पं . श्रीराम शर्मा आचार्य जी की अमृतवाणी के कुछ अंश ------ तप का अर्थ है --आत्म परिष्कार के लिए तितिक्षा करना , कष्ट सहना l तपाने से ईंट मंदिर की नींव में लगती है l तपाने से भस्म खाने योग्य बनती है l हमें अपना जीवन मुसीबतों से खिलवाड़ करने वाला बनाना चाहिए l शक्तियों का बिखराव हम रोकें एवं उन्हें सृजन में नियोजित करें l व्यावहारिक जीवन जीते हुए , संघर्ष करते हुए , दुःखों का सामना करते हुए जो तपकर कुंदन की तरह दमकता है , वही सही अर्थों में तपस्वी है l ' ' मनुष्य जीवन पानी का बुलबुला है l वह पैदा भी होता है और मर भी जाता है l किन्तु शाश्वत रहते हैं उसके कर्म और विचार l सदविचार ही मनुष्य को सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं और सत्कर्म ही मनुष्य का मनुष्यत्व सिद्ध करते हैं l मनुष्य के विचार ही उसका वास्तविक स्वरुप होते हैं l ये विचार ही नए -नए मस्तिष्कों में घुसकर ह्रदय में प्रभाव जमाकर मनुष्य को देवता बना देते हैं और राक्षस भी l जैसे विचार होंगे मनुष्य वैसा ही बनता जायेगा l ' ' मानव जीवन दुबारा नहीं मिलता l वह क्षय हेतु नहीं , गरिमा के अनुरूप शानदार जीवन जीने को मिला है l यह हमें स्वयं ही निश्चित करना है कि पतन अभीष्ट है या उत्कर्ष ? असुरता प्रिय है या देवत्व ? क्षुद्रता चाहिए या महानता ? इसके निर्माता तुम स्वयं हो l पतन के पथ पर नारकीय मार सहनी पड़ेगी , उत्कर्ष के पथ पर स्वर्ग जैसी शांति की प्राप्ति होगी l ' ' कहाँ छिपा बैठा है सच्चा इनसान , ढूंढते जिसे स्वयं भगवान l '
21 September 2024
WISDOM ----
राजा रणजीत सिंह का शासन काल था l प्रजा सुखी थी l उनके पराक्रम व न्यायप्रियता की ख्याति सर्वत्र थी l एक दिन वे नगर भ्रमण को निकले कि एक पत्थर उनके सिर पर आकर लगा l खून की धारा बह निकली l सैनिकों ने अपराधी को पकड़ा तो पता चला कि वह एक गरीब विधवा महिला थी l उसे राजा के सम्मुख प्रस्तुत किया गया l राजा रणजीत सिंह ने उससे पत्थर फेंकने का कारण पूछा तो वह महिला महिला बोली ---- " महाराज ! मैं विधवा हूँ l मेरे दो छोटे -छोटे बच्चे हैं l आमदनी का मेरे पास कोई साधन नहीं है l मेरे बच्चों को भूख लगी थी l सामने बेर के पेड़ पर पके बेर देखकर उन पर निशाना लगाकर पत्थर फेंका , पर वह भूलवश आपको लग गया l यदि मुझे पता होता कि आप यहाँ से निकल रहे हैं , तो मैं कदापि ऐसा नहीं करती l मुझे मेरे इस जघन्य अपराध के लिए मृत्यु दंड दिया जाए , परन्तु मेरे दोनों बच्चों को माफ कर इन्हें आप अपनी शरण में रख लें l " उस विधवा की बातें सुनकर राजा रणजीत सिंह बोले ---- " इस घटना में दो अपराधी हैं l पत्थर फेंकने का अपराध महिला का है और उसे पत्थर फेंकने के लिए विवश करने का अपराध मेरा है l मैं राजा हूँ , मेरे रहते प्रजा में किसी को भूखे नहीं रहना चाहिए l मेरे अपराध का दंड यह पत्थर मुझे दे चुका l इस महिला के अपराध के एवज में मैं इसके पूरे परिवार के भरण -पोषण की पूरी जिम्मेदारी लेता हूँ l " महाराजा रणजीत सिंह के वचनों को सुनकर वह महिला भावविभोर हो गई और समस्त नागरिक महाराज की प्रशंसा करने लगे l
19 September 2024
WISDOM ----
ईर्ष्या , द्वेष , अहंकार जैसे दुर्गुणों से ऋषि , मुनि , देवता भी नहीं बचे हैं l लेकिन वे श्रेष्ठ इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने अपनी गलतियों को समझा , उन्हें स्वीकार किया और फिर से उन गलतियों को न दोहराने का संकल्प लेकर प्रायश्चित भी किया , तब कहीं जाकर वे राजर्षि , महर्षि जैसे सम्मान के अधिकारी बने l पुराण की कथा है ---- ब्रह्मर्षि वसिष्ठ के पास नंदिनी गौ थी , उसकी सामर्थ्य से वे अपने आश्रम की , आश्रम में आने वाले आगंतुकों आगंतुकों की और आश्रम में विद्या अध्ययन करने वाले छात्र -छात्राओं की अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे l जब विश्वामित्र राजा थे और अपनी विशाल सेना के साथ ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में पहुंचे थे तब ऋषि वसिष्ठ ने उनका भी भव्य स्वागत -सत्कार किया था l विश्वामित्र ने देखा की एक तपस्वी ने इतना भव्य स्वागत कैसे किया , उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब नंदिनी गौ की कृपा से है l तब उन्होंने ऋषि वसिष्ठ से कहा कि नंदिनी को आप हमें दे दो l ऋषि वसिष्ठ ने साफ इनकार कर दिया , तब तो विश्वामित्र का हठ और अहंकार उनके सिर चढ़ गया l उन्होंने नंदिनी गौ को प्राप्त करने की ठान ली और पहले अपने सैन्य बल का प्रयोग किया , उसमें असफल हुए l फिर तप किया , अनेक दिव्यास्त्र प्राप्त किए , लेकिन ऋषि वसिष्ठ के ब्रह्म दंड के आगे उनकी एक न चली , बुरी तरह असफल हुए l इसके बाद उन्होंने तप के अनेक प्रयोग किए , न जाने कितनी तरह की विद्याएँ प्राप्त कीं और सभी का एक साथ उन्होंने ऋषि वसिष्ठ पर प्रयोग किया , लेकिन उन्हें असफलता ही मिली l जितना वे असफल हो रहे थे उनका वैर , हठ और अहंकार उतना ही बढ़ता जा रहा था l उन्होंने ऋषि वसिष्ठ के सौ पुत्रों का विनाश किया l ऋषि वसिष्ठ में गजब का धैर्य और सहनशीलता थी , वे विश्वामित्र से रुष्ट नहीं हुए और बड़े धैर्य के साथ इस महाशोक को सहन किया l विश्वामित्र का वैर नहीं मिटा और एक पूर्णिमा की रात्रि को वे ऋषि वसिष्ठ की हत्या करने उनके आश्रम पहुंचे l विश्वामित्र ने महान तप किया था , लेकिन हठ और अहंकार की वजह से वे हत्या जैसा दुष्कृत्य करने को उतारू थे l जब वे ऋषि वसिष्ठ के आश्रम में पहुंचे , उस समय ऋषि अपनी पत्नी अरुंधती से कह रहे थे --- " देवी ! देखो आज चंद्रमा सब ओर निर्मल , धवल प्रकाश फैला रहा है l इस प्रकाश की निर्मलता , शीतलता , धवलता ऋषि श्रेष्ठ विश्वामित्र के महान तप की तरह है l " यह सुनकर विश्वामित्र का ह्रदय ग्लानि से भर गया l ऋषि वसिष्ठ पर उन्होंने इतने वार किए , उन्हें कष्ट दिया , वे उनकी प्रशंसा कर रहे हैं l विश्वामित्र चमकती कृपाण लेकर ऋषि वसिष्ठ के सम्मुख आए और कृपाण सहित उनके चरणों चरणों में गिर पड़े l ऋषि वसिष्ठ ने उनको उठाते हुए कहा ---- " हे ब्रह्मर्षि ! उठो l " गायत्री महामंत्र के ऋषि विश्वामित्र हैं l अपने महान तप के कारण वे ब्रह्मर्षि के पद पर पहुंचे l
18 September 2024
WISDOM ------
' अनेक लोग पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनंद लेते हैं l वे समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस दोहरी नीति को समझ नहीं सकता l वे इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े ही शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं l अपने को इस प्रकार बुद्धिमान समझना बहुत बड़ी मूर्खता है l वास्तविकता छिपी नहीं रह सकती l इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा है l सामने से अच्छा व्यवहार करना और पीठ में खंजर भोंकना , ये सोच समझ कर किया गया ऐसा अपराध है जिसके लिए ईश्वर कभी क्षमा नहीं करते l महाभारत में ऐसे कई प्रसंग हैं जहाँ दुर्योधन ने अपने ही भाइयों पांडवों के विरुद्ध अनेक षड्यंत्र रचे , लाक्षाग्रह में भेजकर तो वे पांडवों के जलकर मर जाने की ख़ुशी मन -ही-मन मना रहे थे l लेकिन ऐसी कुटिल नीति का अंत अच्छा नहीं होता l अपने भीतर की असुरता को मनुष्य संसार से चाहे कितना भी छुपा ले , लेकिन ईश्वर सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान है l उनसे कुछ नहीं छुपा , कर्म का फल अवश्य मिलता है l
15 September 2024
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अनंत ब्रह्माण्ड पर आधिपत्य जमाने की मनुष्य की व्यर्थ चेष्टा पर उसे चेताते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार बट्रेंड रसेल ने लिखा है ----- " अच्छा होता कि हम अपनी धरती ही सुधारते और बेचारे चंद्रमा को उसके भाग्य पर छोड़ देते l अभी तक हमारी मूर्खताएं धरती तक ही सीमित रही हैं l उन्हें ब्रह्माण्डव्यापी बनाने में मुझे कोई ऐसी बात प्रतीत नहीं होती , जिस पर विजय उत्सव मनाया जाए l चंद्रमा पर मनुष्य पहुँच गया तो क्या ? यदि हम धरती को ही सुखी नहीं बना पाए तो यह प्रगति बेमानी है l " पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---- " प्रगति के नाम पर विकृति को अपने जीवन का लक्ष्य बनाए चल रहे इनसान के लिए बट्रेंड रसेल की यह पंक्तियाँ आज बहुत सार्थक प्रतीत होती हैं l विज्ञानं ने हमारे जीवन को सुख -सुविधा और विलासिता की चीजों से भर दिया है l भौतिक प्रगति तो हुई है लेकिन हम आंतरिक रूप से कंगाल हो चुके हैं l मनुष्य भावनाओं और संवेदनाओं से रहित एक रासायनिक यंत्र बन गया है l l विज्ञान का प्रभाव क्षेत्र कितना ही व्यापक और उपलब्धियां कितनी ही चमत्कारी क्यों न हों , इसके अलावा भी जीवन में भावनात्मक संतुष्टि , मानवीय संवेदना जरुरी है , जिसके अभाव में जिंदगी पंगु हो जाएगी l " विज्ञान की उपलब्धियों के संबंध में बंट्रेंड रसेल का कथन है ----- " हम एक ऐसे जीवन प्रवाह के बीच हैं , जिसका साधन है मानवीय दक्षता और साध्य है मानवीय मूर्खता l मानव जाति अब तक जीवित रह सकी तो अपने अज्ञान और अक्षमता के कारण ही , परन्तु यदि ज्ञान व क्षमता मूढ़ता के साथ युक्त हो जाएँ तो उसके बचे रहने कोई संभावना नहीं है l अत: विज्ञानं के साथ विवेक एवं औचित्य पूर्ण क्रियाकुशालता की भी आवश्यकता है l "
13 September 2024
WISDOM -----
11 September 2024
WISDOM -----
संसार में आज इतना पाप , अनर्थ , अनीति , अत्याचार बढ़ रहा है , इसका मुख्य कारण यही है कि मनुष्यों ने कर्म फल और पुनर्जन्म पर विश्वास करना छोड़ दिया है l विद्वानों के इस सन्देश को कि ' वर्तमान में जिओ ' लोगों ने गलत ढंग से ले लिया l अब लोग इस तरह सोचने लग गए हैं कि नैतिक - अनैतिक , सही -गलत किसी भी तरीके से जितना सुख , ऐशो -आराम भोग लो , चाहे जितना छल -कपट , षड्यंत्र कर लोगों को उत्पीड़ित कर लो , अगला जन्म किसने देखा ? जो होगा सो देखा जायेगा l ---इस तरह की सोच होने के करण ही समाज में पाप अपराध बढ़ रहे हैं l थोड़ी सी भी शक्ति आ जाए तो व्यक्ति अपने को सर्वसमर्थ , भगवान समझने लगता है , उसे लगता है कि वही सबका भाग्य -विधाता है l कर्मफल विधान को समझाने वाले अनेक प्रसंग , कथाएं हैं लेकिन अपने ही मानसिक विकारों में फँसा हुआ व्यक्ति समझता नहीं है l -------- आचार्य महीधर अपने शिष्यों के साथ तीर्थयात्रा पर थे l रात्रि में जंगल में रुक गए l रात्रि में ही उन्हें समीप के अंधे कुएं से करुण क्रंदन सुनाई पड़ा l वे वहां पहुंचे तो देखा पांच व्यक्ति औधेमुँह पड़े बिलख रहे हैं l आचार्य ने उनसे पूछा --- 'आप कौन हैं , इस कुएं में क्यों गिरे हैं ? ' उनमें से एक ने कहा --- " हम पांच प्रेत हैं , कर्मफल भोग रहे हैं l ' आचार्य ने उनसे उनकी ऐसी दुर्गति का कारण पूछा , तब उनमें से एक ने कहा ---- " वह पूर्वजन्म में ब्राह्मण था l दक्षिणा बटोर कर विलासिता में खर्च करता था l उपासना कभी नहीं की l " दूसरे ने कहा ---- " वह क्षत्रिय था , पर दुःखियों को पीड़ा देता , मांस - नशा , आदि विभिन्न कुकृत्य में निरत रहा l " तीसरा बोला --- " मैं वैश्य था l हमेशा अपने ही लाभ की सोचता , बिक्री में हेराफेरी करता , कभी दान नहीं किया l " चौथे ने कहा --- " मैं शूद्र था , अहंकारी , आलसी , दुर्व्यसनी l कभी जिम्मेदारी का पालन नहीं किया l " पांचवां प्रेत किसी को अपना मुँह नहीं दिखाता था , निरंतर रोता जा रहा था l बहुत पूछने पर वह बोला --- " मैं पूर्वजन्म में साहित्यकार था , पर अपनी कलम से मैंने अश्लीलता और फूहड़पन फ़ैलाने वाला साहित्य लिखा l मैंने वासना भड़काई और सारे समाज को भ्रष्ट किया l इसलिए मुझे ब्रह्म राक्षस बनकर इस स्थिति में भटकना पड़ रहा है l " उन पाँचों प्रेतों ने आचार्य से प्रार्थना की कि वे समाज में उनकी ( प्रेतों ) की दुर्गति का कारण सभी को बता दें , ताकि वे लोग ऐसी भूल न करें l