विश्व प्रसिद्ध संत खलील जिब्रान धनाढ्य और प्रतिभा संपन्न थे l उन्होंने गरीब और असभ्य लोगों तथा समाज के पीड़ित शोषित वर्ग में चेतना जाग्रत की , सामाजिक क्रांति का बिगुल बजाया इसके फलस्वरूप उन्हें जागीरदारों और शासक वर्ग का कोपभाजन बनना पड़ा l इन स्वार्थपरायण लोगों ने उन्हें स्वदेश से निष्कासित करा दिया , उस वक्त उन्होंने कहा था ---- ' लोग मुझे पागल समझते हैं कि मैं अपने जीवन को उनके सोने - चांदी के कुछ टुकड़ों के बदले नहीं बेचता l और मैं इन्हे पागल समझता हूँ कि वे , मेरे जीवन को बिक्री की एक वस्तु समझते हैं l ' उन्होंने धार्मिक कर्मकांड , आडंबर आदि का विरोध किया l वे कहते थे जो धार्मिक सिद्धांत , कर्मकांड , आचार - व्यवहार मनुष्यता से परे है , जिसने मानवता को विकसित होने के द्वार बंद कर दिए , वह धर्म नहीं पाखंड है l
11 April 2021
10 April 2021
WISDOM --------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' दीन - दुर्बल वे नहीं जो गरीब अथवा कमजोर हैं वरन वे हैं जो कौड़ियों के मोल अपने अनमोल ईमान को बेचते हैं , प्रलोभनों में फँसकर अपने व्यक्तित्व का वजन गिराते हैं l तात्कालिक लाभ देखने वाले व्यक्ति उस अदूरदर्शी मक्खी की तरह हैं , जो चासनी के लोभ को संवरण न कर पाने के कारण उसके भीतर जा गिरती है तथा बेमौत मरती है l मृत्यु शरीर की ही नहीं व्यक्तित्व की भी होती है l गिरावट भी मृत्यु है l ' लोभ , लालच , तृष्णा आदि दुर्गुणों से ग्रस्त व्यक्ति कितना ही धन , वैभव और शक्ति संपन्न हो , वह मन का दरिद्र होता है और अपनी असीमित इच्छाओं को पूरा करने के लिए वह अपना स्वाभिमान , आत्मविश्वास , अपना चरित्र सब कुछ खो देता है l
WISDOM -----
प्राचीन समय की बात है , जब धरती विभिन्न सीमाओं में नहीं बँटी थी और सुविधानुसार योग्य व्यक्ति अपने साधनों और समझ के अनुसार एक भूभाग की देखभाल किया करते थे l प्रजा सुखी व संपन्न थी , कोई अपराध नहीं थे l वक्त बीतता गया , उस योग्य व्यक्ति को . राजा ' नाम दे दिया गया , खुशियां तब भी थीं l प्रत्येक भूभाग के धन - संपन्न व्यक्ति विभिन्न प्रशासकीय कार्यों के लिए मदद करते थे और प्रजा के हित के लिए शिक्षण संस्थाएं , अस्पताल , कुएं व पशुओं के लिए चारागाह आदि विभिन्न लोक कल्याण के कार्य करते थे l सब दिन एक से नहीं होते l विभिन्न भूभागों में से एक में एक व्यक्ति बहुत संपन्न था , उसका व्यापार दूर - दूर तक था , वह विभिन्न क्षेत्रों में लोगों की , और राजा की मदद भी करता था l इस बात का उसे बड़ा अहंकार था , वह सोचने लगा कि जब हम इतना धन सब की मदद में देते हैं तो हुकूमत भी हमारी चलनी चाहिए l उसने विभिन्न भूभाग के धनिकों से संपर्क किया और संगठन बनाकर यह निश्चय किया कि प्रत्येक भूभाग में सभी नियम - कानून उनकी सहमति और स्वीकृति से ही लागू होंगे l ऐसा करने के लिए उन्होंने अपने भूभाग के राजा को आश्वासन दिया कि यदि वे उनकी कठपुतली बन कर रहेंगे तो हमेशा गद्दी पर बने रहेंगे l एक कहावत है ---- ' तेली का काम तमोली नहीं कर सकता ' l जब व्यापार करने वाले प्रशासनिक कार्य में दखल करने लगे तब सभी नियम - कानून में उनका स्वार्थ प्रमुख हो गया l ऐसे नियम बने कि उनकी अमीरी में कमी न आए और जनता गरीब और मजबूर हो जाये ताकि उसमे विद्रोह की हिम्मत ही न रहे l अपने अस्तित्व को बचाने के लिए बड़ी मछली ने छोटी मछली को निगल लिया l जो श्रम का महत्त्व समझते थे उन्हें भी आलसी बना दिया l विभिन्न भूभागों के राजा जिन्होंने सत्ता और धन के लालच में अपना स्वाभिमान गिरवी रख दिया था , धरती से उनके भी जाने के दिन आ गए लेकिन तब तक बहुत देर हो गई थी l श्रम से दूरी के कारण लोग आलसी और भिखारी हो गए और पेट की आग के कारण आपस में ही लड़ मरे l अराजकता और अव्यवस्था ने सब को निगल लिया और अनेक गुणों की खान वह सभ्यता और संस्कृति विभिन्न आपदाओं को सह न सकी और धूल में मिल गई l
8 April 2021
WISDOM ------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने लिखा है ---- " सच्ची राजनीति वही है जिसमे दुष्टों के दमन के साथ - साथ शिष्टों के रक्षण और पालन का पूरा -पूरा ध्यान रखा जाए l ' महात्मा ईसा ने भी लिखा है ---- जो तलवार की धार पर रहते हैं ,उनका अंत भी तलवार से ही होता है l " समर्थ गुरु रामदास ने अपने अनुयायिओं को उस राजनीति की शिक्षा दी जो विवेक , सूझबूझ और सावधानी पर आधारित होती है l उनका कहना था कि ---- ' सांसारिक व्यवहार में भी हमको अकारण किसी का अहित नहीं करना चाहिए , यथासंभव समझौते तथा मेलमिलाप की नीति से ही काम लेना चाहिए l लड़ना तभी चाहिए जब कोई नीच या स्वार्थी व्यक्ति दुष्टता करने पर उतारू हो l " श्री समर्थ के सभी विचार उनके ग्रन्थ ' दासबोध ' में हैं , उनका कहना था ---- " हमें दूसरों के मन की बात को समझना चाहिए l सदैव किसी के अवगुणो को कहते रहना अच्छा काम नहीं है l छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसी नीति पर चलकर महाराष्ट्र में अद्भुत एकता और संगठन शक्ति उत्पन्न कर दी और औरंगजेब जैसे साम्राज्यवादी के छक्के छुड़ा दिए l
7 April 2021
WISDOM -------
श्री महादेव गोविन्द रानाडे के जीवन का प्रसंग है --- जब वे कुछ समय के लिए कोल्हापुर में जज के पद पर थे l उनके पिता के अनेक परिचित उन दिनों घर आने लगे कि वे उनके मुकदमे में सिफारिश कर दें l एक बार उनके दूर का कोई संबंधी जो प्रतिष्ठित व्यक्ति था , किसी बड़े झगड़े में फँस गया था , उसने उनके पिता से कहा कि वे रानाडे से सिफारिश करें कि वे उनके कागजात अच्छी तरह देख लें , तब मुकदमे का फैसला करें l उसके बार - बार अनुनय - विनय करने पर रानाडे के पिता को उस पर दया आ गई और उन्होंने अपने बेटे से कहा कि वे उसकी बात सुन लें l रानाडे बड़े पितृभक्त थे उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया l तब उस व्यक्ति ने कहा --- ' मैं आपको अपने कागज - पत्र दिखाना चाहता हूँ , जब आपको अवसर हो तो दिखाऊं l ' रानाडे ने बड़ी नम्रता से उत्तर दिया ---- जी नहीं , आज तो मुझे बहुत काम है , जब अवसर होगा तब आपको सूचना दे दूंगा l " जब वह सज्जन चले गए तब बहुत विनय के साथ किन्तु स्पष्ट शब्दों में उन्होंने अपने पिता से कहा ---- " मैं जानता हूँ कोल्हापुर के सभी लोग आपके परिचित हैं l वे सभी अपने मुकदमे में आपसे सिफारिश कराना चाहेंगे आप किस प्रकार सबके मन की बात पूरी कर सकेंगे ? इसलिए इस संबंध में अच्छी तरह विचार कर लीजिए , अन्यथा विवश होकर मुझे यहाँ से बदली करा लेनी पड़ेगी l "
6 April 2021
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प्रसिद्ध मानवतावादी विद्वान रोमारोलाँ ने लिखा है ---- ' लेनिन वर्तमान शताब्दी के सबसे कर्मठ और साथ ही स्वार्थ त्यागी व्यक्ति थे l उनने आजीवन घोर परिश्रम किया पर अपने लिए कभी किसी प्रकार के लाभ की इच्छा नहीं की l ' लेनिन 17 वर्ष की अवस्था में ही जन क्रांति के महत्त्व और शक्ति को समझते थे l वे जारशाही के तो दुश्मन थे लेकिन वे कहते थे ---' षड्यंत्र और गुप्त हत्याओं का मार्ग सही नहीं है , हम इस पर चलकर सफलता नहीं पा सकते l जब उन्हें जारशाही ने साइबेरिया में निष्कासित कर दिया तो वे शुसेनिस्क नमक गाँव में नजरबंदी का जीवन बिताना पड़ा l वहां के कष्ट और कठिनाइयों के कारण कितने ही कैदी पागल हो जाते थे , भूखों रहकर मर जाते थे लेकिन लेनिन मनस्वी और कर्मठ थे , उन्होंने समय का सदुपयोग किया , वहां के किसानों , मजदूरों को मुकदमे आदि के संबंध सलाह देते थे l उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी --' कहाँ से कार्य आरम्भ करें ' l इसे लोग रूस की राज्य क्रांति का प्राइमर कहने लगे थे l
5 April 2021
WISDOM -------
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " किसी भी देश के स्वाधीनता आंदोलन में उचित मार्ग चुनने का भी बड़ा महत्व है l यदि ऐसा न किया जाए तो प्रकट में बड़ा परिश्रम , त्याग , कष्ट सहन करते हुए भी हम अपनी शक्ति को बर्बाद करते रहते हैं और प्रगति मार्ग पर बहुत ही कम अग्रसर हो पाते हैं l सभी राजनीतिक कार्यकर्ता अपने - अपने रास्ते को सही और प्रभावशाली बतलाते हैं पर लेनिन के समान व्यक्ति समस्त राष्ट्र में दो - चार ही होते हैं जो समय की गति को बिलकुल ठीक समझ सकते हैं और उसके अनुकूल विधान बना सकते हैं l हमारे देश में महात्मा गाँधी इसी श्रेणी में थे और इसलिए उन्होंने असंभव को संभव कर के दिखा दिया l