21 September 2024

WISDOM ------

    पं . श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी  की  अमृतवाणी   के  कुछ  अंश ------   तप  का  अर्थ  है  --आत्म परिष्कार  के  लिए  तितिक्षा  करना  , कष्ट  सहना  l  तपाने  से  ईंट  मंदिर  की  नींव  में  लगती  है  l  तपाने  से   भस्म  खाने  योग्य  बनती  है  l  हमें  अपना  जीवन  मुसीबतों  से  खिलवाड़  करने  वाला  बनाना  चाहिए   l  शक्तियों  का  बिखराव  हम  रोकें   एवं  उन्हें  सृजन  में  नियोजित  करें   l  व्यावहारिक  जीवन  जीते  हुए  , संघर्ष  करते  हुए  , दुःखों  का  सामना  करते  हुए   जो  तपकर  कुंदन  की  तरह  दमकता  है  , वही  सही  अर्थों  में  तपस्वी  है  l  '                                                      ' मनुष्य  जीवन  पानी  का  बुलबुला  है  l  वह  पैदा  भी  होता  है   और  मर  भी  जाता  है  l  किन्तु  शाश्वत  रहते  हैं   उसके  कर्म  और  विचार  l  सदविचार  ही  मनुष्य  को   सत्कर्म  करने  के  लिए  प्रेरित  करते  हैं   और  सत्कर्म  ही  मनुष्य  का  मनुष्यत्व  सिद्ध  करते  हैं   l  मनुष्य  के  विचार  ही  उसका  वास्तविक  स्वरुप  होते  हैं  l  ये  विचार  ही  नए -नए  मस्तिष्कों  में  घुसकर   ह्रदय  में  प्रभाव  जमाकर   मनुष्य  को  देवता  बना  देते  हैं    और  राक्षस  भी  l  जैसे  विचार  होंगे   मनुष्य  वैसा  ही  बनता  जायेगा  l '                                                                                              '  मानव  जीवन  दुबारा  नहीं  मिलता   l  वह  क्षय  हेतु  नहीं  ,   गरिमा  के  अनुरूप  शानदार  जीवन   जीने  को  मिला  है  l  यह  हमें  स्वयं  ही  निश्चित  करना  है  कि  पतन  अभीष्ट  है   या  उत्कर्ष   ?   असुरता  प्रिय  है   या  देवत्व  ?   क्षुद्रता  चाहिए  या  महानता  ?   इसके  निर्माता  तुम  स्वयं  हो   l  पतन  के  पथ  पर   नारकीय  मार  सहनी  पड़ेगी  ,  उत्कर्ष  के  पथ  पर    स्वर्ग  जैसी  शांति  की  प्राप्ति  होगी   l  '                                                                               '  कहाँ  छिपा  बैठा  है   सच्चा  इनसान  ,  ढूंढते  जिसे  स्वयं  भगवान  l  '  

WISDOM ----

 राजा  रणजीत  सिंह  का  शासन  काल  था  l  प्रजा  सुखी  थी  l  उनके  पराक्रम  व  न्यायप्रियता   की  ख्याति  सर्वत्र  थी  l  एक  दिन  वे  नगर  भ्रमण  को  निकले   कि  एक  पत्थर  उनके  सिर  पर  आकर  लगा  l  खून  की  धारा  बह  निकली  l  सैनिकों  ने   अपराधी  को  पकड़ा   तो  पता  चला  कि  वह  एक  गरीब  विधवा  महिला  थी  l  उसे  राजा  के  सम्मुख  प्रस्तुत  किया  गया  l  राजा  रणजीत  सिंह  ने  उससे  पत्थर  फेंकने  का  कारण  पूछा   तो  वह  महिला  महिला  बोली ---- " महाराज  !  मैं  विधवा  हूँ  l  मेरे  दो  छोटे -छोटे  बच्चे  हैं  l  आमदनी  का  मेरे  पास  कोई  साधन  नहीं  है  l  मेरे  बच्चों  को  भूख  लगी  थी  l  सामने  बेर  के  पेड़  पर   पके  बेर  देखकर   उन  पर  निशाना  लगाकर   पत्थर  फेंका  ,  पर  वह  भूलवश  आपको  लग  गया  l  यदि  मुझे  पता  होता  कि  आप  यहाँ  से  निकल  रहे  हैं  ,  तो  मैं  कदापि  ऐसा  नहीं  करती   l  मुझे  मेरे  इस  जघन्य  अपराध  के  लिए   मृत्यु  दंड  दिया  जाए  ,  परन्तु  मेरे  दोनों  बच्चों  को  माफ  कर   इन्हें  आप  अपनी  शरण  में  रख  लें  l  "    उस  विधवा  की   बातें  सुनकर   राजा  रणजीत   सिंह   बोले  ---- "  इस  घटना  में  दो  अपराधी  हैं  l  पत्थर  फेंकने  का  अपराध  महिला  का  है   और  उसे  पत्थर  फेंकने  के  लिए   विवश  करने  का  अपराध  मेरा  है  l  मैं  राजा  हूँ ,  मेरे  रहते  प्रजा  में  किसी  को   भूखे  नहीं  रहना  चाहिए  l  मेरे  अपराध  का  दंड  यह  पत्थर  मुझे  दे  चुका  l  इस  महिला  के  अपराध  के  एवज   में  मैं  इसके  पूरे  परिवार  के  भरण -पोषण  की  पूरी  जिम्मेदारी  लेता  हूँ  l "  महाराजा  रणजीत  सिंह  के  वचनों  को  सुनकर  वह  महिला  भावविभोर  हो  गई   और  समस्त  नागरिक  महाराज  की  प्रशंसा  करने  लगे  l  

19 September 2024

WISDOM ----

   ईर्ष्या  , द्वेष , अहंकार   जैसे   दुर्गुणों  से  ऋषि , मुनि , देवता  भी  नहीं  बचे  हैं  l   लेकिन    वे  श्रेष्ठ  इसलिए  हैं   क्योंकि  उन्होंने  अपनी  गलतियों  को  समझा , उन्हें  स्वीकार  किया   और  फिर  से  उन  गलतियों  को  न  दोहराने  का  संकल्प  लेकर   प्रायश्चित  भी  किया  ,  तब  कहीं  जाकर  वे  राजर्षि , महर्षि  जैसे सम्मान  के  अधिकारी  बने  l  पुराण  की  कथा  है  ---- ब्रह्मर्षि  वसिष्ठ  के  पास   नंदिनी  गौ  थी  ,  उसकी  सामर्थ्य  से  वे  अपने  आश्रम  की ,  आश्रम  में  आने  वाले  आगंतुकों आगंतुकों  की   और  आश्रम  में  विद्या अध्ययन  करने  वाले  छात्र -छात्राओं  की   अनिवार्य  आवश्यकताओं  की  पूर्ति  करते  थे  l  जब  विश्वामित्र  राजा  थे   और   अपनी  विशाल  सेना  के  साथ  ऋषि  वसिष्ठ  के  आश्रम  में  पहुंचे  थे   तब  ऋषि  वसिष्ठ  ने  उनका  भी  भव्य  स्वागत -सत्कार  किया  था  l   विश्वामित्र  ने  देखा  की  एक  तपस्वी  ने  इतना  भव्य  स्वागत   कैसे  किया  ,  उन्हें  ज्ञात  हुआ  कि  यह  सब  नंदिनी  गौ  की  कृपा  से  है  l  तब  उन्होंने  ऋषि  वसिष्ठ  से  कहा  कि  नंदिनी  को  आप  हमें  दे  दो  l  ऋषि  वसिष्ठ  ने  साफ  इनकार  कर  दिया  , तब  तो  विश्वामित्र  का  हठ  और  अहंकार  उनके  सिर  चढ़  गया  l  उन्होंने  नंदिनी  गौ  को  प्राप्त  करने  की  ठान  ली  और   पहले  अपने  सैन्य बल  का  प्रयोग  किया  , उसमें  असफल  हुए   l  फिर  तप  किया  , अनेक  दिव्यास्त्र  प्राप्त  किए  ,  लेकिन   ऋषि  वसिष्ठ  के  ब्रह्म दंड  के  आगे  उनकी  एक  न  चली , बुरी  तरह  असफल  हुए  l  इसके  बाद  उन्होंने  तप  के   अनेक  प्रयोग  किए ,  न  जाने  कितनी  तरह  की  विद्याएँ  प्राप्त  कीं   और  सभी  का  एक  साथ  उन्होंने  ऋषि  वसिष्ठ  पर  प्रयोग  किया ,  लेकिन  उन्हें  असफलता  ही  मिली  l  जितना  वे  असफल  हो  रहे  थे  उनका  वैर , हठ    और  अहंकार  उतना  ही  बढ़ता  जा  रहा  था  l  उन्होंने  ऋषि  वसिष्ठ  के  सौ  पुत्रों  का  विनाश  किया  l   ऋषि  वसिष्ठ  में  गजब  का  धैर्य  और  सहनशीलता  थी  ,  वे  विश्वामित्र  से  रुष्ट  नहीं  हुए  और  बड़े  धैर्य  के  साथ  इस  महाशोक  को  सहन  किया  l  विश्वामित्र  का  वैर  नहीं  मिटा   और  एक  पूर्णिमा  की  रात्रि  को  वे  ऋषि  वसिष्ठ  की  हत्या  करने  उनके  आश्रम  पहुंचे  l  विश्वामित्र  ने  महान  तप  किया  था  , लेकिन  हठ  और  अहंकार  की  वजह  से   वे    हत्या  जैसा  दुष्कृत्य  करने  को  उतारू  थे  l  जब  वे  ऋषि  वसिष्ठ  के  आश्रम  में  पहुंचे  , उस  समय   ऋषि  अपनी  पत्नी  अरुंधती  से  कह  रहे  थे  --- "  देवी  !  देखो   आज  चंद्रमा   सब  ओर  निर्मल  , धवल  प्रकाश  फैला  रहा  है  l  इस  प्रकाश  की  निर्मलता ,  शीतलता , धवलता  ऋषि श्रेष्ठ  विश्वामित्र  के   महान    तप  की  तरह  है  l  "  यह    सुनकर  विश्वामित्र  का  ह्रदय  ग्लानि  से  भर  गया  l  ऋषि  वसिष्ठ  पर  उन्होंने  इतने  वार  किए , उन्हें  कष्ट  दिया  , वे  उनकी  प्रशंसा  कर  रहे  हैं   l  विश्वामित्र  चमकती  कृपाण  लेकर  ऋषि  वसिष्ठ  के  सम्मुख  आए  और   कृपाण  सहित  उनके  चरणों चरणों  में  गिर  पड़े  l  ऋषि  वसिष्ठ  ने  उनको  उठाते  हुए  कहा  ---- " हे  ब्रह्मर्षि !  उठो  l "    गायत्री  महामंत्र  के  ऋषि  विश्वामित्र  हैं   l  अपने  महान  तप   के  कारण  वे   ब्रह्मर्षि  के  पद  पर  पहुंचे  l  

18 September 2024

WISDOM ------

  ' अनेक  लोग  पीठ   पीछे  बुराई  करने   और  सम्मुख  आवभगत   दिखलाने  में  बड़ा  आनंद  लेते  हैं  l  वे  समझते  हैं  कि  संसार  इतना  मूर्ख  है  कि  उनकी  इस  दोहरी  नीति  को  समझ  नहीं  सकता  l  वे  इस  दोहरे  व्यवहार  पर  भी   समाज  में   बड़े  ही  शिष्ट  एवं   सभ्य   समझे  जाते  हैं   l  अपने  को  इस  प्रकार   बुद्धिमान  समझना   बहुत  बड़ी  मूर्खता  है     l   वास्तविकता  छिपी  नहीं  रह  सकती  l    इतिहास  ऐसे  अनेक  उदाहरणों  से  भरा  है  l  सामने  से  अच्छा  व्यवहार  करना  और  पीठ  में  खंजर  भोंकना  ,  ये  सोच  समझ  कर  किया  गया  ऐसा  अपराध  है  जिसके  लिए  ईश्वर  कभी  क्षमा  नहीं  करते   l  महाभारत  में  ऐसे  कई  प्रसंग  हैं   जहाँ   दुर्योधन  ने  अपने  ही  भाइयों   पांडवों    के  विरुद्ध  अनेक  षड्यंत्र  रचे  ,  लाक्षाग्रह  में  भेजकर  तो  वे  पांडवों  के  जलकर  मर  जाने   की  ख़ुशी   मन -ही-मन  मना  रहे  थे  l  लेकिन  ऐसी  कुटिल  नीति  का  अंत  अच्छा  नहीं  होता  l  अपने  भीतर  की   असुरता  को  मनुष्य  संसार  से  चाहे  कितना  भी  छुपा  ले  ,  लेकिन  ईश्वर  सर्वव्यापक  और  सर्वशक्तिमान  है   l  उनसे  कुछ  नहीं  छुपा  ,  कर्म  का  फल  अवश्य  मिलता  है  l                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                               

15 September 2024

WISDOM ------

  अनंत  ब्रह्माण्ड  पर  आधिपत्य  जमाने  की  मनुष्य  की  व्यर्थ  चेष्टा  पर  उसे  चेताते  हुए  प्रसिद्ध  साहित्यकार  बट्रेंड  रसेल  ने  लिखा  है  ----- " अच्छा  होता  कि  हम  अपनी  धरती  ही  सुधारते   और  बेचारे  चंद्रमा   को   उसके  भाग्य  पर  छोड़  देते   l  अभी  तक  हमारी  मूर्खताएं   धरती  तक  ही  सीमित  रही  हैं  l  उन्हें  ब्रह्माण्डव्यापी  बनाने  में   मुझे  कोई  ऐसी  बात  प्रतीत  नहीं  होती  ,  जिस  पर  विजय उत्सव   मनाया  जाए  l  चंद्रमा  पर  मनुष्य  पहुँच  गया  तो   क्या  ?   यदि  हम  धरती  को  ही  सुखी   नहीं  बना  पाए  तो  यह  प्रगति  बेमानी  है  l  "                        पं. श्रीराम  शर्मा  आचार्य जी   लिखते  हैं ---- "  प्रगति  के  नाम  पर   विकृति  को  अपने  जीवन  का   लक्ष्य  बनाए  चल  रहे  इनसान  के  लिए    बट्रेंड  रसेल  की  यह  पंक्तियाँ   आज  बहुत  सार्थक  प्रतीत  होती  हैं  l    विज्ञानं  ने  हमारे  जीवन  को  सुख -सुविधा  और  विलासिता  की  चीजों  से  भर  दिया  है  l   भौतिक  प्रगति  तो  हुई  है  लेकिन  हम  आंतरिक  रूप  से  कंगाल  हो  चुके  हैं   l  मनुष्य  भावनाओं  और  संवेदनाओं  से  रहित   एक  रासायनिक  यंत्र  बन  गया  है  l  l  विज्ञान  का  प्रभाव  क्षेत्र कितना  ही  व्यापक  और  उपलब्धियां   कितनी  ही  चमत्कारी   क्यों  न  हों  ,  इसके  अलावा  भी  जीवन  में  भावनात्मक   संतुष्टि  , मानवीय  संवेदना  जरुरी  है  , जिसके  अभाव  में  जिंदगी  पंगु  हो  जाएगी   l  "       विज्ञान  की  उपलब्धियों  के  संबंध  में  बंट्रेंड  रसेल  का  कथन  है  ----- "  हम  एक  ऐसे  जीवन  प्रवाह  के  बीच  हैं  , जिसका  साधन  है  मानवीय  दक्षता   और  साध्य  है  मानवीय   मूर्खता  l  मानव  जाति  अब  तक  जीवित  रह  सकी   तो  अपने  अज्ञान  और  अक्षमता  के  कारण  ही  ,  परन्तु  यदि  ज्ञान   व  क्षमता   मूढ़ता  के  साथ   युक्त  हो  जाएँ   तो  उसके  बचे  रहने   कोई  संभावना   नहीं  है   l  अत:  विज्ञानं  के  साथ   विवेक  एवं   औचित्य पूर्ण    क्रियाकुशालता   की  भी  आवश्यकता  है  l  "  

13 September 2024

WISDOM -----

 आज  हम  वैज्ञानिक  युग  में  जी  रहे  हैं  l  विज्ञानं  ने  विभिन्न  क्षेत्रों  में   बड़े  चमत्कार  प्रस्तुत  किए हैं  लेकिन  फिर  भी  जीवन  के  कुछ  क्षेत्र  ऐसे  हैं   जहाँ  विज्ञानं  शून्य  है  ,  ,  वह  क्षेत्र  विज्ञानं  की  पहुँच  से  बाहर  है   और  वह  है --- ' मनुष्य  के  संस्कारों  में  परिवर्तन  करना  l "  यह  विज्ञानं  के  वश  की  बात  नहीं  है  l  मनुष्य  के  विचारों  को  परिष्कृत करना ,  उसे  सन्मार्ग  की  ओर  प्रेरित  करना  ---इसके  लिए  वैज्ञानिकों  के  पास  कोई  उपकरण  नहीं  है  l  यही  कारण  है   कि  अपराध  इतनी  तेजी  से  और  विकृत  रूप  से  बढ़  रहे  हैं  l  मनुष्य  से  गलती  हो  जाए  तो  उसे   सुधारा  जा  सकता  है    l   लेकिन  जो  लोग  सोच  -विचारकर , योजना  बना  कर  पापकर्म  करते  हैं , छल , कपट  , षडयंत्र  करते  हैं  , मनुष्यता  के  स्तर  से  गिरकर  पापकर्म  करते  हैं  --- यदि  ऐसे  लोगों  की  पिछली  तीन -चार  पीढ़ियों  की  जानकारी   निष्पक्ष  भाव  से  ली  जाये   तो  निश्चित  रूप  से  यह  सत्य  सामने  आएगा  कि   उनके  पूर्वजों  में  से  कोई -न-कोई  ऐसे  पापकर्म  में  संलग्न  रहा  है  l  वर्तमान  में  पाप  करने  वाला  अपने  संस्कारों  के  वशीभूत  होकर  ही  यह  कुकर्म  कर  रहा  है  l  आज  विज्ञान  को  अध्यात्म  की  जरुरत  है  l  यदि  मनुष्य  अपने  द्वारा  किए  जाने  वाले  पापकर्मों  के  प्रति  सजग  हो  जाये   और  इस  दलदल  से  उबरना  चाहे  तो   यह  अध्यात्म  से  संभव  है  l   मन्त्र जप  कर  के , दान -पुण्य , नियमित  दिनचर्या , कर्तव्य  पालन   और  स्वयं   में  सुधार  करने  की  तीव्र  इच्छा   और  ईश्वर  के  प्रति  समर्पण  से  रूपांतरण  संभव  है  l  मनुष्य  स्वयं  को  सुधार  कर  अपना लोक -परलोक  सुधार  सकता  है  और  आने  वाली  पीढ़ियों  को  सही  दिशा  दे  सकता  है  l  आज  पृथ्वी  पर   पर्यावरण  प्रदूषण , युद्ध , दंगे , अपराध , दुर्घटनाएं , प्राकृतिक  आपदाएं , बीमारी , महामारी   आदि  प्रत्यक्ष  रूप  से  दिखाई  देने  वाली  समस्याएं  हैं   लेकिन  एक  सबसे  बड़ी  समस्या  जो  दिखाई  नहीं  देती    और  विभिन्न  दुर्घटनाओं , लोगों  में  तनाव  और  अनेक  समस्याओं  का  कारण  है   वह  है  ---- ये  पापकर्म  करने  वाले   स्वयं  तो  अपने  नीच  कर्मों  के  कारण   भूत   -प्रेत , पिशाच  आदि  योनियों  में  भटकते  हैं , ये  लोग  अपने  जीवन  में   अपनी  विकृतियों  के  कारण   बच्चों , महिलाओं  और  अपने  रास्ते  में   बाधा  डालने  वालों  की  हत्या  करते  हैं   और  विभिन्न  कारणों  से  अकाल मृत्यु   जिनकी  हो   जाती  है   वे  भी  अतृप्त  आत्माएं  वातावरण  में  भटकती  हैं  l  इसलिए  इस  धरती  पर  समस्याओं  का  बोझ    प्रत्यक्ष  और  अप्रत्यक्ष   दोनों  है  l  यदि  ज्ञान   , शक्ति , धन -वैभव   के  साथ  विवेक  हो  , सद्बुद्धि  हो  , तभी  उसका  सदुपयोग  संभव  है  l  यह  वैज्ञानिक  प्रगति   एकांगी  है  , जीवन  की  पूर्णता  के  लिए  अध्यात्म  जरुरी  है  l  

11 September 2024

WISDOM -----

  संसार  में  आज  इतना  पाप , अनर्थ , अनीति , अत्याचार  बढ़  रहा  है  , इसका  मुख्य  कारण  यही  है   कि    मनुष्यों    ने   कर्म फल   और  पुनर्जन्म  पर  विश्वास  करना  छोड़  दिया  है  l  विद्वानों  के  इस  सन्देश  को  कि  ' वर्तमान  में  जिओ  '  लोगों  ने  गलत  ढंग  से  ले  लिया  l  अब  लोग  इस  तरह  सोचने  लग  गए  हैं  कि   नैतिक - अनैतिक , सही -गलत  किसी  भी  तरीके  से  जितना  सुख  , ऐशो -आराम  भोग  लो , चाहे  जितना  छल -कपट , षड्यंत्र  कर  लोगों  को  उत्पीड़ित  कर  लो  ,  अगला  जन्म  किसने  देखा  ?   जो  होगा   सो  देखा  जायेगा  l  ---इस  तरह  की  सोच  होने  के  करण  ही  समाज  में  पाप  अपराध  बढ़  रहे  हैं  l  थोड़ी  सी  भी  शक्ति  आ  जाए  तो  व्यक्ति  अपने  को  सर्वसमर्थ , भगवान  समझने  लगता  है  , उसे  लगता  है  कि  वही  सबका  भाग्य -विधाता  है  l  कर्मफल  विधान  को  समझाने  वाले  अनेक प्रसंग , कथाएं  हैं   लेकिन  अपने  ही  मानसिक  विकारों  में  फँसा  हुआ  व्यक्ति  समझता  नहीं  है  l -------- आचार्य  महीधर   अपने  शिष्यों   के   साथ   तीर्थयात्रा  पर  थे  l   रात्रि  में  जंगल  में  रुक  गए  l  रात्रि  में  ही  उन्हें   समीप  के  अंधे  कुएं  से  करुण  क्रंदन  सुनाई  पड़ा  l  वे  वहां  पहुंचे  तो  देखा  पांच  व्यक्ति  औधेमुँह  पड़े  बिलख  रहे  हैं  l   आचार्य  ने  उनसे  पूछा  --- 'आप  कौन  हैं  , इस  कुएं  में  क्यों  गिरे  हैं  ? '   उनमें  से  एक  ने  कहा --- " हम  पांच  प्रेत  हैं  , कर्मफल  भोग  रहे  हैं  l '  आचार्य  ने  उनसे  उनकी  ऐसी  दुर्गति  का  कारण  पूछा  , तब  उनमें  से  एक  ने  कहा ---- " वह  पूर्वजन्म  में  ब्राह्मण  था  l  दक्षिणा  बटोर  कर  विलासिता  में  खर्च  करता  था  l  उपासना  कभी  नहीं  की  l "   दूसरे  ने  कहा  ---- " वह  क्षत्रिय  था  , पर  दुःखियों   को  पीड़ा  देता  ,  मांस - नशा  , आदि  विभिन्न  कुकृत्य  में   निरत  रहा  l "   तीसरा  बोला --- " मैं  वैश्य  था  l  हमेशा  अपने  ही  लाभ  की  सोचता ,  बिक्री  में  हेराफेरी  करता  , कभी  दान  नहीं  किया  l "  चौथे  ने  कहा --- "  मैं   शूद्र   था , अहंकारी , आलसी , दुर्व्यसनी  l  कभी  जिम्मेदारी  का  पालन  नहीं  किया  l "   पांचवां  प्रेत  किसी  को  अपना  मुँह  नहीं  दिखाता   था , निरंतर  रोता  जा  रहा  था  l  बहुत  पूछने  पर  वह  बोला --- " मैं  पूर्वजन्म  में  साहित्यकार  था  ,  पर  अपनी  कलम  से  मैंने   अश्लीलता   और  फूहड़पन  फ़ैलाने  वाला  साहित्य  लिखा  l  मैंने  वासना  भड़काई  और  सारे  समाज  को  भ्रष्ट  किया  l  इसलिए  मुझे  ब्रह्म राक्षस  बनकर  इस स्थिति  में  भटकना  पड़  रहा  है  l "  उन  पाँचों  प्रेतों  ने  आचार्य  से  प्रार्थना  की  कि   वे  समाज  में   उनकी  ( प्रेतों )  की  दुर्गति  का  कारण  सभी  को  बता  दें  , ताकि  वे  लोग  ऐसी  भूल  न  करें  l