लघु कथा --- राजू एक चंचल लड़का था , जंगल में सैर के लिए जाता था l एक दिन उसने देखा कि एक शेर बैठा है , उसकी आँख में आंसू है , पैर में काँटा चुभा हुआ है , वह दर्द से कराह रहा है l राजू ने हिम्मत की और आगे बढ़कर शेर के पैर से काँटा निकाल दिया और अपने पास जो मरहम रखे था , वह उसकी चोट में लगा दिया l शेर को बहुत आराम मिला और अब उसकी राजू से दोस्ती हो गई l इस अहसान के बदले वह राजू को अपनी पीठ पर बैठकर जंगल की सैर कराया करता था l एक दिन कुछ गाँव वालों ने राजू को शेर के साथ देखा तो शेर से डरकर भागने लगे l राजू ने उन्हें रोकते हुए कहा --- अरे ! भागो मत ! यह तो मेरा पालतू कुत्ता है l ' शेर को यह सुनकर बहुत बुरा लगा , वह गुर्रा कर चला गया l उसके बाद उसने कभी राजू को अपनी पीठ पर नहीं बैठाया , उसके पास भी नहीं आया l यह कथा इस सत्य को बताती है कि प्रेम , अपनापन , मान -सम्मान जानवर भी समझते हैं , मजाक में भी झूठ बोलकर कभी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए l
9 May 2023
8 May 2023
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लघु कथा ----- एक माली के लड़के बड़े आलसी थे l वे कामकाज से जी चुराते थे और व्यर्थ की बातों में अपना समय नष्ट करते थे l जब माली मरने लगा , तो उसने लड़कों को बुलाया और कहा --- " तुम लोग आलस्य में पड़े रहकर घर में जो कुछ है , सबको अवश्य बरबाद कर लोगे , पर मैंने तुम्हारे भविष्य का ध्यान रखा और बाग़ में प्रत्येक पेड़ के नीचे थोडा -थोडा सोना गाढ़ रखा है l जब जरुरत हो तब निकाल लेना l यह कहकर माली गया l घर में जो थोड़ी सी पूंजी थी वह भी समाप्त हो गई l लड़के भूखों मरने लगे l उन्होंने सोचा कि चलो पेड़ों के नीचे से सोना निकालें l अब वे खुदाई करने में जुट गए और एक -एक कर के सभी पेड़ों को खोदते गए पर किसी के नीचे कुछ नहीं निकला l लड़के जानते थे कि हमारा बाप कभी झूठ नहीं बोलता था , फिर उनकी यह सोने वाली बात कैसे झूठ निकली , इसका उन्हें आश्चर्य था l कुछ दिनों बाद वर्षा हुई , पेड़ों के नीचे की जमीन खुद जाने के कारण जड़ों में काफी पानी पहुंचा और हर पेड़ ने काफी संख्या में फल दिए l आमदनी इतनी हुई कि हर पेड़ के नीचे सोना निकलने की बात सच हो गई l श्रम और संयम से मनुष्य अपना जीवन सफल बना सकता है l
7 May 2023
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " मानव जीवन की सफलता इसी में है कि हम व्यक्तिगत लाभ और सुख का विचार छोड़कर अपनी शक्तियों का उपयोग परोपकार के लिए करें l " -------- वृक्षों में प्रतिस्पर्धा होने लगी कि कौन बड़ा होकर आसमान छू लेता है ? सबने अपना -अपना प्रयत्न किया और ऊंचाई छू लेने की प्रतिस्पर्धा में ध्यान ही नहीं रहा कि विस्तार और फैलाव भी रुक सकता है और वही हुआ l ताड़ का वृक्ष बाजी जीत गया l वह ऊँचा तो हो गया और अहंकार में गर्दन उठाए खड़ा भी हो गया किन्तु विस्तार न होने से वह किसी के काम का न रहा l ' पक्षी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ' आचार्य जी लिखते हैं ---- ' मनुष्य यश , धन , पद पाकर अहंकार तो बड़ा कर सकता है किन्तु ताड़ के वृक्ष की तरह उपयोगिता घटा बैठता है l '
6 May 2023
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गुलामी एक मानसिकता है l यह व्यक्तिगत गुण है l एक धन -वैभव संपन्न व्यक्ति भी किसी का गुलाम हो सकता है और एक निर्धन व्यक्ति जो अपनी मेहनत से परिवार का गुजर -बसर करता है , किसी के हाथ की कठपुतली नहीं है वह गुलामी की जंजीर में जकड़ा नहीं है l सत्य तो यह है कि व्यक्ति अपनी ही कामना , वासना , तृष्णा , लोभ , लालच , स्वार्थ , महत्वाकांक्षा ------अपनी ही कमजोरियों का गुलाम है l हर तरह से समर्थ होने के बावजूद भी अपनी इन कमजोरियों के पोषण के लिए वह किसी न किसी की गुलामी करता है l महाभारत में पितामह भीष्म , द्रोणाचार्य , कृपाचार्य , कर्ण और दुर्योधन के सभी भाई , कोई भी राज -वैभव से , सत्ता के सुख से वंचित होना नहीं चाहता था , इसलिए सबने आँख बंद कर के दुर्योधन का समर्थन किया , उसके हर षड्यंत्र और द्रोपदी के चीरहरण जैसे दुष्कृत्य पर भी वे सब मौन रहे l यह सुख -भोग की चाहत के लिए गुलामी थी l ऐसा नहीं है कि दुर्योधन इसके लिए उनका सम्मान करता था , उसे जब भी मौका मिलता उन्हें बातें सुनाने , ताने देने से नहीं चूकता था l दो तरह के व्यक्ति होते हैं ---एक वे जो अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी गुलामी स्वीकार कर लेते हैं और दूसरे वे जो दूसरों को अपना गुलाम बनाने की कला में माहिर होते हैं l ये दूसरे प्रकार के व्यक्ति लोगों की कमजोरियों का पता लगते हैं और फिर उन पर लालच का , कामनाओं का जाल फेंकते हैं l अपने मन पर नियंत्रण न होने के कारण लोग ऐसे जाल में फँस जाते हैं और जीवन भर की गुलामी स्वीकार कर लेते हैं l यदि यह सामान्य व्यक्ति है तो ऐसी गुलामी के फायदे और नुकसान केवल उसके परिवार तक ही सीमित रहते हैं लेकिन यदि व्यक्ति का स्तर ऊँचा है तो ऐसी गुलामी से होने वाले नुकसान की गणना असंभव है l जैसे --- जब सिकंदर विश्व -विजय के अभियान में भारत की ओर बढ़ा तो उसने तक्षशिला के महाराज आम्भीक को पचास लाख रूपये की भेंट के साथ सन्देश भेजा कि यदि वह सिकंदर की मित्रता स्वीकार करे तो वह उसे महाराज पुरु को जीतने में उसकी मदद करेगा और पूरे भारत में उसकी दुन्दुभी बजवा देगा l आम्भीक को महाराज पुरु से बहुत ईर्ष्या -द्वेष था , वह इस लालच के जाल में फँस गया l ऐसे इतिहास में अनेकों उदाहरण हैं और उसके घातक परिणामों से इतिहास भरा है l इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है --- अपनी इच्छाओं को अपने वश में रखो , अपने मन पर नियंत्रण रखो तभी सुख -शांति और असीम आनंद का जीवन जी सकते हो l
4 May 2023
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पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' इस संसार की सभी समस्याओं का एकमात्र हल ' संवेदना ' है और स्वार्थ इनसान को संवेदनहीन बना देता है l ' संवेदनहीन मनुष्य हिंसक पशु के समान है l भौतिक द्रष्टि से मानव समाज बहुत विकसित हो गया है लेकिन चेतना के स्तर पर वह आज भी पशु है l यदि मनुष्य और पशु की तुलना की जाए तो कई बातों में पशु श्रेष्ठ हैं --- पशु कभी किसी को धोखा नहीं देते , किसी के विरुद्ध छल , कपट षड्यंत्र नहीं रचते , किसी का शोषण , उत्पीड़न नहीं करते , स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए कभी किसी को अपमानित नहीं करते l यह सब इसलिए संभव है क्योंकि पशुओं के पास बुद्धि नहीं है l ईश्वर ने मनुष्यों को बुद्धि दी है , अपनी चेतना को विकसित करने के लिए उसके पास अनेक अवसर हैं लेकिन स्वार्थ , लोभ , लालच , कामना , वासना , महत्वाकांक्षा आदि दुष्प्रवृत्तियां इतनी प्रबल हैं की मनुष्य अपनी सारी बुद्धि इन बुराइयों के पोषण में ही लगा देता है और इससे भी बड़ी बात यह है कि इन दुष्प्रवृतियों को पोषण मिलता रहे , इसके लिए समान विचारों के लोग परस्पर सहयोग भी करते हैं l यही कारण है की सम्पूर्ण समाज का वातावरण दूषित हो जाता है l संसार में अच्छे लोग भी हैं लेकिन वे संगठित नहीं है जबकि असुरता बहुत मजबूती से संगठित है l समाज के नैतिक पतन का एक कारण यह भी है कि सभ्य समाज में व्यक्ति स्वयं को बहुत सभ्य , सेवाभावी और श्रेष्ठ व्यक्तित्व का दिखाना चाहता है लेकिन इसके पीछे का जो काला पक्ष है , वे उसे छुपाना चाहते हैं l लेकिन आसुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति एक दूसरे के काले पक्ष को अच्छी तरह जानते हैं और इस सिद्धांत के अनुसार कि 'तुम हमारी न कहो , हम तुम्हारी न कहें ' परस्पर मजबूती से संगठित रहते हैं l इसी कारण समाज में इतनी अशांति , तनाव , लड़ाई , झगड़े , असंतोष है l
3 May 2023
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देवता और असुरों के संबंध में पुराण में अनेक कथाएं हैं l कहते हैं असुर बहुत तपस्वी और अहंकारी होते हैं l इनके पास तपस्या का अथाह बल होता है किन्तु ये अपने इस बल को अहंकार के प्रदर्शन में लगा देते हैं और अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हैं l लेकिन सभी असुर एक जैसे नहीं होते , कई भगवान के बड़े भक्त होते हैं जैसे भक्त प्रह्लाद l ऐसे ही एक और असुर भक्त हुआ है जिसका नाम था ---- गयासुर l यह विलक्षण भक्त था , भक्ति और तपस्या का उसमें अनोखा संगम था l उसने तपस्या से प्राप्त ऊर्जा का दुरूपयोग नहीं किया l इस उर्जा को उसने अपने आंतरिक परिष्कार में लगाया l जब भी कोई असुर कठिन तपस्या करता है , ईश्वर की भक्ति करता है तो उससे सबसे ज्यादा भय स्वर्ग के राजा इंद्र को होता है l उन्हें अपने सिंहासन को खोने का भय सताता है l इसलिए उन्होंने देवगुरु ब्रहस्पति के साथ एक षड्यंत्र की रचना की , जिसके अंतर्गत एक ऐसा यज्ञ करने की योजना बनाई जो धरती पर संपन्न नहीं हो सकता था l इसके लिए उन्होंने निर्णय किया कि गयासुर से कहा जाए कि वह अपने शरीर का इतना विस्तार कर दे कि उसके ऊपर यज्ञ संपन्न किया जा सके l इंद्र और ब्रहस्पति दोनों गयासुर के पास गए और उससे कहा --- " स्रष्टि के कल्याण के लिए परमात्मा ने हमें एक यज्ञ करने का आदेश दिया है और वह यज्ञ केवल तुम्हारे शरीर के ऊपर ही संपन्न किया जा सकता है क्योंकि तुम भगवान के भक्त हो और तुम में असीम धैर्य और सहनशीलता है l " गयासुर ने कहा --- " यदि भगवान और स्रष्टि के निमित्त मेरी देह जरा सी भी उपयोगी है तो अवश्य ही आप इसका उपयोग करें और वह यज्ञ मेरी देह के ऊपर संपन्न करें l " निश्चित मुहूर्त में गयासुर ने अपनी देह का विस्तार किया और उसके ऊपर देवताओं का यज्ञ दीर्घकाल तक चला l यज्ञ की अग्नि उसकी देह को जलाने -गलाने लगी , पीड़ा से गयासुर का शरीर टूटने लगा l लेकिन वह इस पीड़ा को भगवान की कृपा मानकर सहन करता रहा और इस असीम कष्ट भगवान का नाम स्मरण करता रहा l देवताओं का यज्ञ समाप्त हुआ , इसके साथ ही गयासुर की देह भी मृतप्राय हो चुकी थी l देवताओं का षड्यंत्र सफल हुआ l अंत में देवताओं ने उससे वरदान मांगने को कहा तो गयासुर ने कहा --- " आप मुझे कुछ देना चाहते हैं तो इतनी कृपा करें कि जहाँ तक मेरी देह है , पृथ्वी के उस स्थान पर यदि मानव अपने पितरों का श्रद्धापूर्वक विधिवत पिंडदान करे तो उनके पितरों को अवश्य मुक्ति मिले l " देवताओं ने कहा ---- " गयासुर ! तुम धन्य हो ! तुम्हारी देह वाले इस स्थान को ' गया ' नाम से प्रसिद्धि मिलेगी और इस गया जी में पिंडदान करने वालों के पितर अवश्य ही मुक्त होंगे l "
2 May 2023
WISDOM -----
मांसाहार का संबंध किसी जाति या वर्ग से नहीं है , जिसे भी स्वाद लग जाये , वह मांसाहार करता है l इसका सबसे बड़ा दोष यह है कि जब सब चीजों में मिलावट है , बेईमानी है तब आर्थिक या किसी भी प्रकार का लाभ कमाने के लिए कोई आपको क्या खिला दे और उसका क्या असर हो यह कोई नहीं जानता ? पुराण की एक कथा है ----- अगस्त्य मुनि की पत्नी लोपामुद्रा एक राजकन्या थी लेकिन विवाह के बाद वन में सादगी का जीवन था l एक बार लोपामुद्रा की इच्छा हुई कि सुख -साधन हों , इसके लिए उन्होंने पति से धन की याचना की l पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए अगस्त्य मुनि अनेक राजाओं के पास गए और धन की याचना की , लेकिन यह भी कहा कि दान से प्रजा और जरूरतमंद को तकलीफ नहीं होनी चाहिए l उन दिनों में न्यायोचित ढंग से राज -काज होता था और राजा से दान लेने का अर्थ था प्रजा को कष्ट पहुंचना l इसलिए यह निश्चित किया कि किसी असुर से धन लिया जाये . जो जनता को पीड़ित कर के , अन्यायपूर्वक धन जमा करते हैं , उनके पास अपार संपदा होती है l अत: अगस्त्य मुनि इलवल नामक एक अत्याचारी असुर राजा के पास गए ताकि आवश्यक धन प्राप्त हो सके l इलवल और वातापी दोनों असुर भाई -भाई थे l ब्राह्मणों से उन्हें बड़ी नफरत थी l उन दिनों भी ब्राह्मण लोग मांस खाते थे l इलवल चालाक था , ब्राह्मणों का स्वागत भी हो जाए और उनका अंत भी l इसके लिए इलवल ब्राह्मणों को भोजन का न्योता देता और अपने भाई वातापी को अपनी माया से बकरा बनाकर उसका मांस ब्राह्मण मेहमानों को खिला देता l ब्राह्मणों के खा चुकने के बाद इलवल पुकारता " वातापी ! आ जाओ l " इलवल को यह शक्ति प्राप्त थी जिससे वातापी ब्राह्मणों का पेट चीरकर हँसते हुए बाहर निकल आता l इस प्रकार कितने ही ब्राह्मणों को इन असुरों ने मार डाला l अगस्त्य मुनि के आने पर दोनों असुर भाई बहुत खुश हुए कि अच्छा मोटा ताजा शिकार फंसा है l उन्होंने ऋषि का बहुत स्वागत किया और हमेशा की तरह वातापी को बकरा बना कर उसका मांस अगस्त्य मुनि को खिला दिया l वे सोच रहे थे कि मुनि अब थोड़ी देर के मेहमान हैं l अगस्त्य मुनि जब भोजन कर चुके तो इलवल ने पुकारा ---- " वातापी आओ भाई , जल्दी आओ l " यह सुन अगस्त्य मुनि बोल उठे --- "" वातापी ! अब आने की जल्दी न कर l संसार की भलाई के लिए तू हजम कर लिया गया है l " यह कहते हुए मुनि ने जोर की डकार ली न और अपने पेट पर हाथ फेरा l इल्वल घबरा कर जोर -जोर से वातापी को बुलाने लगा l अगस्त्य मुनि बोले अब क्यों अपना गला फाड़ रहे हो , वातापी तो कभी का हजम हो चुका l इलवल ने अपने कृत्यों के लिए क्षमा मांगी और मुनि को बहुत सा धन देकर विदा किया l ---यह कथा एक संकेत है कि वे तो मुनि थे जो ऐसा मांस अपने तप की शक्ति से हजम कर गए लेकिन अब ऐसा तपस्वी कोई नहीं है इसलिए ये मांसाहार शरीर से विभिन्न लाइलाज बीमारियों रूपी वातापी बनकर बाहर निकलता है l जागरूकता जरुरी जरुरी है l