31 August 2021

WISDOM ------ संस्कार प्रबल होते हैं , स्वभाव नहीं बदलता

   पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी  लिखते  हैं  ----  "  शत्रु  को   आधा  कुचलकर  छोड़  देने  से   वह  प्राय:  प्रतिशोध  की  ताक   में  रहता  है   और  फिर  से  तैयार  होकर  आक्रमण  कर  सकता  है   l   आचार्य श्री  आगे  लिखते  हैं  ---- " दुष्ट  शत्रु  पर  दया  दिखाना   अपना  और  दूसरों  का  अहित  करना  है  l   आजकल  के  व्यवहार  शास्त्र  का   स्पष्ट  नियम  है   कि   दूसरों  को  सताने  वाले  दुष्ट जन  पर   दया  करना  ,  सज्जनों  को  दंड  देने  के  समान   है    क्योंकि  दुष्ट  तो  अपनी  स्वभावगत   क्रूरता  और   नीचता  को  छोड़  नहीं  सकता  ,  वह  जब  तक  स्वतंत्र  रहेगा   और  उसमें  शक्ति  रहेगी  ,  वह  निर्दोष  व्यक्तियों  को   सब  तरह  से  दुःख  और  कष्ट   ही  देगा   l 

29 August 2021

WISDOM ----- मूर्ख के साथ मित्रता दुखदायी होती है

      वाराणसी  के  शासक  ब्रह्मदत्त  का   राजोद्यान  देश - देशांतर   के  दुर्लभ  एवं  सुन्दर  वृक्षों , लताओं  का  संग्रह  था     बोधिसत्त्व   उसी  उद्यान  में  सपरिषद   विश्राम  कर  रहे  थे   l   उस  दिन  नगर  में  एक  भव्य  उत्सव  आयोजित  था   l    बाग़    के  मालिक  को  उत्सव  देखने  की  लालसा  थी  l  उद्यान  में  बंदरों  का  एक  समूह  था  l   बंदरों  के  नायक  से    माली  की  मैत्री  थी  l  उसने  नायक  बन्दर  को  बुलाकर  कहा  --- " मित्र  !   एक  दिन  तुम  अपने  समूह  के  साथ   मिलकर  उद्यान  सींच  दो    तो  मैं  उत्सव  देख  आऊं   l  "  बन्दर  ने  प्रसन्नता  से   कार्य  करने  का  वचन  दिया   l   माली  चला  गया  तो  नायक  ने  बंदरों  से  कहा  ---" मित्रों  , हमें  विवेकपूर्ण  सिंचन  करना  चाहिए  , अन्यथा  जल  का  अभाव   हो  जायेगा  ,   तुम   लोग  पहले  लताओं  को  उखाड़कर    उनकी  जड़ों  की  गहराई  देख  लो   l   जो  जड़  जितनी  गहरी  हो  ,  उसके  अनुसार  ही  सिंचन  करो  l  '  बंदरों  ने  शीघ्र  ही  लताएं  उखाड़  डालीं   l   माली  जब  वापस  आया    तो  उसने  सिर   पीट  लिया   और  समझ  गया   कि   मुर्ख  से  दोस्ती   कितनी  हानिकारक  है  l     ऐसी  ही   एक  लघु  कथा  है  ----- एक  राजा  ने  बन्दर  से  दोस्ती  की  l   राजा  जब  दोपहर  को  कुछ  देर  सोता  था  तब  वह  बन्दर  उसे  पंखा    झलता    था   l   एक  दिन  राजा  को  गहरी  नींद   आ  गई  l   बन्दर  पंखा  झलने  लगा  l  अचानक  राजा  की  नाक  पर  एक  मक्खी  आकर  बैठ  गई  l   बन्दर  पंखा  झलकर  मक्खी  को  भगाने   की  कोशिश  करने  लगा   l   मक्खी  बार - बार  उड़ती  और  फिर  राजा   की  नाक  पर  बैठ  जाती  l   बन्दर  को  बहुत  गुस्सा  आई   l      वहीँ  पास  में  राजा  की  तलवार  रखी   थी  , उसने  वह  तलवार  उठा  ली  और   मन  ही  मन  कहने  लगा  , -बैठने  दो  , मक्खी  को  ,  अब  मैं  देखूंगा   l    जैसे  ही  मक्खी  राजा  की  नाक   पर  बैठी  बन्दर  ने  तलवार  से  वार  किया  ,  मक्खी  तो  उड़  गई  ,  [पर  राजा  लहूलुहान  हो  गया  l   इस  कथा  से  हमें  यही  शिक्षा  मिलती  है  कि   कभी    भी    किसी    मूर्ख    से  मित्रता  नहीं  करनी  चाहिए   l                                                                                                                                                           

28 August 2021

WISDOM -----

   दुर्बुद्धि  का  प्रकोप     पतन  की  ओर   ले  जाता  है   l   व्यक्ति  जिस  स्तर  का  है  ,  वह    उसी  के  अनुरूप   क्षेत्र  को   अपनी  दुर्बुद्धि  की  चपेट  में  ले  लेता  है  l  दुर्बुद्धि   को  मनुष्य   अपनी  कमजोरियों  के  कारण  स्वयं  आमंत्रित  करता  है  l    ' महाभारत  '  का  यह  प्रसंग  इस  सत्य  को   स्पष्ट  करता  है   ------  ' भोगविलास , जुआखोरी , नशा  आदि  ऐसे  व्यसन  हैं   कि   उनसे  होने  वाली  बुराइयों  को  जानते  हुए  भी   लोग  उनके  चक्कर  में  आ  जाते  हैं   l   धर्मराज  युधिष्ठिर  का  राज्याभिषेक  हो     चुका    था  l  इंद्रप्रस्थ  के  वैभव  से  दुर्योधन  को  बहुत  ईर्ष्या  थी  ,  वह  उन्हें  आगे  बढ़ता  हुआ  नहीं  देख  सकता  था  , इसलिए  उसने   अपने  मामा    शकुनि  के  साथ  मिलकर  धृतराष्ट्र  को  इस  बात  के  लिए  राजी  कर  लिया  कि   वे  युधिष्ठिर  को  चौसर  खेलने  के  लिए  आमंत्रित  करें   l   उन  दिनों  क्षत्रियों  में  यह  नियम  था  कि    खेल  के  लिए  बुलावा  मिलने  पर  उसे  अस्वीकार  नहीं  किया  जा  सकता  था  l    फिर  युधिष्ठिर  को  चौसर  का  व्यसन  भी  था   l   खेल  शुरू  हुआ  , दुर्योधन  तुरंत  बोल  उठा   --- मेरी  जगह  मामा  शकुनि  खेलेंगे    लेकिन  दांव   लगाने  के  लिए  जो  धन - रत्न  आदि   चाहिए  वह   मैं     दूंगा   l   पासे   तो  शकुनि  के  इशारे  पर  चलते  थे   l   इंद्रप्रस्थ  में    अपार  वैभव  था   l   सम्राट  युधिष्ठिर  ने  दांव  लगाना  शुरू  किया  ----  पहले  रत्नों  की  बाजी  लगी ,  फिर  सोने - चाँदी   के  खजानों  की  ,  फिर  रथों  और  घोड़ों  की  ,  तीनो  दांव  हार  गए  l  युधिष्ठिर  ने   नौकर - चाकरों  को  दांव  पर  लगाया  ,  फिर  सारी   सेना  और   हाथी   - घोड़ों  की  बाजी  लगा  दी  ,  सब  हार  गए   खेल  में  युधिष्ठिर    एक - एक  कर  के     अपने  सारे  वैभव  की  बाजी  लगाते   गए  ,  यहाँ  तक  कि   अपने  देश  और  देश  की  प्रजा  को  भी  खो  बैठे   l  लेकिन  उनका   चस्का  न  छूटा   l  शकुनि  कपटी  था  , उसने   कहा  - अभी  तो  तुम्हारे  चार  वीर  भाई  हैं , उन्हें  दांव  पर  क्यों  नहीं  लगते   l  एक - एक  कर  के   युधिष्ठिर    ने  नकुल , सहदेव , भीम , अर्जुन    और  उनके  शरीर  पर  जो  वस्त्र - आभूषण  थे  सबको  दांव  पर  लगा  दिया  ,  यह  बाजी  भी  हार  गए   और  अंत  में  स्वयं  को  भी  हार  गए   l  शकुनि  ने  सभा  में  खड़े  होकर  घोषणा  की   कि   अब  पाँचों  पांडव  उसके  गुलाम  हो   चुके  हैं  l   शकुनि  बड़ा  दुष्टात्मा  था  ,  उसने  युधिष्ठिर  से  कहा  --- अभी  तुम्हारे  पास  एक  चीज  और  है  जो  तुमने  हारी  नहीं  है   और  वो  है  तुम्हारी  पत्नी   द्रोपदी  ,  तुम  उसको  दांव  पर  क्यों  नहीं  लगाते  ?  उसकी  बाजी  लगाओ  तो  अपने  आप  को  भी   छुड़ा  सकते  हो  l  "  जुए  के  नशे  में  चूर  युधिष्ठिर  के  मुँह   से  निकला  --- ' चलो , अपनी  पत्नी  द्रोपदी  की  भी  बाजी  लगाईं   l '  शकुनि  यही  चाहता  था    '  तो  यह  चला  '  कहते  हुए  उसने  पासा   फेंका   और  बोला ---- ' लो  यह  बाजी  भी  मेरी  ही  रही   l '   अब  दुर्योधन  बोला ---- ' द्रोपदी  अब  महारानी  नहीं  ,  हमारी  दासी  है  ,  उसे  सभा  में  ले  आओ -------------            विदुर  जी  ने  कहा  ----   युधिष्ठिर  स्वयं  को  हार  चुके  थे , वे  स्वयं   गुलाम  हो  गए  थे  इसलिए  उन्हें  द्रोपदी  को  दांव  पर  लगाने  का  कोई  हक  नहीं  l  '        लेकिन  जब  व्यक्ति   दूसरों  का  और  विशेष  रूप  से  अपनी  ही  कमजोरियों  का  गुलाम  हो  जाता  है   तो  उसको  आत्मविश्वास  कम    हो  जाता  है    तब   चालाक  और  छल -कपट  करने  वाले   इसका  फायदा  उठाकर  नीति   और  न्याय  विरुद्ध  कार्य  करते  हैं   l   परिणाम ---- महाभारत ,  विनाश   !

27 August 2021

WISDOM -----

  समर्थ  गुरु  रामदास  सतारा  जा  रहे  थे   l   मार्ग  में  उनका  शिष्य   भोजन  लेने  पास  के  गाँव  में  गया   l  उसे  लगा  कि   रास्ते  में  देर  हो  सकती  है  तो  खेत  से  चार  भुट्टे  तोड़  लाया  l  उसने   भुट्टों   को   भूनकर   स्वामी जी  को  दिया  l   धुआँ   उठता  देख  खेत  का  मालिक  भागा -भागा  आया   और  समर्थ  स्वामी  के  हाथ  में  भुट्टे  देखकर  उन्हें  ही   डंडे  से   मारने  लगा   l  शिष्य  कुछ  बोलता  तो  उसे  चुप  कर  समर्थ  गुरु  ने   मार  खा  ली   l   दूसरे  दिन  वे  सतारा  पहुंचे   l   उनकी  पीठ  पर  डंडे  के  निशान  थे   l   शिष्य  ने  भी  वहां  पहुंचकर  सारी   घटना  बता  दी   l   छत्रपति  तक  यह  विवरण  पहुंचा   l   उनने  सेनानायक  से  पता  लगवा  लिया  कि   यह  अपराध  किसके  द्वारा  हुआ  है   l   अभी  तक  समर्थ  गुरु  रामदास  कुछ  बोले  न  थे   l   छत्रपति   शिवाजी    गुरु  को  प्रणाम  करने  आये  तो   वह  खेत  का  मालिक  भी  पीछे -पीछे  लाया  गया   l   शिवाजी  ने  पूरे   राज्य  की  ओर   से  क्षमा  मांगते  हुए  पूछा  ----  " गुरुवर  !  इसे  क्या  दंड  दूँ   ? "  खेत  का  मालिक  गुरु  के  चरणों  में  जा  गिरा  l  समर्थ  बोले  ---- " इसने  हमारे  धैर्य  और  सहन शक्ति  की  परीक्षा  ली   l   इसने  अपना  कर्तव्य  निभाया  है   l   इसे  दंड  न  देकर   चार  भुट्टों  का  हरजाना    नगद  राशि  के  रूप  में   तथा  एक  कीमती  वस्त्र   देकर  सम्मानित  करना  चाहिए  l  "  न्याय  का  यह  विलक्षण  रूप  देखकर   छत्रपति  गुरु  के  चरणों  में  झुक  गए  l  

WISDOM ------

   कहते  हैं -- जो  ' महाभारत '   में  है   वही  इस  धरती  है   l  व्यक्ति  अपने  संस्कार  के  अनुरूप    ही  उससे  सीखता  है   l  महाभारत  का  प्रसंग  है  ---- दुर्योधन  के    गुरु  द्रोणाचार्य  से    ऐसा  कहने  पर  कि   कौरव  पक्ष  के   के  अनेक  वीर  युद्ध  में  मारे  गए  लेकिन  पांडव  पक्ष  का  ऐसा  कोई  नुकसान  नहीं  हुआ   ,  कहीं  ये  आपका  अर्जुन  के  प्रति  मोह  तो  नहीं   ?   तब  गुरु  द्रोणाचार्य  ने  चक्रव्यूह  की  रचना  की    , इस  चक्रव्यूह  में  भगवान  कृष्ण  की  बहन   सुभद्रा  और  अर्जुन  के  पुत्र  अभिमन्यु  को  सात  महारथियों  ने  मिलकर   मार  डाला   l   आसुरी  प्रवृति  के  लोग   इसी  तरह   कभी  जाति   के  आधार  पर  , कभी  धर्म  के  आधार  पर  ,  कभी  अपनी  विकृत  मानसिकता  के  कारण  ऐसे  ही  कलियुगी  चक्रव्यूह  रचते  हैं   l   विज्ञान   के  आविष्कारों  ने   और  संवेदनहीन  ज्ञान  ने  इन  चक्रव्यूह  का  घेरा  बहुत  बड़ा  कर  दिया  है   और  धनवानों  के  लालच  व  महत्वाकांक्षा  ने   इस  घेरे  को  मजबूत  कर  दिया  है   l     कलियुग  में  दुर्बुद्धि  का  प्रकोप  होता  है  l  पहले  घातक  हथियारों  का  निर्माण  होता  था   असुरता  के  अंत  के  लिए   लेकिन  अब   संसार  पर  अपना  वर्चस्व  कायम  करने  के  लिए ,  लोगों  का  दिल  जीतकर  नहीं  ,  उन्हें  डरा - धमका  कर  अपने  नियंत्रण  में  रखने  के  लिए   घातक  हथियार  बनते  हैं  ----- फिर  जब  बन   गए  तो  उनको   बेचना  भी  जरुरी  है  ----- अब  जब   तक  उनका  प्रयोग  नहीं  होगा  ,  तब  तक  और  ज्यादा  कैसे  बिकेंगे   ?  लाभ  कैसे  होगा   ?  यह  चक्रव्यूह   महाभारत  की  तरह  किसी  एक  दिन  का  युद्ध  नहीं  है   l   यह  तो  तब  तक  चलेगा   जब  तक  लोगों  के  हृदय  में  संवेदना  नहीं  जागेगी   l  जब  मनुष्य  में  विवेक  का  जागरण  होगा ,  सद्बुद्धि  आएगी  तभी  यह  चक्रव्यूह  टूटेगा     l    शक्ति  का  सदुपयोग  नहीं  होगा  तो  मानवता  को  नष्ट  होने  में  देर  नहीं   लगेगी  l 

26 August 2021

WISDOM -----

   एक  गाड़ीवान  हनुमान जी  का  बड़ा  भक्त  था   l   नित्य  उनके  मंदिर  में  दर्शन  को  जाता  था   और  वहां  बैठकर  हनुमान चालीसा  का  पाठ   करता  था  , ताकि  हनुमान जी  अपने  कानों  से  सुन  लें  l   एक  दिन  गाड़ीवान  अपनी  गाड़ी   लेकर   कहीं  दूर  गाँव   जा  रहा  था   l  वर्षा  के  दिन  थे  l   सड़क  जगह - जगह  से  टूटी  हुई  थी  , गड्ढ़ों   में  पानी  भरा  था  l  रास्ते  में  एक  जगह  भारी  कीचड़   भरा  हुआ  था  ,  पहिये  उसमें  फँस   गए   l   बैल  उसे  खींच   नहीं  पा  रहे  थे   l   वह  स्वयं  कीचड़  में  उतारकर  गाड़ी  खींचना  नहीं  चाहता  था  l   फिर  गाड़ी  बाहर  कैसे  निकले  l   गाड़ीवान  उसी  में  बैठकर  जोर - जोर  से  हनुमान चालीसा  पढ़ने  लगा   l   उसका  अभिप्राय  था  कि   हनुमान जी  आएं  और  उसकी  गाड़ी   बाहर   निकालें   l  पाठ  करते - करते  बहुत  देर  हो  गई  , पर  हनुमान जी   नहीं    आए  l  वह  झल्लाने  लगा  और  बुरा  बोलने  लगा   l   एक  किसान  पास  के  खेत  में   हल  जोत   रहा  था   l   उसने  यह  तमाशा  देखा   और  बोला   ---- "   मूर्ख  !  हनुमान जी  तो  अनदेखे  पर्वत  को  उखाड़  लाए   थे  l   तू  उनका  भक्त  बनता  है  तो   कीचड़  में  उतारकर   पहिये  को  जोर  क्यों  नहीं  लगाता   , ताकि  धकेले  जाने  पर   वे  आगे  बढ़ें  l   हनुमान जी  ने  तो  समुद्र  पार  कर  लिया  , तुझसे  कीचड़  में  नहीं  उतरा  जाता   l  "  अंध भक्त   को  चेत  हुआ   l   उसने  अपनी  गलती  समझी    और  कीचड़  में  उतरा   l   पहिये  को  जोर  लगाया  ,  गाड़ी  आगे  चली   और  कीचड़  के  पार  हो  गई  l   जो  काम  अपने  पुरुषार्थ  से  हो  सकता  है  ,  उसके  लिए  आलसी  बनकर  देवता  को  क्यों  पुकारा  जाये   ? 

25 August 2021

WISDOM ----

 पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ----- " मनुष्य  में  अच्छाइयां  भी  होती  हैं  और  बुराइयां  भी  होती  हैं  ,  न  कोई  पूर्ण रूपेण  अच्छा  है  ,  और  न  कोई    बिलकुल  बुरा   l   गुण , कर्म  स्वाभाव  में  हर  मनुष्य  दूसरे  से  भिन्न  होता  है   किन्तु  यदि  सामाजिक   हित   पर  व्यक्तिगत  इच्छाओं , आकांक्षाओं  को   वारे  जाने  का  दृष्टिकोण  अपनाने  पर   उसका  यह  मिश्रित  स्वरुप  भी  उपयोगी  और  चिरस्मरणीय  बन  सकता  है   l  l  "     स्टालिन  उसका  सटीक  उदाहरण  है   l   मार्क्स  की  पुस्तक  ने  स्टालिन  को  क्रांतिकारी   बना  दिया  l   उन  दिनों  रूस  की  सामाजिक  दशा   बहुत  बिगड़ी  हुई  थी   l   जार  के  अत्याचारों  से  जनता    त्रस्त   थी    l  जार  के  निरंकुश  शासन  से   मुक्ति  दिलाने  के  लिए    स्टालिन  ने  अपने  जीवन  के  स्वर्णिम  20  वर्ष   समर्पित  किए  l  इस  दौरान  स्टालिन  को  गालियाँ, चाबुक ,   मार ,   यंत्रणाएँ    सभी  कुछ  सहना  पड़ा   l  इस  अवधि  में  उसे   उत्तरी  ध्रुव  से  लगी  रूस  की  सीमा  के  एक   गाँव  में  जेल   में  रखा  गया   l   इस  गाँव  के  दो  सौ   मील   तक  कोई  बस्ती  नहीं  थी  ,  कड़ाके  की  ठण्ड  पड़ती  थी   l   ऐसी  भयंकर  जेल  में  स्टालिन  ने  चार  वर्ष  गुजारे   l     जारशाही  का  अंत  हुआ  ,  फिर  लेनिन  की  मृत्यु  के  बाद  शासन  सत्ता  स्टालिन  के  हाथ  में  थी   लेकिन  उसने  अपने  कष्ट , त्याग   और  बलिदान  का  मुआवजा  सुख -  वैभव    के  रूप  में  नहीं  लिया  ,  वह  नौकरों  के  रहने   वाले   क्वार्टर  में  ही  रहते  थे  ,  उन्ही  के  जैसा  खाना   खाते    थे    l   आत्मप्रशंसा  और  आत्म विज्ञापन  से  वह  कोसों  दूर  था  l