30 January 2024

WISDOM -----

   तुलसीदास जी  ने  कहा  है --- कर्म प्रधान  विश्व  करि  राखा  l  जो  जस   करहि   सो  तस  फल  चाखा  l                पंडित  श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  लिखते  हैं  ---- ' बोओ  और  काटो  '  का  सिद्धांत  सारी  प्रकृति  में  देखने  को  मिलता  है  l  बबूल  का   बीज   बोकर  कोई  आम  नहीं  खा  सकता  l '    यह  कर्म फल  कभी  तो  तुरंत   इसी  जन्म  में  मिल  जाता  है  ,  परन्तु   कभी  ऐसा  होता  है  कि  दुष्ट  कर्म  करने  वाले   तो  सुखी  और  संपन्न  दिखाई  देते  हैं   तथा  त्यागी -तपस्वी  दुःखी  होते  हैं   तो  विश्वास  डगमगा  जाता  है  l  मनुष्य  सोचता  है  कि    जब  दुष्ट  व्यक्ति  आराम  का  जीवन  जीते  हैं   और  सज्जन  कष्ट  पा  रहे  हैं  तो  फिर  त्याग -तपस्या  का  जीवन  क्यों  जिएं  ?  यह  भावना  मनुष्य  को  उद्दंड  और  नास्तिक  बना  देती  है  l  आचार्य श्री  लिखते  हैं  --- यदि  झूठ  बोलते  ही  मनुष्य  की  जीभ  कटकर   गिर  जाती  ,  चोरी  करते  ही  हाथ  कट  जाते   तो  प्रत्येक  व्यक्ति  दुष्कर्म  करने  से  डरता  l  परन्तु  जब  कर्मों  का  फल  दूसरे  किसी  जन्म  में  मिलता  है  तो  मनुष्य  आस्थाहीन  हो  जाता  है  l  लेकिन  यह  निश्चित  है  ---- ईश्वर  के  घर  देर  है  , अंधेर  नहीं  l  ----- एक  स्त्री  नि:संतान  थी  l  किसी  तांत्रिक  ने  उसे  बताया  कि   यदि  वह  किसी  बच्चे  की  बली  दे  देगी   तो  उसके  संतान  होगी  l  उसने  दूर  गाँव  के  एक  गरीब  बच्चे  को  मरवाकर  गड़वा  दिया    और  ईश्वर  की  लीला  ऐसी  कि  उसके  दो  सुन्दर  लड़के  हुए  ,  बहुत  होनहार  थे  l  उस  स्त्री  के  क्रम  का  जिन्हें  पता  था  ,  वे  सब   यही  कहते  कि  देखो  इस   औरत  ने  कितना  नीच  कर्म  किया   और  भगवान  ने  इसको  सजा  देने  के  बदले   दो -दो  बेटे  दिए  l  ईश्वर  के  यहाँ  अंधेर  है  !  बच्चे  बड़े  हुए , बहुत  सुन्दर , पढ़ने   में  होशियार  ,  लेकिन  एक  दिन  दोनों  नदी  में  नहा    रहे  थे  ,  अचानक  एक  का  पैर  फिसला  ,  दूसरा  उसे  बचाने  के  लिए   आगे  बढ़ा   तो  वह  भी  संभल  नहीं  सका   और  दोनों  नदी  में  डूब  गए  l  अब  वह  स्त्री  रो -रोकर  सबसे  यही  कह  रही  थी   कि  भगवान  ने  मेरे  पाप  की  सजा  मुझे  दे  दी  l  ईश्वर  के  यहाँ  देर  है , अंधेर  नहीं  l  

29 January 2024

WISDOM

   यह  संसार  कर्मफल  विधान  से  चल  रहा  है  l  मनुष्य  जैसे  कर्म  करता  है , वैसा  ही  फल  उसे  मिलता  है  l  यह  ईश्वर  निश्चित  करते  हैं  कि  हमें  हमारे  द्वारा  किए  गए  अच्छे -बुरे  कर्मों  का  फल  इसी  जन्म  में  मिलेगा   या  अगले  किसी  जन्म  में  !  काल  की  गति  को  कोई  नहीं   जानता  l  इस  संसार  में  हमारे  जितने  भी  रिश्ते -नाते  हैं  , जिनके  मोह  में  हम  फँसे  हैं  ,  वे  हमारे  ही  कर्म  हैं  जो  विभिन्न  रिश्तों , सहकर्मी , मित्र   आदि  विभिन्न  रूपों  में  हमारे  सामने  हैं  l   जो  किसी  न  किसी  तरह  से   अपना  कर्ज  वसूलने  आए  हैं    या  अपना  कर्ज  चुकाने  आए  हैं  l  यदि  हम  जीवन  में  मिलने  वाले  सुख -दुःख  , अपने  और  परायों  से  मिलने  वाले  कष्ट , पीड़ा ,  आनंद   आदि  विभिन्न   अनुभूतियों  को  इस  ' ऋण  व्यवस्था  '  की  द्रष्टि  से  देखें , समझे  तो  मन  विचलित  नहीं  होगा  , तनाव  नहीं  होगा  , जीवन  यात्रा  सरल  हो  जाएगी   l   आचार्य श्री  का  कहना  है --- 'इस  संसार  में  यही  लेन -देन  चलता  है   l  कभी  कोई  पिता  बनकर  अयोग्य  पुत्र  का  कर्ज  चुकाता  है  ,  कभी  कोई  सुयोग्य  पुत्र  पिता  का  कर्ज  चुकता  है  l  यह  कर्ज  केवल  मनुष्य  रूप  में  ही  नहीं  ,  कभी -कभी  पशु -पक्षी  बनकर , बैल , कुत्ता   बनकर  भी  कर्ज  चुकाना   पड़ता  है  l    एक  कथा  है  ------ एक  राजा  के  संतान  तो  होती  थी  , परन्तु   एक -दो   साल  की  होकर  मर  जाती  थी  l  जब  उसके  पांचवें  पुत्र  का  जन्म  हुआ  तो  ज्योतिषी  को  बुलाकर  उसकी  जन्मपत्री  दिखाई  l   ज्योतिषी   ने  कहा ---- " महाराज  !  अब  तक  आपके  जो  पुत्र  हुए  हैं  , वे  सब   आपसे  अपना  कर्ज  वसूलने  आए  थे  ,  और  साल  दो  साल  में  अपना  कर्ज   लेकर  चले  गए  ,  किन्तु  आपका  यह  पुत्र   अपना  कर्ज  चुकाने  आया  है  ,  इसलिए  आप  इसे  कोई  कार्य  न  करने  दें  , जिससे  यह  अपना  कर्ज  न  चुका  सके   तो  यह  आपके  साथ  तब  तक  रहेगा  ,  जब  तक  कर्ज  न  चुका  दे  l  यह  सुनकर  राजा   अपने  पुत्र  पर  दिल  खोलकर   पैसा  खर्च  करने  लगा  , जिससे  वह  और  अधिक  कर्जदार  हो  जाये  l  जब  वह  पंद्रह  वर्ष  का  हुआ   तो  राज कर्मचारियों   के  साथ  रथ  पर  बैठकर  घूमने  जा  रहा  था   तो  उसने  देखा   रास्ते  में  एक  व्यक्ति  बेहोश  पड़ा  है  , उसने  रथ   रोककर    उस  व्यक्ति  को  उठाया   और  रथ  पर  बैठाकर  उसे   उसके  घर  पहुँचाया    l  वह  एक  सेठ  का  बेटा  था  , सेठ  बहुत  खुश  हुआ  और  उसने  राजकुमार  के  गले  में  मोतियों  की  माला  पहना  दी  l  राजकुमार  ने  बहुत  मना  किया  लेकिन  सेठ  ने  कहा  -- " तुमने  जो  उपकार  किया  है  उसका  बदला  तो  मैं  नहीं  चुका  सकता  , तुम  इसे  स्वीकार  कर  लो  l "  महल  आकर  राजकुमार  ने  वह  माला  अपनी  माँ  को  दी  और   खाना  खाकर  सोया  तो  सोता  ही  रह  गया  l  घर  में  हाहाकार  मच  गया  l  ज्योतिषी  को  बुलाया   और  कहा --- "  तुम्हारी  विद्या  तो  झूठी  हो  गई  मैंने  तो  इससे  कोई  धन  नहीं  लिया  l "  तब  तक  रानी  ने  वह  मोतियों  की  माला  लाकर  दी   और  बताया  कि  यह  उसे  किसी  सेठ  ने  दी  थी  l  ज्योतिषी  ने  कहा  --- "  देखिए  महाराज  !  ज्योतिष  विद्या   झूठी  नहीं  है  l  इसे  आपका  कर्ज  तो  चुकाना  ही  था  ,  साथ  ही  उस  सेठ  से  कर्ज  लेना  भी  था  l   सेठ  से  अपना  कर्ज  लेकर   तथा  आपसे  कर्जमुक्त  होकर  वह  चला  गया  l "  राजा  को  यह  अटल  सत्य  समझ  में  आ  गया   कि  जब  तक  कर्म  बंधन  है  तभी  तक  साथ  है  l  जैसे  ही  कर्मबंधन  समाप्त  हुआ  फिर  कोई  एक  पल  भी  नहीं  रुकता  l  

28 January 2024

WISDOM ------

   लघु  कथा  के  माध्यम  से  यह   बताया  गया  है   कि  लोभ , मोह  और  अहंकार  से  ग्रस्त  व्यक्ति  कैसे  चक्रव्यूह  में  फंसा  रहता  है  , कभी  मुक्त  नहीं  हो  पाता  l ----- 1 .  मोह ----  मोह  कभी  छूटता  नहीं , मृत्यु  के  बाद  शरीर  से  मोह  बना  रहता  है  l  कभी -कभी  किसी को  गहरा  आघात  पहुँचता  है , कोई  चोट  ह्रदय  पर  पहुँचती  है  तो उसका  मोह   छूट  जाता  है  -----  राजा  भर्तहरी  को  किसी  साधु  ने  अमरफल  दिया  l  राजा  को  अपनी  रानी  से  बहुत  प्रेम  था   सो  उन्होंने  वह  फल  अपनी  रानी  को  दे  दिया  l  रानी  एक  साधु  को  चाहती  थी   इसलिए  उसने  वह  फल  साधु  को  दे  दिया  l  साधु  ने  उस  फल  को  एक  नर्तकी  को  दे  दिया  l  नर्तकी  ने  सोचा  कि  वह  इस  फल  का  क्या  करेगी  , उसने  वह  फल  राजा  को  दे  दिया  l  राजा  को  जब  सब  बात  का  पता  चला  तो  उसे  बहुत  ग्लानि  हुई   और  उसने  राजपाट  छोड़कर  संन्यास  ले  लिया  l                                                                    2 . अहंकार ---- अहंकार  के  वशीभूत  होकर  कार्य  करने  वालों  को   अपने  कर्म  का  फल  मिलता  है ---- एक  कथावाचक  पंडितजी  बहुत  अच्छी  कथा  कहते  थे   l  गाँव  के  सभी  लोग  कथा  सुनने  आते  थे  l  एक  व्यक्ति   श्यामलाल   बहुत  सरल  स्वभाव  का  था   और  कार्य  में  व्यस्त  रहने  के  कारण  कथा  सुनने  नहीं  आता  था  l  लोगों  ने  पंडितजी  से  शिकायत  की  कि  श्यामलाल  बहुत  घमंडी  है  कथा  सुनने  नहीं  आता  है  l    एक  दिन  श्यामलाल  पंडित जी  को  निमंत्रण  देने  गया   तो  पंडित जी  ने  क्रोध  करते  हुए  कहा ----" मैं  चल  सकता  हूँ  ,  यदि  तुम  मेरी  डोली  को  कंधे  पर  उठाकर  ले  चलो  l "  श्यामलाल  ने  कहा ---- " यह  तो  मेरा  सौभाग्य  होगा  l "  और  वह   उनकी  डोली   अपने  कंधे  पर  उठाकर  ले  आया   और  उन्हें  भोजन  कराया  l  दोनों की  मृत्यु  हुई  तो  श्यामलाल  तो   अगले  जन्म  में  राजा  बना   और  पंडितजी   हाथी  बने  l   एक  दिन  हाथी को  अपने  पूर्व  कंम  की   याद  आ  गई  कि  वह  तो  पंडित  था   l  अब  वह  बिगाड़  गया   और  राजा  को  बैठने  नहीं  दिया  l  राजा  के  यहाँ  एक  सिद्ध  ज्योतिषी   संयोग  से  आए  , उन्होंने  राजा  की  बात  सुनी  l  वे  हाथी  के पास  गए   और  बोले ---- " मूर्ख  ,  पहला  जन्म  तो  अहंकार   में  बिगाड़  लिया   l  अब  क्या  चाहता  है  ?  इस  जन्म  को  भी  बरबाद  करेगा  l   हाथी    को  समझ  आ  गया   < वह  अहंकार  छोड़कर  अपने  काम  पर  लग  गया  l 

26 January 2024

WISDOM -----

  हमारे  महाकाव्य  हमें  जीवन  जीने  की  शिक्षा  देते  हैं  l  इनके  विभिन्न  प्रसंग  हमें  बताते  हैं   कि   मनुष्य   की  मानसिक  कमजोरियां ,  उसके  भीतर  छिपी  हुई  बुराइयाँ   उसे  गुलाम   बनाती    हैं  l  ईर्ष्या , द्वेष , लालच , कामना , वासना , अति  महत्वाकांक्षा  , अहंकार  --- ये  सब  ऐसी  बुराइयाँ  हैं   जो  व्यक्ति  को  गुलाम   बनने    पर  विवश  कर  देती  हैं ,  व्यक्ति  कितना  ही  धन -संपन्न  हो  ,  कितने  ही  ऊँचे  पद  पर  हो  ,  इन  बुराइयों  की  वजह  से  उसे  कहीं  न  कहीं  अपने  स्वाभिमान  को  खोना  पड़ता  है  l  रावण   प्रकांड   पंडित   था  ,  उसके  पास  सोने  की  लंका  थी  , काल  तक  को  उसने  बंदी  बना  लिया  था   लेकिन   महत्वाकांक्षा , अहंकार  और  सीताजी  को  पाने  की  तीव्र  लालसा  के  कारण  कटोरा  लेकर , वेश  बदलकर   भिखारी  बन  गया  , और  छुपते -छुपाते   चला  , कहीं  कोई  देख  न  ले  l   दुर्योधन  के  पास  भी  सब  कुछ  था   लेकिन  ईर्ष्या  और  अति  महत्वाकांक्षा  ने  उसे  षड्यंत्रकारी  बना  दिया  ,  उसकी  दुष्प्रवृत्तियों  ने  उसकी  बुद्धि  हर  ली  l  अपनी  पतिव्रता  माँ  की  पवित्र   ऊर्जा   से  अपने  शरीर  को  फौलाद  बनाने  के  लिए  निर्वस्त्र  चल  दिया  l  यह  सब  प्रसंग  इस  बात  का  संकेत  करते  हैं  कि    जब  ये  मानसिक  कमजोरियां  व्यक्ति  पर  बुरी  तरह  हावी  हो    जाती  हैं   तब  व्यक्ति  स्वयं  ही  अपनी  असलियत  संसार  को  बता  देता  है  l  रावण  अनेक  गुणों  से  संपन्न  था   लेकिन  उसने   सीता -हरण  कर  के  अपनी  राक्षसी  प्रवृत्ति  पर  स्वयं  ही  मोहर  लगा  दी  ,  संसार  उसे  राक्षसराज  रावण  कहता  है  l  इसी  तरह  दुर्योधन   कुशल  प्रशासक  था , प्रजा  के  हित  का  बहुत  ध्यान  रखता  था   लेकिन  सारा  जीवन  पांडवों  के  विरुद्ध  षड्यंत्र  कर  के   और  हर  तरीके  से  उन्हें  कष्ट  देकर ,  अत्याचार , अन्याय  करने     के  कारण    सुयोधन   के  बजाय    षड्यंत्रकारी   दुर्योधन  कहलाया   l      हमारे  पुराणों  की  विभिन्न  कथाएं  इस  बात  को  भी  बताती  हैं   कि  ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार , महत्वाकांक्षा  ---- आदि  बुराइयाँ  थोड़ी -बहुत  तो  सभी  में  होती  हैं  ,  इनसे  कोई  भी  नहीं  बचा  है   लेकिन  इनकी  ' अति '  सम्पूर्ण  समाज  के  लिए  घातक  होती  है  l  क्योंकि   इनसे    जुड़ी  इच्छाएं    एक  व्यक्ति  स्वयं  में   अकेले  ही  पूरी  नहीं  कर  सकता   , इसके  लिए  उसे   अन्य  लोगों  की  आवश्यकता  पड़ती  है   और  इच्छाओं  की  तीव्रता  के   साथ   समूह  बढ़ता  जाता  है   और  इच्छाओं  में  बाधा  आने  पर  गुणात्मक  दर  से  अपराध  भी  बढ़ता  जाता  है  l  आज  जब  वैश्वीकरण  का  युग  है  , संचार  के  साधनों  की  इतनी  प्रगति  हो  गई  है   तो  इन  इच्छाओं  का  और  इनसे  जुड़े  अपराधों  का   भी  वैश्वीकरण  हो  गया  है   इसलिए  संसार  में  इतना  तनाव ,  छिना -झपटी , युद्ध , अशांति  है  l  इसलिए  पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य  जी   कहते  हैं   कि  मनुष्य  की  चेतना  परिष्कृत  हो ,  विचारों   में  सुधार  हो  ,  सब  सद्बुद्धि  के  लिए  प्रार्थना  करें   तभी  धन  और  शक्ति  का  सदुपयोग  होगा   और  संसार में  सुख -शांति  होगी  l  

25 January 2024

WISDOM -----

   तपस्वी  को  तप  करने  का  मूलमंत्र  देते  हुए  गुरु  बोले  ---- " तप  में  सफलता  अभीष्ट  हो  इसके  लिए  आहार  का  संयम  सबसे  जरुरी  है  l यदि  स्वाद  की  इन्द्रिय  ढीली    छूट   जाती  है   तो  बाकि  सभी  इन्द्रिय  बेलगाम  हो  जाती  हैं  l   इसी  पर  सबसे  पहले  विजय  प्राप्त  करो   l  "  एक  कथा  है  ---- एक  राजा  जंगल  में  शिकार  करने  गया  l  रात्रि  हो  जाने  से  वहां  एक  आश्रम  में   विश्राम  करने  के  लिए  रुक  गया  l    आश्रम  वासियों  ने  राजा  की  बहुत  सेवा  की  l  राजा  ने  प्रसन्न  होकर   वहां  आश्रम  में  एक  वैद्य  को  नियुक्त  कर  दिया   जिससे  उन्हें   चिकित्सा  के  लिए  इतनी  दूर  शहर  में  आने  की  परेशानी   न  हो  l   कुछ  समय  गुजरा  , वैद्य  के  पास  कोई  भी  इलाज  के  लिए  नहीं  आया  l  वह  वैद्य  राजा  के  पास  गया  और  बोला  ---- " महाराज  मैं  यहाँ  निष्क्रिय  जीवन   ही  व्यतीत  कर  रहा  हूँ   l  आश्रम  में  मेरा  कोई  उपयोग  नहीं  है  l "  राजा  को  आश्चर्य  हुआ   कि  आश्रम  में  कोई  बीमार  नहीं  पड़ता  l  इस  संबंध  में  जब  राजा  ने  आचार्य  से  पूछा   तो  आचार्य  बोले  ----- "राजन  !  यहाँ  प्रत्येक  आश्रमवासी  को  सुबह  से  शाम  तक   श्रम  करना  पड़ता  है  l  जब  तक  भूख  परेशान  नहीं  करतीं  ,  कोई  भी   भोजन  नहीं  करता  है  l  जब  कुछ   भूख  शेष  रह  जाती  है   तो  वे  भोजन  बंद  कर  देते  हैं  l  इस  प्राकृतिक  और  स्वच्छ  वातावरण  में   सबको  पवित्र  वायु  और  प्रकाश  मिलता  है  l  यही  इनके  आरोग्य  का   मूल  कारण  है  l "    राजा  को  भी  अपने  लिए   आरोग्य  का  मन्त्र  मिल  गया   l  

24 January 2024

WISDOM ----

   महाराज  जीमकेतु  धार्मिक  प्रवृत्ति  के  शासक  थे  l  दुर्भाग्यवश  उनके  मन  में    उनकी  अकूत  संपत्ति  का  अहंकार  पैदा  हो  गया  l  ऋषि  दत्तात्रेय  को  उनके  ऊपर  दया  आ  गई   और  उन्होंने  उन्हें  सत्य  का  मार्ग  दिखाने  का  निश्चय  किया  l  वे  एक  पागल  का  वेश  धारण  कर   राजा  के  महल  पहुंचे   और  उनके  सिंहासन  पर  जाकर  बैठ  गए  l  राजा  जीमकेतु  दरबार  में  पहुंचे  तो  एक  पागल  को  सिंहासन  पर   बैठा  देखकर  क्रोधित  हो  उठे   और  बोले  ---- "   तू  कौन  है  ?   हमारे  राजदरबार  में  आने  का  तेरा  साहस  कैसे  हुआ  ? "  दत्तात्रेय  बोले  --- "  बंधु   ! क्रोधित  क्यों  होते   हो  ?  यह  तो  धर्मशाला  है  l  इसमें  तुम  भी  ठहरो   और  मैं  भी  ठहरूंगा  l  "  राजा  बोले  --- " अरे , तू  अँधा  है  क्या  ?  यह  धर्मशाला  नहीं   राजमहल  है  l "  ऋषि  दत्तात्रेय  ने  कहा --- '  क्या  तुम  इसमें  अनंत  काल  से  रहते  चले  आ  रहे  हो  ? "  राजा  ने  कहा ---- " नहीं  ,  मैं  पिछले  तीस  वर्षों  से  यहाँ  का  राजा  हूँ  l "  दत्तात्रेय  ने  पूछा  ---- " तुमसे  पहले  कौन  यहाँ  का  राजा  था  ? "  राजा  बोले ---- " मुझसे  पहले  मेरे  पिता   यहाँ  के  राजा  थे  l "  दत्तात्रेय  ने  पूछा  --- " और  उनसे  पहले  कौन  यहाँ  का  राजा  था  ? "  राजा  बोले  --- " तब  मेरे  दादा -परदादा  यहाँ  राज्य  करते  थे  l "  ऋषि  दत्तात्रेय  बोले  --- "जहाँ  कोई  आकर   थोड़े  समय   ठहरकर  चला  जाता  है  ,  तो  वह  धर्मशाला   ही  कहलाती  है  l  उसे  अपनी  पुश्तैनी  जागीर  समझ  लेना    मूर्खता  के  सिवा   और  कुछ  भी  नहीं  है  l " l   यह  सुनकर  राजा  का  अहंकार   तुरंत  ही   विगलित  हो  गया  l 

22 January 2024

WISDOM-------

  ' जाकी   रही  भावना  जैसी  , प्रभु  मूरत  देखी  तिन  तैसी  l '  जिसकी  जैसी  भावना  होती  है  वह  प्रभु  को  उसी  रूप  में  देखता  है  l    हम  ईश्वर  से  उनके  प्रेम  की ,   आशीर्वाद  की  कामना  करते  हैं   l  सूरदास जी  ने   भगवन  के  बाल रूप  को  चाहा , भगवान  उन्हें  उसी  रूप  में  मिले , उनका  जीवन  सफल  हो  गया  l  मीरा  के  ' गिरधर  गोपाल  थे  , एक  अनोखा  बंधन  था  l   अर्जुन  ने  भगवान  को  सखा  रूप  में  देखा  ,  भगवान  ने  उनके  जीवन  रूपी  रथ  की  डोर  संभाल  ली  l  l  रामकृष्ण परमहंस जी  ने  उन्हें  माँ  के  रूप  में  देखा  , उन्हें  माँ  का  स्नेह  मिला  l   अधिकांश  लोग  ईश्वर  को  ' माँ  '  के  रूप  में  देखते  हैं  ,  देवी  के  विभिन्न  रूपों  की  उपासना  करते  हैं  l  इस  संबंध  के  बारे  में  ऋषियों  ने  कहा  भी  है   कि  ' पिता  न्याय  करते  हैं ,  जो  गलती  की  है  उसकी  सजा  देते  हैं  लेकिन  माँ   दुलार  करती  हैं  ,  अपने  भक्त  को  संरक्षण  देती  हैं ,  उसे   उसकी  गलतियों  को  सुधारने  का  अवसर  भी  देती  हैं  l  इसलिए  जीवन  में  सफलता  के  लिए  पिता  और  माता  दोनों  की  जरुरत  है  l           शिव -शक्ति  , राधा -कृष्ण  -- दोनों  ही  ऊर्जा  के  संतुलन  होने  से  जीवन  पूर्ण  होता  है  l   ईश्वर  ने  सबको   चुनाव  की  स्वतंत्रता  दी  है ,  वे  उन्हें  किसी  भी  रूप  में  पूज  सकते  हैं  , किसी  भी  भाषा  में   उन्हें  पुकार  सकते  हैं  l  अब  जिस  रूप  में  उन्हें  पुकारोगे  , वे  उसी  रूप  में  आयेंगे   जैसे  कंस   कृष्ण जी  को   इसी  रूप  में  याद  करता  था  कि  उनका  जन्म  उसे  मारने  के  लिए  हुआ  है   तो  जो  कृष्ण  गोकुल  में  सबके  प्रिय  थे , उन्होंने  मथुरा  आकर  कंस  का  वध  कर  दिया  l   इसलिए  हमारी  संस्कृति  में   ईश्वर  को  माँ  के  रूप  में  देखा  जाता  है  जैसे  धरती माँ , प्रकृति  माँ   ---- इससे  हमें  संरक्षण  मिलता  है   और  बाहर  व  भीतर  संतुलन  स्थापित  होता  है  l  कई  लोग  ईश्वर  को  उनके  उग्र  रूप  में  याद  करते  हैं  ,  देवी  के  रूप  में  नहीं  पूजते  l  ईश्वर  के  नारी  रूप  का   , नारी  शक्ति  का  उन्हें  ध्यान  ही  नहीं  होता  l  इससे  भगवन  को  कोई  फरक  नहीं  पड़ता  ,  ईश्वर  तो  सर्व  समर्थ  हैं  ,  उन्होंने  तो  मनुष्य  को  चयन  की  स्वतंत्रता  दी  है    लेकिन   जो  उग्र  रूप  का  ध्यान  करते  हैं  उनके  स्वभाव  में  उग्रता , कठोरता , अहंकार  , असहिष्णुता   आ  जाती  है  , फिर  उनके  कर्म  व  व्यवहार  भी  वैसा  ही  कठोर  हो  जाता  है  l  कर्मों  के  अनुसार  परिणाम  भी  तय  हो  जाता  है    जबकि  देवी  रूप  को  मानने  से  स्वभाव  में  करुणा , दयालुता , स्नेह , ममता  जैसे  गुण  आ  जाते  हैं   l  इसलिए  हमारे  ऋषियों  ने  शिव  और  शक्ति   दोनों   को  बराबर  महत्त्व  दिया  है  l  जहाँ  आवश्यक  हो  वहां  कठोर  रहो  , जहाँ  आवश्यक  हो  वहां  करुणा , और  प्रेम स्नेह  का  व्यवहार  करो  l  यह  संसार  पुरुष  प्रधान  है   लेकिन  ईश्वर  के  दरबार   में  सब  बराबर  है   और  सम्पूर्ण  ब्रह्माण्ड  के  लिए  ही   दोनों  ही   ऊर्जा   की  आवश्यकता  है  l