संत हाशिम की गणना प्रसिद्ध सूफी फकीरों में होती है l वे एक बार बगदाद पहुंचे l जब बगदाद के खलीफा हारून को उनके वहां पहुँचने का समाचार मिला तो वे संत हाशिम से मिलने पहुंचे l खलीफा हारून की ख्याति एक पथ भ्रष्ट और विलासी राजा के रूप में थी l संत हाशिम के पास पहुंचकर खलीफा हारून उन्हें अभिवादन करने के लिए नीचे झुकने लगे तो संत हाशिम ने उन्हें रोकते हुए कहा ---- " आप नीचे न झुकें हुजुर ! आप तो बड़े त्यागी और विरक्त इनसान हैं l झुकना तो मुझे आपके सामने चाहिए l " खलीफा हारून को लगा कि संत हाशिम ने उन पर व्यंग्य मारा है l वो थोडा क्रोधित होते हुए बोले --- " ये आप कैसी बाते करते हैं ? संत होकर दूसरों की खिल्ली उड़ाना आपको शोभा नहीं देता l " संत हाशिम बोले ---- " नहीं ! मैं आपका मजाक नहीं उड़ा रहा l सच तो ये है कि मैंने तो केवल दुनिया के ऐशोआराम का त्याग किया है , आप तो अपनी आत्मा और उन परवरदिगार को भुलाकर बैठे हैं , जो सारी दुनिया के रखवाले हैं l तो उसको त्यागने वाला तो दुनिया की सबसे कीमती चीज को त्यागने वाला है l इसलिए आपका त्याग , मेरे त्याग से कई गुना बड़ा हुआ l बताइए अब कौन किसके आगे झुके ? " संत हाशिम की बातें खलीफा हारून के दिल पर चोट कर गईं और वे सब कुछ छोड़कर संत हाशिम के साथ निकल पड़े l
5 February 2024
4 February 2024
WISDOM ----
पेट पालने के लिए धन कमाना बहुत जरुरी है और धन कमाने के कई तरीके हैं l जब राजतन्त्र था , बड़ी -बड़ी कम्पनियां नहीं थीं , तब राजा को खुश करने एवं प्रसन्न करने के लिए विशेष रूप से विशेषज्ञ चाटुकारों की व्यवस्था की जाती थी l उनका काम ही था कि वे राजाओं के विभिन्न कार्यों , गुणों और रूप आदि की प्रशंसा करें l ये चाटुकार अपनी कविता , गीतों आदि विभिन्न तरीकों से राजा की प्रशंसा करते थे और राजा प्रसन्न होकर दरबार में सबके सामने उन्हें तोहफे देते , कभी अपने गले से उतार कर हीरे -मोतियों के हार आदि बहुमूल्य तोहफे देते थे l यही इनकी जीविका का साधन था , वे इस कार्य के विशेषज्ञ होते थे l अब वक्त बदल गया , अब अलग से ' चाटुकार ' रोजगार का साधन नहीं है l अब लोग विभिन्न कार्यों में , रोजगार में संलग्न रहते हुए , अपने चाटुकारिता के गुण के कारण अपने वेतन के साथ अतिरिक्त फायदा भी कमा लेते हैं l अपनी प्रशंसा सबको अच्छी लगती है , दिल को छूती है , प्रशंसा सुनकर मन इतना प्रसन्न हो जाता है कि कई दिन तक उसका नशा दिल पर छाया रहता है l इसलिए चाहे कोई छोटी सी संस्था हो , बड़ा संगठन हो , छोटा -बड़ा नेता हो ----, सबको प्रशंसा अच्छी लगती है इसलिए कुशल व्यक्ति चाटुकारिता के गुण से एक सम्पन्नता का जीवन जी लेते हैं l चाटुकारिता करने वाला तो हर तरह से फायदे में रहता है , यह उसका स्वभाव होता है जैसे अधिकारी बदल गया , तो जो नया अधिकारी आता है , वे सुबह से रात तक उसकी खुशामद में लग जाते हैं l हमारे ऋषियों का कहना है ---यह संसार गणित से चलता है , संसार में स्वार्थ और लालच बहुत है इसलिए प्रशंसा से विचलित नहीं होना चाहिए l यह प्रशंसा खतरनाक तब हो जाती है जब प्रशंसा या चाटुकारिता करने वाला इतना सक्षम है , होशियार है कि वह उस चाटुकारिता प्रिय के व्यक्तित्व पर हावी हो जाता है , उसके जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित करता है , अपने स्वार्थ के अनुरूप निर्णय लेने को विवश कर देता है l यह स्थिति केवल संस्थाओं में , राजनीति में , संगठनों में ही नहीं होती , विभिन्न घर -परिवारों में भी इसी ' गुण विशेष ' के कारण कलह , मुकदमे होते है , परिवार में भेदभाव होता है l इन सबके मूल में यही कारण है कि सद्बुद्धि की , विवेक की कमी है l यह सद्बुद्धि कैसे आए ? पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने कहा है --- ' गायत्री मन्त्र में वह शक्ति है जिससे व्यक्ति को सद्बुद्धि का वरदान मिलता है , वह क्या सही है और क्या गलत है , यह समझकर विवेकपूर्ण ढंग से निर्णय लेता है l श्रद्धा और विश्वास जरुरी है l
3 February 2024
WISDOM -----
महाभारत की कथा है ---- यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न पूछा ---- " इस संसार का परम आश्चर्य क्या है ? " युधिष्ठिर ने कहा ---- " सबसे बड़ा आश्चर्य है कि मृत्यु को सुनिश्चित घटना के रूप में देखकर भी मनुष्य इसे अनदेखा करता है l वह मृत्यु की नहीं , जीवन की तैयारी कुछ इस तरह करता है , जैसे विश्वास हो कि वह कभी मरेगा ही नहीं ,उसे सदा -सदा जीवित रहना है l " यदि मृत्यु के अटल सत्य को व्यक्ति स्वीकार कर ले तो संसार में इतना हाहाकार न हो l लालच , महत्वाकांक्षा , ईर्ष्या , द्वेष और सबसे बढ़कर अहंकार ने मनुष्य की सोच को विकृत कर दिया है l ' जियो और जीने दो ' के बजाय ' मारो -काटो ' की बात करता है l ये दुर्गुण व्यक्ति को क्रूर बना देते हैं , उसके 'मानवीयता ' के गुण को ही समाप्त कर देते हैं l ऐसा व्यक्ति परिवार से लेकर संसार में कहीं भी हो उसे दूसरों को सताने में , उन पर अत्याचार करने में ही आनंद आता है l यह अत्याचार , अन्याय हमेशा अपने से कमजोर पर होता है l ऐसे कार्यों से पूरे वातावरण में नकारात्मकता भर जाती है l विभिन्न असाध्य रोग , महामारी , तनाव आदि इसी का परिणाम हैं l
2 February 2024
WISDOM ----
संत रैदास के प्रवचन सुनने हेतु सैकड़ों लोग एकत्र हुआ करते थे l एक बार एक सेठ जी भी उनका प्रवचन सुनने आए l कथा के उपरांत प्रसाद का वितरण आरम्भ प्रारम्भ हुआ l एक हरिजन का प्रसाद खाने में उन्हें संकोच हुआ तो उन्होंने प्रसाद हाथ में लेकर एक ओर फेंक दिया l वह प्रसाद एक कोढ़ी के शरीर से टकराकर नीचे गिर गया , कोढ़ी ने वह प्रसाद उठाकर खा लिया जिससे वह तो ठीक हो गया परन्तु सेठजी कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गए l अपने दुःख से मुक्ति पाने हेतु सेठ जी , संत रैदास की शरण में गए l मन की बात जानने वाले रैदास जी ने सेठ जी से कहा ---- " वह तो मुल्तान गया अर्थात अब वह प्रसाद दोबारा मिलना कठिन है l " परन्तु दयावश उन्होंने सेठ जी को ठीक कर दिया l सेठ जी को अपनी भूल का भान हुआ , उन्हें यह सत्य समझ में आया कि मनुष्य का जन्म किस जाति , किस धर्म में हुआ है , इस पर उसका कोई वश नहीं है l मनुष्य जन्म से नहीं , कर्म से महान होता है l ये भेदभाव तो मनुष्य ने अपने स्वार्थ और अहंकार के पोषण के लिए ही बनाए हैं l
31 January 2024
WISDOM -----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " नियमितता ही जीवन है l सूर्य एक नियमितता लिए हुए उदय एवं अस्त होता है l पृथ्वी , चंद्रमा गृह , तारे सभी निश्चित गति से सुसंचालित हैं l कीड़े -मकोड़ों और पक्षियों में यह विशेषता पाई जाती है कि वे अपने भीतर की किसी अज्ञात घड़ी के मार्गदर्शन से अपनी गतिविधियाँ व्यवस्थित रखते हैं l मुर्गा समय पर बांग देता है , चमगादड़ रात को ही उड़ता है l " प्रकृति के नियम इतने अटल हैं कि वे किसी देवता , और ईश्वर के लिए भी नहीं बदलते l दीपावली के संबंध में कथा है ---- जब 14 वर्ष की अवधि समाप्त कर भगवान राम वन से अयोध्या लौटे थे , तब उस दिन अमावस्या की रात्रि थी l भरत ने सूर्य से प्रार्थना की कि मेरे भाई 14 वर्ष बाद घर आ रहे हैं , तुम रात्रि में प्रकाश कर दो l पर सूर्य नियम से बंधे थे , उन्होंने मना कर दिया कि मैं नियम के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता l फिर उन्होंने चंद्रमा से प्रार्थना की कि तुम ही प्रकाशित हो जाओ , पर चंद्रमा भी विवश थे l प्रकृति के नियम को बदलने का साहस उनमें भी नहीं था , इस विवशता पर उनकी आँखों में आँसू आ गए l आँसू गिरने से मिटटी गीली हो गई l गीली मिटटी ने कहा --- " भरत , रो मत , गीली मिटटी के दीपक बना और घी के दीप जलाकर भाई राम का स्वागत कर l ' और कहते हैं उन दीपों के प्रकाश को देखकर आकाश के सूर्य और चन्द्र भी लज्जित हो गए l मनुष्य भी यदि प्रकृति के नियमों के अनुसार चले तो अपने जीवन को प्रकाशित करने की अपार संभावनाएं हैं l
30 January 2024
WISDOM -----
तुलसीदास जी ने कहा है --- कर्म प्रधान विश्व करि राखा l जो जस करहि सो तस फल चाखा l पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- ' बोओ और काटो ' का सिद्धांत सारी प्रकृति में देखने को मिलता है l बबूल का बीज बोकर कोई आम नहीं खा सकता l ' यह कर्म फल कभी तो तुरंत इसी जन्म में मिल जाता है , परन्तु कभी ऐसा होता है कि दुष्ट कर्म करने वाले तो सुखी और संपन्न दिखाई देते हैं तथा त्यागी -तपस्वी दुःखी होते हैं तो विश्वास डगमगा जाता है l मनुष्य सोचता है कि जब दुष्ट व्यक्ति आराम का जीवन जीते हैं और सज्जन कष्ट पा रहे हैं तो फिर त्याग -तपस्या का जीवन क्यों जिएं ? यह भावना मनुष्य को उद्दंड और नास्तिक बना देती है l आचार्य श्री लिखते हैं --- यदि झूठ बोलते ही मनुष्य की जीभ कटकर गिर जाती , चोरी करते ही हाथ कट जाते तो प्रत्येक व्यक्ति दुष्कर्म करने से डरता l परन्तु जब कर्मों का फल दूसरे किसी जन्म में मिलता है तो मनुष्य आस्थाहीन हो जाता है l लेकिन यह निश्चित है ---- ईश्वर के घर देर है , अंधेर नहीं l ----- एक स्त्री नि:संतान थी l किसी तांत्रिक ने उसे बताया कि यदि वह किसी बच्चे की बली दे देगी तो उसके संतान होगी l उसने दूर गाँव के एक गरीब बच्चे को मरवाकर गड़वा दिया और ईश्वर की लीला ऐसी कि उसके दो सुन्दर लड़के हुए , बहुत होनहार थे l उस स्त्री के क्रम का जिन्हें पता था , वे सब यही कहते कि देखो इस औरत ने कितना नीच कर्म किया और भगवान ने इसको सजा देने के बदले दो -दो बेटे दिए l ईश्वर के यहाँ अंधेर है ! बच्चे बड़े हुए , बहुत सुन्दर , पढ़ने में होशियार , लेकिन एक दिन दोनों नदी में नहा रहे थे , अचानक एक का पैर फिसला , दूसरा उसे बचाने के लिए आगे बढ़ा तो वह भी संभल नहीं सका और दोनों नदी में डूब गए l अब वह स्त्री रो -रोकर सबसे यही कह रही थी कि भगवान ने मेरे पाप की सजा मुझे दे दी l ईश्वर के यहाँ देर है , अंधेर नहीं l
29 January 2024
WISDOM
यह संसार कर्मफल विधान से चल रहा है l मनुष्य जैसे कर्म करता है , वैसा ही फल उसे मिलता है l यह ईश्वर निश्चित करते हैं कि हमें हमारे द्वारा किए गए अच्छे -बुरे कर्मों का फल इसी जन्म में मिलेगा या अगले किसी जन्म में ! काल की गति को कोई नहीं जानता l इस संसार में हमारे जितने भी रिश्ते -नाते हैं , जिनके मोह में हम फँसे हैं , वे हमारे ही कर्म हैं जो विभिन्न रिश्तों , सहकर्मी , मित्र आदि विभिन्न रूपों में हमारे सामने हैं l जो किसी न किसी तरह से अपना कर्ज वसूलने आए हैं या अपना कर्ज चुकाने आए हैं l यदि हम जीवन में मिलने वाले सुख -दुःख , अपने और परायों से मिलने वाले कष्ट , पीड़ा , आनंद आदि विभिन्न अनुभूतियों को इस ' ऋण व्यवस्था ' की द्रष्टि से देखें , समझे तो मन विचलित नहीं होगा , तनाव नहीं होगा , जीवन यात्रा सरल हो जाएगी l आचार्य श्री का कहना है --- 'इस संसार में यही लेन -देन चलता है l कभी कोई पिता बनकर अयोग्य पुत्र का कर्ज चुकाता है , कभी कोई सुयोग्य पुत्र पिता का कर्ज चुकता है l यह कर्ज केवल मनुष्य रूप में ही नहीं , कभी -कभी पशु -पक्षी बनकर , बैल , कुत्ता बनकर भी कर्ज चुकाना पड़ता है l एक कथा है ------ एक राजा के संतान तो होती थी , परन्तु एक -दो साल की होकर मर जाती थी l जब उसके पांचवें पुत्र का जन्म हुआ तो ज्योतिषी को बुलाकर उसकी जन्मपत्री दिखाई l ज्योतिषी ने कहा ---- " महाराज ! अब तक आपके जो पुत्र हुए हैं , वे सब आपसे अपना कर्ज वसूलने आए थे , और साल दो साल में अपना कर्ज लेकर चले गए , किन्तु आपका यह पुत्र अपना कर्ज चुकाने आया है , इसलिए आप इसे कोई कार्य न करने दें , जिससे यह अपना कर्ज न चुका सके तो यह आपके साथ तब तक रहेगा , जब तक कर्ज न चुका दे l यह सुनकर राजा अपने पुत्र पर दिल खोलकर पैसा खर्च करने लगा , जिससे वह और अधिक कर्जदार हो जाये l जब वह पंद्रह वर्ष का हुआ तो राज कर्मचारियों के साथ रथ पर बैठकर घूमने जा रहा था तो उसने देखा रास्ते में एक व्यक्ति बेहोश पड़ा है , उसने रथ रोककर उस व्यक्ति को उठाया और रथ पर बैठाकर उसे उसके घर पहुँचाया l वह एक सेठ का बेटा था , सेठ बहुत खुश हुआ और उसने राजकुमार के गले में मोतियों की माला पहना दी l राजकुमार ने बहुत मना किया लेकिन सेठ ने कहा -- " तुमने जो उपकार किया है उसका बदला तो मैं नहीं चुका सकता , तुम इसे स्वीकार कर लो l " महल आकर राजकुमार ने वह माला अपनी माँ को दी और खाना खाकर सोया तो सोता ही रह गया l घर में हाहाकार मच गया l ज्योतिषी को बुलाया और कहा --- " तुम्हारी विद्या तो झूठी हो गई मैंने तो इससे कोई धन नहीं लिया l " तब तक रानी ने वह मोतियों की माला लाकर दी और बताया कि यह उसे किसी सेठ ने दी थी l ज्योतिषी ने कहा --- " देखिए महाराज ! ज्योतिष विद्या झूठी नहीं है l इसे आपका कर्ज तो चुकाना ही था , साथ ही उस सेठ से कर्ज लेना भी था l सेठ से अपना कर्ज लेकर तथा आपसे कर्जमुक्त होकर वह चला गया l " राजा को यह अटल सत्य समझ में आ गया कि जब तक कर्म बंधन है तभी तक साथ है l जैसे ही कर्मबंधन समाप्त हुआ फिर कोई एक पल भी नहीं रुकता l