पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं ---' जितनी शक्ति मनुष्य के भीतर है , उतनी किसी के पास नहीं है किन्तु मनुष्य भोग -विलास में जीवन बिता कर इस अमूल्य संपत्ति को नष्ट कर रहा है l ' एक कथा है ----- एक तपस्वी वन में रहकर घोर तप कर रहे थे l यह देख इंद्र घबराए कि इतना कठोर तप करने वाला इन्द्रासन का हकदार बन सकता है l इंद्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अप्सराएँ भेजीं , डराने के लिए राक्षस भेजे , पर तपस्वी ज्यों के त्यों रहे , वे जरा भी डगमगाए नहीं l अब इंद्र ने दूसरी चाल चली l उन्होंने एक परी को बहुत से पकवान , मिष्ठान लेकर भेजा l तपस्वी ने पहले तो उपेक्षा दिखाई , लेकिन फिर उनकी जीभ चटोरी हो गई l वन में ऐसा स्वादिष्ट भोजन उन्हें पहली बार मिला l अब वे रोज उस परी की प्रतीक्षा करने लगे l एक दिन वन परी अपने घर छप्पन भोग पकवान खिलाने का निमंत्रण देने आई l तपस्वी उसके घर पहुंचे और भोजन कर बहुत प्रसन्न हुए l परी ने कहा ---- ' आप मेरे घर ही निवास करें , इससे भी बढ़कर भोजन कराया करुँगी l " तपस्वी सहमत हो गए l रोज -रोज पकवान खाते थे l अब वे परी पर मुग्ध हो गए , उसके साथ गंधर्व विवाह करने को सहमत हो गए l तप भ्रष्ट हुआ , देवराज इंद्र बहुत प्रसन्न हुए और बोले ---- " अन्य रस छोड़े जा सकते हैं , पर स्वाद बड़े -बड़ों की साधना चट कर जाता है l "
9 October 2022
WISDOM ----
पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी लिखते हैं --- ' आकस्मिक विपत्ति का सिर पर आ पड़ना मनुष्य के लिए बहुत दुखदायी है l इससे उसकी बड़ी हानि होती है , किन्तु उस विपत्ति की हानि से अनेकों गुनी हानि करने वाला एक और कारण है , वह है विपत्ति में घबराहट l विपत्ति कही जाने वाली मूल घटना चाहे वह कैसी बड़ी क्यों न हो , किसी का अत्यधिक अनिष्ट नहीं कर सकती , परन्तु विपत्ति की घबराहट , ऐसी पिशाचिनी है कि वह जिसके पीछे पड़ जाती है , उसके गले से खून की प्यासी जोंक की तरह चिपक जाती है और जब तक उस मनुष्य को पूर्णतया नि:सत्य नहीं कर देती , तब तक उसका पीछा नहीं छोड़ती l " सामान्यत: यही देखा जाता है कि थोड़ी सी भी परेशानी आने पर हम अपना धैर्य खो बैठते हैं और समस्या का समाधान खोजने के बजाय घबराहट में उस समस्या को और अधिक बढ़ा देते हैं l धैर्य और ईश्वर विश्वास जरुरी है l एक कथा है -------- एक भैंस थी --बड़ी उपद्रवी l रस्सा तुड़ाकर भाग जाती थी और जिस खेत में घुस जाती , उसी को कुचल कर रख देती l पकड़ने वालों की भी वह अच्छी खबर लेती l एक दिन तो वह ऐसी हो गई कि किसी की पकड़ में नहीं आ रही थी l हैरान लोगों के बीच से एक साहसी लड़का निकला l सिर पर उसने हरी घास का गट्ठर रख लिया और उपद्रवी भैंस की तरफ सहज स्वभाव से आगे चलता चला गया l ललचाई भैंस घास खाने के लिए आगे बढ़ी , लड़के ने उसके आगे गट्ठा डाल दिया और मौका मिलते ही उछलकर उसकी पीठ पर जा बैठा l डंडे से पीटते हुए वह उसे बाड़े में ले आया l लोगों ने जाना कि आवेश भरे प्रतिरोध से भी बढ़कर उपद्रवी तत्वों को काबू में लाने के लिए कई बार दूरदर्शी नीतिमत्ता अधिक कार्य करती है l
8 October 2022
WISDOM -----
भारतीय तत्ववेत्ताओं का कहना है कि मानव के बंधन और दुःख उसके अतीत के गलत कार्यों व कर्मों के स्वाभाविक परिणाम हैं l यदि इस जीवन में शुभ और उचित कर्म निष्ठापूर्वक किए जाएँ तो भविष्य में उनका शुभ फल प्राप्त होने की पूर्ण संभावना है l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- " मनुष्य का जीवन एक खेत है , जिसमें कर्म बोए जाते हैं और उन्ही के अच्छे -बुरे फल काटे जाते हैं l जो अच्छे कर्म करता है , वह अच्छे फल पाता है , बुरे कर्म करने वाला बुराई ही समेटता है l ' आचार्य श्री लिखते हैं --- कर्म करना मनुष्य के हाथ में है लेकिन उसका फल कब और कैसे मिलेगा यह काल निश्चित करता है l कर्मों का इच्छानुसार फल प्राप्त करना हो तो प्रयत्न के अतिरिक्त धैर्य की भी आवश्यकता होती है l " यदि आज हम कोई नेक कर्म कर रहे हैं तो आज या कल में या कुछ ही दिनों में हमको उसका सुफल नहीं मिल जायेगा , ईश्वर तराजू में तोलकर न्याय करते हैं , हम निरंतर सत्कर्म करें और ईश्वरीय चमत्कारों को महसूस करें l एक कथा है ----- ' बंदरों का एक दल आम के बाग में निवास करता था l बन्दर जब भी आम तोड़ने का प्रयास करते तो आम तो कम ही हाथ लगते , पर बाग के रखवालों के पत्थर ज्यादा झेलने पड़ते l तंग आकर बंदरों के सरदार ने एक दिन सभी बंदरों की सभा बुलाई और उसमें घोषणा की कि ' आज से हम लोग अपना अलग बाग लगाएंगे और उसमे आम के पेड़ लगाएंगे l इससे रोज -रोज के झंझट से मुक्ति मिलेगी l ' सब बंदरों को यह बात जंच गई और सबने आम की एक -एक गुठली ली और जमीन में गड्ढा खोद कर बो डाली l सब बंदरों में प्रसन्नता की लहर व्याप्त हो गई कि अब शीघ्र ही हर बन्दर आम के एक पेड़ का स्वामी होगा l बंदरों में धैर्य नहीं था , कुछ ही घंटे गुजरे थे कि बंदरों ने जमीन खोदकर गुठलियाँ निकाल कर देखना शुरू किया कि उनमें से पेड़ निकले या नहीं l थोड़ी ही देर में सारा बाग उजाड़ गया l
5 October 2022
WISDOM -----
एक नदी किनारे शिव मंदिर था l वहीँ पास के घाट पर धोबियों का पत्थर भी पड़ा था , जिस पर धोबी अपने कपड़े पटककर धोते थे l मंदिर में प्रतिष्ठित शिवलिंग और धोबी का पत्थर , हजार वर्ष पहले एक ही थे l नदी के जल के बहाव ने दोनों को अलग -अलग कर दिया और काल क्रम ने एक को शिवलिंग और दूसरे को धोबी का पत्थर बना दिया l धोबी का पत्थर आत्महीनता का अनुभव कर दुःखी रहता था l शिवलिंग को उसकी आत्मव्यथा का बोध था l वह उससे बोला ---- " मित्र ! तुम्हारा दुःख निरर्थक है l यह ठीक है कि मैं अपने समीप आने वालों को शांति प्रदान करता हूँ , किन्तु तुम तो निर्विकार भाव से हर किसी का मैल धोते हो l तुम्हारी साधना मुझसे कहीं बढ़कर है l सत्य तो यह है कि मेरे पास आने की प्रथम कसौटी तुम्ही हो l " शिवलिंग के ये मधुर वचन सुनकर धोबी घाट का पत्थर गदगद हो उठा , उसे अपना महत्त्व समझ में आया और आत्महीनता दूर हुई l
WISDOM -----
प्रकृति हमें हर पल संकेत देती है , लेकिन मनुष्य उसे समझता नहीं है या अपने विकारों में इस तरह बंधा हुआ है कि समझते हुए भी नासमझी करता है l हमारे देश में विजयदशमी पर रावण जलाया जाता है , प्रतिवर्ष यह रावण और बड़ा होता जाता है l धार्मिक आस्था भी है , रोजगार की द्रष्टि से भी पटाखे , मेला आदि से लोगों को कुछ न कुछ आमदनी हो जाती है , त्योहार के बहाने लोग खुशियाँ भी मना लेते हैं l इन सब बातों से अलग हटकर प्रकृति के खेल निराले हैं l यदि विजयदशमी के दिन बहुत तेज पानी बरस जाए तो असुरता को छिपाने के बहुत तरीके हैं l रावण , कुम्भकरण , मेघनाद सभी पुतले रूपी असुरों को छिपा लिया जाता है , इसी में प्रकृति का सन्देश छिपा है कि अपने ऊपर अच्छाई का आवरण डालकर अपने भीतर बैठी कामना , वासना , तृष्णा , छल , कपट , षड्यंत्र , लोभ , लालच , अति महत्वाकांक्षा जैसी दुष्प्रवृतियों को मत छिपाओ , ये दुष्प्रवृत्तियाँ व्यक्ति को जीता -जगता रावण बना देती हैं , इनसे सारा संसार त्रस्त है l जैसे सद्गुण वंशानुगत हैं , अभिमन्यु ने गर्भ में ही चक्रव्यूह सीख लिया वैसे ही ये बुराइयां, दुष्प्रवृत्तियाँ भी वंशानुगत है , पीढ़ी -दर -पीढ़ी चलती रहती हैं और सन्मार्ग दिखाने वाला कोई न हो तो बढती जाती हैं रावण ने असुरों का ही साम्राज्य खड़ा किया , एक लाख पूत , सवा लाख नाती सब असुर थे l इसलिए प्रकृति हमें सिखाती है कि अपने भीतर की असुरता को मिटाओ l प्रकृति में क्षमा का प्रावधान नहीं है , उसके क्रोध से कोई बच नहीं सकता l
4 October 2022
WISDOM ---
1. वटवृक्ष की पूजा होते देख रेगिस्तान को क्रोध आया l पूजा करते लोगों को लताड़ कर बोला --- " मूर्खों ! एक पेड़ की क्या पूजा करते हो ? मुझे देखो ! मेरा विस्तार मीलों तक है , उसमें एक नहीं अनेकों पेड़ समा जाएंगे l " ऊपर फैले हुए आसमान ने रेगिस्तान को टोक कर बोला --- " अभिनन्दन विस्तार का नहीं , विशालता का होता है l वटवृक्ष तुमसे विस्तार में छोटा ही सही , पर अपने ह्रदय की विशालता के कारण सैकड़ों को जीवन और आश्रय प्रदान करता है l ये पूजा उसी सह्रदयता की हो रही है l " रेगिस्तान का मुंह लज्जा से नीचे झुक गया l
2 . दक्षिणेश्वर में माँ काली की पूजा का आयोजन हुआ l दूर -दूर से लोग आए l पूजा के बाद भोग का वितरण हुआ l जब सब श्रद्धालु अपने -अपने घरों को लौट गए , तब स्वामी रामकृष्ण परमहंस उठे और लोगों की झूठी पत्तलों को उठा -उठाकर फेंकने लगे l यह देखकर मंदिर का पुजारी दौड़ा आया और उनसे बोला ---- " हे भगवन ! ये आप कैसा पाप चढ़वाते हैं ? यह सब काम करने के लिए तो मजदूर भी हैं l " रामकृष्ण परमहंस बोले ---- " मैं केवल पत्तलों को नहीं फेंक रहा l मैं तो अपने अहंकार को भी उठाकर फेंक रहा हूँ l भगवान की तरफ जाने वाली सीढ़ियाँ विनम्रता के ही रास्ते से जाती हैं l जो विनम्रता की और निरहंकारिता की साधना कर लेते हैं , माँ काली उन्ही के ह्रदय में वास करती हैं l "
WISDOM -----
राम -रावण युद्ध समाप्त हुआ l महाबली रावण के अतिरिक्त युद्ध में कुम्भकर्ण की भी मृत्यु हुई l कुम्भकर्ण के पुत्र का नाम मूलकासुर था l मूलकासुर जब बड़ा हुआ तो उसके मन में प्रतिशोध की भावना बलवती हुई l घनघोर तपस्या कर उसने अपार शक्ति अर्जित कर ली और वरदान प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु किसी नर के हाथों नहीं होगी l इसके उपरांत उसने राक्षसों और असुरों की सेना एकत्र कर लंका पर चढ़ाई कर दी l लंकापति विभीषण ने अपनी हार प्रत्यक्ष देख भगवान राम से सहायता मांगी l मूलकासुर को वरदान था कि वह किसी नर से पराजित नहीं होगा , इस स्थिति में भगवान राम ने सीता से अनुरोध किया l माता सीता ने वहां पहुंचकर भगवती का रूप धारण कर मूलकासुर का वध किया l आदिशक्ति के हाथों असुरता का संहार हुआ l