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' जिनका मन मनोग्रंथियों से मुक्त होता है वे कहीं भागते नहीं , किसी को जीतते नहीं , वह स्थिर होते हैं , स्वयं को जीतते हैं और धीरे - धीरे उनका मन शांति और आनंद से भर जाता है लेकिन जिनका मन मनोग्रंथियों से घिरा होता है , वे बेचैन , अशांत व परेशान रहते हैं l ऐसे व्यक्ति चाहे पूरा विश्व भ्रमण कर लें , ढेर सारी सम्पदा एकत्र कर लें , लेकिन फिर भी वे अपने मन के अँधेरे को दूर नहीं कर पाते l "
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ----- " आकस्मिक विपत्ति का सिर पर आ पड़ना मनुष्य के लिए सचमुच बड़ा दुखदायी है l इससे उसकी बड़ी हानि होती है , किन्तु उस विपत्ति की हानि से अनेकों गुनी हानि करने वाला एक और कारण है , वह है विपत्ति में घबराहट l विपत्ति कही जाने वाली मूल घटना चाहे वह कैसी ही बड़ी क्यों न हो , किसी का अत्यधिक अनिष्ट नहीं कर सकती , परन्तु विपत्ति की घबराहट ऐसी दुष्ट पिशाचिनी है कि जिसके पीछे पड़ती है उसके गले से खून की प्यासी जोंक की तरह चिपक जाती है और जब तक उस मनुष्य को पूर्णतया नि:सत्व नहीं कर देती , तब तक उसका पीछा नहीं छोड़ती l l " इसलिए विपत्ति आने पर हमें धैर्य से काम लेना चाहिए l स्वामी रामतीर्थ कहते हैं ---- " धरती को हिलाने के लिए धरती से बाहर खड़े होने की आवश्यकता नहीं है , आवश्यकता है ---- आत्मा की शक्ति को जानने और जगाने की l आत्म शक्ति का ही दूसरा नाम है आत्मविश्वास है l " आत्मविश्वास ही ईश्वरविश्वास है l
27 January 2021
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कहते हैं --- जो कुछ महाभारत में है , वही इस धरती पर है l इसके विभिन्न प्रसंग हमें शिक्षा देते हैं , जीवन जीना सिखाते हैं ------- महाभारत का एक पात्र है ----' अश्वत्थामा ' l जब महाभारत के युद्ध में दुर्योधन भी पराजित हो गया , वह घायल अवस्था में पड़ा था , उसे इस बात का दुःख था कि पांचों पांडवों में से वह किसी को नहीं मार सका l तब उसने कूटनीतिक चाल चली और शिविर में सोते हुए पांचों पांडवों को मरने चला l उस समय उस स्थान पर द्रोपदी के पांच अबोध शिशु सो रहे थे l क्रोध में उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई , उसने उन पांचों बच्चों का गला काट दिया और दुर्योधन के पास पहुंचा l दुर्योधन ने उससे भीम का सिर माँगा l सिर को अपने हाथ में लेते ही वह चौंक गया , इतना कोमल और नाजुक l दुर्योधन क्षत्रिय था , वीर था , उसको अपने जीवन के आखिरी पल में बहुत दुःख हुआ , उसने कहा --- अश्वत्थामा तुमने यह घोर पाप किया , निर्दोष बच्चों की हत्या कर दी ! पांडवों को जब इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने अश्वत्थामा को पकड़ कर द्रोपदी के सामने पेश किया कि इस घोर पाप के लिए इसे जैसा कहो वह दंड थे , लेकिन द्रोपदी को दया आ गई , और कहा जैसे मैं दुःखी हूँ , गुरु माता को भी दुःख होगा , इसे छोड़ दो l सोते हुए निर्दोष बालकों की हत्या का घृणित कृत्य कर के भी उसे क्षमा मिल गई , इससे वो सुधरा नहीं बल्कि और पाप करने की उसकी हिम्मत खुल गई l अब उसने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ को निशाना बनाया , ताकि पांडवों का वंश ही समाप्त हो जाये l गर्भस्थ शिशु की रक्षा तो भगवान कृष्ण ने की , लेकिन फिर उन्होंने अश्वत्थामा को क्षमा नहीं किया l मृत्यु दंड तो कम था , भगवान कृष्ण ने भीम से कहा -- अश्वत्थामा के मस्तक पर जो मणि है उसे निकाल दो , इससे वहां घाव हो जायेगा जो हमेशा रिसता रहेगा , उससे बुरी बदबू आएगी , मणिहीन होकर हजारों वर्षों तक ये ऐसे ही भटकता रहेगा l पूर्वज कहा करते थे -- यदि कभी अचानक तेज बदबू आये तो समझो वहां से अश्वत्थामा निकला है l ----- महाभारत का यह प्रसंग शिक्षा देता है कि कभी किसी निर्दोष प्राणी की हत्या नहीं करनी चाहिए , संसार की अदालत से तो व्यक्ति बच जाता है लेकिन प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं होता l
26 January 2021
WISDOM ------
एक पौराणिक गाथा है ----- सीता हरण के उपरांत जब रावण को परास्त करने का प्रश्न आया तो राम के द्वारा भेजा गया निमंत्रण उन दिनों के राजाओं और संबंधियों तक ने अस्वीकृत कर दिया था l उन्हें लगा कि राम तो वनवासी हैं , उनके पास कोई सेना नहीं है और रावण बहुत शक्तिशाली है , इसलिए झंझट में न पढ़कर कन्नी काट गए l लेकिन जहाँ अत्याचार और अन्याय के उन्मूलन का प्रश्न होता है , वहां दिव्य शक्तियां मदद करती हैं l रीछ और वानरों की विशाल सेना तैयार हो गई जो उत्साह , साहस और प्राणशक्ति से ओत - प्रोत थी l इसी तरह इस युग में जब छत्रपति महाराज शिवाजी अपने सैन्यबल को देखते हुए असमंजस में थे , तो समर्थ गुरु रामदास ने उन्हें भवानी के हाथों अक्षय तलवार दिलाई थी और कहा था ------ " तुम छत्रपति हो गए , पराजय की बात ही मत सोचो l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं ---- " युग सृजन में श्रेय किन्ही को भी मिले , पर उसके पीछे वास्तविक शक्ति उस ईश्वरीय सत्ता की ही होगी l युग सृजन महाकाल की योजना है l "