कहते हैं कोई भी संस्कृति तभी तक जीवित रहती है जब तक उस देश के लोगों का चरित्र श्रेष्ठ होता है l सारे सद्गुण जैसे --सत्य , अहिंसा , कर्तव्यपालन , ईमानदारी , संवेदना , रिश्ते में शुचिता , दया , करुणा , परस्पर प्रेम आदि सभी सद्गुण मिलकर व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं l जब व्यक्ति पतन की राह पर चल देता है तब उसका पतन इतनी तेजी से होता है जैसे कोई गेंद बड़ी तेजी से नीचे गिरती है l पुरुष और नारी से मिलकर ही यह समाज बना है जिसमे अमीर , गरीब , ऊँच -नीच , विभिन्न जाति और धर्म के लोग हैं l अब यह मनुष्य को ही चुनाव करना है कि उसे कौन सी राह पसंद है --- उत्थान की या पतन की l समाज का पतन जब होता है तो चारों दिशाओं से ही होता है --कहीं गरीबी , मज़बूरी , दंगे , युद्ध आदि के समय मौके का फायदा उठाना आदि अनेक कारण है जो पीड़ित को तरक्की की राह में आगे नहीं बढ़ने देते l दूसरी ओर समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो शिक्षित है , समर्थ है लेकिन दूषित सामाजिक वातावरण , अश्लील फिल्म , सस्ते साहित्य का असर और अपनी मानसिक कमजोरियों के कारण स्वेच्छा से ही चारित्रिक पतन के रास्ते पर चल देता है l मुखौटा लगाकर सभ्य होने का ढोंग रचता है l इन सब कारणों से व्यक्ति का आत्मबल कम हो जाता है और पीढ़ी -दर -पीढ़ी पतन होता जाता है l भगवान श्रीकृष्ण का पूरा वंश अति धन वैभव के कारण भोग -विलास में लिप्त हो गया था , वे सब आपस में ही लड़ मरे और पूरी द्वारका समुद्र में डूब गई l आज जरुरी है कि हर व्यक्ति अपने ही अंतर में , अपने ह्रदय में झांके कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अपने जीवन के कौन से उदाहरण पेश कर के जा रहा है और कौन से संस्कार दे कर जा रहा है l बबूल के पेड़ में कभी आम नहीं लगता l
23 July 2023
22 July 2023
WISDOM ----
पुराणों में अनेक कथाएं हैं जिनमें यह बताया गया है कि असुर बड़े तपस्वी होते हैं , वे कठोर तपस्या कर के ईश्वर से वरदान प्राप्त कर लेते हैं l तपस्या से शक्ति तो प्राप्त हो जाती है लेकिन असुर संवेदनहीन होते हैं इसलिए वे अपनी शक्ति का दुरूपयोग करते हैं l असुर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होता जिसके बड़े -बड़े सींग हों , डरावनी शक्ल हो l व्यक्ति में यदि दुर्गुण ज्यादा हैं , उसके कर्म दूसरों को कष्ट देने वाले हैं तो वह असुर है l पुराण में कथा है ---- भस्मासुर की l इसने कठिन तपस्या कर के शिवजी से वरदान प्राप्त कर लिया था कि वह जिसके सिर पर हाथ रख दे , वह भस्म हो जाये l ऐसा वरदान पाकर वह अहंकार से मतवाला हो गया और प्रजा पर अत्याचार करने लगा l असुरता के राज्य की सबसे बुरी बात यह होती है कि वह असुर स्वयं तो प्रजा पर अत्याचार करता है , उसके राज्य में उसके आधीन जितने भी अधिकारी , कर्मचारी और राज्य के अन्य ताकतवर लोग होते है वे अपने -अपने तरीके से प्रजा का शोषण व अत्याचार करते हैं l प्रजा पर दोहरी मार हो जाती है l भस्मासुर के अत्याचार से दुःखी होकर प्रजा ने भगवान से प्रार्थना की कि इस अत्याचारी से हमारी रक्षा करो l क्योंकि कोई भी उसके विरुद्ध एक शब्द बोलता , , उसकी आज्ञानुसार नहीं चलता , वह उसके सिर पर हाथ रख देता और वह व्यक्ति भस्म हो जाता l अहंकार व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है , उसने सोचा कि वह क्यों न शिवजी को ही भस्म कर दे और पार्वती जी से विवाह कर ले l उसके चापलूसों ने भी उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया l अब क्या था , वह चला शिवजी के सिर पर हाथ रखकर उन्हें भस्म करने l शिवजी क्या करें , वरदान देकर वह बंधे थे l अपनी समाधि से उठकर भागे l आगे -आगे शिवजी और पीछे -पीछे भस्मासुर ! भागते -भागते वे विष्णु लोक पहुंचे और भगवान से कहा कि मुझसे वरदान पाकर यह तो मुझे ही भस्म करना चाहता है , अब आप ही कोई तरकीब निकालो , जिससे इस असुर से मुझे और इसकी प्रजा को छुटकारा मिले l विष्णु भगवान मोहिनी रूप बनाकर बैठ गए l जैसे ही भस्मासुर शिवजी का पीछा करते विष्णुलोक पहुंचा , वहां इस मोहिनी रूप को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठा l अब शिव -पार्वती सबको भूलकर वह इस मोहिनी रूप पर बावला हो गया l मोहिनी बने विष्णु जी ने कहा ---मुझे पाना है तो मेरे साथ नृत्य करो जैसी मेरी मुद्रा हो वैसी ही तुम करो l नृत्य करते -करते विष्णु जी ने अपने सिर पर हाथ रखा l भस्मासुर तो मोहिनी रूप में खो चुका था , उसने भी अपने सिर पर हाथ रखा , और वह तत्काल ही भस्म हो गया l शक्ति के साथ सद्बुद्धि और संवेदना भी जरुरी है , अन्यथा वह उसे पाने वाले को भस्मासुर की तरह ही नष्ट कर देती है l
21 July 2023
WISDOM -----
20 July 2023
WISDOM -----
पुराण की कथाएं मनुष्य को जीवन जीने की शिक्षा देती हैं l ---- ' योगवासिष्ठ ' में भगवान राम को महर्षि वसिष्ठ उपदेश दे रहे थे l इसी बीच वे लघुशंका हेतु गए l लघुशंका के दौरान वे जोर से हँसे l रामचंद्र जी ने सोचा, इतने बड़े महर्षि लघुशंका के दौरान हँस रहे हैं ! क्या उन्हें इतना ज्ञान नहीं है कि इस समय कोई भी क्रिया नहीं करनी चाहिए l जब लौटकर आए तो श्रीराम ने पूछा ---- " भगवान क्या बात थी , आप हँसे क्यों ? ऐसे समय में आपको हँसी आना किसी विशेष रहस्य का कारण है ? " महर्षि बोले ---- " मैं एक द्रश्य देखकर हँस पड़ा l एक चींटा नीचे नदी के प्रवाह में बहा जा रहा था l वह चींटा नौ बार इन्द्रपद पर रह चुका है , पर अपने भोग के कारण वह चींटे की योनि को प्राप्त हुआ है l " आचार्य श्री लिखते हैं ---- हम -आप कल्पना कर सकते हैं कि जब इन्द्रपद प्राप्त करने वाले की यह स्थिति है तो हमारी -आपकी क्या स्थिति होगी l " यह सत्य है कि मनुष्य स्वयं ही अपने कर्मों द्वारा यह तय कर लेता है कि उसको अगले जन्म में कौन सी योनि मिलेगी l मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है l मनुष्यों से मिलकर ही परिवार , समाज और राष्ट्र बना है l एक मनुष्य को उसके कर्मों का फल तो मिलता ही है , लेकिन उसके कर्म उसके परिवार , समाज और राष्ट्र की दिशा को भी तय करते हैं l छल , कपट , षडयंत्र , धोखाधड़ी , अनैतिक , अमर्यादित कार्य , विभिन्न अपराध कोई अकेला नहीं करता , उसमे समाज का बहुत बड़ा तबका जुड़ा होता है l भौतिक द्रष्टि से चाहे उनके पास धन -वैभव हो लेकिन मानवीय द्रष्टि से वे परिवार और समाज को पतन के गर्त में और निम्न योनियों में ले जाते हैं l संसार में सुख शांति के लिए जरुरी है कि ' विकास ' को भौतिक द्रष्टिकोण से नहीं , इंसानियत के आधार पर परिभाषित किया जाये l इस आधार पर यदि विभिन्न देशों का निष्पक्ष सर्वेक्षण किया जाये तो यह सत्य सामने आएगा कि विकास ने मनुष्य को क्या बना दिया --- पशु , नर पशु , पिशाच या खूंखार पशु ! इनसान तो बहुत ही कम होंगे l विभिन्न योनियाँ तो मृत्यु के बाद ही मिलती हैं लेकिन व्यक्ति के गलत कार्य उसे पशु और जिन्दा प्रेत बना देते हैं जो न तो स्वयं चैन से रहता है और न दूसरों को चैन से जीने देता है l मनुष्य बुद्धिमान है इसलिए वह अपने इस रूप पर आदर्शवादी और समाजसेवी होने का आवरण डाल लेता है l आज जरुरी है कि हर व्यक्ति ईश्वर से सद्बुद्धि की प्रार्थना करे , ईश्वर हमें विवेक दें जिससे हम किसी व्यक्ति की सच्चाई को , उसके असली रूप को समझकर जागरूक रहें l
18 July 2023
WISDOM -----
यदि आपको तनाव रहित जीवन जीना है , संसार में निडर होकर , निश्चिन्त रहकर जीना है तो ईश्वर के सच्चे भक्त बनिए l क्योंकि जो सच्चा ईश्वर भक्त है , उसके लिए ईश्वर ही पर्याप्त है , वह संसार में किसी से कोई उम्मीद नहीं रखता l उसे मृत्यु का भी डर नहीं होता क्योंकि उसे पता है कि उसके जीवन की डोर भगवान के हाथ में है l भगवान और भक्त का एक अटूट रिश्ता होता है l भक्त हर पल भगवान का स्मरण करता है तो भगवान भी अपने भक्त का स्मरण करते हैं l -------- यह अधिकार मात्र नारद जी को प्राप्त था कि वे जब चाहे श्रीकृष्ण के अंत:पुर तक चले जाते थे , कहीं भी कोई उन्हें टोकता नहीं था l एक बार नारद जी द्वारका पहुंचे तो देखा भगवान कहीं दीख नहीं रहे हैं l रुक्मणी जी के पास पहुंचे और पूछा ---- " प्रभु कहाँ विराज रहे हैं ? दिखाई नहीं दे रहे हैं l " रुक्मणी जी ने पूजा घर की ओर संकेत किया और कहा ----" वहां बैठे जप कर रहे हैं l " नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ l वे पूजा घर पहुंचे तो देखा भगवान ध्यानस्थ हैं l थोड़ी देर में उन्होंने आँखें खोली और देवर्षि का हँसकर स्वागत किया l नारद जी ने पूछा ---- " भगवान ! सारी दुनिया आपका ध्यान करती है l आप किसका ध्यान करते हैं ? " भगवान श्रीकृष्ण ने गंभीर होकर कहा ---- " देवर्षि ! मैं सदा अपने भक्तों को स्मरण करता हूँ l " देवर्षि को एक नई अनुभूति हुई कि भक्त , भगवान के ह्रदय में बसते हैं , भगवान अपने भक्तों को कभी नहीं भूलते l
WISDOM --------
कांची नरेश की राजकुमारी प्रेत बाधा से पीड़ित हुई l भूत सामान्य नहीं , ब्रह्मराक्षस था l तब श्री रामानुज को बुलाया गया l उन्होंने वहां जाकर पूछा ---- " आपको यह योनि क्यों मिली l " रोकर ब्रह्मराक्षस बोला ---- " मैं विद्वान् था , किन्तु मैंने अपनी विद्या छिपा कर रखी l किसी को भी मैंने विद्या दान नहीं किया , इससे ब्रह्मराक्षस हुआ l आप समर्थ हैं , मुझे इस प्रेतत्व से मुक्ति दिलाइये l " श्री रामानुज ने राजकुमारी के मस्तक पर हाथ रखकर , जैसे ही भगवान का स्मरण किया , वैसे ही ब्रह्मराक्षस ने उसे छोड़ दिया , और वह प्रेत योनि से मुक्त हो गया l उस दिन से श्री रामानुज ने प्रतिज्ञा की कि वह स्वाध्याय का लाभ समाज को भी देंगे l आज संसार में इतनी नकारात्मकता है , युद्ध , दंगे , तनाव , छल कपट , षड्यंत्र , प्राकृतिक आपदाएं - नकारात्मक शक्ति प्रबल है l दो विश्व युद्ध हुए , बीते युग में अनेक छोटे , बड़े युद्ध , विभाजन की त्रासदी और युद्ध के नाम पर निर्दोष और कमजोर को सताना , अकाल मृत्यु --- इन सबके कारण कितनी ही अशांत आत्माएं हैं , जो मुक्त नहीं हो पायीं l पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी कहते हैं --- गायत्री मन्त्र से प्रकृति को पोषण मिलता है , प्रकृति में व्याप्त नकारात्मकता दूर होती है l इसलिए व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो उसे गायत्री मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए l मनुष्य तो अपनी महत्वाकांक्षा , ईर्ष्या , द्वेष के कारण युद्ध आदि से पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है , लेकिन गायत्री मन्त्र से जब प्रकृति में व्याप्त नकारात्मकता दूर होगी तब संसार में भी सुख -शांति स्वत: आ जाएगी l
15 July 2023
WISDOM ------
बुझते दीपक को देखकर अंधकार ने ठहाका लगाया और कहा ---- " क्यों आ गया न तेरा अंत l छोटा सा दीपक और अंधकार को चुनौती देने चला था l " दीपक बोला --- " बंधु ! अंत तो इस संसार में हर एक का निश्चित है l यदि हमेशा उजाला नहीं रहता तो हमेशा अँधेरा भी नहीं रहता l प्रश्न इस बात का है कि हमने किस उदेश्य के लिए जीवन जिया और अंत में कैसी भावनाएं रखीं l मुझे संतोष है कि मैं औरों के हित जिया और औरों के हित मरा l ' ---- जार्ज बर्नार्ड शा का जब अंत निकट आ गया तो उन्होंने अपने सेक्रेटरी से कहा कि वह कोर्ट से एक वकील को बुलाएँ l वकील के आने पर उन्होंने डाक्टरों के सामने ही अपनी वसीयत लिखवाई ---- मैं जार्ज बर्नार्ड शा शपथ पूर्वक कहता हूँ कि मेरी अंतिम इच्छा है कि जब मैं इस संसार से और अपने इस भौतिक शरीर से आजाद हो जाऊं और जब मेरे शव को कब्रिस्तान ले जाया जाए तो उस वक्त मेरी शव यात्रा में प्रथम श्रेणी में पक्षी , द्वितीय में भेड़ें , मेमनें , गायें और अन्य सभी तरह के चौपाये और तृतीय में पानी में रहने वाले जीव होंगे l इन जीवों के गले में एक विशेष कार्ड बंधा होगा l जिस पर अंकित होगा ---' हे प्रभु ! हमारे हितचिन्तक जार्ज बर्नार्ड शा पर दया करना , जिसने दूसरे जीवों की रक्षा के लिए अपना जीवन निछावर कर दिया l " कहा जाता है कि अपनी इस इच्छा को लिखवाने के बाद जार्ज बर्नार्ड शा ने प्राण त्याग दिए और उनकी अंतिम इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्हें कब्रिस्तान तक पशु -पक्षियों के एक जुलूस के साथ पहुँचाया गया l जार्ज बर्नार्ड शा जीवन भर अंडा और मांसाहार से दूर रहे l एक बार बहुत बीमार होने पर डॉक्टर ने उन्हें अंडा और मांस का शोरबा लेने को कहा लेकिन उन्होंने इसे लेने से इनकार कर दिया l उनके ह्रदय की संवेदना , करुणा और प्रेम संसार के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं l